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फ़िल्म रिव्यू: सनक

डिज़्नी+ हॉटस्टार पर इस फ्राइडे रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘सनक’. एक होस्टेज ड्रामा मूवी. करीब 2 घंटे लंबी ये ‘सनक’ हमने आते ही निपटा दी. कैसी थी ये ‘सनक’. मज़े आए या पक गए, इस पर आगे बात करेंगे

#होस्टेज ड्रामा

ये कहानी है विवान आहूजा की. विवान एक MMA ट्रेनर है. अपनी पत्नी अंशिका के साथ एक खुशहाल जीवन जी रहा है. एक दिन अंशिका की तबियत थोड़ी बिगड़ जाती है. अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है. जिस अस्पताल में अंशिका को भर्ती किया जाता है, उसी में इमरजेंसी कंडीशन में अजय पाल सिंह नाम के एक हाई लेवल क्रिमनल को पुलिस लेकर आती है. अजय पाल पर डिफेंस में खराब हथियार बेच देश की जड़ो को कमज़ोर करने के आरोप हैं. अजय पाल ICU में एडमिट है. पुलिस की निगरानी में. इसी वक्त अस्पताल में एंट्री लेता है सजू. अपनी गैंग के साथ. इसका मकसद है अजय पाल सिंह को पुलिस के हाथों से निकाल कर ले जाना. जिसकी तैयारी स्वरूप पूरी गैंग आधुनिक हथियारों से लैस आई है. कुछ ही वक़्त में सजू हथियारों के बल पर अस्पताल में मौजूद लोगों को होस्टेज बना लेता है. वारदात की खबर पाते ही जांबाज़ पुलिस अफ़सर जयति भार्गव भी अपने स्क्वाड के साथ अस्पताल के बाहर पहुंच जाती है. सजू लोगों की जान के बदले अजय पाल को लेकर वहां से भागने के लिए कुछ डिमांड रखता है. इधर अंदर विवान जब अंशिका को सजू गैंग के कब्ज़े में देखता है, तो खुद सजू की गैंग से लोहा लेने निकल जाता है. क्या विवान अंशिका को बचा पाने में कामयाब होता है या उस का काल बनती है सजू की सनक, जानने के लिए फिल्म देखिए.

सजू एंड गैंग.
सजू एंड गैंग.

#एक्टिंग डायरेक्शन और राइटिंग में कितना दम है?

‘सनक’ को डायरेक्ट किया है कनिष्क वर्मा ने. कनिष्क ने कई साल रश’, ‘3जी’ जैसी फ़िल्मों में सेकंड यूनिट डायरेक्टर के तौर पर काम किया है. ‘सनक’ कनिष्क की दूसरी बड़ी फिल्म है. इससे पहले वो पिछले साल रिलीज हुई गुलशन देवैया स्टारर ‘फुट फेयरी’ डायरेक्ट कर चुके हैं. ‘सनक’ में कनिष्क का डायरेक्शन अच्छा है. उन्होंने जिस तरीके से कुछ एक्शन सीन्स फिल्माए हैं, वो तारीफ़ योग्य हैं. हालांकि ज़्यादातर सीन्स 2002 में आई हॉलीवुड फ़िल्म ‘जॉन क्यू’ जैसे ही लगते हैं. क्योंकि ‘सनक’ असल में इस फ़िल्म का ही रीमेक है. ‘सनक’ को लिखा है आशीष पी वर्मा ने. आशीष का लेखन बेहद कमज़ोर रहा. फ़िल्म का कांसेप्ट पुरानी से पुरानी से हॉलीवुड होस्टेज ड्रामा फिल्म उठा लीजिए, उससे भी मिल जाएगा. कुछ जगह आशीष के लिखे कॉमिक डायलाग अच्छे हैं लेकिन ऐसे डायलाग दो घंटे की फ़िल्म में दो या तीन बार ही आते हैं.

विद्युत जामवाल की ‘बुलेट राजा’ छोड़ आप कोई सी भी फ़िल्म उठा लें, सब में वो एक जैसे ही दिखाई देते हैं. एक जैसी फाइट करते हैं. उनकी पिछली फिल्मों की एक्टिंग देख यकीन नहीं होता ये वही विद्युत हैं, जिन्होंने ‘फ़ोर्स 2’ और ‘बुलेट राजा’ जैसी फ़िल्मों में बेहतरीन काम किया था. लेकिन अब इन बातों को अरसा बीत चुका है. पिछली लगातार कई फ़िल्मों में विद्युत सिर्फ अपने आप को रिपीट कर रहे हैं. ना ही वो अपने लुक्स बदलते हैं. ना अपनी बॉडी. और ना ही अपनी फिल्मों की चॉइस को. वो सेम टू सेम फ़िल्में किए जा रहे हैं. यही समय है उन्हें इन फिल्मों से पलट अपने आप को पुश करते हुए कुछ नया ट्राय करना चाहिए.

‘सनक’ में मेन विलन सजू बने हैं चंदन रॉय सान्याल. चंदन ही हैं, जो पूरी फिल्म में थोड़े रोचक लगते हैं. लेकिन उनकी परफॉरमेंस में भी नएपन की कमी है. उन्होंने भी वही सब किया है, जो सालों से होस्टेजस के साथ विलन करते आ रहे हैं. फ़िल्म में नेहा धूपिया ने स्ट्रांग एंड बोल्ड जयति भार्गव का रोल किया है. इनका इंट्रोडक्शन तो बहुत मजबूत हुआ फ़िल्म में. लेकिन बाद में पूरी फ़िल्म में नेहा धूपिया सिर्फ वैन में खड़ी नज़र आती हैं. फ़िल्म में विद्युत के अपोजिट रुक्मणि माइत्रा हैं. जो फ़िल्म में सिर्फ़ एक गाने और चंद एक छुटपुट सीन्स के लिए आती हैं. यहां तारीफ़ करनी बनती है ‘सनक’ के दूसरे चन्दन रॉय की. जिन्होंने फ़िल्म में रियाज़ अहमद की भूमिका निभाई है. हालांकि फिल्म में रियाज़ का करैक्टर बहुत ही गैरज़रूरी और एकदम वैसा लगा जैसे नाइंटीज़ की किसी भी फ़िल्म में किसी भी प्लाट में जॉनी लीवर को डाल दिया जाता था. लेकिन इसके लिए राइटर-डायरेक्टर कसूरवार हैं ना कि चंदन. ‘पंचायत’ में चंदन का काम पहली बार देखा था. उसमें वो जंचे थे. इस फ़िल्म में भी उन्होंने अच्छा काम किया है.

"तू बॉस मार मिल्खा"
“तू बस मार मिल्खा”

# कैसी ये सनक?

इसे फ़िल्म कहूं या कहूं इसे वीडियो गेम?

पूरी फिल्म देख कर हमें ऐसा लगा जैसे हम कोई वीडियोगेम की स्टोरी देख रहे हैं. जिसमें गेम का हीरो छोटे-मोटे विलन से लड़ता हुआ एंड में मेन विलन से फाइट करके गेम जीतता है. फ़िल्म में हीरो हैं विद्युत जामवाल. MMA ट्रेनर बने हैं. जो अस्पताल में थे तो अपनी वाइफ का इलाज कराने के लिए. लेकिन आतंकियों के आने बाद अकेले ही एकदम ‘मैं एक्सपर्ट हूं, मुझे सब आता है’ टाइप खुद ही पूरी गैंग से फाइट करने निकल जाते हैं. सब काम वो ही कर रहे हैं. मतलब बाहर पूरी पुलिस फ़ोर्स खड़ी है, वो कुछ नहीं कर रही. थारा भाई विद्युतिंदर सब संभाल ले रहा है. उल्टा ये ही एसीपी को बता रहा है कि आगे क्या करना है. विद्युत को शायद ये ब्रीफ़ किया गया था कि उन्हें पूरी फिल्म में सिर्फ अलग-अलग ढंग से लड़ना है. फ़िल्म में चार संवाद आते हैं और फ़िर विद्युत MMA स्टाइल में लड़ते हैं. फिर संवाद, फिर कुंग फू स्टाइल में फाइट. फिर दो डायलॉग, फिर फ्री स्टाइल फाइट. कभी आग में फाइट. कभी पानी मे फाइट. उड़-उड़ के फाइट. गिर-गिर के फाइट. कई बार तो हमें डाउट हुआ, ये कोई मूवी ही है या कहीं से ‘टेकन 3’ तो नहीं चल गया. दो घंटे की फ़िल्म में पौने दो घंटे तो सिर्फ मारधाड़ ही चलती है. बस ले देकर इतना ही है.

विद्युत् जामवाल.
विद्युत् जामवाल.

#देखें या नहीं

‘सनक’ ऐसी फ़िल्म है जिसकी राइटिंग देख ऐसा लगता है किसी वीडियोगेम स्टोरीलाइन राइटर ने पीयर प्रेशर में आकर फ़िल्म लिख दी है. मालूम होता है फ़िल्म के नाम को सभी ने ज़्यादा ही दिल पे ले लिया और सनक-सनक में फ़िल्म बना दी. फ़िल्म में एंटरटेनमेंट चवन्नी भर का नहीं है. फाइट एक्शन ओवरलोडेड है. जनता को अगर इतना एक्शन ही देखना होगा, तो भैया हम रियल MMA फाइट्स नहीं देख लेंगे. उसके लिए पिक्चर क्यों देखेंगे? कुल जमा बात ये कि ‘सनक’ एक बहुत ही बोगस फ़िल्म है. जिसे ना देखना ही आपके स्वास्थ्य के लिए बेहतर रहेगा. बाकी देखना ही हो, तो भैया ‘सनक’ का तो कोई इलाज है नहीं.


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