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फ़िल्म रिव्यूः गुलाबो सिताबो

फ़िल्म: गुलाबो सिताबो । डायरेक्टर: शुजीत सरकार । कलाकार: अमिताभ बच्चन, आयुष्मान ख़ुराना, फारुख़ ज़फर, सृष्टि श्रीवास्तव, विजय राज, बृजेंद्र काला । अवधि: 2 घंटा 04 मिनट । प्लेटफॉर्मः एमेज़ॉन प्राइम वीडियो

ये कहानी है लखनऊ में फ़ातिमा महल नाम की हवेली में रहने वाले मिर्ज़ा चुन्नन नवाब की. 78 साल के बुजुर्ग. हवेली उनकी बेगम के नाम है. फत्तो बी. जो उनसे 17 साल बड़ी हैं. ये हवेली जर्जर हालत में. ईंटे भुरभुरा रही हैं. रेलिंग टूट चुकी हैं. तीन-चार परिवार यहां किराए पर रहते हैं. बहुत कम किराया देते हैं. इनमें सबसे कम किराया देता है बांके. जो अपनी तीन बहनों और मां के साथ रहता है. आटा चक्की चलाता है. बांके सिर्फ 30 रुपये महीना किराया देता है. तीन महीने से तो दिया भी नहीं है.

मिर्ज़ा ज़रा लालची इंसान हैं. पैसे की किल्लत है तो कंजूसी आ ही जाती है. वो बांके से बार बार कहते हैं कि वो किराया बढ़ा दे या घर खाली कर दे. बांके कहता है – “जित्ता दे रहे हैं उत्ता ही ले लो वरना ये भी नहीं देंगे और मकान भी खाली नहीं करेंगे”.

Amitabh Bachchan Ayushmann Khurrana Comedy Scene In Gulabo Sitabo The Lallantop Review
बाइक लेकर आटा चक्की जा रहे बांके का रास्ता रोकते मिर्ज़ा, किराए का तकादा करते हुए. (फोटोः Amazon Prime video)

मिर्ज़ा हवेली खाली कराने या किराया बढ़वाने के लिए तरह तरह की हरकतें करते हैं. बल्ब निकाल लेते हैं, साइकल की घंटियां निकाल लेते हैं, रात में बिजली काट देते है, लेट्रीन यानी पाख़ाने के ताला लगाकर आगे चारपाई डालकर सो जाते हैं. लेकिन बांके भी जिद्दी है, वो भिड़ा रहता है. मिर्ज़ा को ‘तू’, ‘बुढ़ऊ’, ‘छछुंदर’ कहकर ही संबोधित करता है. इनकी ये तकरार आगे क्या ग़ुल खिलाती है ये फिल्म में दिखता है.

‘गुलाबो सिताबो’ को शुजीत सरकार ने डायरेक्ट किया है. जिन्होंने विकी डोनर, पीकू, अक्टूबर जैसी फिल्में डायरेक्ट की हैं. वे ऋषिकेश मुखर्जी वाली धारा के फिल्ममेकर हैं. उनकी ये सब फिल्में लिखने वाली जूही चतुर्वेदी ने गुलाबो सिताबो भी लिखी है. स्टोरी, स्क्रीनप्ले, डायलॉग तीनों. जूही के लिखे कुछ डायलॉग अच्छे हैं. जैसे –

1. बांके का अपनी बहनों से कहना – “तुम लोग एक साल में चार साल कैसे बड़ी हो जाती हो, थोड़ा वक्त तो दो पैसा जमा करने के लिए”. ये वो तब बोलता है जब उसे बहनें बताती हैं कि वे काफी आगे की कक्षाओं में आ चुकी हैं और दद्दा को पता भी नहीं होता.

Ayushmann Khurrana Baanke With Sisters Scene In Gulabo Sitabo The Lallantop Review
बहनों से बात करता बांके. (फोटोः Amazon Prime video)

2. फत्तो बी का शहदभीगी आवाज़ में कहना – “अरे बल्ब नहीं चोरी हुआ, निगोड़ी जयदाद चोरी हो गई”. वो ये तब बोलती हैं जब बांके शिकायत करता है कि रात को किसी ने यानी मिर्ज़ा ने बल्ब चुरा लिए.

3. बांके-मिर्ज़ा का संवाद. जब बांके उन्हें लालची कहता है तो मिर्ज़ा बोलते हैं – “अव्वल तो ये कि हमने आज तक सुना नहीं है कि कोई लालच से मरा हो. और दूसरा, ये कि हम लालची हैं ही नहीं. हवेली का लालच नहीं है, उल्फत है, मुहब्बत है, हवेली से. बेइंतहा.”

Amitabh Bachchan Ayushmann Khurrana Funny Dialogue Scene In Gulabo Sitabo The Lallantop Review
इस सीन में बांके मिर्ज़ा के पास आकर कहता है लालच छोड़ो और मुझे बेटा बनाकर गोद ले लो. (फोटोः Amazon Prime Video)

4. सबसे फनी डायलॉग और सीन वो लगता जब मिर्ज़ा अपनी बीवी के रिश्तेदार से मिलने जाते हैं और वो रिश्तेदार कहता है – “फत्तू बी अभी भी ज़िंदा है?” इस पर सपाट चेहरे और भोलेपन के साथ मिर्ज़ा कहते हैं – “मर ही नहीं रहीं.”

कुछ बेदम डायलॉग भी हैं. जैसे, जब बांके आसिफुदौला की कहानी सुनाता है जिन्होंने फैज़ाबाद से आकर लखनऊ शहर को बनाया. वो तीन-चार लाइन का संवाद कोई असर नहीं छोड़ता.

फिल्म के एक्टर्स की बात करें तो मिर्ज़ा का रोल अमिताभ बच्चन ने किया है. उनका प्रोस्थेटिक मेकअप और घुटने झुकाकर चलना पूरी फिल्म में आकर्षण का केंद्र होता है. आयुष्मान ख़ुराना ने बांके का रोल किया है. वे अपने कैरेक्टर की जीभ को एक लिस्प यानी तुतलाहट देते हैं, जैसे 3 ईडियट्स में वीरू सहस्त्रबुद्धे के किरदार की होती है. अटल बिहारी वाजपेयी जैसी. लेकिन ये लिस्प ढंग से विकसित नहीं होती. उनके लखनवी लहज़े की भी कोई खास पहचान या distinctness नहीं है.

विजय राज ने पुरातत्व विभाग में काम करने वाले शुक्ला का रोल किया है. बृजेंद्र काला ने वकील क्रिस्टोफर क्लार्क का, जो मकान खाली करवाता है किराएदारों से.

Vijay Raaz Brijendra Kala In Gulabo Sitabo
शुक्ला बने विजय राज और वकील के रोल में बृजेंद्र काला. (फोटोः Amazon Prime Video)

चार महिला किरदार और उन्हें करने वाली एक्ट्रेस ख़ास याद रहती हैं.

फत्तो बी का रोल करने वाली फारुख़ ज़फर. जिन्हें हम स्वदेश और पीपली लाइव में देख चुके हैं.

बांके की मां का रोल करने वाली एक्ट्रेस.

बांके की बहन गुड्डो का रोल करने वाली सृष्टि श्रीवास्तव.

Farrukh Jaffar Srishti Shrivastava In Gulabo Sitabo
तीन किरदार – फत्तो बी, बांके की मां, बहन गुड्डो.

और फातिमा महल में ही रहने वाली एक महिला जो पूरा झुककर चलती हैं, जिनका बोला समझ नहीं आता. ये पात्र मुझे पाथेर पांचाली की बुजुर्ग महिला इंदीर ठकुराइन की याद दिला गया जो रोल देखते हुए लगा था कि किसी नॉन एक्टर ने किया होगा लेकिन असल में वो पेशेवर एक्ट्रेस चुनीबाला देवी थीं.

Pather Panchali Indir Thakuran Like Character In Gulabo Sitabo
शुजीत की फिल्म का किरदार, सत्यजीत राय की फिल्म में उस बुजुर्ग का किरदार.

गुलाबो सिताबो की सिनेमैटोग्राफी यानी कैमरे का काम अवीक मुखोपाध्याय ने किया है. उन्होंने बंगाली फिल्में ज्यादा की हैं और कुछ हिंदी – जैसे, पिंक, अक्टूबर, बदला, चोखेर बाली, अंतहीन, राजकाहिनी. एडिटिंग चंद्रशेखर प्रजापति की है. वे 2005 में आई फिल्म ‘यहां’ से लेकर गुलाबो सिताबो तक शुजीत की सब फिल्मों के एडिटर रहे हैं. बरेली की बर्फी, निल बटे सन्नाटा की एडिटिंग भी की.

प्रोस्थेटिक्स और मेकअप पिया कॉर्नीलियस का है. वे स्वीडन की हैं. इस फिल्म में मिर्ज़ा के किरदार के लिए बच्चन का प्रोस्थेटिक्स उन्होंने किया है. वे शूजीत की अक्टूबर और शूबाइट भी कर चुकी हैं. शूबाइट में अमिताभ का प्रोस्थेटिक्स भी ऐसा ही आकर्षक था. वो फिल्म बरसों से अटकी हुई है. गुलाबो सिताबो का प्रोडक्शन डिजाइन, आर्ट डायरेक्शन, कॉस्ट्यूम और मेकअप इसकी सबसे आकर्षक चीजों में है.

Make Up Pia Cornelius, Editor Chandrashekhar Prajapati, Cinematographer Avik Mukhopadyay Gulabo Sitabo
पिया, चंद्रशेखर और शुजीत के साथ अवीक.

फ़िल्म को देखने की ओवरऑल फीलिंग, विचार कुछ यूं हैं –

[1.] गुलाबो सिताबो खुलती है इन नामों वाली दो कठपुतलियों के खेल से. कठपुतली वाला कहता है कि वे दोनों बहुत लड़ती हैं. थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो बांके की सबसे छोटी बहन टीवी पर टॉम एंड जैरी का कार्टून देख रही होती है. इन दो संकेतों से फिल्म स्पष्ट कर देती है कि वो ऐसे ही लड़ने वाले मिर्ज़ा और बांके की कहानी सुनाने वाली है. कुछ कुछ स्टूज ब्रदर्स, लॉरेल हार्डी वाली लाइन पर. चूहे बिल्ली का वो खेल जो हमने दूल्हे राजा के सिंघानिया और राजा के बीच देखा है या, हाफ टिकट में किशोर कुमार और प्राण के किरदारों के बीच देखा है.

लेकिन कहानी जिस फिजिकल कॉमेडी, ठहाकों या गुदगुदी के इर्द-गिर्द हमें निमंत्रित करती है, उसमें लंबे समय तक मिर्ज़ा़, बांके की किसी बात से हंसी नहीं आती.

Three Stooges And Govinda Kadar Khan Starrer Dulhe Raja Chat In Gulabo Sitabo Review
तीन स्टूज और दूल्हे राजा में कादर – गोविंदा.

[2.] फिल्म वादा करके भी नहीं हंसा पाती तो ये कोई बुरी बात नहीं. एक फिल्म से सिर्फ एंटरटेनमेंट चाहना, बड़ा अधूरापन है. उस कहानी को सुनने देखने का अनुभव चाहे कितना ही imperfect हो, नया है तो भी बहुत है.

[3.] इस कहानी की महिलाएं सशक्त हैं. अपने फैसले खुद लेती हैं. बाकी सब मर्दों के मुकाबले ज्यादा स्मार्ट और शिक्षित हैं. वे कंगाल और रुपये के पीछे भाग रहे मर्दों को छोड़कर, उन पुरुषों को चुनती हैं जो बताया जाता है कि उनसे प्यार करते हैं, लेकिन संयोग से उनकी जो सबसे बड़ी क्वालिटी फिल्म दिखा पाती है वो ये कि वे सब पैसे वाले हैं, सबके पास चमचमाती गाड़ियां है. उन पुरुषों के पास भौतिक दुनिया के सब ऐश आराम हैं.

[4.] जो फिल्म दो लोगों की लड़ाई दिखाकर हंसाने चली थी वो आगे कहीं और मुड़ जाती है. वो प्यार की बात करती है. कहती है कि पुरुष ज़मीन को, मकान को प्यार करते हैं, अपनी औरत को नहीं. लेकिन ऐसे अवगुण वाले पुरुषों यानी बांके-मिर्ज़ा का निर्माण कहानी में किया तो किसी और उद्देश्य के लिए गया था. वो उद्देश्य था टॉम एंड जैरी वाली धूम-धड़ाक निर्मित करना. लेकिन उनके उन्हीं अनिवार्य अवगुणों का इस्तेमाल बाद में एक खास मैसेजिंग या क्लाइमैक्स के फैसलों को सही ठहराने के लिए किया गया. मिर्ज़ा-बांके की नोकझोंक से उठाकर पूरी कहानी का सिरा मिर्ज़ा के लालच पर खड़ा कर देना एक किस्म का छल है. अगर स्क्रिप्ट कुछ और करना चाह रही थी तो वो मेरे लिए स्प्ष्ट नहीं था.

Ayushmann As Baanke And Amitabh Bachchan As Mirza In Gulabo Sitabo The Lallantop Review
बांके और मिर्ज़ा. लिखने वाले के हाथ की कठपुतलियां. (फोटोः Amazon Prime Video)

कहानी के इन दो दिशाओं में भागने की कोशिश, इसे देखने के पूरे प्रोसेस को एक तरह की अर्थहीनता या inconsequentiality में तब्दील कर देती है.

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Cinema Video: ‘गुलाबो सिताबो’ का रिव्यू यहां देखें

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