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ऐसे ही चला तो नरेंद्र मोदी की कविता वाली किताब के साथ ये 9 किताबें भी बैन हो जाएंगी!

बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस सारंग कोतवाल ने War and Peace पर जो कहा, उससे दो कीवर्ड काफी ट्रेंड हो रहे हैं-

# ‘मोदी’, जो ऑलमोस्ट हर चर्चा का फोकल पॉइंट बन जाते हैं, सो इसमें भी बने.

# ‘War and Peace’, क्यूंकि कोर्ट में बात इसी को लेकर कही गई थी.

वैसे जज साहब ने सफाई दे दी है कि वो लियो टॉल्स्टॉय वाली वॉर एंड पीस की बात नहीं कर रहे थे. वो बिस्वजीत रॉय की लिखी ‘वॉर एंड पीस इन जंगलमहलः पीपल, स्टेट एंड माओइस्ट्स’ की बात कर रहे थे. लेकिन जब तक उनकी सफाई आती तब तक हाथ में किताब लिये मोदी जी तो वायरल हो ही चुके थे. इनके बारे में तो स्वातिलिख ही चुकी हैं. और साथ ही हमको ये आईडिया दिया कि क्यूं न एक ऐसा लिस्टिकल बनाया जाए जिसमें वो सब किताबें हों जिनपर बैन लग सकता है.

ट्रैफिक पुलिस के बारे में कहा जाता है कि अगर उसे किसी गाड़ी या ड्राईवर या दोनों से खुन्नस है तो उसकी रूल बुक में इतने नियम हैं कि ड्राईवर अपनी जेब ढीली किए बगैर उसके चंगुल से निकल ही नहीं सकता. इसी तरह चुल्लू भर रिसर्च कर चुकने के बाद ही हमें पता चल गया कि लगभग हर किताब ऐसी है, जिसे किसी न किसी आधार पर बैन हो जाना चाहिए-

# किसी किताब से लोगों के ऑफेंड होने के इतने कारण ढूंढें जा सकते हैं कि बाल साहित्य तक बैन हो जाए.

# ‘एडल्ट’,’क्राइम’ जैसे न जाने कितने ही कीवर्ड्स में से एक कीवर्ड तो हर किताब के साथ टैगित रहता ही है.

यूं अगर कोई लिस्ट बनाई जाए जिसमें बैन होने वाली किताब लिखनी हो तो उस लिस्ट में दुनिया की लगभग सारी ही किताबें आ जाएंगी. और वो लिस्ट, लिस्ट या कैटेलॉग न रहकर एक किताब, एक महाग्रंथ बन जाएगा. और इंट्रेस्टिंगली इस महाग्रंथ का नाम भी इस महागंथ्र में होगा. महाभारत की तरह- जिसमें वो सब कुछ है जिसका इस संसार में होना संभव है.

अब चूंकि महाभारत का ही नाम आ गया तो चलिए अपने लिस्टिकल का श्रीगणेश महाभारत से ही किया जाए. वो लिस्टिकल जिसमें ऐसी किताबें लिस्टेड हैं, जो आपके घर में हैं लेकिन जिनको आसानी से बैन किया जा सकता है. जिनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता कि ये बैन होंगी-

#1- नए युग का करें स्वागत-

महाभारत घर में क्यों हो? वैसे भी सयाने मना कर गए हैं कि घर में महाभारत नहीं रखनी चाहिए. झगड़ा होता है, मारपीट हो सकती है. किसी को मारने के लिए सड़क होती है, घर थोड़ी. महाभारत में क्या बताया गया है? भाई-भाई से जमीन के लिए लड़ गए. भाई को भाई से लड़ते और जीतते दिखाने वाली किताब नहीं चलेगी. समस्या ये भी है कि महाभारत में दार्द, हूण हुंजा, किंपुरुष , त्रिविष्टप , प्राग्ज्योतिष और हरिवर्ष जैसी जगहों का ज़िक्र आता है. आज के कानूनी मान्य मैप के हिसाब से ये फिट नहीं बैठते. इसलिए मिसलीडिंग हैं. महाभारत ये भी बताती है कि आदमी के लिए नॉलेज हानिकारक है. अर्जुन जब तक भाई-भाई-भाई कर रहे थे. सही आदमी थे. चाचा-दादा-भाई लोग को मारने से मना कर रहे थे. जैसे ही कृष्णजी ने नॉलेज दिया. अपनों को ही मारने पर उतर आए. बताइए. ऐसी कहानी से आदमी क्या सीखेगा?

#2- वो मारा पापड़ वाले को-

बांकेलाल जब छोटा था तो उसके पिता से मिलने शिव और पार्वती आए थे. बांकेलाल ने उनके पानी में मेंढ़क डाल दिया.

ये बांकेलाल सीरीज़ की पहली किताब थी. और मुखपृष्ठ देखें ज़रा.
ये बांकेलाल सीरीज़ की पहली किताब थी. और मुखपृष्ठ देखें ज़रा. (साभार- राज कॉमिक्स)

अब सोचिए कैसा हो यदि फिल्मों की तरह ही किताबों का कोई सेंसर बोर्ड हो और पुनः यदि उसे पता चले कि 90s’ के बच्चों का सुपरह्यूमरस सुपरहीरो blasphemy करते हुए Bless और Famous दोनों हो गया था? यूं बांकेलाल कॉमिक्स को आज से दशकों पहले बैन हो जाना था.

#3- कोस कोस पे बदले पानी, ‘शब्दकोष’ पे वाणी

बताइए कौन सी ऐसी किताब है, जिसमें कम से कम एक भाषा के सारे ‘अश्लील’, ‘उत्तेजक’ और ‘भौंडे’ शब्द कम से कम एक बार अंडर वन अंब्रेला आ जाते हों?  डिक्शनरी ऑफ कोर्स. हिंदी में बोले तो शब्दकोश. बस्स. आगे हमें कुछ नहीं कहना!

#4- ये बाबूभाई का इस्टाइल है-

खतरनाक किताबों की बात चली तो टेलीफोन डायरेक्टरी को भी लिस्ट में रखा जाना चाहिए. अव्वल तो ये किताब नहीं है. दूसरा अर्बन एरिया में ज़्यादा मिलती है. अर्बन नक्सलिज्म फैलने का खतरा होता है. तीसरा इसमें लैंडलाइन नंबर होते हैं, जिन पर वॉट्सऐप नहीं चलता. किताबें हाशिये पर धकेली गईं तो आदमी ज्ञान वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से लेता है. वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी को बढ़ने से रोके, ऐसी किताब घर में क्यों रहे. ऊपर से टेलीफोन डायरेक्टरी इतनी मोटी और भारी होती है कि खुद में पोटेंशियल हथियार होती है. आदमी इसकी चोट से, दबकर या कुचलकर ख़त्म किया जा सकता है. तो इसपर तो आर्म्स एक्ट के तहत बैन लगना चाहिए. और हेराफरी में परेश रावल के कन्फ्यूज़न का कारण भी यही डिक्शनरी बनी थी.

हेराफेरी में तीन स्टार और एक कॉमेडियन था. अक्षय, सुनील, परेश नहीं. स्टार फिशरी, स्टार गैराज और डिक्शनरी.
हेराफेरी में दो स्टार्स और एक कॉमेडियन थे. अक्षय, सुनील, परेश नहीं. स्टार फिशरी, स्टार गैराज और डिक्शनरी.

#5- किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने-

राम दूध पी, सीता पानी ला जैसे वाक्यों से भरी एक हिंदी की किताब हो याएक ही काम को 5 पुरुषों अथवा 10 महिलाओं द्वारा किए जाने वाले सवालों से भरी मैथ्स की किताब. ये सारी कोर्स की किताबें यकीनन स्त्री विमर्श को  एक कदम पीछे ले जाने वाली किताबें हैं. और इनमें सीरियसली, आई मीन सीरियसली बैन न भी लगे तो भी, इनकी एडिटिंग के बारे में विचार होना ही चाहिए.

बाकी कुछ पाठ्य पुस्तकें तो समय-समय पर परिवर्तित होती रही हैं. लेकिन बदलने वाली ज़्यादातर किताबें हिंदी या मैथ्स की नहीं हिस्ट्री की होती हैं. तो पाठ्य पुस्तकों को बैन करना हर सरकार के पाठ्यक्रम में होना चाहिए.

#6- बच्चे मन के सच्चे, सारी जग के-

नैतिक शिक्षा की किताबें भी बैन हो जाएंगी. क्या ही तो सिखाते हैं नैतिक शिक्षा की किताबों में, झूठ न बोलो, चोरी न करो. क्या आपको बच्चे झूठ बोलने वाले, चोरी करने वाले लगते हैं. जैसे देश सहिष्णु है तो आप उसे सहिष्णुता का पाठ नहीं पढ़ाते, वैसे ही ईमानदार बच्चों को बेईमानी न करने को भी नहीं कहेंगे. बच्चे भगवान का रूप होते हैं, भगवान को सही गलत सब पता है.

Black Board

इस तरह बच्चों को सिखाना, मने ऑलमोस्ट blasphemy.  भगवान के रूपों को नैतिक शिक्षा देने लायक नहीं हैं आप. एक बात और इस लॉजिक से लगभग सारी ही किताबें बैन सी होंगी, मतलब बच्चा कोई शब्द नहीं सीख पाएगा. नैतिक शिक्षा की किताब हाथ लगते ही वो स्वर सीखेगा, अ,आ,इ,ई.  पहली बात ही ‘अ’ सीखेगा जो नैतिक के आगे लग अनैतिक हो जाएगी. अपने बच्चे को देंगे आप अनैतिक शिक्षा?

#7- मेरा पेज बदल रहा है-

नरेंद्र मोदी की कविता की किताब भी घर पर नहीं रखी जाएगी. किसी इंसान को जानने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि आप उसका लिखा पढ़िए. कविताएं पढ़िए. अब अगर आप प्रधानमंत्री की लिखी किताब पढ़ेंगे, उनकी कविताएं पढ़ेंगे तो उनके बारे में सब कुछ जान जाएंगे. और प्रधानमंत्री को जानना देशहित में नहीं है. प्रधानमंत्री से जुड़ी हर जानकारी संवेदनशील जानकारी है. सरकार को चाहिए कि प्रधानमंत्री की हिफाज़त के लिए उनकी लिखी किताबों पर ही बैन लगा दे. इसलिए दरअसल मोदी की कविताएं, कविताएं नहीं ऐसे पुल की तस्वीरें हैं, जिसमें लिखा है कि सुरक्षा कारणों से इसकी तस्वीरें खींचना मना है. ये कविताएं नहीं किसी आरटीआई का जवाब है. और आरटीआई से सरकार का प्रेम तो पिछले महीने स्पष्ट रूप से देखने में आया था.

#8- ये जो ज़िंदगी की किताब है-

वैसे तो हर बायोग्राफी अपने आप में कॉन्ट्रोवर्सियल होती है. और बायोग्राफी ऐसी विधा है जिसपर प्रति पुस्तक बैन का घनत्व सबसे ज़्यादा और 1 के सबसे करीब है. लेकिन हम बायोग्राफी की नहीं उस पुस्तक की बात कह रहे हैं जिसके बारे में राजेश रेड्डी ने कहा है-

कहीं इक हसीन सा ख़्वाब है, कहीं जानलेवा अज़ाब है.

और अज़ाब पर तो लोग सर्वसम्मित से बैन लगाना चाहेंगे न. इसलिए राजेश रेड्डी द्वारा प्रपोज़्ड ‘ज़िंदगी’ की किताब पर भी लगाते हैं. अपनी नहीं तो दूसरे की ज़िंदगी पे. कभी गार्जन बनकर कभी गर्जन बनकर तो कभी ‘तार्जन’ (तारनहार) बनकर. कभी सूडान में, कभी ईरान में तो कभी अफगानिस्तान में. कभी बीमारी से, कभी लाचारी से तो कभी भुखमरी से. अच्छा है कि ऐसा कुछ हमारे देश में नहीं होता. (कुछ लेख भी बैन होते देखे गये हैं, अस्तु…)

#9-  कोरा काग़ज़ था ये बैन मेरा-

तो क्या किताब लिखते वक्त ऐसे जतन किए जा सकते हैं जिससे कि वो बैन ही न हो?

‘हां किए जा सकते हैं न. ऐसी किताब ‘लिखी’ जाए जिसमें कुछ ‘लिखा’ ही न हो.’

‘लेकिन शायद वो अपने नाम के वजह से बैन हो जाए.’

‘चलिए अगर उसका कोई नाम भी न हो?’

‘तो फिर तो वो कॉपी कहलाएगी न.’

‘चलिए फॉर एन आर्ग्युमेंट सेक उसे किताब ही कह लिया जाए, तो? तो क्या वो किताब बैन हो सकती है.’

‘एक नहीं कई कारणों से. अव्वल तो ऐसी पुस्तक से गांधीवादी आहत होंगे. वो कहानी तो पढ़ी होगी न आपने जिसमें- गांधी जी कूड़े से एक कागज़ उठाते हैं, क्यूंकि उसके पिछली तरफ कुछ नहीं लिखा था. और चूंकि उन्हें हर काग़ज़ में एक काटे जा चुके पेड़ की आत्मा दिखती थी, अतः वो पन्नों के खाली छोड़ दिए जाने के पक्ष में न थे. अब अगर आपने ये कहानी नहीं पढ़ी तो हो सकता है कि जिस पुस्तक में ये कहानी थी वो पुस्तक भी किसी कारण से प्रतिबंधित हो गई हो. लेकिन अगर पढ़ी है तो आप समझ सकते हैं कि खाली पन्नों को खाली छोड़ देना कुछेक की नज़र में उतना ही बड़ा क्राइम है जितना गेम ऑफ़ थ्रोंस का ‘फैन’ न होना.’

वैसे इंट्रेस्टिंग बात बताऊं, ऐसी किताब बिना गांधीवादियों के विरोध के बावज़ूद भी प्रतिबंधित होने वाली सबसे पहली किताब होगी. सोचिए जैसे बोलने की आज़ादी के लिए प्रदर्शन करने वाले लोग अपने मुंह को काले पट्टे या उंगली से बंद करके चलते हैं, सरकार को चिढ़ाने के लिए, वैसे ही बैन करने वाली संस्था को ये किताब मुंह चिढ़ाती हुई न लगेगी? प्रदर्शन का कोई नया तरीका न लगेगी? चाहे किसी भी रंग के पन्ने हों, ये किताब, लाल किताब न कहलाएगी, कॉमरेड?

#10- लालिमा सुनाओ मुझे एक कहानी- 

मेरी कलीग लालिमा ने एक आपबीती, आई मीन भाई बीती सुनाई. आप भी पढ़िए-

मेरा भाई 11 साल का था. उस वक्त वो 6वीं में था. उसके स्कूल की लाइब्रेरी बहुत बड़ी. इतनी बड़ी की पूरे शहर की सार्वजनिक लाइब्रेरी थी. इधर पर घर पर मम्मी बार-बार मेरे भाई से कहती-

इतनी बड़ी लाइब्रेरी है. कोई भगवान वाली किताब लेकर आ. अच्छी किताबें पढ़ा कर.

मम्मी की रोज़-रोज़ की बातें सुनकर भाई ने लाइब्रेरी कार्ड बनवा ही लिया. एकदम मन में डिसाइड कर लिया कि अब तो ‘भगवान वाली’ अच्छी किताब लेकर रहूंगा और पढ़ूंगा. फिर क्या वो यही सोचते हुए लाइब्रेरी गया. बहुत खोजा एक किताब उसे दिखी. नाम था- ‘कामसूत्र’. लाइब्रेरी वाले सर ने वो किताब मेरे भाई को इश्यू भी कर दी. वो लेकर घर आ गया. खुश होकर मम्मी को दिखाया और कहा-

देखो मम्मी, मैंने आपके कहने पर भगवान वाली अच्छी किताब लाई है. आप इसे पढ़ो. मैं भी पढ़ूंगा.

किताब का नाम देखकर मम्मी का माथा चकरा गया. भाई को तुरंत आदेश दिया गया कि वो लाइब्रेरी वापस जाए, और किताब रिटर्न कर दे. बेचारा भाई मम्मी से पूछता रहा कि क्या हुआ, वो डांट क्यों रही हैं. लेकिन मम्मी ने कहा-

जितना बोली हूं, उतना करो.

भाई मन में ढेर सारे सवाल लिए, लाइब्रेरी वापस गया और किताब रिटर्न कर दी. उसे समझ ही नहीं आया कि आखिर उसने ऐसा क्या कर दिया कि मम्मी ने उसकी क्लास लगा दी. अब उसे कौन बताता कि वो जो किताब लेकर आया था, वो बहुत ‘खतरनाक’ थी घर पर रखने के लिए.


अंततः– अगर फ्यूचर में हम ‘ऐसे आर्टिकल्स जिनपर बैन लगना चाहिए’ टाइप्स कोई लिस्टिकल बनाएं, तो हम नहीं चाहेंगे कि उसमें हमारे इस आर्टिकल के बारे में भी जानकारी दी गई हो. इसलिए (बावजूद इसके कि आप जानते हैं, मगर दूसरा तो नहीं जानता न) हम ये बताना चाहते हैं कि इस लेख का उद्देश्य सिर्फ आपका मनोरंजन भर करना था. और सारी बातें उतनी ही काल्पनिक थीं, जितनी ये अंतिम बात.


इसे लिखने में आशीष के ‘विशेषज्ञ’ ज्ञान की काफी हेल्प ली गई है.


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