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फिल्म रिव्यू- जवानी जानेमन

एक ही महीने के भीतर सैफ अली खान की दूसरी फिल्म रिलीज़ हुई है. पहले ‘तान्हाजी’ और अब ‘जवानी जानेमन’, जिसमें वो बने हैं नानाजी. ये जोक या वर्ड प्ले नहीं फिल्म की कहानी है. जब 50 साल का आदमी फिल्म में 40 का दिखे. और उसी उम्र में पहले बाप और फिर नाना बनने वाला हो, तो इंट्रेस्ट तो जग ही जाता है.

फिल्म की कहानी सीधी भाषा में मोटे तौर पर जान लीजिए. एक आदमी है जसविंदर सिंह उर्फ जैज़. इसने अपने अंदर के बच्चे को कभी मारा ही नहीं. नतीजा सीरियस होने और ज़िम्मेदारियों भागता है. अपने भाई पम्मी के साथ मिलकर रियल एस्टेट का बिज़नेस करता है. 12 बजे सोकर उठता है. 3 बजे ऑफिस पहुंचता है. और 5 बजे निकल जाता है. क्लब में एंजॉय करने. उसकी ऐसी ही मस्त लाइफ चल रही थी कि कहानी में एक लड़की (टिया) एंट्री मारती है. वो एम्सटरडैम में रहती थी. लंदन अपनी मम्मी के बताए लोकेशन पर पापा को ढूंढने आई है. उसकी मां के मुताबिक दुनिया में तीन लोग हैं, जो उस लड़की के पिता हो सकते हैं. इसमें से ही एक अपना जैज़ भी है. मतलब 20 साल पुराने ‘पाप’ की वजह से उसके भी बाप बनने के चांसेज़ 33.33% हैं. अब ये कहानी यहां से निकलकर कहां पहुंचती है, इसके लिए आपको थिएटर्स का रास्ता लेना पड़ेगा.

जसविंदर सिंह उर्फ जैज़. ये आदमी जीवन में कभी सेट्टल ही नहीं होना चाहता है. इसे लगता है, शेर तभी तक राजा होता है, जब तक अकेला होता है.
जसविंदर सिंह उर्फ जैज़. ये अपनी मम्मी का शेर बच्चा है.  इसे लगता है, शेर तभी तक राजा होता है, जब तक अकेला होता है.

फिल्म में बेसिकली दो ही एक्टर्स हैं. सैफ अली खान और आलिया फर्निचरवाला, जिनके नाम की स्पेलिंग आलिया भट्ट वाले आलिया से अलग है. सैफ अली खान को हमने एक बेफिक्रे लड़के के कैरेक्टर में बहुत बार देखा है. लेकिन हर बार उसमें चेंज लेकर आना बड़ा ज़रूरी और इंट्रेस्टिंग रहता है. सैफ ये चीज़ बड़ी आसानी से कर लेते हैं, जिसकी वजह से वो अपने बनाए खांचे में भी टाइपकास्ट नहीं हो पा रहे. पिछले कुछ सालों में ही वो ‘दिल चाहता है’, ‘लव आज कल’ और ‘कॉकटेल’ जैसी फिल्मों में ये कर चुके हैं. इसके बावजूद ट्रेलर देखने के बाद उन्हें वही करते फिर से देखने का मन करता है. क्योंकि आपको पता है कि जिन फिल्मों का ज़िक्र हमने ऊपर किया, वो सभी एक-दूसरे कितनी अलहदा हैं. दूसरी ओर हैं आलिया. उनकी बतौर एक्टर पहली फिल्म है. फिल्म देखकर ये नहीं लगता. फिल्म में उनकी एंट्री के साथ ही आप सैफ की साइड छोड़ देते हैं. काफी कंफर्टेबल लगती हैं. और कॉन्फिडेंट भी. साथ में पम्मी के रोल में हैं कुमुद मिश्रा और सैफ की दोस्त बनी हैं कुब्बरा सेत. कुब्बरा और सैफ के बीच का इक्वेशन अच्छा लगता है. कुमुद मिश्रा के पास करने के लिए इससे कहीं ज़्यादा सलमान खान की फिल्म ‘सुल्तान’ में था. सारकाज़्म समझ रहे हैं न!

टिया उर्फ आलिया, जिसने रातों-रात जैज़ को बाप और नाना दोनों बना दिया.
टिया उर्फ आलिया, जिसने रातों-रात जैज़ को बाप और नाना दोनों बना दिया.

‘ओले ओले’ और ‘गल्लां करदी’ जैसे रीमिक्स गानों को फिल्म के म्यूज़िक से हटाकर ही देखना चाहिए क्योंकि वो फिल्म में कहीं फिट नहीं होते. फिल्म में रीमिक्स के अलावा जो दो गानें हैं, वो भी कुछ खास याद रखे जाने लायक नहीं हैं. ‘बंधु’ करके एक गाना है, जिसे सुनकर लगता है ‘कॉकटेल’ वाले गाने को उठाकर धुन और लाइनें चेंज कर दी गई हैं. और हुकलाइन रख लिया गया. बैकग्राउंड स्कोर कई बार ड्रामा वाले सीन्स में भी फनी हो जाता है. आप कंफ्यूज़ हो जाते हैं कि इसपे हंसना है कि सीरियस होना है. क्योंकि जो बात हो रही है, उस पर हंसी तो नहीं आती.

 तबू की एंट्री फिल्म में देखकर थोड़ी आस बंधती है. लेकिन ये चीज़ फिल्म के लिए फुस्स हुए बम जैसा साबित होती है.
तबू की एंट्री फिल्म में देखकर थोड़ी आस बंधती है. लेकिन ये चीज़ फिल्म के लिए फुस्स हुए बम जैसा साबित होती है.

फिल्म के बेस्ट पार्ट हैं उसके डायलॉग्स. एक दम मज़े में लिखे हुए. जैसे वाकई दो लोग बात करते हैं. एक सीन में अपने मनमौजी बाप से टिया पूछती है- क्या मैं आपके घर में रह सकती हूं? जवाब आता है- नहीं. एक और है लेकिन वो थोड़ा सा अश्वलील वर्डप्ले है, यहां नहीं बता सकते. वो भी फनी है. लेकिन डायलॉग्स जितनी ही मेहनत फिल्म की कहानी पर भी की जाती है, तो बात कुछ अलग लेवल पर होती, जो यहां नहीं हो पाती.

फुल फैमिली और फैमिली ड्रामा.
फुल फैमिली और फैमिली ड्रामा.

‘जवानी जानेमन’ सीधे-सीधे मिलेनियल्स को निशाने पर रखकर बनाई गई है. कॉन्सेप्ट से लेकर ट्रीटमेंट, सब इस बात की तस्दीक करते हैं. इसमें थोड़ा सा एक्सपीरियंस या समझदारी का छौंका लग जाता है, तो फिल्म अपने को लेकर कम से कम सीरियस दिखती तो सही. हालांकि जो दिख रही है, वो भी बुरी नहीं है. सैफ के कैरेक्टर की कुछ बातें अच्छी लगती हैं. जैसे उनकी उम्र की बात बार-बार छिड़ती है. कभी उनकी हेयरड्रेसर दोस्त उन्हें टोक देती है, तो कभी वो खुद ही कुछ पढ़ने से पहले अपना सनग्लास उतारकर पावर का चश्मा लगा लेते हैं.

बाल रंगवाकर अपनी जवानी रिन्यू करने की कोशिश करता जैज़ उर्फ सैफ अली खान.
बाल रंगवाकर अपनी जवानी रिन्यू करने की कोशिश करता जैज़ उर्फ सैफ अली खान.

फिल्म से जुड़ी बुरी बातों की शुरुआत अपन तबू से करते हैं. ये फिल्म उन्होंने क्यों की, ये बात समझ के परे है. क्योंकि फिल्म में वो क्लाइमैक्स से ठीक पहले आती हैं. उसका भी कुछ खास मतलब रहता नहीं है. सैफ के किरदार की जिन खूबियों के बारे में हमने बात की थी, उसके साथ भी एक दिक्कत है. वो ये है कि जैज़ उम्रदराज है, ये बात हमने पहली बार में ही समझ लिया था. उसे तीन-चार बार रिपीट करने का क्या मतलब. फिल्म एक मॉडर्न सेटअप की कहानी सुनाती है. लेकिन आप फिल्म की सारी गंभीरता और समझ एक पेड़ के कटने के इर्द-गिर्द नहीं बिल्ड कर सकते. कर ही नहीं सकते. क्योंकि आपके पास आपकी कहानी से जुड़ी बहुत सी बातें रहती हैं, जिन्हें आपने एक्सप्लोर नहीं किया. ऐसे में आपको पेड़ के नीचे बैठकर सोचना चाहिए, ना कि उस पेड़ को जबरदस्ती कहानी में में डाल देना चाहिए. कुछ सीन्स ऐसे हैं, जिन्हें देखते वक्त लगता है कि कहानी में इसका कुछ कॉलबैक वैल्यू तो होगा ही. लेकिन ऐसा है नहीं. इसलिए वो सीन्स पूरी फिल्म देखने के बाद खटकते हैं.

21 साल में पहली बार मिले बाप-बेटी के बीच होती हुई हार्ट टू हार्ट बातचीत.
21 साल में पहली बार मिले बाप-बेटी, जिन्हें इससे पहले पता भी नहीं था कि वो एग्ज़िस्ट भी करते हैं. 

अगर आपने ‘जवानी जानेमन’ का ट्रेलर देखा है, तो आपको पता होगा कि थिएटर में क्या देखने जा रहे हैं. फिल्म आपको वो देती है. उम्मीदें तो इंसानों से भी पालना गलत हैं. अब आप इंसान की बनाई फिल्म से उम्मीद पाल लेंगे, तो दिक्कत तो आएगी. सीरियस-सीरियस चीज़ें देखकर पक गए हैं, तो ‘जवानी जानेमन’ देखी जा सकती है. कुछ हटके देखना चाहते हैं, तो अपने जेब को फटके से बचाइए.


 

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