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गैंग्स ऑफ वासेपुर की मेकिंग से जुड़ी ये 24 बातें जानते हैं आप?

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1. मनोज बापजेयी ने अनुराग कश्यप की लिखी सत्या, शूल और कौन में काम किया है लेकिन गैंग्स ऑफ वासेपुर से पहले तक उनकी बात नहीं होती थी. इस फिल्म के लिए अनुराग ने मन बनाकर उन्हें फोन किया. पूछा कि एक स्क्रिप्ट है, करेंगे? मनोज ने कहा, क्यों नहीं! तो वे रात 11.30 बजे अनुराग के वहां पहुंचे. उनके लिए रेड वाइन की बोतल का इंतजाम किया गया. नरेशन पूरा होने तक मनोज पूरी तरह टल्ली हो चुके थे. उन्होंने एक ही बात कही, कि क्या उनके किरदार का नाम सरदार खान रख सकते हैं. और बाद में इस किरदार का नाम यही रखा गया.

2. कुरैशियों से झगड़ा होने के बाद जब शाहिद खान (अहलावत) वासेपुर छोड़ धनबाद आता है तो कोयले की खदान में मजदूरी करने लगता है. एक सीन है जब वो कोयला तोड़ रहा है, बरसात हो रही है और बरसात का पानी अंदर आ रहा है. लेकिन किसी त्रासदी की संभावना में भी सब काम कर रहे हैं और बाहर से गेट बंद है. इसका संदर्भ और इशारा 1975 में धनबाद के पास हुई चसनाला खदान त्रासदी की ओर भी जाता है जब विस्फोट से खदान ढह गई और उसमें भयंकर पानी भर गया. इस त्रासदी में 370 से ज्यादा लोग मारे गए थे. ऐसी कई खदान त्रासदियां हुई हैं.

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3. विपिन शर्मा ने इस कहानी में कसाई अहसान कुरैशी का रोल किया है. इसके कुछ सीन असल कसाईबाड़े में चित्रित किए गए. जहां जमीन पर पूरा ख़ून और कीचड़ बिखरा था, जानवरों के शरीर के अंग कटे गिरे थे. वहां दृश्यों को शूट करते हुए उन्हें कई बार उल्टी हुई.

4. यहां शूटिंग की अवधि के दौरान अनुराग और पूरी क्रू ने अपने आगे 60 भैंसे और एक ऊंट कटता देखा. इसके बाद लंबे समय तक किसी की मीट खाने की इच्छा नहीं हुई.

5. गैंग्स ऑफ वासेपुर में शाहिद खान का किरदार जयदीप अहलावत ने निभाया था. शाहिद खान का बेटा होता है सरदार खान जो रोल मनोज बाजपेयी ने किया है. फिल्म में जयदीप को कास्ट करने का सुझाव अनुराग को मनोज ने ही दिया था.

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6. शुरुआती दृश्यों में एक में जयदीप अहलावत को खदान के पहलवान को कोयले के ढेले से सिर और मुंह पर बार-बार मारना था. पहले इसके लिए फोम से बने नकली कोयले का इस्तेमाल होना था. लेकिन अनुराग ने सीन में पूरी सत्यता लाने के लिए उनसे असली कोयले के ढेले का इस्तेमाल करवाया.

7. एक सीन में मनोज बाजपेयी का पात्र सरदार खान एक लोहार से कट्टा बनाने के बारे में पूछता है. उसमें जवाब देने वाला युवक असल में उसी पेशे का था. इसे यूं शूट किया गया कि निर्देशक अनुराग कश्यप ने उस लोहार से यूं ही बातें की. वे उससे कट्टा यानी देसी पिस्टल बनाने की विधि पूछते गए, वो बताता गया और बाद में इसी फुटेज को फिल्म में बरत लिया गया. मनोज का सवाल बाद में वीडियो में जोड़ा गया.

8. फिल्म में फैजल (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) और मोहसिना (हुमा कुरैशी) के पात्र जब पहली बार डेट पर गार्डन में जाते हैं तो बातें करते हुए फैजल मोहसिना के हाथ पर हाथ रख देता है. इस पर वो कहती है, “ये कोई अच्छी बात है, पहले परमिसन लेनी चाहिए न?” ऐसी बातें सुनकर फैजल रोने लगता है. ये वाकया असल में नवाज के साथ हुआ था. वे जब दिल्ली में अभिनय की बारीकियां सीख रहे थे तब अपने दोस्तों की देखा देखी वे भी एक लड़की के साथ घूमने पार्क गए. बाद में उस लड़की ने कहा कि वो बोर हो गई है. नवाज को लगा कि उन्होंने कुछ किया नहीं है इसलिए वो बोर हो गई है तो उन्होंने हाथ पर हाथ रख दिया. तो वो नाराज हो गई और बोली, ये गैर-कानूनी है. आप ऐसे कैसे किसी को छू सकते हैं. आपको पहले परमिशन लेनी चाहिए. वो बोलती गई और नवाज डर गए कि कहीं पिटाई न हो जाए. वे रोने लगे और वहां से जाने लगे. इस पर उस लड़की ने रोका, गले लगाया और किस किया. ये नवाज के जीवन का पहला किस भी था.

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9. इसी तरह एक और सीन था जहां फैजल पाइप और छज्जे के सहारे चढ़कर मोहसिना के कमरे में जाता है. वहां वो शारीरिक संबंध बनाने की परमिशन मांगता है जिस पर मोहसिना उसे दौड़ा देती है. ऐसा भी नवाज के साथ असल में हुआ था और फिल्म में सीन यहीं से आया.

10. फिल्म की टीम लोकेशन हंट करने जब गई तो उन्हें ऐसा घर नहीं मिला जहां सरदार खान को रहते हुए दिखाया जाना था. बाद में अनुराग ने उत्तर प्रदेश में जो लोकेशन चुनी, वो दरअसल वही घर था जहां वे बचपन में रहते थे, और जहां उनके छोटे भाई अभिनव (दबंग के निर्देशक) का जन्म हुआ था. फिल्म के लिए उन्होंने ज्यादातर लोकेशन बनारस, ओबरा, अनपरा, मिर्जापुर वगैरह चुनी जहां उनका बचपन गुजरा या जो पहले से उनके जेहन में थीं.

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11. कहानी में सरदार खान के पांच बेटे होते हैं. उनमें से अंत में सिर्फ एक ही बचता है. पैरेलल/गुड्‌डू. फिल्म में उसके अलावा बाकी चारों फैज़ल, दानिश, डेफिनिट, परपेंडिकुलर को ही खास दिखाया गया है. पैरेलल सिर्फ एक सीन में आता है जो असल में परपेंडिकुलर का इंट्रोडक्शन सीन होता है.

12. सुल्तान कुरैशी का पात्र पंकज त्रिपाठी ने अदा किया था. उन्हें ऑडिशन के बाद चुना गया. पहले ये रोल छोटा था लेकिन बाद में काफी बड़ा हो गया. इस पात्र के अतीत की कहानी अनुराग को लाइव लोकेशन से मिली. वे एक कसाईखाने में थे जहां एक 12 साल का लड़का एक पूरे भैंसे को अकेला काट रहा था. उसने कहा कि वो अकेला काटेगा. उसे भय नाम के भाव का कोई अहसास नहीं था. अनुराग के मुताबिक उन्होंने कल्पना की कि जब ये 12 साल का लड़का बड़ा होगा तो कितना डरावना और निर्भय होगा या कैसा होगा? यहीं से ये बैक स्टोरी आई और नरेशन में आया कि सुल्तान एक दिन में 60 भैंसे अकेले काटता है.

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13. फिल्म लिखने के लिए अनुराग स्पेन के मेड्रिड गए थे. वे एक ऐसी होटल में ठहरे थे जहां बहुत सारे ट्रांससेक्सुअल्स ठहरे हुए थे. चार रातों में उन्होंने वहां गैंग्स ऑफ वासेपुर भाग-1 की स्क्रिप्ट पूरी और भाग-2 की स्क्रिप्ट आधी लिख दी थी.

14. जब वे स्क्रिप्ट लेकर भारत लौट रहे थे तो दिल्ली हवाई अड्डे पर विमान कंपनी ने उनका बैग गुम कर दिया. उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई. वे दो दिन तक वहीं रुके जब तक उनका बैग नहीं मिल गया.

15. फिल्म के दो गानों में अनुराग के असिस्टेंट डायरेक्टर भी नजर आते हैं. भूस के ढेर में राई का दाना गाने में वासन बाला दिखते हैं जो अग्ली, बॉम्बे वेलवेट में सह-लेखक रहे हैं और पैडलर्स के निर्देशक. उसी तरह आई एम अ हंटर गाने में श्लोक शर्मा नजर आते हैं जिनकी पहली फिल्म हरामखोर सेंसर ने रोक रखी थी. हालांकि अब वो रिलीज़ हो चुकी है. श्लोक भी अनुराग के असिस्टेंट रहे हैं.

वासन बाला
वासन बाला
श्लोक शर्मा
श्लोक शर्मा

16. इतने विशाल सेटअप वाली फिल्म में भारी बजट चाहिए होता है लेकिन अनुराग ने पूरी फिल्म को 10 करोड़ से भी कम की लागत में पूरा किया जो रिकॉर्ड है. भाग-2 को मिलाकर इसकी लागत करीब 18 करोड़ से भी कम रही. कश्यप मानते हैं कि उनकी जगह कोई और होता तो ये फिल्म 80 करोड़ से कम में नहीं बनती.

17. मेकिंग में अनुराग ने कई स्थान पर चतुराई बरती. जैसे एक सीन में रमाधीर सिंह खड़े हैं और पीछे एक आधा ब्रिज बना दिख रहा है. ऐसा नहीं है कि उन्होंने कंप्यूटर ग्राफिक्स से वो आधा ब्रिज बनाया. उन्होंने मौजूदा दौर में बने हुए ब्रिज को सीजीआई से अलग-अलग जगह से मिटा दिया जिससे ये लगने लगा कि ये कुछ दशक पहले का दौर है जब ब्रिज निर्माणाधीन अवस्था में था.

CGI के प्रयोग के बाद.
CGI के प्रयोग के बाद.
CGI वर्क से पहले पूरा ब्रिज
CGI वर्क से पहले पूरा ब्रिज

18. बनारस में शूटिंग के दौरान अनुराग के चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर सोहैल शाह की मृत्यु हो गई थी. दरअसल एक दृश्य फिल्माया जा रहा था जिसमें एक जीप को चलते हुए दिखाना था. इसके लिए एक ड्राइवर तय था लेकिन सोहैल ने खुद ही जीप चलाई. ब्रिज से गुजर रहे थे कि सामने से दो लोगों को आते देख उन्होंने जीप मोड़ी और वो नीचे जा गिरी. सोहैल का सिर धातु से टकरा गया और उन्हें ब्रैन हैमरेज हो गया. अस्पताल ले जाते हुए उनकी मृत्यु हो गई. क्रेडिट्स में उन्हें ट्रिब्यूट दी जाती है.

19. ओपनिंग क्रेडिट्स में अनुराग कश्यप ने तमिल सिनेमा के तीन निर्देशकों को शुक्रिया कहा है कि इन्होंने अपनी फिल्मों से अनुराग को अपनी जड़ों में जाने के लिए प्रेरित किया. बाला, एम. ससिकुमार और अमीर सुल्तान. इन तीनों का जुड़ाव मदुरै से है और अपनी फिल्में वे वहीं शूट करते हैं. तीनों डार्क, फ्रैश, भौचक्का करने वाली फिल्में बनाते हैं. कम बजट में. नए कलाकारों के साथ. बेहद प्रभावोत्पादक. अनुराग ने भी गैंग्स.. के साथ यही करने की कोशिश की. एम. ससिकुमार की सुब्रमण्यपुरम (2008) बड़ी प्रशंसित फिल्म है. ये कम बजट की थी. फिर भी उन्होंने 80 के दशक के मदुरै को जिंदा करके दिखाया. शानदार कहानी थी. नए एक्टर थे. किरदारों का जबरदस्त प्रस्तुतिकरण था. नए फिल्मकारों के लिए ये एक मस्ट वॉच है. इसी तरह बाला धाकड़ निर्देशक हैं. वे अपनी जबरदस्त फिल्म नान कडवल (2009) की शूटिंग वाराणसी में आकर करके गए जहां अनुराग रहे हैं. इस बात ने भी उन्हें बहुत प्रभावित किया. कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जो ये फिल्म देखने के बाद शॉक में न हो. बाला पूरी तरह से कॉमर्शियल सेटअप के बाहर और अपनी ही कड़ी शर्तों पर काम करते हैं जिस राह पर अनुराग अब फिर से चल रहे हैं. दक्षिण के हीरो-हीरोइन उनके साथ काम करने को तड़पते हैं. तीसरे निर्देशक अमीर सुल्तान की फिल्म वारुथीवीरन (2007) उनका सबसे जबरदस्त काम है. ये भी मदुरै में बनाई गई. इसमें 60 नए एक्टर्स ने डेब्यू किया. इसे दो नेशनल अवॉर्ड मिले.

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20. फिल्म में पीयूष मिश्रा नासिर का रोल निभाते हैं और तिग्मांशु धूलिया रमाधीर सिंह का. बताया जाता है कि अनुराग ने इन दोनों को ये दोनों रोल ऑफर किए थे और उन्हीं पर छोड़ा था कि वे कौन सा किरदार करना चाहते हैं.

21. कहानी में एक जगह सरदार खान का मुकाबला करना रमाधीर सिंह (तिग्मांशु धूलिया) के लिए मुश्किल हो जाता है तो मंदिर में एक आदमी रमाधीर से मिलता है और कहता है, “मुसलमानों से लड़ना है तो मुसलमानों को जोड़ लो साथ में”. इसके बाद रमाधीर सुल्तान कुरैशी (पंकज त्रिपाठी) को अपने साथ मिलाता है. इस आदमी की शक्ल भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से मिलती-जुलती है. असल में ये पात्र चंद्रशेखर पर ही आधारित बताया जाता है. दरअसल रमाधीर का पात्र धनबाद जिले के झरिया से विधायक रहे सूरज देव सिंह पर आधारित है. इन सूरज देव को राजनीति में गाइड करने वाले चंद्रशेखर ही थे. फिल्म में यहां यूं दोनों का रिश्ता दिखाया जाता है.

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22. गैंग्स ऑफ वासेपुर-2 के अंत में फैजल खान मारा जाता है. लेकिन जिस फहीम खान पर नवाज का ये रोल आधारित है वो आज भी जिंदा है और धनबाद की जेल में बंद है.

23. एक सीन है जहां सरदार खान (मनोज) को मुर्गी लेकर जा रहे नेता के पहलवान को गली में बर्फ तोड़ने वाले सुवे/नुकीले चाकू से मारना होता है. अनुराग और एक्शन डायरेक्टर श्याम कौशल ने इसे ज्यादा हिंसक दिखाने के लिए अलग तरीके से फिल्माया. इसमें सरदार खान वो सुवा पहलवान के बदन में घोंपता है और उछल कर दूर हो जाता है. वो बार-बार ऐसा करता रहता है जिससे ताकतवर पहलवान की ताकत घटती जाती है. चूंकि शॉट लाइव है और इसमें वीएफएक्स का मामूली इस्तेमाल भी नहीं है तो इसका असर दिखने में बहुत प्रभावी आता है. इस शॉट में एक समस्या ये भी थी कि पहलवान के शरीर में खून कैसे लाया जाए. तो उसकी स्वेटर के नीचे कुछ खून के छोटे-छोटे गुब्बारे लगाए गए. लेकिन उन्हें फोड़ने की समस्या थी. ऐसे में पहलवान को ऐसी अंगूठी पहनाई गई जिसमें पिन लगी थी. जैसे ही पहलवान सुवा घोंपे जाने के बाद अंगुली से उस जगह को छूते हुए दबाता गुब्बारे फूट जाते और खून निकलता.

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24. जब भाग-2 में फैजल खान के घर पर हमला होता है और वो छत के रास्ते से होते हुए निकलता है तो इस सीन में पहले आठ बार कोशिशें ज़ाया गईं. इसमें नवाजुद्दीन के वायर बांधे गए थे जिस वजह से उन्हें एक छत से दूसरी पर कूदने और फिर काफी नीचे तक उतरने में दिक्कत होती है. फिर नवाज ने कहा कि वे इसके बिना वायर कर सकते हैं. नौवीं कोशिश में उन्होंने बिना किसी वायर के ये किया और एक ही टेक में शॉट ओके हो गया.

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