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सौरव गांगुली के वो पांच फैसले, जिन्होंने इंडियन क्रिकेट को हमेशा के लिए बदल दिया

सौरव गांगुली. पूर्व कप्तान और मौजूदा BCCI चीफ. गांगुली हर मामले में वनडे क्रिकेट के महानतम बल्लेबाजों में से एक हैं. वनडे में ओपनिंग के तमाम रिकॉर्ड अपने नाम रखने वाले गांगुली 48 साल के हो गए. न सिर्फ बैटिंग, बल्कि गांगुली की लीडरशिप क्वॉलिटी की भी खूब तारीफ की जाती है. टीम इंडिया को जीत की आदत गांगुली ने ही डलवाई थी.

मैच फिक्सिंग के भंवर से निकालकर टीम इंडिया को जीत की राह पर डालने वाले दादा के अंडर भारत ने तमाम मैच जीते. इन जीतों के पीछे काफी हद तक दादा की डिसिजन मेकिंग जिम्मेदार थी. दादा के फैसलों ने इंडियन क्रिकेट पर काफी प्रभाव डाला. दादा के इस बड्डे पर हम बात करेंगे ऐसे पांच फैसलों की.

सहवाग से ओपन कराना

मुझे अच्छी तरह याद है, जब सहवाग को मैंने पहली बार देखा था. सहवाग बोलिंग कर रहे थे. बोलिंग क्या कर रहे थे, बेदर्दी से पीटे जा रहे थे. सहवाग की बोलिंग देख, बैटरी के डीसी पावर से चल रही ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की ओर देखते हुए मैंने अपनी चाय फेंकते हुए कहा- इससे अच्छा बोलिंग तो मैं कर लेता हूं, वो भी थकने के बाद. दरअसल थकने से पहले मैं मीडियम पेसर होता था और थकने के बाद ऑफ-स्पिनर. मेरे दिमाग में यह सहवाग की पहली याद है. बाद में उस मैच में वह बल्ले से कुछ खास कर भी नहीं पाए थे.

ये अलग है कि टेस्ट डेब्यू में सहवाग ने सेंचुरी मारी और मुझे लगा कि बंदे में कुछ तो है. लेकिन जिस सहवाग को आज की दुनिया जानती है वो अब भी दूर था. कुछ ही वक्त बाद पता चला कि दादा को सहवाग में वो आग दिख चुकी थी, जो पहले किसी ने नहीं देखी थी. उन्होंने सहवाग को ओपन करने के लिए कहा. इस बारे में सहवाग ने हाल ही में कहा था,

‘दादा ने मुझे ओपनिंग करने को कहा. मेरे टाल-मटोल करने पर बोले- ओपनिंग स्लॉट खाली है. भर दोगे, तो टीम में तुम्हारी जगह पक्की रहेगी. लेकिन अगर तुम्हें मिडल ऑर्डर में ही खेलना है, तो किसी के चोटिल होने का इंतजार करो. मैं तुम्हें ओपनर के रूप में तीन-चार पारियां देना चाहता हूं. अगर फेल हुए, तो भी बाहर करने से पहले मिडल ऑर्डर में एक मौका जरूर दूंगा.’

बस इसके बाद सहवाग ने ओपनिंग शुरू की और आज रिकॉर्ड-बुक्स देख लीजिए. टेस्ट में लगभग 50 की एवरेज, दो-दो ट्रिपल सेंचुरी. सहवाग ने ओपनर के रूप में वो सारे धमाके किए, जो तमाम प्लेयर्स सिर्फ सोच ही पाते हैं.

राहुल द्रविड़ का डबल रोल

महेंद्र सिंह धोनी से पहले इंडियन क्रिकेट टीम की विकेटकीपिंग हर कप्तान और सेलेक्टर के लिए सरदर्द होती थी. तमाम ऑप्शन ट्राई किए, लेकिन मामला जम नहीं रहा था. दौर एडम गिलक्रिस्ट और मार्क बाउचर का था और हमारे विकेटकीपर अभी भी ट्रेडिशनल ही थे. मतलब, विकेट के पीछे तो अच्छे थे, लेकिन विकेट के आगे फिसड्डी. पार्थिव पटेल को छोड़ बाकी सारे विकेटकीपर कभी भी बल्ले से भरोसा नहीं दिला पाए.

टेस्ट में तो टीम फिर भी किसी तरह काम चला लेती थी. लेकिन वनडे में मामला फंस ही जाता था. ऐसे में दादा ने राहुल द्रविड़ से विकेटकीपिंग करने को कहा. द्रविड़ मान गए और दादा को मिल गया एक एक्स्ट्रा बल्लेबाज उतारने का मौका. महेंद्र सिंह धोनी से पहले लिमिटेड ओवर्स में द्रविड़ ही टीम इंडिया के परमानेंट विकेटकीपर होते थे. उन्होंने लंबे वक्त तक इस जिम्मेदारी को निभाया.

महेंद्र सिंह धोनी का धमाका

साल 2004. डोमेस्टिक सर्किट में एक नाम तेजी से उभर रहा था- महेंद्र सिंह धोनी. धोनी लगातार धमाके कर रहे थे, लेकिन इंडिया कैप अब भी दूर थी. अंडर-19 के वक्त से ही धोनी लगातार दावेदारी पेश कर रहे थे, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही थी. ऐसे में दिसंबर 2004 में गांगुली ने रिस्क लिया. उन्होंने इंडिया A के साथ केन्या से लौटे धोनी को टीम इंडिया में शामिल करने का फैसला किया.

बल्लेबाज के रूप में धोनी की शुरुआत अच्छी नहीं रही. वह लगातार फेल हुए. सबको लगा कि धोनी इंटरनेशनल लेवल के प्रेशर को संभाल नहीं पा रहे हैं. लेकिन दादा को यकीन था. तभी तो उन्होंने 2005 में पाकिस्तान के खिलाफ विज़ाग वनडे में धोनी को तीसरे नंबर पर भेजा. धोनी ने उस मैच में 148 मारे और आगे चलकर क्रिकेट के महानतम विकेटकीपर-बल्लेबाज के रूप में मशहूर हुए.

टर्बनेटर पर भरोसा

साल 2001 की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के लिए टीम सेलेक्शन चालू था. कप्तान थे दादा. सेलेक्शन मीटिंग में दादा सेलेक्टर्स से भिड़ गए. वह हरभजन सिंह नाम के एक युवा ऑफ-स्पिनर को टीम में लेना चाहते थे. लेकिन सेलेक्टर्स इसके खिलाफ थे. 1998 में डेब्यू करने वाले हरभजन के एक्शन की शिकायत हो चुकी थी. सेलेक्टर्स उनके डोमेस्टिक रिकॉर्ड्स से भी बहुत प्रभावित नहीं थे.

लेकिन दादा को इससे क्या ही लेना-देना. दादा का तो सूत्र-वाक्य ही यही था- क्रिकेट कैप्टन का गेम है, बाकी सब पीछे रहें. उन्होंने ताल ठोक दी,

‘जब तक हरभजन टीम में नहीं आयेगा, मैं इस कमरे से बाहर नहीं जाऊंगा.’

बहुत देर तक चली बमचक के बाद भी जब दादा अड़े रहे, तो ऑप्शन ही क्या था. सेलेक्टर्स झुके और हरभजन टीम में आ गए. आगे की कहानी तो परीकथा जैसी है ही. कोलकाता टेस्ट में हैटट्रिक लेकर भज्जी ने भारत को सीरीज में वापसी कराई और फिर बरसों तक टीम इंडिया के लिए खेलते रहे. टेस्ट में 400 से ज्यादा विकेट ले डाले.

आंख में आंख डालना

गांगुली से पहले भारत ने कई कप्तान देखे. कमाल के लोग, गज़ब की पर्सनैलिटी. लेकिन गांगुली के अंदर जो जोश था, उसका लेवल ही अलग था. उनसे पहले के कप्तान विदेश में सिर्फ ड्रॉ के लिए खेलते थे. लेकिन दादा ने कप्तान बनते ही फैसला किया कि अब टीम जीत के लिए खेलेगी. उन्होंने टीम को जीतने के लिए खेलना सिखाया. टॉस के लिए स्टीव वॉ को इंतजार कराना अब छोटी बात लगती होगी, लेकिन उस दौर में ऑस्ट्रेलिया का जो रुतबा था, उसमें ये बड़ी बात थी.

‘माइंड गेम’ के लिए मशहूर कंगारुओं को दादा ने बेहतरीन तरीके से डील किया था. वह गांगुली ही थे, जिन्होंने भारत को जीत के रास्ते पर डाला. आगे चलकर धोनी ने उस रास्ते को हाइवे बनाया और अब कोहली की टीम उस रास्ते पर सरपट भाग रही है. क्रिकेट की पिच के ऐसे कई क़िस्से हैं, जब दादा ने आंख में आंख डालकर विदेशी कप्तानों को बता दिया- ये नया इंडिया है.


सचिन के बारे में दादा ने कमाल का खुलासा किया है

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