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सुकमा हमले को 'सोची-समझी साजिश' कहने से पहले इस पर ध्यान दें राजनाथ

ये आर्टिकल जुगल आर पुरोहित ने वेबसाइट ‘डेली ओ’ के लिए लिखा है. जुगल इंडिया टुडे टीवी के विशेष संवाददाता हैं. वेबसाइट की इजाजत से इसे हम हिंदी में अनुवाद करके पढ़ा रहे हैं.


मार्च 2014 की बात है. ओडिशा के कोरापुट के जंगलों में पुलिस की एक टीम रात भर ताक लगाकर बैठी रही. उनको सूचना मिली कि कुछ नक्सली एक नदी को पार करने वाले थे. पुलिस की स्ट्रेटजी थी कि वो नक्सलियों को बीच रास्ते ही धर दबोचेगी. लेकिन सुबह पुलिस की वो टीम खाली हाथ वापस लौट आई. उस टीम के एक ऑफिसर ने बताया कि ‘हमें बाद में समझ आया कि नक्सलियों ने नदी पार करते वक्त मिट्टी पर हमारे पैरों के निशान देख लिए थे. और उन्होंने अपना रास्ता बदल दिया.’

रिप्रजेंटेटिव फोटो
रिप्रजेंटेटिव फोटो

नक्सली मामले का कोई भी जानकार आसानी से बता सकता है कि माओइस्ट जमीनी रणनीति जमाने से लेकर किसी हमले के बाद के माहौल को संभालने में बड़ी काबिलियत से काम करता है. साथ ही नए और बेहतरीन विस्फोटक डिवाइसेज और ड्रोन, हेलीकॉप्टरों से बचने के बारे में काफी सजग हैं.

इस तरह, भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह का सुकमा अटैक के लिए नक्सलियों पर सोची-समझी साजिश का आरोप लगाना उनकी कम जानकारी को दिखाता है.

सुकमा में हुए अटैक ने 25 जवानों की जान ले ली. पिछले ही महीने इसी राज्य में, इसी जिले में, इसी फोर्स के साथ ऐसा ही हादसा हुआ था. नक्सलियों ने हमला करके सीआरपीएफ के 12 जवानों को मार दिया था. इस साल के शुरुआती महीनों में ही माओवादियों ने कुल 60 सुरक्षाकर्मियों को मार डाला.

सुकमा में हुए नक्सली हमले में 25 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए.
सुकमा में हुए नक्सली हमले में 25 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए.

नार्थ ब्लॉक में बैठे गृह मंत्रालय के नुमाइंदे जब तक वस्तुस्थिति को नहीं समझेंगे तब तक नक्सलियों से हमारी लड़ाई सही दिशा में नहीं जा सकती है. लेकिन वहां पर बैठे लोगों की समझ में कोई सुधार नहीं आया है.

कुछ जरूरी बातें

1. 15 मार्च को एक पार्लियामेंट्री कमिटी रिपोर्ट आई थी. इसमें होम सेकरेटरी राजीव महर्षि ने बताया था कि सरकार के पास माओवादियों की माइन्स से बचाने वाले ‘माइन रेसिस्टेंट व्हीकल्स’ खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं. ये कमिटी ये जांचने के लिए बनाई गई थी कि पैसों की कमी की वजह से सुरक्षा जवानों की जाने जा रही हैं.
2. गृहमंत्रालय ने संसद में बताया कि माओवादियों की बिछाई हुई माइन्स से लड़ने के लिए एक से ज्यादा माइन प्रूफ व्हीकल दिए जाएंगे. लेकिन गृह मंत्रालय ने ये कभी नहीं बताया, उसकी खुद की गाइडलाइन्स में लिखा है कि हर एक बटालियन के सात से दस एमपीवी होनी चाहिए.

माइन प्रूफ व्हीकल (MPV)
माइन प्रूफ व्हीकल (MPV)

3. गृह मंत्रालय ने बातों बातों में ये भी बताया कि जबलपुर में बनी ऑर्डनैंस फैक्ट्री जरूरत के मानिंद एमपीवी नहीं बना पा रहा है. अगर ऐसा है तो गृह मंत्रालय ने एमपीवी के ग्लोबल टेंडर क्यों नहीं जारी किए. लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म डिवीज़न के इंचार्ज हंसराज अहीर के मुताबिक अब तक इस पर कोई विचार नहीं किया गया है.
4. 12 अप्रैल को सांसदों के साथ एक बैठक में हंसराज अहीर ने इस बात पर खुद की पीठ थपथपाई थी कि साल दर साल सुरक्षा जवानों की मौतों में कमी आ रही है. जैसे कि ये समस्या सिर्फ जवानों की मौत से ही जुड़ी हो. वहीं जब अहीर से पूछा गया कि सिक्योरिटी फोर्सेज को मॉडर्न हथियारों और टेक्नॉल्जी से मजबूत बनाने के लिए सरकार क्या कर रही है. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हां, उन्हें ड्रोन और हैलीकॉप्टर दिए जा रहे हैं.

हंसराज अहीर, लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म (LWE) से निपटने के लिए बनाए गए डिपार्टमेंट के हेड
हंसराज अहीर, लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म (LWE) से निपटने के लिए बनाए गए डिपार्टमेंट के हेड

5. ड्रोन होने और उनके इस्तेमाल पर भी सवाल उठ रहे हैं. अगर वाकई उनका इस्तेमाल किया गया था तो ये कैसें संभव हुआ कि माओवादी सीआरपीएफ कैंप के इतना नजदीक आ गए और सीआरपीएफ को इसकी भनक तक नहीं लगी.
6. खराब लीडरशिप की समस्या उस वक्त भी सामने आई थी जब होम मिनिस्ट्री ने सीआरपीएफ को 2 महीने तक बिना किसी हेड के रखा था.
7. कश्मीर के हालात को समझदारी से संभालने के मामले में भी गृह मंत्रालय ज्यादा कुछ नहीं कर पाया है. जिसकी वजह से गृह मंत्रालय खुद को नेगलेक्टेड महसूस कर रहा है. दरअसल लेफ्ट के एक्सट्रीमिज्म से लड़ने के लिए पर्याप्त सुरक्षा बल ही नहीं है. नक्सली प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बल ही कम लगाए गए हैं.

सीआरपीएफ को हेड करने के लिए 2 महीनों तक किसी डीजी को अपॉइंट ही नहीं किया गया.
सीआरपीएफ को हेड करने के लिए 2 महीनों तक किसी डीजी को अपॉइंट ही नहीं किया गया.

देश की सरकार जिम्मेदारी नहीं ले रही और एक गलत फैसले की वजह से लोगों की जानें जा रही हैं. एक घटना है. अमेरिकी सेना की है लेकिन नक्सलियों से लड़ने में कमजोर पड़ रही अपने देश की व्यवस्था के लिए प्रासंगिक है. वियतनाम से यूएस मरीन कॉर्प्स की एक सक्सेज स्टोरी सामने आई थी. जिसे टॉम मैनगोल्ड और जॉन पेनीकेट ने ‘द टनेल्स ऑफ कुची’ में लिखा है.

‘एक नौजवान ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल ऑलिवर ने पाया कि कैसे कम्यूनिस्ट लड़ाके उसकी टुकड़ी को मारने के लिए अंडरग्राउंड सुरंग का इस्तेमाल करते हैं और फिर भाग जाते हैं. उस वक्त तक अमेरिकियों को सुरंग से हुए हमलों से निपटने के लिए कोई अनुभव नहीं था. उसने इस बात की जिम्मेदारी खुद ली और इपनी बटालियन को बंकर पहचानकर नष्ट करना सिखाया. इस पूरी ट्रेनिंग को करवा लेने के बाद उसे ‘ऑपरेशन’ लॉन्च करने की इजाजत मिल गई. उसकी टीम ने पूरा इलाका सीज कर दिया. और खुद जाकर सारे गड्ढे और छिप सकने की जगह चेक करते गए. इस ऑपरेशन में 92 में से 89 लड़ाके मारे गए या पकड़े गए या उन्होंने खुद ही सरेंडर कर दिया.’


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