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बच्चों को सेक्स एजूकेशन दो, उनके कहीं और फंसने से पहले

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संदीप माहेश्वरी बिजनेसमैन हैं. इमेजेज़बाजार के फाउंडर. उससे एक कदम आगे इंस्पिरेशनल स्पीकर हैं. माने प्रेरक स्पीच देते हैं. इनकी बातें सुनने के लिए सेशन लगते हैं. इनका नया वीडियो आया है. जिसमें वो हमारी सोसाइटी में सेक्स एजूकेशन की जरूरत बता रहे हैं. सच्ची बात तो यही है. कि इस पर बात करने की जरूरत बहुत ज्यादा है. क्योंकि अभी जो रेप, इनसिक्योर सेक्स, ब्लैकमेलिंग और सेक्स मजे से ज्यादा सजा वाला माहौल बना है न. उसकी एक सबसे बड़ी वजह सेक्स एजूकेशन की कमी है. हमको लगा कि संदीप की बात आपको भी सुननी चाहिए. पढ़नी चाहिए. और आगे बढ़ानी चाहिए.

इस सेशन में बच्चों की मैम, यानी टीचर ने ये सवाल पूछा. 

इंटरनेट पर एंटरटेनमेंट के नाम पर जो वल्गैरिटी यूथ और 10-12 साल के बच्चे पढ़ रहे हैं, देख रहे हैं. जिस उम्र में हम चाचा चौधरी पढ़ते थे उस उम्र में वो पोर्न में जकड़ रहे हैं. उसको कैसे रोका जाए?

फिर संदीप ने दिया जवाब. हम बचपन में स्पाइडर मैन के जाल में फंसे थे. वो किसी और जाल में फंसे हैं. 20 साल में सोसाइटी बहुत चेंज हुई है. इंटरनेट की वजह से. अगर आज के दौर को समझना है तो आजकल की फिल्में देखो. यूट्यूब पर करोड़ों वीडियो और उन पर आए व्यूज देखो. उनसे सोच पता चलती है. जो सोचेंगे, वही करेंगे.

आज यूथ का सवाल होता है “शादी से पहले सेक्स सही है या नहीं?” घर पर ये सवाल पूछें तो पैरेंट्स जवाब देने के बजाय कंटाप देंगे. इसके जवाब वो घर से बाहर, अपनी उम्र के दोस्तों में तलाशते हैं.

हमारी सोसाइटी की प्रॉब्लम ये कि चूहे बिल्ली सा हाल है. चूहा आंखें बंद करके सोचता है कि बिल्ली मुझे नहीं देख रही. माने जब तक अपने बच्चे कुछ गड़बड़ न कर दे तब तक उनके मां बाप को लगता है हमारे बच्चे ऐसा कुछ कर ही नहीं सकते. जागते तब हैं जब कुछ गलत हो जाए.

सोचो अगर बेटी का अबॉर्शन कराने की नौबत आ जाए. तो खूब रायता फैलेगा. पहले तो मार कुटाई होगी. बाद में जो होगा सो होगा. लेकिन इसके पहले? उसके पहले क्या कभी पैरेंट्स ने, टीचर्स ने, स्कूल ने या गवरमेंट के सेक्स एजूकेशन टूल के थ्रू कभी किसी तरह की बात करने की कोशिश की? इन चीजों के बारे में? नहीं की.

उसके आगे संदीप एग्जांपल देते हैं सिमरन और राज का. अगर इन दोनों के बारे में नहीं जानते तो आई एम सॉरी. हम जवाब आगे बढ़ाते हैं. “कि लड़की यानी सिमरन पूछेगी राज से. और राज कैसे बताएगा? वो सिमरन को ले जाएगा खेतों में. वो राज से पूछेगी क्योंकि राज के बारे में घरवालों को कुछ पता नहीं है.”

अब ये सारे लोग अपनी उम्र के दोस्तों से इसके बारे में बात करते हैं. वो दोस्त जो खुद भरे बैठे हैं. क्योंकि उन्होंने चाचा चौधरी नहीं पढ़ा है. ये खुद चाचा बने हैं. खुद चौधरी बने हुए हैं.

इसका सिर्फ एक सोल्यूशन समझ में आता है. कि पैरेंट्स को बच्चों की नजर से दुनिया देखनी होगी. उनके लेवल पर आकर बात करनी होगी. ताकि उनको सही गाइडेंस मिल पाए. और ये काम जितनी जल्दी हो जाए उतना अच्छा. प्रॉब्लम को इग्नोर करने से उसका सोल्यूशन नहीं निकलने वाला. ये सोचने से कि ये प्रॉब्लम तो सोसाइटी की है, दूसरों की है. ये सोचने से काम नहीं चलेगा.

पैरेंट्स को सोचना होगा कि उनका सब कुछ करना धरना उनके सपनों के इर्द गिर्द है. वो जॉब कर रहे हैं, बिजनेस कर रहे हैं. उसके पीछे सपना है. अपना घर चाहिए, गाड़ी चाहिए. और बच्चों का सपना? जो वो देख रहे हैं. अपने लैपटॉप में. किसी के लैपटॉप में 20 GB डेटा है किसी के 80 GB. किसी के पास नया माल है. वो उनका सपना बन रहा है.

अब दिक्कत ये है कि वो सब करने से पैरेंट्स उनको रोकेंगे. तो वो और करेंगे. इसका तरीका ये है कि वो उनके रोकने की बजाय उनका साथ दें. ये गोल्डन रूल है. कि दुनिया बदल रही है तो हम भी बदल सकते हैं. अपने बच्चों के साथ बढ़ सकते हैं.

इसका तरीका ये नहीं है कि उनके साथ बैठ के पोर्न देखें. तरीका ये है कि पहले उनको छूट दें सवाल करने की. फिर उन सवालों के सही सही जवाब दें. गोल मोल नहीं. इससे भरोसा कायम होगा. एक बंधन बनेगा. बच्चों और पैरेंट्स के बीच में. अगर ये नहीं करेंगे तो और उनको उल्टी सीधी कहानियां सुनाएंगे तो गैप और बढ़ता जाएगा. कि मम्मी पापा तो हमको बेवकूफ बनाते रहते हैं.

इस तरह भरोसा बढ़ने से क्या होगा? कि वो बच्चे अगर अपने दोस्तों से भी कुछ सुनेंगे तो उसके बारे में पैरेंट्स से बात करेंगे. तब ऐसा होगा कि कम से कम पैरेंट्स कुछ कर पाएंगे. अगर ऐसा नहीं करते फिर तो कुछ भी नहीं हो सकता.

उनसे ऐसी बात क्यों करें कि हमारे जमाने में ये होता था. तो तुमको भी ऐसा करना चाहिए. क्यों करना चाहिए? आप सुनते थे चंदा मामा की कहानियां सुन सुन के. वो सोते हैं कुछ और देख के, सुन के. जमाना बदल चुका है. अगर उनसे उस जमाने की बात करेंगे. तो डिस्कनेक्ट हो जाएंगे.

और सुनो. पैरेंट्स का “हमारे जमाने वाला” जुमला बड़ा सेलेक्टिव होता है. उस जमाने की बात पूछो. कि बॉबी फिल्म आई थी. कितनी बार गए थे देखने? कितने बार सुनते थे हम तुम इक कमरे में बंद हों. कितनी बार कमरे में बंद होते थे? क्या उस वक्त आप खुद को रोक पाए थे? नहीं. तो अपने बच्चों से क्यों एक्सपेक्ट करते हो? आज की जो सिचुएशन है. अगर इस सिचुएशन में उनके मां बाप को लाकर डाल दिया जाए तो उनका उससे भी बुरा हाल हो जाएगा.

पहले हमको अपने बच्चों को समझना है. अपने बच्चों को समझने के बाद हम उनसे बोलेंगे कि लल्ला/ लल्ली, तुम्हारी एज हो जाए 18 साल. उसके पहले ये करना कानूनन जुर्म है. फंस सकते हो. 18 के बाद तुम्हारी मर्जी. जो चाहे करो.

इतना कहने के बाद बच्चे आप पर ट्रस्ट करेंगे. माने भरोसा. वो आपकी बात को लॉजिकल मानेंगे. उसे सीरियसली सुनेंगे. उसके बाद आप उनको बता सकते हैं कि इसे करने के, और न करने के क्या फायदे-नुकसान हैं. करना है तो किस तरह करना है.

सबसे पहली चीज आप उसे समझाओगे कि जिसके साथ करने जा रहे हो. वो भरोसे लायक है. और ये एक ऐसी बात है जिसे सिर्फ आप बता सकते हैं. कोई दोस्त नहीं बताएगा. वो तो कहेगा “अबे कर ना. जो होगा देखा जाएगा.”

तो जब आप उसे भरोसे में लेकर बताओगे. कि मेरे बच्चे, तुम ये डिसीजन लेती/लेते हो. तो अगला तुम्हारे भरोसे लायक हो. हो सकता है तुम ये सोच रहे हो कि एक बार करके भूल जाओगे. और अगला न भूले. वो घर के चक्कर लगाने लगे. तुम्हारी वीडियो बना ले. या शादी हो जाए तुम्हारी किसी और से. वो वहां जाकर सीन क्रियेट कर दे. तो इन हालात में वो जिसके पास अपनी तकलीफ लेकर आए. वो पहले इंसान आप होने चाहिए. उसके मां बाप. अगर वो अपनी प्रॉब्लम लेकर बाहर दुनिया में जाते हैं. तो हर कोई उनका फायदा उठाने की सोचेगा. केवल पैरेंट्स उसका फायदा सोचेंगे.

सोचो कि लड़के ने अपनी गर्लफ्रेंड से कहा कि चलो चलते हैं. किसी होटल में. लड़की ने भी दिमाग नहीं लगाया. क्यों लगाएंगे? वो फिल्म देख रहे हैं. उसको ट्राई करने का सोचेंगे ही. इंसान हैं तो सोचेंगे. रोबोट हैं तो नहीं सोचेंगे. तो बिना दिमाग लगाए वो होटल में चले गए. और वह गलत जगह है. अगर उस होटल का मालिक पुलिस वाले को बुला ले. क्योंकि उसको होटल का कमरा देने पर मिलने वाला है सिर्फ पांच सौ रुपए. वो पुलिस वाला आपके बच्चों को पकड़ ले. तो बच्चे उनसे क्या कहेंगे? “मेरे मम्मी पापा से मत बताना.” आखिर क्या है ये? फिर वो ब्लैकमेल होंगे. पुलिस वाला पैसे मांगेगा. तब वो क्या करेंगे?

ये अभी बड़े पैमाने पर हो रहा है. लेकिन हम तब तक नहीं जागते. जब तक खुद हमारे यहां ऐसी गड़बड़ न हो जाए. याद रखो. इस दुनिया में सबसे सिक्योर जगह अपने मां बाप के साथ बच्चों का भरोसा है. इसके अलावा किसी और पर भरोसा नहीं कर सकते. आपके बच्चों का बेहतर भविष्य आपके अलावा कौन सोच सकता है.

किसी भी तरह का कम्युनिकेशन गैप दूर करने के लिए जरूरी है डिस्कशन. आप बात करना शुरू करो. वो अगर इसमें अपनी तरफ से सोच और बोल पाएं तो इससे बेहतर कुछ नहीं. उनको अप्रीसिएट करो. उसकी मम्मी से कहो कि इसका दिमाग कितना तेज हो गया है. आप उसका दिमाग तेज तब कहते हो जब वो पोयम याद कर ले. वो तो तोता भी कर लेता है. दिमाग में कोई भी चीज भर कर बोलने का काम तो रोबोट भी कर सकता है. लेकिन सोचने की क्षमता इंसान में ही हो सकती है. अगर वो अपना अच्छा बुरा सोच पाए. उसमें फर्क कर पाए. इससे बेहतर कुछ है ही नहीं.

तस्वीरों के माध्यम से ये देते हैं बच्चों को सेक्स एजूकेशन

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