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आर. के. नारायण, जिनका लिखा 'मालगुडी डेज़' हम सबका नॉस्टैल्जिया बन गया

दूरदर्शन पर ‘मालगुडी डेज़’ देखना अब भी बहुतों को याद होगा. मालगुडी डेज़ के साथ एक धुन मन में बजने लगती है. ‘मालगुडी डेज़’ के लेखक थे आर. के. नारायण. पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी एय्यर नारायणस्वामी. अंग्रेज़ी साहित्य के बेजोड़ लेखक. आर. के. नारायण ने और भी बहुत कुछ लिखा. ‘दी गाइड’ नाम का उपन्यास इनमें से एक था. और इसी उपन्यास पर मशहूर फ़िल्म ‘गाइड’ बनी. जिसे आज भी देवानंद और वहीदा रहमान के अभिनय के लिए जाना जाता है. आज लेखक आर. के. नारायण की बरसी है. आइए पढ़ते हैं ‘मालगुडी डेज़’ और ‘गाइड’ के कुछ मशहूर डायलॉग –

#1

मुंह में चार दांत तो रहे नहीं और ज़बान का चस्का तो देखो इनका.

– मुनिया (मालगुडी डेज़)

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#2

क्या पता अब ये रोड रोलर ही मेरी किस्मत बदल दे.

– शेषाद्री जी (मालगुडी डेज़)

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#3

नई मिठाई का ढांचा नया, पर पदार्थ पुराना है. सारी मिठाइयों में पदार्थ तो एक ही रहता है.

– मिठाईवाला (मालगुडी डेज़)

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#4

आदमी में शेर जैसी हिम्मत होनी चाहिए, वो है तो सबकुछ है. वो नहीं तो कुछ भी नहीं.

– स्वामी (मालगुडी डेज़)

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#5

पढ़ाई किसलिए की जाती है? जिंदा रहने के लिए. अगर जिंदा ही नहीं रहे तो पढ़ाई भला किस काम की?

– स्वामी (मालगुडी डेज़)

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‘गाइड’ फ़िल्म के कुछ मशहूर डायलॉग भी सुनिए –

 

# लगता है आज हर इच्छा पूरी होगी, पर मज़ा देखो आज कोई इच्छा ही नहीं

– राजू

(गाइड 1965)

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# जब मतलब से प्यार होता है, तो प्यार से मतलब नहीं होता

– रोज़ी

(गाइड 1965)

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# जो आदमी अपने नसीब को कोसता रहता है, उसका नसीब भी उसको कोसने लगता है

– राजू

(गाइड 1965)

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# याद में नशा करता हूं और नशे में याद करता हूं

– राजू

(गाइड 1965)

Guide4

# मौत एक ख़याल है, जैसे ज़िंदगी एक ख़याल है

– राजू

(गाइड 1965)

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# दुःख वो अमृत है जिससे पाप धुलते हैं

– राजू

(गाइड 1965)

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