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वेब सीरीज़ रिव्यू: ग्रहण

सत्य व्यास. हिंदी भाषा के लेखक हैं. बनारस टॉकीज और दिल्ली दरबार जैसी किताबें लिख चुके हैं. दोनों बेस्ट सेलर्स रही. उन्होंने 2018 में एक और नॉवेल लिखा. ‘चौरासी’. कहानी 1984 के सिख दंगो को पृष्ठभूमि बनाकर बुनी गई थी. अब ‘चौरासी’ को स्क्रीन के लिए अडैप्ट किया गया है. ‘ग्रहण’ के नाम से. ‘ग्रहण’ एक वेब सीरीज है जो 24 जून से डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर स्ट्रीम होना शुरू हो गई है. कैसी है ये सीरीज, यही जानने के लिए हमनें भी देखी. क्या अच्छा लगा और क्या नहीं, यही जानते हैं.

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दो टाइमलाइंस में बंटा है शो.

# Grahan की कहानी क्या है?

कहानी सेट है झारखंड में. लेकिन उसके दो अलग-अलग शहरों में. सिर्फ अलग शहरों में ही नहीं, अलग टाइमलाइंस में भी. एक है 2016 का रांची तो दूसरा 1984 का बोकारो. पहले बताते हैं 2016 वाली टाइमलाइन. झारखंड में चुनाव समीप हैं. मुख्यमंत्री केदार की कुर्सी खतरे में है. सामने है संजय सिंह. अब संजय का पक्ष कमजोर करने के लिए केदार एक एसआईटी कमिटी बिठाता है. जो बोकारो में हुए 1984 के सिख दंगों की जांच कर सके. वो जानता है कि संजय का उन दंगों से सीधा कनेक्शन था. इसलिए जांच में जो सामने आएगा, वो संजय का राजनीतिक करियर खत्म करने के लिए काफी होगा.

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‘मुक्काबाज़’ वाली ज़ोया हुसैन ने अमृता का किरदार निभाया है.

एसआईटी की इंचार्ज बनाया जाता है अमृता सिंह को. एक सिख आईपीएस ऑफिसर. अपने पिता के बेहद करीब है. उन्हीं के साथ रहती है. अमृता जैसे पुलिसवाले आप सिनेमा में पहले भी देख चुके हैं. जो सिर्फ न्याय में भरोसा करते हैं. जिनके लिए सब व्हाइट और ब्लैक है. इन दोनों रंगों के बीच छुपे सच से तो ये बडी लेट परिचित होते हैं. और जब होते हैं, तब अपने आप से सवाल करने लगते हैं. अमृता का भी सच से सामना होता है. जिसके लिए वो बिल्कुल भी तैयार नहीं होती. पता चलता है कि जिन दंगों की जांच कर रही है, उनका उसके पिता से भी कनेक्शन है. वो कनेक्शन क्या है और अमृता उससे कैसे डील करेगी, ये आपको शो देखकर पता चलेगा. शो शुरू भले ही अमृता के सच से होता है, लेकिन कहानी उससे कई ज्यादा गहरी है. उन सभी पहलुओं के लिए आपको ये शो देखना ही चाहिए. कुछ कारण और बताते हैं जिनकी वजह से ये शो देखा जाना चाहिए.


# अपने समय के हिसाब से रेलवेंट है

शो दो हिस्सों में चलता है. 2016 के रांची की कहानी एक तरफ. 1984 के बोकारो की कहानी दूसरी ओर. बोकारो वाली कहानी के मुख्य किरदार हैं ऋषि और मनु. दोनों एक दूसरे से खूब प्यार करते हैं. पुराने जमाने वाला निश्छल प्यार. कई दशक और शहर नापने वाली इस लव स्टोरी को शो का मेन प्लॉट कहना गलत नहीं होगा. आठ एपिसोड्स में बहुत कुछ घटता है, लेकिन ये लव स्टोरी आपके दिल के किसी कोने में आपके साथ चलती है. कई अर्थ रखने वाले शब्द ‘प्यार’ का अपना वर्ज़न खोजने की कोशिश करती है. अब इसके सब-प्लॉटस की बात करते हैं. दंगे क्यों होते हैं? कल तक साथ हंस खेलने वाले पड़ोसी अचानक एक दूसरे के दुश्मन क्यों हो जाते हैं. अपनी किसी पूर्वधारणा के चलते? या दंगे होते हैं या करवाए जाते हैं? दंगे कैसे भी घटें. या इन्हें कोई भी करवाए. लेकिन इसमें नुकसान सिर्फ दो लोगों का होता है. जिनके खिलाफ हिंसा होती है. और दूसरे जो खुद हिंसा करते हैं.

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एक लव स्टोरी जिसके बीच बहुत कुछ घटता है.

गुस्से में या भड़काए जाने पर ये लोग हिंसक पशु बन जाते हैं. और हिंसक जानवर बस मरना-मारना जानता है. ऐसा ही करते हैं. खुद मारे जाते हैं या सामने वालों को मार देते हैं. लेकिन जब ये जानवर क्षीण हो जाता है और ये फिर इंसान बन जाते हैं, तब क्या होता है. गुस्से में जो किया, क्या उसपर पश्चाताप होता है. और क्या सिर्फ हाथ धोने से उनपर लगा खून मिट जाता है. शो में भी ऐसा ही एक किरदार है. जो भड़काने पर सिखों के खून का प्यासा हो गया. लेकिन जब धुआं साफ हुआ तब समझ आया. कि जो कर दिया अब उसे कभी भी सही नहीं किया जा सकता. अपने तरीके से पश्चाताप करता है. पूरी ज़िंदगी अपनी उस एक रात की हैवानियत के साथ जीता है. शो में ये किरदार निभाया था ‘छिछोरे’ के बेवडा यानी सहर्ष कुमार शुक्ला ने. मंच पर खड़े होकर ‘अब भी जिसका खून ना खौले, वो खून नहीं’ जैसी बातें कहने वाले तो बोलकर चले जाते हैं. लेकिन खामियाज़ा भुगतती है जनता. यही सटीक तरीके से दिखाया है शो में.

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हिंसा करने वाले और सहने वाले, दोनों पक्षों की मनोदशा को जगह दी है.

शो ने पॉलिटिक्स को भी प्रॉपर स्पेस दिया. राजनीति फिल्मों से ज्यादा फिल्मी कैसे हो सकती है, ये आपको शो का क्लाइमैक्स देखकर समझ आ जाएगा. राजनीति में जब आपकी बात से कोई सहमत ना हो तो उस पर कोई भी ‘स्तानी’ किस्म का लेबल लगाकर उसे खतरा बताने की प्रथा बड़ी पुरानी है. जिसका दुर्भाग्यवश आज भी पालन हो रहा है. 1984 दंगों में भी हिंसा भड़काने के लिए ऐसे ही लेबल लगाए गए. ऐसे ना दिखने वाले लेबल्स की छाप कितनी गहरी होती है, वो आपको शो देखकर पता चलेगा. शो ने अपने किसी भी प्लॉट कर पकड़ ढीली नहीं पड़ने दी. जिसके लिए इसकी मजबूत राइटिंग की तारीफ होनी चाहिए.


# बॉक्स ऑफिस वाले स्टार नहीं बल्कि असली वाले स्टार हैं

शो में ऋषि का किरदार निभाया ‘जामताड़ा’ वाले अंशुमन पुष्कर ने. वहीं, मनु बनी हैं वामिका गब्बी. दोनों की लव स्टोरी प्यार का हर मौसम देखती है. वो पहली नज़र के टकराव से लेकर अलगाव तक. दोनों ने इन सारे फेज़ेस के हिसाब से खुद को ढाला है. साथ ही शो में ‘मुक्काबाज़’ वाली ज़ोया हुसैन भी हैं. जिन्होंने अमृता का किरदार निभाया है. अमृता के लिए ड्यूटी से बढ़कर कुछ नहीं. पूरी सख्ती बरतती है. लेकिन जब पिता से जुड़ा सच सामने आता है तो टूट जाती है. खुद को पूरी तरह बिखरने से रोकने के लिए जो आंतरिक कश्मकश चलती है, उस भाव के साथ ज़ोया ने पूरा इंसाफ किया है.

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पवन मल्होत्रा ने अमृता के पिता का किरदार निभाया है.

इनके अलावा एक और एक्टर की बात करनी ज़रूरी है. वो हैं पवन मल्होत्रा. शो में उन्होंने अमृता के पिता का किरदार निभाया. आम तौर पर एक्टर्स अपने चेहरे का इस्तेमाल करते हैं. अपने भाव बयां करने के लिए. उसमें भी मुख्यत आंखों का. लेकिन पवन ने अपने किरदार की मनोदशा दिखाने के लिए अपनी पूरी बॉडी लैंग्वेज का इस्तेमाल किया है. खासतौर पर अपने हाथों का. शो में लिए वाइड शॉट्स यानी दूर से लिए गए शॉट्स में ये बात क्लियर भी होती है. वो अपने हाथों को बस इधर-उधर नहीं घूमने देते. कभी अंगुलियों की हरकत से तो कभी हाथों को मोड़कर किरदार के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं.


# दी लल्लनटॉप टेक

रंजन चंदेल के डायरेक्शन में बना ये शो आज के सोशिओ-पॉलिटिकल लैंडस्केप में बेहद रेलवेंट है. इसलिए देखा जाना चाहिए. हां, बीच में कुछ जगह स्लो लग सकता है. लेकिन बावजूद ऐसे फैक्टर्स के ये मस्ट वॉच है.


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