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अक्षय की 'सूर्यवंशी' से अलग वो फिल्मी पुलिसवाले, जिन्होंने बताया कि पुलिस कैसी होनी चाहिए

रोहित शेट्टी के डायरेक्शन में बनी ‘सूर्यवंशी’ पैंडेमिक के बाद सिनेमाघरों में उतरने वाली पहली बड़ी फिल्म है. अक्षय कुमार की ये फिल्म बढ़िया कमाई कर रही है. ऐसे में इस फिल्म की महत्ता बढ़ जाती है. क्योंकि कोरोना वायरस के डर से लंबे समय से घरों में कैद पब्लिक अब सिनेमाघरों में फिल्म देखने जाने लगी है. ‘सूर्यवंशी’ की कमाई, इसी ओर इशारा करती है. ये तो हुई परिस्थितियों की बात. मगर एक सिनेमा के तौर पर ‘सूर्यवंशी’ हमें क्या देती है? ये एक बड़ा सवाल है.

अगर ब्रीफ में बताएं, तो ‘सूर्यवंशी’ एक पुलिसवाले की कहानी है. जो देश पर होने जा रहे एक बड़े आतंकी हमले को रोकता है. हिंदी सिनेमा के तमाम पुलिसवाले पहले भी ऐसा कर चुके हैं. और भरपूर चांसेज़ हैं कि आगे भी करते रहेंगे. ‘सूर्यवंशी’ में क्या नया या अलग है? इसका दो टूक जवाब है- कुछ नहीं.

# ‘सूर्यवंशी’ में एक अन-रियल बैकड्रॉप है, जो बड़े कनविनिएंट तरीके से लीड कैरेक्टर को हीरो बनाने के लिए गढ़ा गया है.
# एक पुलिसवाला, जो असलियत से इतना दूर है, जितना लॉजिक से रोहित शेट्टी.
# ओरिजनैलिटी के नाम पर फिल्म में ‘टिप टिप बरसा पानी’ और ‘ना जा ना जा’ जैसे ऑलरेडी हिट गानों के रीमिक्स हैं.
# इस फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज़ और सेलिंग फैक्टर है, अजय देवगन और रणवीर सिंह का गेस्ट अपीयरेंस.

अगर आपने फिल्म नहीं देखी, तो ‘सूर्यवंशी’ का ट्रेलर देखकर अंदाज़ा लगाने की कोशिश करिए-

रोहित शेट्टी अपना कॉप यूनिवर्स बना रहे हैं. मगर उनके कॉप्स इस यूनिवर्स के लगते ही नहीं. क्योंकि सिंघम से लेकर सिंबा और सूर्यवंशी, हर वो चीज़ करते हैं जो एक पुलिसवाले से एक्सपेक्ट नहीं की जाती. पुलिसवाले कैसे होने चाहिए, इन किरदारों ने उस आइडिया को करप्ट कर दिया है. रोहित शेट्टी के मुताबिक कोर्ट-कचहरी कोई चीज़ नहीं होती. उनकी फिल्मों के पुलिस का काम सिर्फ आरोपियों को पकड़ना नहीं, उसके किए की सज़ा देना भी है. हम आए दिन एक्स्ट्रा जूडिशियल किलिंग्स जैसी चीज़ें देखते-सुनते रहते हैं. वो कहानियां दिल दहला देने के लिए काफी होती हैं. ‘विसारनाय’ से लेकर ‘जय भीम’ जैसी फिल्में बनीं, जो इस मसले पर गंभीरता से बात करती हैं.

रोहित शेट्टी की फिल्में एक्स्ट्रा जूडिशियल किलिंग जैसी चीज़ों को ग्लोरिफाई करती हैं. उन्हें हेरोइक एक्ट की तरह जनता के सामने रखती हैं. हम रोहित शेट्टी का नाम इसलिए ले रहे हैं क्योंकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड इस बात की गवाही देता है. मगर वो इस तरह की चीज़ों को फैशनेबल तरीके से दिखाने वाले इकलौते फिल्ममेकर नहीं हैं. हमारी कोशिश थी कि हम रोहित शेट्टी को आइना दिखाने वाले फिल्मी पुलिसावालों के ऊपर एक लिस्टिकल बनाएं. हमने एक लंबी-चौड़ी लिस्ट तैयार की थी. इस लिस्ट में ‘अर्ध सत्य’, ‘सरफरोश’ से लेकर ‘शूल’, ‘गंगाजल’ और ‘मुळशी पैटर्न’ जैसी फिल्मों के नाम शामिल थे.

फिर हमें ये रियलाइज़ हुआ कि हमने जिन फिल्मों का चुनाव किया है, वो सिर्फ ‘सूर्यवंशी’ से बेहतर तरीके से पुलिसावालों का चित्रण करती हैं. वो आइडियल सिचुएशन नहीं है. सबमें कुछ न कुछ खामियां हैं. सबने अलग-अलग तरीकों से नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाई हैं. सिनेमा का स्टुडेंट होने के नाते, हमारी असली परीक्षा यहां शुरू होती है. उन फिल्मों को ढूंढना, जिसमें पुलिस को वैसा दिखाया गया है, जैसे उन्हें होना चाहिए.

पुलिस को कैसा होना चाहिए?

# सबसे बेसिक बात ये है कि उन्हें किसी आरोपी को उसके क्राइम से हटकर एक इंसान के तौर पर देखना चाहिए. उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. क्योंकि कोई भी पैदाइशी क्रिमिनल नहीं होता. समाज और परिस्थितियां उसे ऐसे शेप करती हैं कि वो चीज़ों को सही पर्सपेक्टिव में देख नहीं पाता.
# जैसे फिल्मों में दिखाया जाता है कि पुलिस किसी क्रिमिनल के साथ मारपीट करती है. अधिकतर मामलों में उन्हें जान से मारकर न्याय करने का ढोंग करती है. मगर ये पुलिस का काम नहीं है. पुलिस का काम किसी आरोपी को पकड़कर कोर्ट के सामने पेश करना है. मामले की तहकीकात का जिम्मा भी उनका होता है. सजा देना कोर्ट का काम होता है.
# पुलिस से उम्मीद की जाती है कि वो आरोपियों से नफरत न करें. उन्हें संवेदनशीलता के साथ डील करे. उन्हें चुका हुआ मान लेने की बजाय उन्हें सुधरने का मौका दे.
# लास्ट और सबसे ज़रूरी, पुलिस संविधान के मुताबिक चले.

(PS- मैं कभी पुलिस नहीं रहा. मेरे आसपास कुछ लोग हैं, जो पुलिस में हैं. उनसे बात करके जो चीज़ें समझ आईं, उन्हें इस आर्टिकल में इन-कॉर्पोरेट करने की कोशिश की गई.)

सिनेमा के जानकार लोगों की मदद से हमने कुछ ऐसी फिल्में ढूंढी हैं, जिनके पुलिसवाले ऊपर बताए सभी पैमानों पर खरे उतरते हैं.

1) आशीर्वाद (1968)- जेलर

ये फिल्म जोगी ठाकुर नाम के एक सिद्धांतवादी शख्स की कहानी है. फिल्म का एक सीक्वेंस है, जिसमें जोगी कत्ल के इल्ज़ाम में जेल में बंद है. इस दौरान हमें सिर्फ जोगी ही नहीं, उसके आसपास का माहौल भी दिखाया जाता है. ऐसे ही एक सीन में अपनी सजा पूरी करके एक चोर जेल से बाहर जा रहा है. वो जेल से निकलने से पहले आखिरी बार जेलर से मिलने जाता है. बातचीत के दौरान चोर बताता है कि अब वो अपने गांव नहीं जा पाएगा. क्योंकि उसके घर-परिवार वाले ये सोचेंगे कि वो जेल से आया है. वो पहले कुछ बन जाएगा. फिर अपने घर जाएगा. जेलर साहब उस चोर से पूछते हैं-

”तुम्हें जेल में क्यों रखा?”

जवाब आता है-

”जुर्म की सज़ा देने के लिए साहब”

इसके बाद जेलर उस चोर को बताता है कि जेल जाने का असल मतलब क्या होता है. जेलर कहता है-

”हम मुजरिमों को कैदखाने में इसलिए रखते हैं, ताकि वो बाहर के तमाम रिश्ते-नातों से कटके अपने आप के साथ रहे. अपने आप को देखे. अपनी अच्छाइयों और बुराइयों को खुद पहचाने. और परखे उन्हें.”

जेलर को उस चोर से ये सब कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी. वो फॉरमैलिटी पूरी करके चोर को छोड़ देता. मगर जेलर सुपर नहीं, सेंसिबल कॉप है. उसकी कही हुई वो बात, गलती और उसकी सज़ा के बोझ तले दबे चोर को जीवन को अलग नज़रिए से देखने की समझ देती है. उस चोर को लगता है कि कोई है, जो उसे चोर नहीं, एक इंसान के तौर पर देख रहा है. उसकी व्यथा समझ और साझा कर रहा है.

फिल्म ‘आशीर्वाद’ का वो सीन आप नीचे लगे वीडियो में 01:16:16 सेकंड से देख सकते हैं-

2) मुंबई मेरी जान (2008)- सुनील कदम और तुकाराम पाटिल

ये फिल्म 11 जुलाई, 2006 को मुंबई लोकल में हुए 7 ब्लास्ट्स के नेपथ्य में बुनी हुई है. इसमें ये दिखाने की कोशिश की गई थी कि इन ब्लास्ट्स ने मुंबई के लोगों को किस कदर प्रभावित किया. और इस हमले के बाद उनकी ज़िंदगी कितनी बदल गई. इस कहानी में अलग-अलग सोशल बैकग्राउंड से आने वाले लोगों की कहानी दिखाई गई थी. इसमें दो पुलिसवाले भी शामिल थे. तुकाराम पाटिल और सुनील कदम. फिल्म में एक सीन है, जहां बम ब्लास्ट का एक आरोपी पकड़ा जाता है. उसे टीवी पर देखकर थाने में एक पुलिसवाला कहता है कि ऐसे लोगों को मारना ही चाहिए. कदम की ठनक जाती है. वो पूछता है,

”क्यों? तू पुलिस में है इसलिए?”

दूसरा पुलिसवाला कहता है- ”हां”

सुनील कदम उसे समझाने और हड़काने के मिले-जुले भाव से कहता है-

”लेकिन है तो आदमी न. मेघवाड़ी पुलिस थाने में मैं उसके साथ तीन महीना था. मेरे को कभी लगा नहीं कि वो ऐसा कुछ करेगा. दो सेकंड लगता है शैतान, आदमी के अंदर घुसने में. और उसी दो सेकंड के टाइम में ही सब गलती हो जाती है. डॉक्टर पेशेंट पे रेप करता है. कंपनी का मालिक सेक्रेटरी पे रेप करता है. शैतान हम सबके अंदर होता है. माना की काम है हमारे डिपार्टमेंट का कि होते हुए रेप को रोकने का. लेकिन हमारे में से कोई करता है, तो. जो करने का है, एकदम उसका उल्टा करते हैं.”

इस सीन को देखकर ऐसा लगता है मानों एक रियल पुलिसवाला फिल्मी पुलिसवाले को बता रहा है कि उनकी ड्यूटी क्या है. पुलिस डिपार्टमेंट जैसे काम करती है, सुनील कदम उससे परेशान है. मगर वो अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी के साथ कर रहा है. वो बम ब्लास्ट कर सैकड़ों लोगों की जान लेने वाले के प्रति नफरत का भाव नहीं रखता. वो मानता है कि उस शख्स से गलती हुई है. मगर इसका मतलब ये नहीं कि वो आदमी ही नहीं रहा. वो चाहता है कि उसकी गलती की सज़ा उसे मिले. मगर वो सज़ा उसे कोर्ट दे. पब्लिक या पुलिसवाले नहीं.

फिल्म का वो सीन आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं-

‘मुंबई मेरी जान’ में कई ऐसे सीन्स हैं, जो पुलिस और उनकी ड्यूटी के बारे में आपको अवेयर करते हैं. जैसे हमने विजय मौर्य के निभाए सुनील कदम वाले किरदार के बारे में बात की. फिल्म में एक और सीन है, जिसमें परेश रावल का निभाया तुकाराम पाटिल का किरदार पुलिस से रिटायर हो रहा है. वो आखिरी बार अपनी टीम के साथियों को संबोधित करता है. यानी फेयरवेल स्पीच दे रहा होता है. तुकाराम कहते हैं-

”आपको 36 साल हो गया पुलिस का नौकरी में. आज आप रिटायर होने जा रहे हो. साहब को बोलो टीवी पर आपका इंटरव्यू दिखाए. मैं पूछा क्यों? बोला आज कल तो किसी भी दिखा देते हैं टीवी पर. मगर मेरे को ऐसा पब्लिसिटी नहीं, सिर्फ ड्यूटी करने का है बस.”

वो 36 साल पहले की बंबई और आज की मुंबई में फर्क बताता है. बताते-बताते तुकाराम भावुक हो जाता है. कहता है-

”अभी मैं और बोलने जाऊंगा, तो रो पड़ूंगा. और पुलिस का वर्दी पहन के रोने का अलाउड नहीं, तो मैं टॉयलेट जाकर आता हूं.”

उस आदमी को अपनी ड्यूटी के आगे कुछ नहीं दिखता. उसे सिर्फ अपना काम करना है. उसने अपने सामने, आसपास की दुनिया को बदलते देखा. कुछ नहीं बदला, तो वो है तुकाराम. काम के प्रति उसका समर्पण और ईमानदारी. अपने सर्विस के आखिरी दिन तक उसे वर्दी की इतनी कद्र है कि वो उसे पहनकर रोना तक नहीं चाहता. क्यों? क्योंकि अलाउड नहीं है.

‘मुंबई मेरी जान’ का वो सीक्वेंस आप नीचे देख सकते हैं-

3) तलवार (2015)- अश्विन कुमार

2008 आरुषि-हेमराज हत्याकाण्ड पर बेस्ड ये फिल्म उस घटना के एक से ज़्यादा वर्ज़न दिखाती है. उस केस में वाकई क्या हुआ था, ये किसी को नहीं पता. आरुषि तलवार के ऊपर जो किरदार आधारित है, उसे फिल्म में श्रुति टंडन नाम से बुलाया जाता है. फिल्म में दिखाई गई एक थिअरी के मुताबिक श्रुति टंडन के किरदार की हत्या का ज़िम्मेदार घर के नौकर को बताया जाता. दूसरी थिअरी में इसे ऑनर का किलिंग के मामले के तौर पर पेश किया जाता है. जिसमें बच्ची के माता-पिता को उसका किलर माना जाता है. कौन सी थिअरी सही या गलत है, ये फैसला दर्शकों पर छोड़ दिया जाता है. रियल घटना की जांच में पुलिस की लापरवाही को लेकर बड़ी फजीहत हुई थी. यहीं सीन में आता है, वो पुलिसवाला जिसकी हम बात कर रहे हैं. फिल्म में इस मामले की जांच CDI को सौंपी जाती है. जॉइंट डायरेक्टर अश्विन कुमार काम शुरू करते हैं. अश्विन का रोल किया है इरफान ने.

‘तलवार’ का ट्रेलर देखकर आपको चीज़ों के बारे में ज़्यादा क्लैरिटी मिलेगी-

अश्विन कुमार अपना काम चालू करता है. हर चीज़ को दोबारा से चेक करता है. अपनी शंकाएं मिटाने के लिए शुरुआती जांच करने वाले पुलिस ऑफिसर्स की मदद लेता है. अश्विन देखता है कि इस मामले की इनवेस्टिगेशन में पुलिस ने भयंकर लापरवाही बरती है. पुलिस देखती है कि लड़की का मसला है. उन्हें कंप्यूटर पर कुछ पोर्नोग्राफिक कॉन्टेंट मिलती है. उसके आधार पर बिल्कुल कंवेंशनल माइंडसेट के साथ इस केस की जांच में लग जाते हैं. उन्हें लगता है कि लड़की की कुछ हरकतें ऐसी रही होंगी, जिससे मां-बाप नाखुश रहे होंगे. इसलिए उन्होंने अपनी बेटी की हत्या कर दी. ऊपरी प्रेशर और डेडलाइंस के चक्कर में वो इस नतीजे तक पहुंचते कि श्रुति का खून उसके पैरेंट्स ने ही किया है.

अश्विन कुमार यहां सबसे बुनियादी चीज़ करते हैं. या यूं कहें कि वही करते हैं, जो उनसे एक्सपेक्टेड है. उन्हें दिखता है कि पुलिस ने क्राइम सीन कंटैमिनेट कर दिया. कई पहलूओं को नज़रअंदाज कर दिया. शुरुआती जांच के आधार पर माता-पिता को खूनी बता दिया. मगर वो इसका कोई ठोस सबूत नहीं दे पा रहे हैं. ऐसे में अश्विन बिना किसी बायस या मोरल प्रेशर वाले चश्मे से इस केस को देखते हैं. वो डेडलाइन और सीनियर्स के दबाव में नहीं, सिर्फ इसलिए इस केस को दोबारा से इनवेस्टिगेट करते हैं क्योंकि-

”किसी भी बेगुनाह को सज़ा मिलने से अच्छा है, 10 गुनहगार छूट जाएं.”

ये सिर्फ अश्विन कुमार का नहीं, भारतीय न्याय व्यवस्था का भी मानना है. इंडियन जूडिशियरी ऐसे ही काम करने की कोशिश करती है.

जाते-जाते इस फिल्म का एक जबरदस्त सीन देखते जाइए-


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- सूर्यवंशी

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