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जब प्रेमचंद रुआंसे होकर बोले, 'मेरी इज्जत करते हो, तो मेरी ये फिल्म कभी न देखना.'

1934 की बात है. बंबई (अब मुंबई) में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था. इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया. बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे. प्रेमचंद जी की ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रही है. ललक हुई, अवश्य देखूं. अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई. मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी. प्रेमचंद बोले, ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो, तो ये फिल्म कभी नहीं देखना.’ ये कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं. तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई, सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है.

ये रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा था. संस्मरण जिसमें प्रेमचंद और उनके द्वारा लिखी एकमात्र मूवी, ‘मिल मजदूर’ का ज़िक्र था. तो, जैसा रामवृक्ष ने कहा, क्या सच में हर हिंदी लेखक के साथ बॉलीवुड में यही हुआ?

इस सवाल का उत्तर जानने से पहले सवाल को और बेहतर तरीके से समझना होगा.

क्यूंकि अगर हम बांग्ला साहित्य को देखें तो, गुरुदत्त की ‘साहब बीबी और गुलाम’, विमल मित्र के इसी नाम के उपन्यास पर बेस्ड थी. शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ पर एक दो नहीं कई बार फ़िल्में बन चुकी हैं और लगभग सारी ही सफल रही हैं. ‘परिणिता’ और ‘मंझली दीदी’ से भी अच्छी स्क्रिप्ट्स निकली हैं.

'देवदास' मूवी जितनी बार बनी, उतनी बार सराही गई.
‘देवदास’ मूवी जितनी बार बनी, उतनी बार सराही गई.

तो क्या दुर्गति केवल हिंदी साहित्य की ही हुई?

शायद नहीं. हालांकि ‘चाणक्य’ और ‘पृथ्वीराज’ फेम चंद्रप्रकाश द्विवेदी बताते हैं-

हमारा साहित्य काफी विशाल है. लेकिन भारतीय लेखकों को दिखाने में (फिल्ममेकर्स) गौरवान्वित महसूस नहीं करते.  जब लोग हिंदी दिवस मनाते हैं, तो मुझे लगता है कि हमने हार मान ली है. इसका मतलब है कि हिंदी मर रही है.

लेकिन हमें ऐसा नहीं लगता. हिंदी की कई साहित्यिक कृतियों पर भी काफी अच्छी फ़िल्में बनीं हैं, बन रही हैं. आप ‘चित्रलेखा’ की बात कर लीजिए, आप मन्नू भंडारी की ‘यही सच है’ पर बनी फिल्म, ‘रजनीगंधा’ की बात कर लीजिए. आप कई ऐसी फिल्मों की बात कर लीजिए, जो चाहे हिट न हुई हों, लेकिन क्रिटिकली अक्लेम्ड रहीं. जैसे ‘तीसरी कसम’ या ‘आंधी’, जिनका ज़िक्र हम आगे स्टोरी में फिर से करेंगे.

तो बात न कृतियों की है, न हिंदी कृतियों की, न उनपर बेस्ड फिल्मों की, न उनके हिट फ्लॉप होने की. सवाल थोड़ा अलहदा है. सवाल ये है कि ‘फिल्मों में अपना करियर तलाश रहे साहित्कारों की क्या गत रही?’

उत्तर है, ‘कोई ख़ास अच्छी नहीं रही.’

ये स्वीपिंग कमेंट्स सा लगने वाला ऑब्जरवेशन इन 5 साहित्यकारों के अनुभवों पर बेस्ड है. लेकिन सारी कहानियां असफलताओं की नहीं हैं. साथ ही पांचों कहानियां एक दूसरे से अलग हैं.

# प्रेमचंद-

'मिल' का पोस्टर.
‘मिल’ का पोस्टर.

साल 1934. प्रेमचंद की माली हालत तो खराब हो ही चुकी थी, साथ ही उनका स्वास्थ भी खराब रहने लगा था. उनकी प्रिंटिंग प्रेस की हालत भी खस्ता थी. ‘हंस’ और ‘जागरण’ जैसे-तैसे प्रकाशित हो रहे थे. अपने दोस्त बनारसी दास चतुर्वेदी को उन्होंने लिखा-

मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं चल रही है. इस साल 2,000 रुपए का घाटा हुआ है और इसने मेरी कमर तोड़ दी है.

फिर उन्हें पता चला कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री अच्छा पैसा देती है राइटर्स को. चल दिए मुंबई अपनी किस्मत आजमाने. उन्होंने जो सुना था वो ग़लत न निकला. ‘अजंता सिनेटोन’ ने उन्हें 8000 रुपए की सैलरी पर रख लिया.

उस वक्त इतने पैसे, कितने होते होंगे, अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. वहां पर रहकर उन्होंने ‘मिल’ नाम की मूवी के लिए स्क्रिप्ट लिखी. जिसका नाम बाद में  ‘मज़दूर’ और अंत में ‘मिल मज़दूर’ कर दिया गया. चलिए आगे बात करने से पहले शॉर्ट में मोहन भवनानी के निर्देशन में बनी ‘मिल’ की स्टोरी जान लेते हैं-

पिता की मृत्युशैया के पास बैठा उसका बेटा विनोद शराब में डूबा है. पिता की मृत्यु होती है तो विनोद को ‘विल’ में मिल मिलती है. विनोद मिल ठीक वैसे ही चलाता है जैसे कोई विलेन चलाएगा. वर्कर्स की सैलरी काटी जाने लगती है. काम के घंटे बढ़ा दिए जाते हैं. सालों से काम कर रहे ईमानदार मजदूरों की छंटनी होने लगती है. इस सबके खिलाफ खड़ी होती है, पद्मा. विनोद की ही सगी बहन. अंत में विनोद जाता है, जेल और पद्मा चलाती है मिल. मिल वर्कर्स के साथ मिलकर.

‘मिल मज़दूर’ में प्रेमचंद का एक केमियो भी था. वो मूवी में वर्कर्स यूनियन के लीडर बने थे.

ये मूवी सेंसर बोर्ड की आंखों में चढ़ गई. उनको लगा कि ये मूवी काफी भड़काऊ है. कारण काफी थे. अव्वल तो एक सीन जिसमें पद्मा मिल वर्कर्स को उनका हक़ याद दिलाती है, काफी जीवंत बन पड़ा था. उससे मिल मजदूरों के बीच असंतोष फैलने की आशंका थी. दूसरा, अभी-अभी (1929 में) यूएस का ग्रेट डिप्रेशन आया था, तो ब्रितानी सरकार ऐसी किसी चीज़ को बढ़ावा नहीं दे सकती थी, जिससे मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच के रिश्ते खराब हों. और प्रोडक्शन प्रभावित हो.

तीसरा, उस वक्त ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ वाली बात भी किसी के ध्यान में नहीं आई. वरना ‘बॉम्बे मिल ओनर्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष सेंसर बोर्ड के मेंबर न होते. बैरामजी जीजाभाई. कहने वाले कहते हैं कि फिल्म को बैन करवाने में उनका बड़ा हाथ था.

लेफ्ट में मुंशी प्रेमचंद की एक पोट्रेट. राईट में श्याम बेनेगल की 'शतरंज के खिलाडी' का पोस्टर.
लेफ्ट में मुंशी प्रेमचंद की एक पोट्रेट. राईट में श्याम बेनेगल की ‘शतरंज के खिलाडी’ का पोस्टर.

तो यूं मुंबई में ये फिल्म बैन कर दी गई. भारत की पहली मूवी जिसे बैन किया गया. साथ ही कई जगहों पर, जहां ये रिलीज़ हुई, इसने वही किया जिसका सेंसर बोर्ड को अंदेशा था. या तो आंदोलन होने लगे, या मिल मालिकों की त्योरियां चढ़ने लगी. उन जगहों से भी इस मूवी को हटा लिया गया. कहीं नियम कानून बताकर, कहीं ज़ोर जबरदस्ती से. दो हफ्ते के भीतर इस मूवी के सारे प्रिंट्स ऐसे गायब हो गए थे कि वो अब तक अप्राप्य हैं.

ये भी कम बड़ी विडंबना नहीं थी कि प्रेमचंद की प्रिंटिंग प्रेस में जो हड़ताल हुई, उसमें भी ‘मिल मजदूर’ सबसे बड़ा उत्प्रेरक बनी.

पहले निर्देशक ने फिर सेंसर बोर्ड ने भी प्रेमचंद की मूल स्क्रिप्ट में बदलाव और कांट-छांट की. ‘मिल मजदूर’ का अंतिम स्वरूप देख प्रेमचंद ने खुद भी इसे ‘प्रेमचंद की हत्या’ कहा था.

28 नवंबर, 1934 को मुंबई से भेजे एक पत्र में प्रेमचंद, जैनेंद्र कुमार को लिखते हैं-

फिल्मी हाल क्या लिखूं? ‘मिल’ यहां पास न हुई. लाहौर में पास हुई और दिखाई जा रही है. मैं जिन इरादों से आया था, उनमें से एक भी पूरा होता नजर नहीं आता. ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियां बनाते आए हैं, उसकी लीक से जौ भर भी नहीं हट सकते. ‘वल्गैरिटी’ को ये ‘एंटरटेनमेंट वैल्यू’ कहते हैं. मैंने सामाजिक कहानियां लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे. लेकिन उनकी फिल्म बनाते इन लोगों को संदेह होता है कि चले, या न चले.

अपने दोस्त जयशंकर प्रसाद को लिखते हैं-

यहां मुंबई की फिल्मी नगरी देखकर चित्त प्रसन्न नहीं हुआ. सब रुपए कमाने की धुन में हैं, चाहे फिल्म कितनी गंदी और भ्रष्ट हो. हर कोई काम को सोलह आने व्यवसाय की दृष्टि से देखता है. जो लोग बड़े सफल समझे जाते हैं, वे भी अंग्रेजी फिल्मों की नकल कर वाहवाही पाते हैं.

प्रेमचंद 1935 में ही बनारस लौट आए. वहां पहुंच कर उन्होंने बॉलीवुड पर एक आलोचनात्मक निबंध लिखा, ‘सिनेमा और साहित्य’. और अगले साल 1936 में वो चल बसे.

हालांकि इसके बाद उनकी स्टोरीज़ और नॉवल्स पर फ़िल्में बनती रहीं. उनकी मृत्यु के तीन साल बाद सुब्रमण्यम ने 1938 में ‘सेवासदन’ उपन्यास पर फ़िल्म बनाई. ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत रे ने 1977 में मूवी बनाई. सत्यजीत रे ने ही 1981 में उनकी कहानी पर ‘सदगति’ भी बनाई. 1977 में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’ पर आधारित ‘ओका ऊरी कथा’ नाम से एक तेलुगु फ़िल्म बनाई, जिसे नेशनल अवॉर्ड भी मिला था. वैसे प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन‘ पर उनकी मूवी ‘मिल’ के आने से पहले ही 1934 में बाजारे हुस्न‘ नाम से एक फिल्म बनी थी. और उसी साल उनकी कृति पर ‘नवजीवन’  भी बनी. दोनों फ्लॉप रहीं. प्रेमचंद भी इन दोनों अडैप्शन से खुश न थे.

# फणीश्वर नाथ रेणु-

'तीसरी कसम' के एक सीन में वहीदा रहमान और राजकपूर.
‘तीसरी कसम’ के एक सीन में वहीदा रहमान और राजकपूर.

4 मार्च को फणीश्वर नाथ रेणु का जन्मदिन है. और उनकी बात चली, तभी हमें इस स्टोरी को करने का आइडिया आया. साहित्य वाले ‘फणीश्वर नाथ रेणु’ नाम से कतई अंजान नहीं हैं. लेकिन वो, जिन्हें हिंदी साहित्य से बस मतलब भर का वास्ता था, वे लोग भी फणीश्वर नाथ रेणु को इन दो या इन दो में से किसी एक ‘टैग’ से पहचानते होंगे-

# 1) पहला टैग है, ‘मैला आंचल’ नाम का नॉवल. उनकी कालजई रचना. आंचलिक नॉवल्स में इसे बाइबिल का दर्ज़ा हासिल है. अपने इस पहले नॉवल से ही उन्हें इतनी ख्याति मिल गई थी, जितनी बड़े-बड़े लिक्खड़ों को ता-उम्र नहीं मिलती.

# 2) और दूसरा टैग है, उनकी शॉर्ट स्टोरी, ‘मारे गए गुलफाम’. फिर जब बिहार के पूर्णिया आंचल के बैकड्रॉप पर लिखी इस कहानी को शैलेंद्र ने एक फिल्म, ‘तीसरी कसम’, के रूप में अडैप्ट किया तो फणीश्वर पूरे दौरान जुड़े हुए थे. फिल्म को शैलेंद्र के प्रोड्यूस किया था. डायरेक्ट किया था बासु भट्टाचार्य ने.  

मूवी का नाम ‘तीसरी कसम’ था, हीरामन की तीन कसमों के चलते. हीरामन, जो दो कसमें फिल्म के शुरुआत में लेता है और एक कसम क्लाइमेक्स में. हीरामन का किरदार निभाया था राजकपूर ने. और साथ में थीं वहीदा रहमान. जिन्होंने एक नाचने वाली का किरदार निभाया था. हीराबाई का.

तीसरी कसम और फणीश्वर नाथ रेणु के रिलेशन पर जनसत्ता में सत्मेयव त्रिपाठी लिखते हैं-

कोई तब्दीली न करने की शैलेंद्रीय प्रतिबद्धता और स्वयं रेणु की उपस्थिति न होती, तो बासु दा ‘तीसरी कसम’ में हीरामन को हीराबाई से अवश्य मिलवा देते. सुखांत की पब्लिक पसंद के चलते, जो दादा की अन्य सभी फिल्मों में है.

फणीश्वर नाथ रेणु ने ही इस मूवी के डायलॉग्स भी लिखे थे –

तुम समझते हो मैं वेश्या हूं, वो समझता है मैं देवी हूं. तुम दोनों ही ग़लत हो.

1966 में रिलीज़ हुई ये फिल्म इस कदर फेल हुई, गोया कब आई कब गई, पता ही न चला. लेकिन ये तब की बात थी. अब इसकी अपनी एक कल्ट वाली हैसियत है. इसके गानों की भी. हालांकि उस वक्त भी इस मूवी को नेशनल अवॉर्ड से नवाज़ा गया था.

और फणीश्वर नाथ रेणु? उनका भी प्रेमचंद की तरह, एक ही मूवी से मोहभंग हो गया. आधी सदी बीत जाने के बाद 17 नवंबर, 2017 को उनकी कहानी पर एक और मूवी आई. ‘पंचलैट’. ये मूवी भी इस कदर फेल हुई, गोया कब आई कब गई, पता ही न चला.

बाद में फणीश्वर नाथ रेणु ने लिखा कि मूवी जानबूझकर फ्लॉप की गई थी. उन्होंने अपने मोहभंग को कुछ यूं अभिव्यक्त किया-

‘तीसरी कसम’ के निर्माण के समय बंबई आया था और अब आया हूं ‘मैला आंचल पर आधारित ‘डागदर बाबू’ के निर्माण के सिलसिले में. अब की बार यहां के फिल्म उद्योग की फिजा ही बदली-बदली-सी या कह लीजिए बदलती-सी नजर आयी. यह कैसा परिवर्तन है कि लेखक शर्ते रखता है और सब उन शर्तों को पूरा करते हैं. हमारी कहानी में हीरो फलां को लेना होगा, हीरोइन फलां.’ बल्कि हीरोइन किस रंग की साड़ी पहनेगी. यहां तक सुना है कि लेखक द्वय सलीम-जावेद ने लेखक की इज्जत को बुलंद कर दिया है. लेखक को उसका स्थान दिलाने का यह जो काम सलीम-जावेद ने कर दिखाया है, उसके लिए लेखक सदा उनके आभारी रहेंगे. वरना इस उद्योग में लेखक की हस्ती ही क्या थी? लेखक या तो मुंशी होते या पंडित जी. वेतन या पारिश्रमिक नाम का, शायद सबसे कम. इस दीन-हीन प्राणी ने जो संवाद लिख दिया जरूरी नहीं कि हीरो-हीरोइन या अन्य पात्र बोलें ही. जिस शब्द पर अटक गया या उच्चारण नहीं कर पाया तो मुंशी-पंडित दोषी. यही वजह रही कि प्रेमचंद और अन्य जो भी साहित्यकार यहां आये, निराश होकर लौट गये.

# सआदत हसन मंटो-

लेफ्ट में मंटो की मूवी (मिर्ज़ा ग़ालिब) का पोस्टर, राईट में मंटो पर नंदिता दास की मूवी का पोस्टर.
लेफ्ट में मंटो की मूवी (मिर्ज़ा ग़ालिब) का पोस्टर, राईट में मंटो पर नंदिता दास की मूवी का पोस्टर.

जनवरी 1948. मंटों ने मुंबई ही नहीं भारत भी छोड़ दिया था. अपनी लिखी हुई स्क्रिप्ट ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’, सोहराब मोदी को बेचकर.

जनवरी 1955. हालिया रिलीज़ ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ टिकट खिड़की पर धूम मचा रही थी. मंटो की लिखी हुई. सोहराब मोदी की डायरेक्ट की हुई. स्टारिंग, भारत भूषण एंड सुरैया. सुरैया के गीतों की तारीफ़ करते हुए तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू उनसे बोले-

तुमने ग़ालिब को फिर से ज़िन्दा कर दिया.

उधर लाहौर, पाकिस्तान में, इन्हीं दिनों, जब इस सफलता को सेलिब्रेट करने का अवसर था, 18 जनवरी, 1955 को मंटो ने इस फानी ज़हान को अलविदा कह दिया.

11 मई, 1912 को लुधियाना में जन्मे सहादत हसन मंटो का जुलाई 1942 में अलीगढ़, दिल्ली होते हुए फिर से मुंबई आना हुआ. ‘फिर से’ यूं कि इससे पहले वो 1934 में भी मुंबई आ चुके थे. मुंबई के अपने पहले प्रवास के दौरान जहां उनकी फ़िल्मी हस्तियों से जान पहचान हुईं. वहीं दूसरे प्रवास में मंटो ने ‘चुगद’ जैसी कृति तो लिखा ही, फ़िल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखीं. उनकी लिखीं ‘अपनी नगरिया’, ‘आठ दिन’ और ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ बहुत ज़्यादा चर्चित रहीं थीं. जिसमें से ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ को तो नेशनल अवॉर्ड भी मिला था. यूं उन्हें एक सफल स्क्रिप्ट राइटर कहा जा सकता है.

मंटो की कहानी पर बनी मूवी 'टोबा टेक सिंह' के एक दृश्य में पंकज कपूर. फिल्म ज़ी 5 नाम के स्ट्रीमिंग पोर्टल पर रिलीज़ की गई थी. अगस्त 2018 में.
मंटो की कहानी पर बनी मूवी ‘टोबा टेक सिंह’ के एक दृश्य में पंकज कपूर. फिल्म ज़ी 5 नाम के स्ट्रीमिंग पोर्टल पर रिलीज़ की गई थी. अगस्त 2018 में.

हमारी लिस्ट में जितने भी लेखक हैं, उन सबमें से फिल्म इंडस्ट्री से सबसे गहरा और काफी हद तक सफल रिश्ता मंटों का ही रहा. उनके दोस्तों ने ही फिल्मिस्तान बनाया था, और इस स्टूडियो की फिल्मों के लिए मंटों ने काफी कुछ लिखा.

वैसे मंटो ने फिल्म के लिए ही नहीं, फिल्मों पर भी लिखा था. नर्गिस पर, अशोक कुमार पर. नूरजहां, सितारा देवी, श्याम, नसीर… सब पर लंबे लंबे लेख, संस्मरण. फिर बॉलीवुड पर किताब भी लिखी ‘स्टार्स फ्रॉम अनदर स्काई’. ये सब उन्होंने पाकिस्तान जाने के बाद लिखा. 

दरअसल ये कहना सही होगा कि जहां प्रेमचंद के लिए असफलता के अलावा कोई और विकल्प नहीं था, वहीं मंटों ने असफलता को खुद चुना था. हालांकि विकल्प उनके पास भी कम ही थे. मंटों ने इंडिया क्यूं छोड़ा, इसके दो उत्तर हैं. और दोनों ही एक साथ सही हैं.

# 1) उनकी पत्नी और उनकी तीन लड़कियां बंटवारे के दौरान पाकिस्तान शिफ्ट हो गईं थीं. लेकिन मंटों को लगा कि स्थितियां सुधर जाएंगी तो सबको मुंबई बुला लेंगे. मंटो ने अपनी किताब ‘स्टार्स फ्रॉम अनदर स्काई’ में लिखा था कि-

एक दुकानदार हिंदू हो सकता है, मुस्लिम हो सकता है. लेकिन एक एक्टर कभी हिंदू या मुस्लिम नहीं हो सकता.

यूं उम्मीद का दामन थामकर वो मुंबई ही रह गए. लेकिन उनकी पत्नी साफिया इंडिया नहीं लौटने वालीं थीं. वो मंटो पर भी पाकिस्तान आने का दबाव डालती रहीं.

# 2) इधर मुंबई में भी बाहर से सबकुछ सही दिख रहा था लेकिन भीतर हालात खराब होते जा रहे थे. एक शाम उनके सबसे करीबी दोस्त सुंदर ‘श्याम’ चड्ढा, उनके पास आए और बोले, ‘मंटो. मेरा मन करता है कि तुम्हारे गले को चाक़ू से काट दूं.’ हालांकि ये एक्सक्यूज़ हो सकता है कि ऐसा कहते वक्त ‘श्याम’ बहुत पीये हुए थे, या वो पाकिस्तान में मारे जा रहे हिंदुओं की खबरें सुनकर गुस्साए हुए थे. लेकिन मंटो इससे बहुत डर गए और उनका पाकिस्तान जाना कन्फर्म हो गया. ये भी एक विडंबना है कि श्याम ने ही अंत में उन्हें भावभीनी विदाई दी. और कराची जाने वाली शिप में उनका सामान चढ़वाने में हेल्प भी की.

क्या इससे श्याम का कृत्य क्षम्य हो जाता है? पता नहीं.

हालांकि मंटो को मुंबई बहुत प्रिय था. वो पाकिस्तान जाकर भी कहते थे-

आप ‘किसी को’ मुंबई से तो बाहर निकाल सकते हो, लेकिन ‘किसी से’ मुंबई को बाहर नहीं निकाल सकते.

XXX

तीन बड़ी दास्तानों के बाद आइए अब शॉर्ट में दो और लेखकों का फिल्मों के साथ रिलेशन भी देख लिया जाए.

# मनोहर श्याम जोशी-

मनोहर श्याम जोशी की लिखी मूवीज़ 'भ्रष्टाचार' और 'पापा कहते हैं', दो दिग्गज डायरेक्टर्स ने बनाई थी.
मनोहर श्याम जोशी की लिखी मूवीज़ ‘भ्रष्टाचार’ और ‘पापा कहते हैं’, दो दिग्गज डायरेक्टर्स ने बनाई थी.

मनोहर श्याम जोशी काफी लेट लतीफ थे. उनका पहला उपन्यास ‘कसप’, 40 साल की उम्र में आया था. फिर उन्होंने टीवी के लिए कालजयी सीरियल्स लिखे. ‘बुनियाद’ और ‘हम लोग’ के चलते वो भारतीय टीवी सीरियल्स के जनक कहलाए.

लेकिन फिल्मों में इनकी भी दाल नहीं गली. रमेश सिप्पी के लिए ‘भ्रष्टाचार’ लिखी. फ्लॉप.

महेश भट्ट के लिए ‘पापा कहते हैं’ लिखी. सो फ्लॉप. हालांकि इसके गीत काफी हिट रहे थे.

कमल हासन के लिए ‘हे राम’ लिखी. वो भी कमाई के मामले में औसत ही निकली. हालांकि ये मूवी क्रिटिक्स ने काफी पसंद की थी.

# कमलेश्वर-

'आंधी' की स्टोरी और 'दी बर्निंग ट्रेन' के डायलॉग्स, कमलेश्वर ने लिखे थे.
‘आंधी’ की स्टोरी और ‘दी बर्निंग ट्रेन’ के डायलॉग्स, कमलेश्वर ने लिखे थे.

हर हिंदी राइटर के बॉलीवुड संस्करण का हश्र इतना बुरा नहीं रहा, जितना प्रेमचंद का. जैसे कमलेश्वर का फ़िल्मी करियर कमाल का रहा. वो 1970 के दशक में मुंबई आए थे और ढेरों फिल्मों में काम किया. गुलज़ार के साथ मिलकर ‘आंधी’ और ‘मौसम’ बनाई. बी. आर. चोपड़ा के लिए ‘पति पत्नी और वो’ लिखी. जिसके लिए उन्हें ‘बेस्ट स्क्रीनप्ले राइटर’ कैटेगरी में फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला. गुलज़ार के अलावा दूसरे ऐसे लेखक जिन्हें साहित्य अकादमी और फिल्मफेयर दोनों मिले.

लेकिन कमलेश्वर की फिल्मों में ये सफलता, साहित्य से ‘कॉम्प्रोमाइज़’ करने के एवज़ में तो नहीं रही? एक ‘ट्रेड ऑफ़’? कई मानते हैं. उनकी सत्तर से ज़्यादा फिल्मों में से ‘दी बर्निंग ट्रेन’ जैसी मसाला फिल्मों का उदाहरण देकर इसे सिद्ध करने की कोशिश करते हैं. लेकिन ऐसा था भी, तो भी ये ग़लत भी तो नहीं. क्लासेज़ और मासेज़ के बीच में साम्य बनाने से ही कमलेश्वर जैसे साहित्यकार फिल्म इंडस्ट्री में सर्वाइव कर पाते हैं और गुलज़ार जैसे फिल्म इंडस्ट्री के लेखक साहित्य की रचना कर पाते हैं.

इन पांच के अलावा भगवतीचरण वर्मा, कृष्ण चंदर, नरेंद्र देव,राही मासूम रज़ा, राजेंद्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, कुछ ऐसे साहित्याकर हैं जिनका बॉलीवुड में भी थोड़ा-बहुत हस्तक्षेप रहा है. फिर गुलज़ार और बलराज साहनी जैसी बॉलीवुड की हस्तियां भी हैं, जो साहित्य के साथ प्रत्यक्ष तौर से जुड़ी थीं. बाकी बॉलीवुड और साहित्य का रिश्ता पर्दे के पीछे भी कम पुराना और अंजाना नहीं.


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