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पुतिन ने जिसकी छाती पर ऊंचा तमगा बांधा वो अकेला इंडियन डायरेक्टर नहीं रहा

30 दिसंबर को सुबह 10.30 बजे मृणाल सेन का निधन हो गया.

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ऋत्विक घटक और सत्यजीत रे के साथ मृणाल सेन ही थे जिन्होंने भारत में ऐसी फिल्मों का दौर शुरू किया जिनमें कहानियां बिलकुल यथार्थपरक होती थीं, उनमें कोई कमर्शियल मनोरंजन की बाध्यता वाली मिलावट नहीं होती थी.

लेकिन वे बांधकर रखने वाली होती थीं. और बेहद जरूरी, वे विश्व स्तर के फिल्म आर्ट की बराबरी करने वाली थीं. ऐसी फिल्मों को आलोचकों ने समानांतर सिनेमा कहकर बुलाना शुरू किया. इन फिल्मों की नींव सेन, रे, घटक व अन्य ने रखी.

ये तीन अच्छे-खासे प्रतिस्पर्धी थे लेकिन एक-दूसरे के काम को पसंद करते थे.

मृणाल सेन और सत्यजीत रे. (फोटोः मृणाल सेन डॉट ऑर्ग)
मृणाल सेन और सत्यजीत रे. (फोटोः मृणाल सेन डॉट ऑर्ग)

उस पीढ़ी के फिल्मकारों में मृणाल दा ही थे जो जीवित थे. लेकिन रविवार को 95 की उम्र में उनका भी निधन हो गया. कौन थे मृणाल दा, आइए जानें.

1. 2002 में 80 की उम्र में भी उन्होंने आमार भुवन नाम की एक फिल्म बनाई. वो भी फिल्ममेकिंग के प्रयोगों के साथ.

2. मिथुन चक्रवर्ती ने 1976 में जिस प्रशंसित फिल्म मृगया से अपना डेब्यू किया था और जिसके लिए उन्होंने बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जीता था वो मृणाल दा ने ही बनाई थी. उन्हें भी नेशनल अवॉर्ड प्राप्त हुआ था.

फिल्म मृगया के एक दृश्य में मिथुन चक्रवर्ती.
फिल्म मृगया के एक दृश्य में मिथुन चक्रवर्ती.

3. उन्होंने 20 के करीब नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते थे. विश्व सिनेमा में योगदान के लिए सोवियत संघ ने उन्हें 1979 में नेहरू-सोवियत लैंड अवॉर्ड से सम्मानित किया था. यही नहीं, उन्हें साल 2000 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने अपने मुल्क का ऊंचा सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप’ मृणाल सेन को पहनाया. ये सम्मान पाने वाले वे अकेले इंडियन फिल्ममेकर हैं.

एक समारोह में मृणाल सेन को स्टार पहनाते पुतिन. (फोटोः मृणाल सेन डॉट ऑर्ग)
एक समारोह में मृणाल सेन को स्टार पहनाते पुतिन. (फोटोः मृणाल सेन डॉट ऑर्ग)

4. वे पद्म भूषण जैसे तीसरे सबसे ऊंचे नागरिक सम्मान से नवाजे जा चुके हैं.

5. उन्हें 2005 में भारत सरकार ने दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड प्रदान किया गया जो भारत में फिल्मों का सबसे ऊंचा सम्मान है.

6. कोलंबिया मूल के ख्यात नॉवेलिस्ट, लेखक, पत्रकार गेब्रिएल गार्सिया मार्क़ेज उनके दोस्त थे.

मृणाल दा.
मृणाल दा.

7. मृणाल दा फरीदपुर में 14 मई को जन्मे थे. 1923 में. ये जगह अब बांग्लादेश में है. स्कूल की पढ़ाई वहीं से की. फिर कलकत्ता के जाने-माने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से फिजिक्स पढ़े. फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से.

8. छात्र जीवन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक शाखा से जुड़े लेकिन कभी सदस्य नहीं बने. बाद में एक फिल्मकार के तौर पर भी वे किसी विचारधारा से नहीं बंधे, हमेशा एक कलाकार के तौर पर मानवीय दृष्टिकोण से सोचते रहे.

9. उनकी ‘नील आकाशेर नीचे’ (1958) आजाद भारत की पहली फिल्म थी जिसे बैन कर दिया गया था.

ये महादेवी वर्मा की कहानी चीनी भाई पर आधारित थी.

ये ब्रिटिश राज के आखिरी दिनों की कहानी थी. 1930 के बाद के कलकत्ता की. यहां एक गरीब चाइनीज़ फेरीवाला वांग लू रहता है जो कलकत्ता की गलियों में चाइना सिल्क बेचता है. मजबूर पृष्ठभूमि से आया होता है. जब उसके देश चीन पर ताकतवर, साम्राज्यवादी जापान ने हमला बोला होता है. कहानी की अन्य प्रमुख पात्र है बसंती जो एक बैरिस्टर की बीवी है और वांग से आत्मानुभूति रखती है. उसके कष्टों को लेकर संवेदना रखती है.

नील आकाशेर नीचे का एक दृश्य.
फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ का एक दृश्य.

पहले फिल्म रिलीज हुई तो लोगों को बहुत पसंद आई. यहां तक कि तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी फिल्म को सराहा. इसने थियेटरों में अपना रन भी पूरा कर लिया.

फिर जब भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ने लगा तो एकदम से सूचना प्रसारण मंत्रालय वाले नींद से जागे और फिल्म पर रोक लगा दी. फिल्म में भारत की अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई और 1930 के दौर में चीनी लोगों की साम्राज्यवादी जापान के अतिक्रमण की लड़ाई को एक ही दिखाने की कोशिश थी. मृणाल ने बरसों बाद भी माना था कि फिल्म की इस टिप्पणी से वे इत्तेफाक रखते हैं कि किसी देश की आजादी की लड़ाई और एक प्रगतिवादी विश्व की फासीवाद के खिलाफ लड़ाई अलग-अलग नहीं होती. लेकिन 1962 में चीन-भारत तनाव के दौरान कोई ये संदर्भ समझा नहीं.

बाद में संसद में कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद हीरेन मुखर्जी ने इसे लेकर टिप्पणी की. नेहरू और रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन वहीं थे. इन्होंने बाद में फिल्म पर से बैन हटवाया. ये बैन दो महीने चला था.

मृणाल सेन द्वारा निर्देशित हिंदी फिल्म जेनेसिस (1986) के दृश्य में ओम पुरी, शबाना आज़मी और नसीरुद्दीन शाह. पैरेलल सिनेमा के तीन आइकन. चौथे इसे बनाने वाले.
मृणाल सेन द्वारा निर्देशित हिंदी फिल्म जेनेसिस (1986) के दृश्य में ओम पुरी, शबाना आज़मी और नसीरुद्दीन शाह. पैरेलल सिनेमा के तीन आइकन. चौथे इसे बनाने वाले.

10. बैशे श्रावणा (विवाह का दिन) 1960 में प्रदर्शित हुई और बहुत कठोर फिल्म थी. ‌विश्व युद्ध-2 से पहले की कहानी. बंगाल के एक गांव में रहता है प्रियनाथ. पहले गांव में उसका परिवार समृद्ध था. अभी नहीं है. बूढ़ी मां को खुश करने के लिए वो एक कम उम्र की लड़की से शादी कर लेता है. खुद रेल में सामान बेचने का काम करता है. फिर कष्ट टूट पड़ते हैं. विश्व युद्ध के कारण लोग गांव से पलायन कर रहे होते हैं लेकिन वो और पत्नी वहीं रुकते हैं. भूख इन दोनों के रिश्ते की परीक्षा लेने लगती है. इस फिल्म को लेकर मृणाल दा ने बोला था:

वो एक क्रूर वक्त था और मैं एक क्रूर फिल्म बनाना चाहता था.

11. दुनिया में जितने टॉप फिल्म फेस्टिवल होते हैं. केन (फ्रांस), वेनिस, बर्लिन, शिकागो, मॉस्को, मोंट्रियल, कार्लोवी, कायरो सब में उनकी फिल्मों को चुना जाता रहा है. अवॉर्ड मिलते रहे हैं.

जर्मन फिल्ममेकर्स उलरिच ग्रेगौर और राइनहार्ड हॉफ के साथ मृणाल दा. (फोटोः मृणाल सेन डॉट ऑर्ग)
जर्मन फिल्ममेकर्स उलरिच ग्रेगौर और राइनहार्ड हॉफ के साथ मृणाल दा. (फोटोः मृणाल सेन डॉट ऑर्ग)

12. भुवन शोम (1969) उनकी सबसे आइकॉनिक फिल्मों में से एक है. ‘लगान’ में भुवन (आमिर) की मां का रोल करने वाली सुहासिनी मुलै इस फिल्म में उत्पल दत्त के साथ लीड रोल में थीं. इस फिल्म में उनका नाम गौरी था (लगान में भी हीरोइन का नाम यही था). ‘भुवन शोम’ कोई आम सांचे वाली कहानी नहीं थी. ये एक गहरे निहितार्थों वाला व्यंग्य और अनूठा मनोरंजन थी. भुवन शोम, फिल्म में उत्पल दत्त के पात्र का नाम होता है जो 50 साल का अधेड़ है.

रेलवे में बड़ा अफसर है. एकाकी है. संवेदनाएं नहीं है. जीवन जीता नहीं है. वो गुजरात के एक गांव शिकार करने की छुटि्टयां लेकर पहुंचता है. लेकिन उसने जीवन में जितनी विद्वता पाई थी वो यहां शून्य हो जाती है.

यहां उसे गौरी नाम की गांव की लड़की मिलती है जो न उसकी तरह पढ़ी लिखी है, न उसके पास बंदूक है लेकिन व्यावहारिक तौर पर सब चीज उससे ज्यादा जानती है. ग्रामीण परिवेश के कपड़े पहनाती है ताकि पक्षी अनजान आदमी मानकर उड़ न जाएं. ऐसी कई छोटी-छोटी चीजें वो करती है.

भुवन शोम के दृश्य में उत्पल दत्त व सुहासिनी मुलै.
भुवन शोम के दृश्य में उत्पल दत्त व सुहासिनी मुलै.

उसकी खुश रहने की फिलॉसफी भी है. इस लहर जैसी यात्रा के बाद भुवन शोम को जीवन में नई दिशा मिलती. फिल्म इस कहानी से वर्णित नहीं की जा सकती. इस अनु‌भव को देखकर ही जिया जा सकता है.

13. भारत और दुनिया के शीर्ष फिल्म स्कूलों में मृणाल दा की फिल्में पढ़ाई जाती हैं. फिल्म स्टूडेंट्स के अलावा विश्व सिनेमा में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी भुवम शोम, मृगया, अकालेर संधाने, खंडहर, खारिज, अकाश कुसुम, कोरस, जेनेसिस, एक दिन अचानक जैसी फिल्में ‌विशेष स्थान रखती हैं.

14. उन्होंने अपने वक्त की अमानवीय स्थितियों को दर्शकों के सामने रखा. उनकी फिल्मों में गरीबी, साम्राज्यवाद, अकाल, वर्गभेद, सामाजिक अन्याय, सूखा, गैर-बराबरी जैसे विषयों को देखा गया. इसे लेकर मृणाल सेन ने कहा था:

” मैं अपने ख़ुद के वक्त को समझने की कोशिश करता हूं और उसे सामने रखने की कोशिश करता हूं.”

मृणाल दा पर एक अच्छी डॉक्यूमेंट्री है जिसे यहां देख सकते हैं: 

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