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वो नेताजी, जिन्होंने खाकी छोड़ पहनी थी खादी और खूब सियासी दांव आजमाए

गुप्तेश्वर पांडे. बिहार के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) थे. दो दिन पहले वॉलंटरी रिटायरमेंट (ऐच्छिक सेवानिवृत्ति- VRS) ले लिया. खबरें आ रही हैं कि वह बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ने वाले हैं. चर्चा गरम है कि नीतीश कुमार की पार्टी जदयू से उन्हें टिकट मिल गया है. हालांकि कुछ-कुछ जगहों पर बीजेपी से टिकट मिलने की भी बात हो रही है. हालांकि अभी आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है.

Gupteshwar Pandey
गुप्तेश्वर पांडे बिहार के डीजीपी पद से इस्तीफा दे चुके हैं. (फोटो- फेसबुक)

गुप्तेश्वर पांडे चुनाव लड़ेंगे या नहीं, और लड़ेंगे तो किस पार्टी से, ये सब कुछ दिनों में साफ हो ही जाएगा. लेकिन अगर वह आगामी इलेक्शन में बतौर उम्मीदवार उतरते हैं, तो ये पहला मौका नहीं होगा जब कोई पुलिसवाला इस्तीफा देकर या रिटायरमेंट के बाद चुनाव लड़ा हो. ऐसे वाकयों से इतिहास पटा पड़ा है.

वो पुलिस अधिकारी, जो इस्तीफा देकर राजनीति में आए-

1. प्रदीप शर्मा, पार्टी- शिवसेना

एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहलाते थे. 1983 में महाराष्ट्र पुलिस से जुड़े थे. मुंबई क्राइम ब्रांच का हिस्सा रहे. अपनी 35 साल की पुलिस की नौकरी में 150 से ज्यादा अपराधियों और आतंकियों का एनकाउंटर किया. मुंबई से अंडरवर्ल्ड के खात्मे का बड़ा क्रेडिट इन्हें भी जाता है. इनके ऊपर फिल्में भी बन चुकी हैं.

Pradeep Sharma
प्रदीप शर्मा चुनाव तो हार गए थे, लेकिन सबकी नज़र इन्हीं पर टिकी थी.

2019 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने VRS ले लिया था. तब वह ठाणे में एंटी एक्सटॉर्शन सेल के प्रमुख थे. इस्तीफा देने के बाद शिवसेना में शामिल हो गए. जॉइनिंग के वक्त कहा था कि बाल ठाकरे उन्हें अपने बेटे जैसा मानते थे. विधानसभा चुनाव में नाला सोपारा से खड़े हुए. हालांकि जीत नहीं मिल पाई. बहुजन आघाड़ी पार्टी के क्षितिज हितेंद्र ठाकुर से 43,729 वोटों से हार का सामना करना पड़ा.

2. सत्यपाल सिंह, पार्टी- BJP

मुंबई के पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह रहे थे. जनवरी 2014 में पुलिस से इस्तीफा दिया. फरवरी में मेरठ में हुई बीजेपी की एक रैली में पार्टी में शामिल हो गए. बागपत लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा. RLD के अजीत सिंह को हराया. सांसद बने. 2017 में केंद्रीय मंत्री भी बनाए गए. 2019 में हुए 17वें लोकसभा के चुनाव में भी बागपत से उतरे, BJP के ही टिकट पर. इस बार भी जीत हासिल की.

Satyapal Singh
सत्यपाल ने डार्विन की थ्योरी को गलत बता दिया था, जिस पर खूब विवाद हुआ था . (फोटो- सत्यपाल का फेसबुक अकाउंट)

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सत्यपाल 1980 बैच के महाराष्ट्र कैडर के IPS थे. इशरत जहां एनकाउंटर की जांच करने वाली SIT के चीफ रहे थे. पुणे और नागपुर के भी पुलिस कमिश्नर रहे. राज्य के और कई ज़िलों की पुलिस में अहम पद पर रहे थे. खादी पहनने के बाद 2018 में उस वक्त विवादों में आए थे, जब उन्होंने चार्ल्स डार्विन की ‘थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन’ को गलत बताया था. ये भी कहा था कि इस थ्योरी को स्कूल-कॉलेज के सिलेबस से हटा देना चाहिए.

3. सुशील कुमार शिंदे, पार्टी- कांग्रेस

नाम तो सुना होगा. कांग्रेस के बड़े नेता हैं. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री हैं. फैक्ट ये है कि राजनीति में आने से पहले पुलिस में थे. कॉस्टेबल के तौर पर महाराष्ट्र पुलिस में शामिल हुए थे. फिर सब-इंस्पेक्टर बने, लेकिन 1971 में पुलिस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आ गए. कांग्रेस पार्टी के मेंबर बने.

Sushilkumar Shinde
सुशील कुमार शिंदे 1971 में राजनीति में आए थे, आज कांग्रेस के बड़े नेता हैं. (फोटो- शिंदे का ट्विटर अकाउंट)

1974 में महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव लड़ा. पहली बार विधानसभा पहुंचे. फिर लगातार पांच बार विधानसभा में बैठे. 1992 में राज्यसभा के लिए चुने गए. उप-राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा, लेकिन हार गए. 2003 से 2004 तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे. 2004 में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बनाए गए. 2006 में दोबारा सक्रिय राजनीति में वापसी हुई. पीएम मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में ऊर्जा मंत्री बनाए गए. 2012 से 2014 तक गृह मंत्री रहे. इनके कार्यकाल में दो बड़े अपराधियों को फांसी पर चढ़ाया गया- एक अफज़ल गुरू और दूसरा अजमल कसाब. 2019 में लोकसभा चुनाव में सोलापुर सीट से लड़े थे, हार गए. ‘इकॉनमिक टाइम्स’ के मुताबिक, शिंदे ने चुनाव से पहले कहा था,

“ये मेरा आखिरी चुनाव है. इसके बाद मैं कोई विधानसभा या लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ूंगा. ये बात मैंने पब्लिकली नहीं कही थी, अब कह रहा हूं.”

4. नमो नारायण मीणा और हरीश चंद्र मीणा, पार्टी- कांग्रेस

दोनों भाई हैं. दोनों IPS अधिकारी रह चुके हैं. नमो बड़े हैं, हरीश छोटे हैं. नमो 1969 बैच के IPS हैं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रेसिडेंशियल पुलिस मेडल विजेता हैं. राजस्थान के DGP भी रहे. रिटायर होने के बाद कांग्रेस से जुड़े. 2004 में सवाई माधोपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा, जीत गए. 2009 में टोंक-सवाई माधोपुर सीट से उतरे, जीत गए. 2014 में दौसा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा. हार मिली अपने ही भाई हरीश चंद्र मीणा के हाथों.

हरीश 1976 बैच के IPS अधिकारी हैं. SP, DSP, DGP रह चुके हैं. 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले सर्विस से इस्तीफा देकर BJP में शामिल हो गए. पार्टी ने दौसा से ही टिकट दिया. भाई से मुकाबला था, जीत मिली. 2014 से 2018 तक हरीश दौसा के सांसद रहे. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, हरीश ने 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस जॉइन कर ली. टोंक ज़िले के तहत आने वाली दियोली उनियारा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीते. फिलहाल कांग्रेस के MLA हैं.

Namo And Harish
बाएं से दाएं: बड़े भाई नमो, छोटे भाई हरीश. (फोटो- फेसबुक)

रही बात नमो नारायण की, तो उन्होंने 2019 में फिर से कांग्रेस के टिकट पर टोंक-सवाई माधोपुर सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत नहीं मिली. फिलहाल दोनों रिटायर्ड IPS भाई कांग्रेस में ही हैं.

5. एचटी संगलियाना, पार्टी- पिछले साल ही कांग्रेस छोड़ी

एचटी संगलियाना 1967 बैच के IPS अधिकारी हैं. कर्नाटक कैडर के. बेंगलुरू सिटी के पुलिस कमिश्नर रहे थे. 2003 में रिटायर हुए, उस वक्त कर्नाटक के DGP थे. डकैत वीरप्पन को पकड़ने के लिए जो स्पेशल टास्क फोर्स बनी थी, संगलियाना उसके हेड थे. कर्नाटक में बड़ा नाम हुआ था तब संगलियाना का. उनपर तीन कन्नड़ फिल्म भी बनी थीं.

पुलिस से रिटायर होने के बाद बीजेपी जॉइन की. 2004 में बेंगलुरू नॉर्थ से चुनाव लड़ा. कांग्रेस के बड़े नेता जाफर शरीफ को हराया. लेकिन 2008 में बीजेपी ने संगलियाना को पार्टी से निकाल दिया, क्योंकि उन्होंने US सिविल न्यूक्लियर डील के पक्ष में वोट कर दिया था. संगलियाना ने कांग्रेस जॉइन की. 2009 में बेंगलुरू सेंट्रल से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. 2019 में कांग्रेस छोड़ दी, ये कहकर कि पार्टी ने 2019 लोकसभा चुनाव में क्रिश्चियनों की अनदेखी की.

Sangliana
निर्भया की मां को लेकर कुछ ऐसा कहा था कि जमकर किरकिरी हुई थी संगलियाना की.

संगलियाना निर्भया की मां को लेकर दिए बयान की वजह से विवादों में रहे थे. 2018 में उन्होंने एक सम्मान समारोह में कहा था,

‘मैं निर्भया की मां को देखता हूं. उनका फिजीक (शरीर की बनावट) देखता हूं. मैं सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूं कि निर्भया कितनी खूबसूरत रही होगी.’

हालांकि बाद में उन्होंने कहा था कि उनके बयान को ज़बरन मुद्दा बनाया जा रहा है.

6. उपेंद्र नाथ विश्वास, पार्टी- तृणमूल कांग्रेस (TMC)

उपेंद्र, जिन्हें उपेन विश्वास भी कहते हैं. पश्चिम बंगाल कैडर से 1968 बैच के IPS अधिकारी हैं. सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) के जॉइंट डायरेक्टर रहे. रिटायर हुए, तब CBI के अडिशनल डायरेक्टर थे. SP, DSP, SSP भी रह चुके हैं. रिटायरमेंट के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) से जुड़े. 2011 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बागदा सीट से चुनाव लड़ा, जीत हासिल की. 2011 से 2016 तक बंगाल सरकार में मंत्री भी रहे. 2016 में दोबारा बागदा से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके.

Upendra Nath Biswas
TMC के मेंबर हैं अभी उपेंद्र. (फोटो- ANI)

चारा घोटाला खोलने वाले अधिकारी उपेंद्र

साल 1996 में उपेंद्र हेडलाइन्स में छा गए थे. 950 करोड़ के चारा घोटाले का खुलासा करने की वजह से. इस घोटाले में लालू प्रसाद यादव का नाम उस वक्त पहली बार सामने आया था. इसी स्कैम के लिए अब लालू सज़ा काट रहे हैं. खुलासे के वक्त उपेंद्र CBI (ईस्ट) के जॉइंट डायरेक्टर थे.

7. किरण बेदी, पार्टी- BJP

1972 में भारत की पहली महिला IPS अधिकारी बनीं. देश के कई हिस्सों में कई पदों पर तैनात रहीं. दिल्ली के जेलों की इंस्पेक्टर जनरल बनाई गईं. तब उन्होंने तिहाड़ को मॉडर्न जेल बनाने के लिए बहुत काम किया. 2007 में, जब रिटायरमेंट को दो साल बाकी थे, किरण बेदी दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनने की रेस में थीं, लेकिन रेस में जीत वाई.एस डडवाल को मिली. इसके बाद बेदी ने गुस्से में कहा था कि उनकी अनदेखी की गई. उसी साल नवंबर में इस्तीफा दे दिया. कहा कि अभी तक सिस्टम के अंदर काम किया, अब बाहर काम करूंगी.

Kiran Bedi
किरण बेदी देश की पहली महिला IPS अधिकारी हैं. (फोटो- इंस्टाग्राम)

2010 में किरण बेदी एंटी-करप्शन मूवमेंट से जुड़ीं. अरविंद केजरीवाल के साथ अन्ना हजारे के मूवमेंट में साथ दिया. जब केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई, तो किरण ने रास्ते अलग कर लिए. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को सपोर्ट किया. 2015 में BJP से जुड़ीं. पार्टी ने उन्हें दिल्ली विधानसभा चुनाव में सीएम उम्मीदवार के तौर पर उतारा, लेकिन बेदी को हार का सामना करना पड़ा. मई 2016 में पुडुच्चेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाई गईं. अभी भी उस पद पर हैं.

8. बृजलाल, पार्टी- BJP

2015 बैच के IPS हैं. उत्तर प्रदेश के DGP रह चुके हैं. बीएसपी प्रमुख मायावती के काफी करीबी माने जाते थे. लेकिन रिटायरमेंट के बाद 2015 में बृजलाल ने BJP जॉइन करके सबको हैरान कर दिया. उनकी जॉइनिंग से समय उत्तर प्रदेश BJP के अध्यक्ष थे लक्ष्मीकांत वाजपेयी. उन्होंने कहा था,

“बृजलाल बीजेपी में शामिल हो रहे हैं और राजनीतिक पारी शुरू करेंगे. IPS रहते हुए, उन्होंने कभी आपराधिक तत्वों को लेकर समझौता नहीं किया और कड़ाई से डील किया. अब वो नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में काम करना चाहते हैं.”

Brij Lal
बृजलाल कभी BSP के करीबी माने जाते थे, अभी BJP में हैं. (फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट)

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बृजलाल ने टिकट मांगा था, लेकिन उन्हें नहीं दिया गया. 2018 में उन्हें यूपी के SC/ST कमीशन का चीफ बनाया गया. किसी ज़माने में BSP के करीबी माने जाने वाले बृजलाल BJP में आने के बाद कई बार BSP के खिलाफ बोल चुके हैं.

इन पुलिसवालों ने भी सियासी दमखम आजमाया

विष्णु दयाल राम

1973 बैच के आईपीएस रहे थे विष्णु दयाल. दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, दो बार झारखंड के डीजीपी रह चुके हैं. एक बार 2005 से 2006 और दूसरी बार 2007 से 2010 तक. 1980 के दशक में बिहार में अंखफोड़वा कांड को लेकर काफी चर्चा में रहे थे. तब अपराधियों की आंख में तेजाब डाल दिया जाता था. विष्णु दयाल झारखंड के पलामू से सांसद हैं. 2019 में लगातार दूसरी बार सांसद चुने गए थे.

युमनाम जयकुमार सिंह

युमनाम की गिनती पूर्वोत्तर के बड़े नेताओं में होती है. नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के विधायक हैं. 1976 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे युमनाम 2007 से 2012 तक मणिपुर के डीजीपी थे. रिटायरमेंट के करीब 5 साल बाद उन्होंने उन्होंने राजनीति में एंट्री ली थी. 2017 में जीतने के बाद एन वीरेन सिंह की सरकार में उपमुख्यमंत्री बने थे.

डीके पांडेय

2015 से 2019 तक झारखंड के डीजीपी रहे थे. रिटायरमेंट के बाद अक्टूबर 2019 में पांडेय भाजपा में शामिल हो गए. पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास के करीबी माने जाने वाले डीके को उम्मीद थी कि इस बार के झारखंड विधानसभा चुनाव में टिकट मिलेगा, लेकिन ऐन वक्त पर टिकट कट गया.

निखिल कुमार 

बिहार के वैशाली जिले से ताल्लुक रखने वाले 1963 बैच के आईपीएस निखिल एनएसजी, आईटीबीपी और आरपीएफ के डीजीपी रह चुके हैं. 2001 में रिटायर होने के बाद 2004 में कांग्रेस में आए. कांग्रेस से औरंगाबाद सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. बाद में 2009 में नागालैंड और 2013 में केरल के राज्यपाल बने.

प्रकाश मिश्रा

2012 से 2014 तक ओडिशा के डीजीपी रहे. सिंतबर 2014 में ओडिशा सरकार ने डीजीपी पद से हटा दिया. दैनिक भास्कर के मुताबिक, जून 2015 में कोर्ट ने सरकार के आरोपों को खारिज करते हुए प्रकाश मिश्रा को राहत दी. इसके बाद 2014 से 2016 तक सीआरपीएफ के डीजीपी रहे. रिटायरमेंट के बाद 2019 में भाजपा में शामिल हो गए. कटक सीट से उन्हें लोकसभा का टिकट भी मिला, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली.


वीडियो देखें: ‘लल्लनटॉप’ से बातचीत में गुप्तेश्वर पांडेय ने चुनाव लड़ने पर पहले ही बोल दिया था

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