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फिल्म रिव्यू: मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर

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पिछले दो एक सालों में हिंदी सिनेमा ने कुछेक फ़िल्में ऐसी दी हैं जो टैबू समझे जानी वाली समस्याओं पर बात करती हैं. ‘टॉयलेट-एक प्रेमकथा’, ‘हल्का’, ‘फुल्लू’, ‘पैड-मैन’ जैसी फिल्मों ने उन चीज़ों पर बात की जिनका ज़िक्र ओपनली करना हमारे यहां कभी चलन में नहीं रहा. चाहे माहवारी की समस्या हो या फिर देश के एक बड़े तबके के लिए शौचालय न उपलब्ध होना. ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ इसी कड़ी की एक और फिल्म है. और बड़ी ही प्यारी फिल्म है.

स्लमडॉग्स का संसार

मुंबई की झोपड़पट्टी में रहती है सरगम. और उसका बेटा कन्हैया उर्फ़ कान्हू. झोपड़पट्टी है तो ज़ाहिर है बेसिक सुविधाओं का घोर अकाल होगा ही. माचिस की डिबिया जैसा घर है. पानी खरीदना पड़ता है. और टॉयलेट तो है ही नहीं. ओपन एरिया में जाना पड़ता है. लड़कों का तो कुछ नहीं लेकिन महिलाओं की दिक्कत है. उन्हें सुबह-सवेरे, अंधेरे में जाना पड़ता है. ग्रुप बनाकर. एक दिन सरगम ग्रुप के साथ नहीं जा पाती. अकेली जाती है और एक हादसे का शिकार हो जाती है. वो हादसा मां-बेटे की, ख़ास तौर से बेटे की दुनिया हिलाकर रख देता है. उस पर एक ही धुन सवार होती है. मां के लिए टॉयलेट की व्यवस्था करना.

इसके लिए वो खूब कोशिशें करता है. म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के धक्के खाता है. वहां के अधिकारी एक दिन झल्लाकर उससे कह देते हैं कि ये हमसे नहीं होगा, पीएम को ख़त लिखो. कान्हू लिखता है. अब लड़ाई है उस ख़त को दिल्ली में पीएम तक पहुंचाने की. क्या उसकी चिट्ठी प्रधानमंत्री तक पहुंचती है? क्या उस पर कोई एक्शन लिया जाता है? क्या कान्हू और सरगम को टॉयलेट हासिल होता है? ये सब फिल्म देखकर जानिएगा.

कान्हू, निराला और रिंगटोन.
कान्हू, निराला और रिंगटोन.

और भी बहुत कुछ है फिल्म में

फिल्म की कहानी के केंद्र में भले ही टॉयलेट की समस्या हो लेकिन फिल्म सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. फिल्म की सबसे सुंदर चीज़ है मां-बेटे की बॉन्डिंग. मां-बेटे के बीच वाले कई सीन आपको खुश कर देंगे. ख़ास तौर से वो, जब दोनों साथ-साथ ‘आती क्या खंडाला’ गाते हैं या फिर वो, जब सरगम जोकर बनकर दिखाती है. एक छोटी सी लव स्टोरी भी है, जो बेहद प्यारी लगती है.

अंजलि पाटिल की बढ़ती चमक

अंजलि पाटिल धीरे-धीरे एक कद्दावर अभिनेत्री का मुकाम हासिल करती जा रही हैं. ‘चक्रव्यूह’, ‘न्यूटन’ और ‘मेरी निम्मो’ के बाद ये उनकी एक और सॉलिड परफॉरमेंस है. उनकी एक्टिंग देखकर बार-बार स्मिता पाटिल की याद आती है. शोषित, दमित लेकिन स्वाभिमानी लड़की का रोल उन्होंने कमाल तरीके से निभाया. कई सीन्स में तो उन्हें डायलॉग्स की भी ज़रूरत नहीं पड़ती. वो देहबोली से ही भाव व्यक्त कर देती हैं. ‘जा रे हट नटखट’ गाना तो इतना सुंदर बन बड़ा है कि लूप पर देखा-सुना जा सकता है.

ये वाला गाना मस्त है.
ये वाला गाना मस्त है.

कान्हू के रोल में ओम कनोजिया ऐन वैसे लगे हैं जैसा उन्हें लगना चाहिए था. निश्चल, मासूम, संवेदनशील. उनके दोस्तों का रोल निभाने वाले बच्चे तो और भी कहर हैं. शार्प, हाज़िरजवाब और बला के फनी. एक का नाम है निराला, एक का रिंगटोन और एक है मंगला. फुल धमाल मचाते हैं. सरगम का पड़ोसी कपल और उससे प्यार करने वाला पप्पू, सबने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है. अतुल कुलकर्णी के हिस्से सिर्फ एक सीन आया है. और उन्होंने हमेशा की तरह अच्छा ही किया.

बड़े डायरेक्टर की बढ़िया फिल्म

सबसे ज़्यादा मार्क्स देने होंगे डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा को. ‘रंग दे बसंती’ जैसी बड़ी फिल्म देने वाले मेहरा साहब ने अपना वक़्त, अपना हुनर इस प्रोजेक्ट में इन्वेस्ट किया, पहले तो इसी बात के लिए उनकी तारीफ़ बनती है. फिल्म को ज़्यादा से ज़्यादा रियल बनाने के लिए की गई उनकी मेहनत दिखती है. एक तरफ ‘टोटल धमाल’ जैसी फिल्मों में जहां ज़्यादातर सीन क्रोमा पर शूट हो रहे हैं, वहीँ ये फिल्म भी है जो घाटकोपर के एक रियल स्लम एरिया में शूट हुई है. बस्ती की रिएलिटी सिनेमा के फ्रेम तक भी पहुंचती है. फिर चाहे वो टीन, गत्ते और प्लास्टिक के इस्तेमाल से बने घर हों या गंदी, गटर से गुज़रती सड़कें हों.

मुंबई का स्लम.
मुंबई का स्लम.

ये फिल्म घोर गरीबी की ज़मीनी समस्याओं को भी बड़े रॉ ढंग से दिखाती है. भारत का मिडल और अपर क्लास जिन बातों का ज़िक्र तक करते असहज होता है, वो परदे पर पूरी बेबाकी से दिखती है. झोपड़पट्टी के उपर से गुज़रता चमचमाता हवाई जहाज, दो बिल्कुल अलग दुनियाओं को एक फ्रेम में कैद करके विडंबना को जैसे शक्ल दे देता है. इसके लिए थोड़ी सी तारीफ़ सिनेमेटोग्राफर के हिस्से भी जानी चाहिए.

मेरी एक प्रिय किताब है. डोमिनिक लापियर की ‘सिटी ऑफ़ जॉय’. उसमें एक जगह एक वाक्य आता है.

“संसार के सबसे दबे-कुचले लोगों में ही संवेदनशीलता की मात्रा ज़्यादा पाई जाती है. यही लोग अच्छी तरह समझते हैं कि एक मुस्कान की कीमत क्या है.”

ये फिल्म देखते वक्त मुझे ये बात बार-बार याद आती रही. इस फिल्म के किरदार ऐसे ही हैं. दूसरों की ख़ुशी में खुश होने वाले.

जाइए, फिल्म देख आइए. आप भी खुश हो जाएंगे.


वीडियो:

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