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हर्षित: मूवी रिव्यू

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मेल गिब्सन, अंजन दत्ता और विशाल भारद्वाज जैसे लीजेंड्स के बाद अगर कोई फिल्ममेकर शेक्सपियर के ‘हेमलेट’ से प्रेरित होकर सिनेमा बनाता है, तो ये आम बात नहीं हो सकती है. फिल्मकार ध्रुव हर्ष ने शॉर्ट फिल्म ‘हर्षित’ बनाई है. फ़िल्म को पॉकेट फिल्म्स ने रिलीज़ किया है. और अब इसे अमेजॉन प्राइम पर देखा जा सकता है.

फ़िल्म की शुरुआत होती है शेक्सपियर की समयातीत पंक्तियों से:

Doubt thou the stars are fire

   Doubt the sun doth move

   Doubt truth to be a list

    But never doubt

    I love

शेक्सपीयर के नाटक हेमलेट का एक सीन.
शेक्सपीयर के नाटक हेमलेट का एक सीन.

कहानी है एक हिंदू लड़के हर्षित (सत्यजीत दुबे) और एक मुस्लिम लड़की राहिला (दीक्षा जुनेजा) की. ये एक-दूसरे को पसंद करते हैं. प्यार करते हैं. जबकि उनके दोस्त, परिवार और समूचा समाज इस रिश्ते के ख़िलाफ़ हैं. हर्षित इस रिश्ते को औपचारिक नाम देने और सार्वजनिक घोषणा की ज़िद पर अड़ा हुआ है. राहिला के परिवार और समाज को उनकी मोहब्बत के बारे में पता चलता है, तो दुखद घटनाओं का त्रासदीपूर्ण दौर शुरू होता है. जिससे प्रेमी-युगल, उनके दोस्त, परिवार और पूरा समाज मुतासिर हुए बगैर नहीं रह सके.

फ़िल्म के दूसरे पहलू में पितृसत्तात्मकता का मजहब को लेकर दोहरा म्यार भी दिखाया गया है. करीम ख़ुद तो एक हिन्दू ब्याहता मंजू से इश्क फरमाता है. लेकिन जब उसकी बेटी राहिला के एक हिन्दू हर्षित से मोहब्बत की बात पता चलती है तो उसका कत्ल कर देता है.

भले ही मज़हबी नफ़रत और पूर्वाग्रह दुनियावी रवायतों में, लोगों के ज़हनों में तंग नक़्शे खींच देती है. फ़िल्मकार ने कन्वे करने की कोशिश की है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद बाज़ मौकों पर उसके परे भी जाना मुमकिन है. दिलचस्प है कि फ़िल्मकार ने हर्षित और राहिला पर आख़िर तक ये भेद खुलने नहीं दिया कि दोनों एक ही पिता यानी करीम की संतानें हैं!

हर्षित, जिसकी बाद में हत्या कर दी जाती है. फिल्म में.
हर्षित, जिसकी बाद में हत्या कर दी जाती है. फिल्म में.

सर्वकालिक मशहूर नाटकों में से एक ‘हेमलेट’ से प्रेरित होकर फ़िल्म बनाना चुनौतीपूर्ण तो होता ही है! ध्रुव ‘हेमलेट’ के सभी महत्त्वपूर्ण तत्वों और परतों को भारतीय समाज में ब्लेंड करते हुए एक मनोरंजक फ़िल्म बनाने में सफल हुए हैं. ध्रुव एक समर्थ कवि और नाटककार भी हैं, और प्रयागराज में अपने डॉक्टरेट के दौरान जनवादी लेखक संघ से भी जुड़े रहे. धार्मिक वैमनस्य और पूर्वाग्रहों को देखने का उनका अपना नज़रिया है. फिल्म की शूटिंग 2017 में हुई थी. तब तक अनुभव सिन्हा की ‘मुल्क़’ परदे पर नहीं आयी थी. साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले फ़िल्ममेकर को फ़िल्म बनाने के बाद पोस्ट-प्रोडक्शन की मुश्किलों से भी दो चार होना पड़ता है.

शेक्सपीरियन एलिमेंट्स:

‘हर्षित’ में ‘हेमलेट’ के सारे मूलभूत तत्व हैं- इडिपस कॉम्प्लेक्स, नफ़रत, बदला, द्वन्द, ऊहापोह, अपराध-बोध, सेक्सुअल जैलेसी और पोएटिक जस्टिस. भारत में इंग्लिश लिटरेचर के ज्यादातर विद्यार्थियों के पसंदीदा होते हैं- शेक्सपियर, जॉन कीट्स और पीबी शेली सरीखे कवि. शायद इसकी एक वजह हो सकती है इन कवियों की उर्दू शायरों से दिलचस्प समानताएं मसलन अपनी माशूक़ से मुख़ातिब होकर कविताएं कहना- उनमें भी बाजदफ़ा शिकायतें, अर्ज़ियां, मिन्नतें और मालामतें करना.

ध्रुव ने भी कमाल अमरोही और वज़ाहत मिर्ज़ा जैसे दानिशवर स्क्रीनराइटर्स की स्टाइल में शेक्सपियर के ‘ब्लैंक वर्स’ को अडॉप्ट करने की कोशिश की है.

हर्षित राहिला से कहता है-

तेरे इश्क़ ने मुझे फ़िदायीन बना दिया. फिर फ़नाई से क्या ख़ौफ़ खाना?

एक दृश्य में लड़कों के पूर्वधारणाओं और विद्वेष से परिचित राहिला संशय के क्षणों में हर्षित से पूछ बैठती है:

तुम हव्वा की बेटी से मोहब्बत करते हो या मुसलमानी ज़िस्म से?

सालिलक्वी (आत्मभाषण) को अलग से तो नहीं फ़िल्माया गया है लेकिन दृश्यों में किरदारों की अभिव्यक्तियों में वो द्वंद और अपराध-बोध स्पष्ट दिखता है.

राहिला और हर्षित, जिन्हें धर्म की वजह से अलग कर दिया जाता है.
राहिला और हर्षित, जिन्हें धर्म की वजह से अलग कर दिया जाता है.

हैदर से निस्बत

ध्रुव कहते हैं कि अगर उन्होंने ‘हैदर’ न देखी होती तो शायद उनको ‘हर्षित’ बनाने का ख़याल भी न आता! हालांकि ‘हर्षित’ की कहानी और बैकग्राउंड ‘हैदर’  से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ है. जैसा कि गुलज़ार विशाल भारद्वाज के शेक्सपियर के अडॉप्टेशन्स के बारे में कहते हैं कि विशाल बनाते वही हैं जो उनको बनाना होता है. बस शेक्सपियर का नाम ले लेते हैं. किसी हद तक ध्रुव के बारे में भी ये बात सटीक मालूम पड़ती है.

ध्रुव के सामने ये चैलेंज था कि उनकी फिल्म “हैदर” से अलग रहे. लेकिन फ़िल्मकार के अचेतन में विशाल के विजुअल्स रहते हैं और गाहे-बगाहे दृश्यों में उभर आते हैं. मसलन समंदर किनारे बच्चे का खोपड़ी से खेलना, या हर्षित का अपनी मां के पास बैठकर ग़ालिब को पढ़ना. इसी तरह मूल “हेमलेट” में प्रोटागनिस्ट की मौत हो जाती है लेकिन “हैदर” और ”हर्षित” में नहीं.

फिल्म हैदर न होती, तो शायद ही हर्षित बनाई जाती.
फिल्म हैदर न होती, तो शायद ही हर्षित बनाई जाती.

क्या बेहतर हो सकता था:

सबसे बड़ी दिक़्क़त तो फ़िल्म की अवधि ही है. घटनाएं और दृश्य सामान्य से ज़्यादा तेजी से घट रहे हैं. ऐसा लगता है जहां थोड़ा ठहराव चाहिए वहां भी फ़िल्ममेकर को रुकने की इजाज़त नहीं. ओरिजिनल प्ले “हेमलेट” की अवधि चार घंटे से अधिक है. मेल गिब्सन की “हेमलेट” सवा दो घंटे की और “हैदर” तो तक़रीबन दो घंटे पैंतालीस मिनट की. ज़ाहिर है कि “हर्षित” के लिए 25 मिनट कम हैं. इसी वजह से हर्षित का द्वन्द और करीम का अपराध-बोध भी खुलकर नहीं दिख पाता.

साउंड का काम बेहतर किया जा सकता था. लोकेशंस का दोहराव खटकता है.

क्या बेहतर है:

हर्षित के किरदार में सत्यजीत दुबे और राहिला के किरदार में दीक्षा का अभिनय औसत है. मंजू की भूमिका में में नताशा राणा के चेहरे पे एक बेटे की मां की ममता है और पति के कातिल की अय्यारगी भी. फ़िल्म में सबसे बेहतर अभिनय किया है करीम की भूमिका निभाने वाले अभिषेक पांडे ने. कैमरे के पीछे सिनेमैटोग्राफर अंकुर राय का काम उम्दा है. विकी कौशल का बैकग्राउंड स्कोर प्रभावी है. उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल की कविता “दिन हिरन सा चौकड़ी भरता चला” को भी कर्णप्रिय सुरों में पिरोया है. कुल मिलाकर पच्चीस मिनट की फ़िल्म है. आप अपने मोबाइल पर भी एक सिटिंग में आराम से “हर्षित” देख सकते हैं.

[दीपांकर शिवमूर्ति प्रयागराज में रहते हैं. स्वतंत्र लेखक, कवि और टिप्पणीकार हैं. समाज, साहित्य, सिनेमा, संस्कृति और सियासत सरीखे मुख़्तलिफ़ विषयों पर लिखते रहते हैं.]


वीडियो देखें : लाल कप्तान: मूवी रिव्यू

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