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'पंचायत' के दूसरे सीज़न की कहानी पता चल गयी

पलायन भारत की सच्चाई है. आज हर तीसरा आदमी काम के सिलसिले में अपना गांव छोड़कर किसी शहर में रह रहा है. पर ‘पंचायत’ में इसका ठीक उल्टा है. इसमें एक शख्स अपनी नौकरी के सिलसिले में शहर से गांव में आकर रह रहा है. तो भैया इसी ‘Panchayat’ का दूसरा सीजन 20 मई को प्राइम वीडियो पर आने वाला है. उससे पहले आ गया है इसका ट्रेलर. अभी मज़ा आएगा ना भिड़ू.

पंचायत सीज़न 2 20 मई को आ रहा है
पंचायत सीज़न 2 20 मई को आ रहा है

पंचायत के पहले सीज़न में क्या था?

हम जैसे गांव से पलायित लोग ‘पंचायत’ के सहारे पहले सीज़न अपने गांव पहुंचे. जो कभी गांव नहीं गए उन्होंने भी गांव कैसा हो सकता है, सीरीज़ के सहारे देखा. हालांकि ‘पंचायत’ में जैसा गांव दिखाया गया है, ठीक वैसा ही होता है ये कहना गंवई लोगों के साथ बेईमानी होगी. बेसिकली ‘पंचायत’ ने ग्रामीण परिवेश के देसीपन को इसके किरदारों के ज़रिए बहुत अच्छे तरीके से कवर किया था. अभिषेक के प्वाइंट ऑफ व्यू से मेकर्स ने सबकुछ कहने की कोशिश की थी. टीवीएफ वाले जीतू भैया को इसी किरदार ने युवाओं से इतर फ़ेम दिलाई. जीतेंद्र ने अभिषेक का किरदार भी बहुत सहजता से निभाया था.

इसके ग्रामीण कैरेक्टर्स ने तो छप्परफाड़ शोहरत कमाई थी. चाहे प्रधान जी हों या प्रधान पति हों, या फिर विकास और प्रह्लाद. रघुबीर यादव और नीना गुप्ता ने जैसा काम इस सीरीज़ में किया वो शायद ही कोई और कर पाता. इतने मंझे हुए कलाकार ही ऐसा कर सकते थे. पर फ़ैसल मलिक ने प्रह्लाद का रोल जैसा निभाया है, क्या कहने, ऐसा लगता है वो ग्राम पंचायत फुलेरा के ही निवासी हैं. विकास के रोल में चंदन ने भी चार चांद लगाए थे. पंचायत ने बहुत छोटी-छोटी बातें उठाकर उसी में डायलॉग्स के ज़रिए फन पैदा करने की कोशिश की थी. आजकल वही फ़िल्म या सीरीज़ हिट है जिसके मीम हिट हैं. पंचायत के मीम तो सुपरहिट हैं. इस सीरीज़ का एक सीन तो ऐसा रहा, जिसने मीम मार्केट में तहलका मचा दिया. एक छोटे से रोल ने गणेश बने आसिफ खान की रातोंरात किस्मत पलट दी. याद है कि नहीं, ‘गज़ब बेज्जती है यार’.

गज़ब खराब ब्यवस्था है यार
गज़ब बेज्जती है यार

कितना सॉलिड सीन आईडिया है. गांव में यह बहुत आम है कि पंचायत भवन या प्राइमरी स्कूल में बारात रुकती ही है. भई सरकारी प्रॉपर्टी है और सरकार किसके लिए है, जनता के लिए ना. ऐसे ही एक बड़ा ऑबवियस-सा डायलॉग है, जो हमारे साथ लगभग रोज़ होता है. ‘पेसाब करते-करते अचानक दिमाग में आ गया’. बताईए आपके दिमाग में आता है या नहीं. ये ऐसी दो-चार हालिया चुनिंदा सीरीज़ में से थी जिसे परिवार के साथ देखा जा सकता है. फूहड़ता नहीं थी. गाली नहीं थी. कुछ देहाती शब्द थे, जो गांव में गाली नहीं आशीर्वाद समझे जाते हैं यानि रोज़मर्रा के इस्तेमाल में हैं. हम तो पहले सीज़न में ही खो गए, दूसरे सीज़न का ट्रेलर आया है उसकी भी कुछ बात कर लेते हैं. नहीं तो आपलोग कहेंगे ‘गज़ब खराब ब्यवस्था है यार’.

रिंकी और अभिषेक का क्या होगा?

पहले सीज़न को जैसा रिस्पॉन्स मिला. उसी रिस्पॉन्स ने मेकर्स को पंचायत का दूसरा सीजन लाने पर मजबूर कर दिया. पहले सीज़न की एन्डिंग वाली टंकी याद है! जिस पर अभिषेक की प्रधान जी की बेटी रिंकी से मुलाक़ात होती है. लोगों की बड़ी जिज्ञासा थी कि दूसरे सीज़न में उनका क्या होने वाला है. ट्रेलर में इस जिज्ञासा का समाधान करने की कोशिश की गई है. रिंकी और अभिषेक जब एक-दूसरे के साथ बैठकर चाय पी रहे हैं. उनकी आंखे दोनों के मन में उमड़ रहे भावनाओं के ज्वार को बयान कर रही हैं. बाक़ी तो अब आप समझ ही गए होंगे कि रिंकी और अभिषेक के बीच में कुछ तो गड़बड़ है दया.

कॉफी ना सही चाय डेट ही सही
कॉफी ना सही चाय डेट ही सही

गांव के ये चार मुद्दे सीरीज़ की हाईलाइट होने वाले हैं

‘इसमें सब रिकॉर्ड होगा!’, ‘जब तक सीट नहीं लग जाता कहीं और जाके हग ले’, ‘साला रोड ही बवासीर है’, ‘चप्पल की चोरी हुई है अब एफआईआर होगी गांव के प्रधान पर’. इन चार डायलॉग्स में चार मुद्दे हैं. CCTV, टॉयलेट सीट, सड़क और चप्पल. पूरा ट्रेलर इन्हीं मुद्दों के इर्दगिर्द घूम रहा है. ट्रेलर देखकर पता चलता है कि इस बार सीरीज़ को थोड़ा और विस्तार देने की कोशिश की जाएगी. अब रोड के लिए प्रधान जी के रेल की पटरी पर लेटने की नौबत आ गई है. सीरीज़ में आक्रामकता भी पहले से ज़्यादा दिख रही है. ऐसा लग रहा कि इस बार डायरेक्टर दीपक कुमार मिश्रा और राइटर चंदन कुमार ने गांव वालों को और दर्शकों को दायरा बढ़ाकर, फुलेरा से बाहर निकालने की कोशिश की है.

ये चार मुद्दे सीरीज़ की धुरी हैं
ये चार मुद्दे सीरीज़ की धुरी हैं

एक और मुद्दा है जिसके बिना सीरीज़ अधूरी है

अभिषेक जो फ़िलहाल पंचायत सेक्रेटरी है. पर उसके सपने कुछ और हैं. उसे कुछ बड़ा करना है. उसी तैयारी में वो लगा भी हुआ है. उसने ये जॉब इसलिए कर ली थी कि ग्रेजुएशन के बाद दिखाने को उसके हाथ में कोई जॉब होगी. पर दुर्भाग्यवश अब बस वही एक जॉब उसके हाथ में है. वो फुलेरा से निकलने के लिए पहले सीज़न में भी डेस्परेट था और इस सीज़न में भी. कुछ बड़ा करने की तैयारी चल रही है पर प्रधान जी और गांव वाले उसकी ज़िंदगी में चरस बोए हुए हैं. पर इन सबसे इतर वही उनका परिवार भी हैं. जैसे पिछले सीज़न में मवालियों से बंदूक लेकर प्रधान जी उसके लिए लड़ने जाते हैं. इस सीज़न भी वैसा ही एंगेजिंग-कॉमेडी से भरपूर और भावनाओं से लबरेज कुछ होगा या नहीं, यही तो 20 मई को देखना है.

इसी पंचायत भवन में अभिषेक फंसकर रह गया है
इसी पंचायत भवन में अभिषेक फंसकर रह गया है

‘डेढ़ करोड़ का पैकेज बाबू भैया’

जब 60-70 हजार की नौकरी के लिए युवा मारा-मारा फिर रहा है. ऐसे में उसका कोई दोस्त आकर कहे कि उसका सालाना डेढ़ करोड़ का पैकेज लगा है. इससे ज़्यादा बुरा उसे खुद कोई ठीक नौकरी न मिलने पर भी नहीं लगेगा. ऐसा ही कुछ इस ट्रेलर के एक डायलॉग में हैं. जो अभिषेक के तो गोली की तरह से लगता ही है, हम सबके भी सीने बेध देता है. डेढ़ करोड़ का पैकेज कोई इतनी सहजता से कैसे बोल सकता है? जैसा लग रहा है कोई 10 हजार की नौकरी लगी हो. मॉडेस्टी देखिएगा आप ट्रेलर में डेढ़ करोड़ी भाईसाहब की, जिसका किरदार निभाया है सतीश रे ने. इसमें गुल्लक वाली बिट्टू की मम्मी की भी एंट्री हुई है. और भी कुछ नए और बाक़ी पुराने किरदारों ने अपने विटी ह्यूमर और इमोशन्स की लेयर से हमें हंसाने की कोशिश की है.

कुलमिलाकर मुझे तो ट्रेलर सही लगा. कहानियों के हिंट दिए गए. दर्शकों को किरदारों के अंदर उतरने का मौक़ा दिया गया. उम्मीद तो बहुत है. इंतज़ार करते हैं 20 मई का. कुछ नया मिलेगा या पुराना माल ही नए की तरह पेश किया जाएगा. बाक़ी उम्मीद पर दुनिया क़ायम है.

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