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बेताल: नेटफ्लिक्स वेब सीरीज़ रिव्यू

”पहले हमारा देश चुराया, फिर नौकरी चुराई, सोना चुराया, जमीन चुराई और कुत्ते की जात अब हमारा भूत भी चुरा लिया”

ये नेटफ्लिक्स पर आई वेब सीरीज़ ‘बेताल’ का सबसे फनी डायलॉग है. ये हमें फनी यूं लगा क्योंकि सीरीज़ में कॉमेडी के नाम पर और कुछ है ही नहीं. सोचने वाली बात ये कि जब ये सीरीज़ हॉरर-ज़ॉम्बी के बारे में है, तो हम कॉमिक चीज़ों की बात क्यों कर रहे हैं. सारी बहस यहीं आकर ठहर जाती है. ‘मैं तो ठहर गया, तू कब ठहरेगा’- ये बात जब बुद्ध ने अंगुलिमाल से कही थी, तब उनका कॉन्टेक्स्ट बिलकुल अलग था. लेकिन भावना यही थी कि भाई, जो तुम कर रहे हो, वो बहुत गड़बड़ है. शाहरुख खान या ग्राहम पैट्रिक कहीं मिलें, तो बुद्ध की ये बात हमारे रेफरेंस के साथ उन तक पहुंचा दें. अर्जेंट है.

‘बेताल’ की कहानी एक फिक्शनल रिमोट गांव निल्जा में घटती है. निल्जा में अधबनी सुरंग है, जो सालों से ब्लॉक है. सरकार उस सुरंग को खोलकर वहां पर हाइवे बनाना चाहती है. गांववाले इसके सख्त खिलाफ हैं. उन्हें लगता है कि पास की बेताल पहाड़ी पर काला साया है और अगर ये सुरंग खुल गई, तो अंदर से एक ऐसी पावरफुल फोर्स निकलेगी, जो सबकी जान ले लेगी. उस हाइवे को बनाने का टेंडर पाने वाली कंस्ट्रक्शन कंपनी का मालिक अपने एक लालची मातहत मुदलवन को ये काम देकर जाता है कि उसे किसी भी तरह से ये गांव खाली करवाकर हाइवे का काम शुरू करवाना है. क्योंकि ठीक अगले दिन उस रोड के इनॉग्यूरेशन के लिए मुख्यमंत्री आने वाले हैं. मुदलवन अपने इस काम के लिए सरकार के लिए काम करने वाली CIPD नाम की फोर्स का सहारा लेता है. CIPD का सेकंड इन कमांड ऑफिसर विक्रम सिरोही अपनी टीम बाज़ स्कॉड के साथ निल्जा पहुंचता है और बाय हुक और क्रुक वो गांव खाली करवाकर सुरंग में घुस जाता है. सुरंग में घुसने से लेकर अगले 12 घंटे के भीतर अपनी जान बचाकर उस गांव से निकल लेने की कहानी है ‘बेताल’.

सीरीज़ का ट्रेलर यहां देखिए:

अगर आपने नोटिस किया हो, तो इस सीरीज़ का नाम ‘बेताल’ और इसके नायक का नाम ‘विक्रम’ है. हिंदुस्तानी टीवी के परिप्रेक्ष्य में इससे इतना कुछ ज़ाहिर हो जाता है कि कुछ और बताने की ज़रूरत महसूस नहीं होती. यहां हम सिर्फ अपनी बात कर रहे हैं. सीरीज़ का सोचना कुछ और है. ‘बेताल’ अपने पहले एपिसोड के पहले ही सीन/प्लेट पर जो चीज़ कहती है, उसे ध्यान से पढ़ें. क्योंकि उसके बाद आपको सीरीज़ नहीं देखनी पड़ेगी. इससे आप अपने जीवन के चार बेशकीमती घंटे और बेदिमाग एंटरटेनमेंट से खुद को बचा सकते हैं. इस प्लेट पर ये लिखा होता है कि आप जो कहानी देखने जा रहे हैं, उसके पीछे की कहानी क्या है. सॉर्ट ऑफ क्लाइमैक्स. अपने बारे में सबसे बड़ा स्पॉयलर देने से पहले, ये सीरीज़ स्पॉयलर अलर्ट भी नहीं लिखती.

बाज़ स्वॉड के सेकंड इन कमांड विक्रम सिरोही.
बाज़ स्वॉड के सेकंड इन कमांड विक्रम सिरोही.

‘बेताल’ में मुख्यत: चार एक्टर्स हैं, जिन्हें अपना टैलेंट झाड़ने का मौका मिला है. सनद रहे हमने मौका कहा है समय या डायलॉग नहीं. निल्जा को खाली कराने की ज़िम्मेदारी जिस बाज़ स्कॉड को दी गई थी, उसकी कमांडिंग ऑफिसर हैं त्यागी. यानी सुचित्रा पिल्लई. याद नहीं आ रहीं, तो ‘दिल चाहता है’ याद कर लीजिए. समीर (सैफ अली खान) की बॉसी गर्लफ्रेंड बनी थीं. यहां उनका रोल एक करप्ट ऑफिसर का है, जिसका काम सिर्फ अपने सेकंड कमांड को ऑर्डर देना है. इन्हें कुछ भी या कुछ न करते देख इस सीरीज़ का ज़ॉम्बी भी इतना पक जाता है कि इन्हीं को अपने वश में कर लेता है. इस सीरीज़ के नायक और सेकंड इन कमांड ऑफिसर विक्रम सिरोही का रोल किया है ‘मुक्काबाज’ फेम विनीत कुमार ने. विनीत खुद को एक बार ‘बार्ड ऑफ ब्लड’ में जाया कर चुके हैं. भले उन्हें शाहरुख बार-बार मौके दे रहे हैं लेकिन ज़िंदगी नहीं देती. और इस सीरीज़ में भी उनके हिस्से ऐसा कोई चंक नहीं आया है, जब उन्हें अपनी कला के साथ न्याय करने का मौका मिले.

'बेताल'ल के एक सीन में आहाना कुमरा. एक सीन में उनके चेहरे को लेकर बात शुरू भी होती है लेकिन पूरी नहीं होती.
‘बेताल’ के एक सीन में अहाना कुमरा. एक सीन में उनके चेहरे को लेकर बात शुरू भी होती है लेकिन पूरी नहीं होती.

इन दोनों के साथ हैं बाज़ स्कॉड के तीसरे नंबर की ऑफिसर डीसी अहलूवालिया. ये किरदार निभाया है ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ वाली अहाना कुमरा ने. इस किरदार के दाहिने गाल पर बड़ा सा कटने या जलने के निशान हैं. लेकिन मेकर्स ने कहीं इस बात की जहमत नहीं उठाई कि वो क्यों और कैसे है, ये बात दर्शकों को भी बता दी जाए. अहाना का रोल सिर्फ विनीत की मॉरल गाइड और उनके ग्रुप में हो रही लड़ाइयों को रोकने का है. चौथे एक्टर हैं ‘सेक्रेड गेम्स’ के काटेकर यानी जीतेंद्र जोशी उर्फ मुदलवन. लालच और भ्रष्टाचार के रास्ते से होते हुए ये सफलता की सीढ़ी तक पहुंचा है. लेकिन अब ज़ॉम्बीज़ के हाथों मरना नहीं चाहता. इसलिए उनके साथ भी डील कर लेता है. ये ग्रे शेड वाला कैरेक्टर है. और जीतेंद्र एकमात्र एक्टर हैं, जिन्होंने शायद अपने किरदार को लिखे से बेहतर परफॉर्म किया है.

मुदवलन. एक तरह से इस सीरीज़ का विलन. ये रोल जीतेंद्र जोशी ने किया है.
मुदलवन. एक तरह से इस सीरीज़ का विलन. ये रोल जीतेंद्र जोशी ने किया है.

‘बेताल’ में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो आपने पहले कभी नहीं देखा हो. इसके मेकर्स को कम से कम ये सोचकर चलना चाहिए था कि उनका शो नेटफ्लिक्स पर आने वाला है. उस प्लैटफॉर्म पर ज़ॉम्बी जॉनर की दुनियाभर की तमाम फिल्में और वेब सीरीज़ हैं मौजूद हैं, जो ‘बेताल’ से लाख गुना बेहतर हैं. क्योंकि उनके पास बेहतर राइटर्स थे. राइटर्स के पास लॉजिक था. उनके यहां एमडीएच मसाला नहीं बनता, जिसके चक्कर में उन्हें हल्दी और भभूत फेंककर ज़ॉम्बी को शांत कराना पड़े. और ये सारी दिक्कत शुरू होती है राइटिंग के लेवल से, जो हद से ज़्यादा स्टीरियोटाइप के जद में है. डायलॉग्स ऐसे कि आंख में 0 वाट का का बल्ब जलाकर एक ज़ॉम्बी कहता है-

”भाई मेरी आंखों में देखो, मैं हूं हक़. तुम्हारा छोटा भाई.”

अब क्या करें इन सीन्स का. हमें पता है कि किसी फिल्म या सीरीज़ को बनाने में बहुत मेहनत लगती है. की-बोर्ड पीटकर उन्हें बेकार कह देने जितना आसान नहीं होता सबकुछ. लेकिन सवाल है ये है कि-

‘बेताल’ के बासेपन की लिमिट ये है कि यहां ज़ॉम्बीज़ को भूत से रिप्लेस कर दिया गया है. जैसे भूत किसी इंसान के भीतर समा जाते हैं और बेकार के डिमांड्स करते हैं, यहां ज़ॉम्बीज़ वो सब कर रहे हैं. सीरीज़ में एक सीन है, जहां एक ज़ॉम्बी अपनी जमात की पूरी कहानी बताता है. साथ में ये भी कहता है कि वो 160 साल से जहन्नुम में सड़ रहा था, वो बहुत भूखा है. बहुत बहुत भूखा. लेकिन उन्हें सिर्फ ऐसी लड़की का खून ही चाहिए, जिसने आज तक कभी ब्लीड न किया हो. इसके पीछे का क्या तर्क है, ये बताने वाला कोई है ही नहीं.

‘बेताल’ की सबसे शानदार बात ये है कि इस सीरीज़ में सिर्फ चार ही एपिसोड्स हैं. इनमें से पहला कहानी को एस्टैब्लिश करने में खर्च होता है. बीच के दो एपिसोड्स बिलकुल तेज रफ्तार में निकलते हैं. ये सीरीज़ कहती तो खुद को हॉरर है लेकिन इसमें कुछ-एक गुण थ्रिलर वाले हैं. और यही गुण इसकी थोड़ी-बहुत लाज रख लेते हैं. ‘बेताल’ को देखने के बाद आपको सिर्फ एक बात समझ आती है कि ये नहीं देखनी चाहिए थी.

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