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2019 के चुनाव में परिवारवाद खत्म हो गया कहने वाले, ये आंकड़े देख लें

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पीएम मोदी कह रहे हैं, मंत्री कह रहे हैं, अमित शाह कह रहे हैं. बीजेपी के सीनियर नेता कह रहे हैं. हर कोई कह रहा है कि इस बार लोकसभा चुनाव में परिवारवाद हार गया. दिख भी रहा है. अमेठी से राहुल गांधी हार गए. कन्नौज से अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव हार गईं. राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत के बेटे भी हार गए. कर्नाटक में सीएम के बेटे हार गए. लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती हार गईं. तेलंगाना के सीएम केसीआर की बेटी के कविता हार गईं.

इन सबकी हार के बाद भी अगर कहें कि इस चुनाव में परिवारवाद बढ़ गया है तो शायद आपको यकीन नहीं होगा. पहली नजर में मुझे भी यकीन नहीं हुआ. लेकिन आंकड़े कह रहे हैं कि इस बार चुने गए 30 प्रतिशत सांसद राजनीतिक परिवार से हैं. 542 से 162 सांसद राजनीतिक परिवार से आते हैं.

त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा (अशोका यूनिवर्सिटी) और सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज CERI (Sciences Po) के शोधकर्ताओं की एक टीम ने डेटा तैयार किया है. आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 में चुने गए लोकसभा सांसदों में से 30% सांसद राजनीतिक परिवारों से आते हैं और यह रिकॉर्ड प्रतिशत है.

रिसर्च में परिवारवाद के तहत उन उम्मीदवारों को शामिल किया गया है जिनके रिलेटिव किसी भी स्तर पर चुनाव जीते हैं. परिवार के सदस्य या रिलेटिव पार्टी में या संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं.

क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादा वंशवादी हैं?

लोगों के दिमाग में ये बात घर गई है कि क्षेत्रीय पार्टियों में वंशवाद ज्यादा है. लेकिन यह सच नहीं है. सभी राज्यों में राष्ट्रीय दल परिवारवाद के मामले में क्षेत्रीय पार्टियों से आगे रहे. यानी राष्ट्रीय दलों ने उन उम्मीदवारों को टिकट दिया जो किसी राजनीतिक परिवार से आते हैं. बिहार में राष्ट्रीय दलों ने  58% टिकट राजनीतक परिवार से आने वाले उम्मीदवारों को दिया. जबकि राज्य की पार्टियों ने  14% टिकट राजनीतक परिवार से आने वाले उम्मीदवारों को दिया. हालांकि कुछ क्षेत्रीय पार्टियों में वंशवाद राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. जद (एस) (66%), एसएडी (60%), टीडीपी (52%), राजद (38%), बीजेडी (38%), सपा (30%).इन पार्टियों ने इतने प्रतिशत टिकट राजनीतिक परिवार से आने वाले उम्मीदवारों को दिए.  इनमें से अधिकांश दलों का नेतृत्व राजनीतिक परिवार करते हैं.

किस पार्टी में परिवारवाद ज्यादा?

केवल एक पार्टी है जो वंशवाद में लिप्त नहीं हैं. सीपीआई और सीपीआई (एम). यहां 5% से भी कम उम्मीदवार राजनीतिक परिवारों से थे. राष्ट्रीय दलों में, कांग्रेस सबसे अधिक वंशवादी है. 31% उम्मीदवार राजनीतिक परिवार से थे. बीजेपी में यह आंकड़ा 22% था. बीजेपी परिवारवाद के लिए कांग्रेस और विपक्ष की आलोचना करती है लेकिन बीजेपी में भी परिवारवाद बढ़ रहा है.

महिला उम्मीदवार ज्यादा वंशवादी

शोध में कहा गया है कि महिला उम्मीदवारों में परिवारवाद ज्यादा है. पार्टियां राजनीतिक परिवार से आने वाले महिलाओं को ही टिकट देती हैं. पार्टियों को अब भी लगता है कि महिला उम्मीदवारों का जीतना मुश्किल है. समाजवादी पार्टी, टीडीपी, डीएमके और टीआरएस ने उन 100 प्रतिशत टिकट उन महिलाओं को दिए जो राजनीतिक परिवार से आती हैं. आरजेडी ने भी उन महिलाओं को टिकट दिया, जिनके पति नेता थे लेकिन अभी जेल में हैं.

यही ट्रेंड कांग्रेस और बीजेपी पर भी लागू होता है. कांग्रेस ने 54 तो बीजेपी ने 53 प्रतिशत टिकट उन महिलाओं को दिया जो राजनीतिक पार्टी से आती हैं. इस चुनाव में टीएमसी ने ज्यादा महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था. कांग्रेस और बीजेपी की तुलना में टीएमसी की महिला उम्मीदवार 27 प्रतिशत थी जो राजनीतिक परिवार से आती हैं.

राजनीतिक पार्टियां क्यों देती हैं टिकट?

पार्टियां उन उम्मीदवारों को जो राजनीतिक परिवार से आते हैं इसलिए भी टिकट देती हैं क्योंकि उनका पार्टी में प्रभाव होता है. उनके जीतने के चांस गैर राजनीतक दलों से आने वाले उम्मीदवारों से ज्यादा होता है.

इंडियन एक्सप्रेस के लिए गिलेस वर्नियर्स और क्रिस्टोफ जाफरलॉट ने स्टोरी की है. (क्रिस्टोफ जाफरलॉट CERI-Sciences Po / CNRS पेरिस में सीनियर रिसर्च फेलो हैं. किंग्स इंडिया इंस्टीट्यूट लंदन में भारतीय राजनीति और समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं. वहीं अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए कार्नेगी एंडॉवमेंट में विद्वान हैं. गिल्स वर्नियर्स अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं. इस रिपोर्ट को आप अंग्रेजी में यहां पढ़ सकते हैं.

इस चुनाव में राजनीतिक परिवार से आने वाले नेताओं की हार हुई है. उन पार्टियों की भी हार हुई है जो परिवारवाद की राजनीति करती हैं. लेकिन ये भी उतना ही सच है कि राजनीतिक परिवार से आने वाले सांसदों की संख्या 17वीं लोकसभा में बढ़ गई है.


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