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वेब सीरीज़ रिव्यू: करनजीत कौर - दी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ सनी लियोनी

सनी लियोनी और उनके परिवार की वो बातें जो अब तक आप बिल्कुल नहीं जानते थे.

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दर्पण
24 जुलाई 2018 (Updated: 24 जुलाई 2018, 05:39 AM IST)
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नेटफ्लिक्स, टीवीएफ़, अमेज़न, ऑल्ट बालाजी और हॉटस्टार के बाद ज़ी5 भी वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स के मैदान में ज़ोर-शोर से कूद पड़ा है. और इस सारे ट्रेंड को देखकर लगता है कि टीवी का विकल्प वेब-टीवी (ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग) होने जा रहा है. कम से कम शहरी इलाकों में तो ये बदलाव ज़ल्द ही देखने को मिलेगा. खासतौर पर तब जबकि ग्राहकों और दर्शकों को इंटरनेट डाटा, नेट की स्पीड और उसके दाम की ज़्यादा चिंता नहीं करनी पड़ रही है.


ये सारे प्लेटफॉर्म्स अपने-अपने ‘ओरिजिनल्स’ लेकर आ रहे हैं. ‘ओरिजिनल्स’ मने ऐसे सीरियल या मूवी या कंटेंट जो आपको कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे. इन ‘ओरिजिनल्स’ का उपयोग हर वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स अपने-अपने प्लेटफॉर्म के लिए बज़ क्रिएट करने और अपने सबस्क्राइबर्स बढाने के लिए करती हैं.

Sunny - 1चूंकि इन ओरिजिनल्स का उद्देश्य सब्सक्राइबर्स बनाना/बढ़ाना होता है इसलिए इनकी विशेषता ये होती है कि ये ऐसे विषयों को छूती हैं जिनके बारे में या तो पहले ही ढेर सारा बज़ होता है लेकिन इनफार्मेशन कम या फिर वे विषय जो देखने के लिए दर्शक वाकई में लालायित होते हैं. बायोग्राफीज़, सबसे ज़्यादा फेवरेट होती हैं. फिर चाहे वो ‘नार्कोज़’ हो ‘बोस’ हो या ‘करनजीत कौर’ कौर हो. बुक एडॉप्शन और मिथक सेकेंड और थर्ड फेवरेट विषय होते हैं. और वीडियो स्ट्रीमिंग के फील्ड में साई-फाई कंटेंट की भी बहुत मांग है. चूंकि अभी वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स को लेकर कोई सेंसरशिप नहीं आई है इसलिए आपको ‘गंदी बात’ जैसे सुपर हॉट ओरिजिनल्स देखने को भी मिलते हैं. इनमें नैतिकता या किसी संदेश की आड़ में सेक्स को छुपा कर या जायज़ बनाकर परोसने की न चाह होती है न जद्दोजहद. Sunny - 2बहरहाल इसी क्रम में ज़ी5 भी एक ओरिजिनल सीरीज़ लेकर आया है, नाम है – ‘करनजीत कौर: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ सनी लियोनी’. इसके डिस्क्रिप्शन में खुद ज़ी5 जो लिखा हुआ है वो पढ़िए -
‘करनजीत कौर: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ सनी लियोनी’ एक ZEE5 ओरिजनल सिरीज़ है. मुख्य भूमिका में सनी लियोनी, राज अर्जुन, रियासा सौजानी, करमवीर लांबा, बिजय जसजीत आनंद, ग्रुशा कपूर, वंश प्रधान और मार्क बकनर हैं. इस बायोपिक ने पूरे इंडिया में खलबली मचा दी है. आदित्य दत्त द्वारा निर्देशित यह सेन्सेशनल ड्रामा सनी लियोनी के इतिहास, परिवार, प्रेमी और पति डैनियल वेबर के बारे में बताता है. और एक वयस्क फिल्म स्टार से लोकप्रिय बॉलीवुड की मुख्यधारा की अभिनेत्री के रूप में उसका परिवर्तन दिखाता है. सनी गूगल पर सबसे ज़्यादा खोजे जानेवाले नामों में से एक है.
Sunny - 3ये सारा ऊपर का पैराग्राफ ज़ी5 में लिखा हुआ है. ‘इस बायोपिक ने पूरे इंडिया में खलबली मचा दी है’ वाला पार्ट भी. जिसके बारे में कोई कमेंट करने से मैं तो सर्वथा बचना चाहूंगा. क्यूंकि ‘खलबली’ एक बहुत ज़्यादा एबस्ट्रेक्ट शब्द है, और इसको मापा नहीं जा सकता. हां लेकिन कुछ बातें है जिनको लेकर विवाद उठे थे. और विवाद अच्छे हों या बुरे, किसी ऑडियो-विज़ुअल कंटेंट के लिए फायदेमंद ही होते हैं. जैसे एक विवाद ये था कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के प्रवक्ता दिलजीत सिंह बेदी ने इस सीरीज़ के नाम में ‘कौर’ होने पर आपत्ति जताई थी. उनका कहना था कि ऐसा करना सिखों की भावनाओं से खिलवाड़ है. Sunny - 4खैर इक्का-दुक्का विवाद तो हर दूसरी फ़िल्म/कंटेंट के साथ जुड़ ही जाते हैं. बात करें इस सीरीज़ की तो इसमें एडल्ट सनी लियोनी का किरदार खुद सनी लियोनी ने निभाया है. बाकी के एक्टर्स और निर्देशक की जानकारी Z5 के डिस्क्रिप्शन को पढ़ कर ही मिल जाती है. सबने ही अच्छी एक्टिंग की है. लेकिन किसी ने भी उत्कृष्ट एक्टिंग की हो ऐसा नहीं है. एक इंटेंस फैमिली ड्रामा होने के बावज़ूद पूरी सीरीज़ में जगह-जगह कुछ हल्के फुल्के मोमेंट्स हैं जिसे ह्यूमर नहीं कहा जा सकता. लेकिन आपको बोर होने से बचाते ज़रूर हैं. जिस तरह डॉक्यूमेंट्रीज़ का कोई स्पॉइलर होना असंभव है वैसे ही इसका भी कोई स्पॉइलर नहीं हो सकता. यूं ये डॉक्यूमेंट्रीज़ और स्क्रिप्टेड सीरियल के बीच का कुछ है क्यूंकि इसमें किसी सीरियल की तरह हाई और लो मोमेंट्स, क्लाइमेक्स, सस्पेंस आदि का सर्वथा अभाव न भी हो तो कमी तो है ही. जैसे डॉक्यूमेंट्री चलती हैं न, इंट्रेस्टिंग होने के बावज़ूद फ्लैट, वैसे ही. मतलब आप इसको देखकर जानकारी प्राप्त करते हैं इमोशनल नहीं होते. इक्का दुक्का इमोशनल सीन्स में भी मैं भावुक होने के बजाय ये सोच रहा था कि अगर सनी की फैमिली इसे देखेगी तो ज़रूर इमोशनल होगी. Sunny - 5सनी की फैमिली में कुल चार लोग हैं, उसके माता-पिता और उसका छोटा भाई. पंजाबी फैमिली के हिसाब से वो बहुत ज़्यादा लिबरल लगते हैं लेकिन फिर भी यूएस के मानकों के हिसाब से ये लिबरलनेस कम ही पड़ जाती है. खास तौर पर अगर आपकी बेटी पोर्न स्टार हो तो. ये सीरीज़ धर्म, ईश्वर के मुद्दे को उठाती तो है लेकिन वही बात कि इसको देख के आप ‘कैरिड अवे’ नहीं होते. न पक्ष में, न विपक्ष में. इसे निर्देशक और टीम की सफलता के रूप में भी देखा जा सकता है. इसमें स्त्री विमर्श या होमोसेक्शुअलटी को भी ग्लोरिफाई नहीं किया गया है. एक कॉमर्शियल फ़िल्म में जितनी जेंडर इक्वेलिटी संभव थी उतनी है. इमोशन आते हैं लेकिन टुकड़े में. एक कॉमर्शियल फ़िल्म में जितने होने चाहिए उतने नहीं. सनी का अपने पिता और अपने भाई के साथ एक प्यारा रिलेशन दिखाया गया है लेकिन इसको और एक्सप्लोर किया जा सकता था. दिक्कत यही है कि इसमें सारी ही चीज़ों की सतह भर छू दी गई है. Sunny - 6भाव पक्ष की बात की जाए तो आप इसे देख सकते हैं. बोर नहीं होंगे. और कंटेट की बात की जाए तो ये फ़िल्म सनी लियोनी के लिए वही काम करती जो ‘संजू’ संजय दत्त के लिए करती है. (माइनस इमोशन). मतलब ये सनी के उजले पक्ष को ही दिखाती है. मैं ये नहीं कह रहा कि ये सही है या गलत है. लेकिन ऐसा है ज़रूर. और दोस्तों याद रखिए, यदि किसी बायोग्राफी में खुद वो बंदा/बंदी भी इंवोल्व हो जिसकी बायोग्राफी बनाई जा रही है, तो इतनी बाउंडेशन तो रहेंगी ही. संजय दत्त ने ‘संजू’ को लेकर कहा था कि कोई डायरेक्टर किसी की इमेज सुधारने के लिए क्यूं ही करोड़ों रुपए दांव पर लगाएगा. ये कथन प्रथम दृष्टया तो तार्किक लगता है, लेकिन है नहीं. आज कल इमेज बिल्डिंग में जितना पैसा खर्च होता है उतना कहीं नहीं. लेकिन ‘संजू’ और ‘करनजीत कौर’ में बात प्रोपोगेन्डा फ़ैलाने की नहीं है. ये दरअसल ऐसा ही है कि किसी कंट्रोवर्शीयल फिगर के लिए आप अगर बायोग्राफी बनाएंगे तो ही इन्वेस्टमेंट के हिसाब से वो प्रोजेक्ट खुद ब-खुद एक ‘कैलकुलेटेड’ रिस्क हो जाता है. साथ ही ऐसी बायोग्राफिकल फ़िल्म में जो सबसे पहले नाराजगी जताएगा, आपके खिलाफ़ मान हानि का एक्शन लेगा उसे तो आपने पहले ही विश्वास में ले लिया. हां बेशक आपको कुछ ‘फैक्ट्स’ के साथ कोम्प्रोमाईज़ करना पड़ा. लेकिन अंततः ये सौदा फायदे का ही रहा. Sunny - 8अगर संजय दत्त को इस फ़िल्म से दिक्कत नहीं थी तो उन्हें यासिर उस्मान की किताब ‘बॉलीवुड का बिगड़ा शहज़ादा: संजय दत्त’ से क्यूं दिक्कत हुई? केवल इसलिए क्यूंकि इस किताब के लिए उनसे पूर्व में सहमती नहीं ली गई थी. खैर बात विषयांतर हो रही है, हम वापस ‘करनजीत कौर’ में आते हैं. सनी लियोनी ने फ़िल्म की रिलीज़ से पहले कहा था कि उनकी इस बायोपिक में उनके अच्छे और बुरे पक्ष दोनों ही देखने को मिलेंगे लेकिन फ़िल्म कॉमर्शीयल मूवी मेकिंग, प्रोपोगेंडा और डॉक्यूमेंट्री की खिचड़ी भर बनकर रह गई है. लेकिन एक अच्छी बात ये है कि ये सनी लियोनी के कथित बुरे पहलूओं को छूती नहीं हो, ऐसा नहीं है. बल्कि ये उन पहलुओं को भी अच्छे से छूती है और नायिका से कठिन सवाल भी पूछती है, बस होता ये है कि अंत में हर बार वर्डिक्ट नायिका के पक्ष में रहता है. इसमें सनी के कनाडा और यूएस के जीवन का ही लेखा जोखा है. दस एपिसोड हैं. हर एपिसोड बीसेक मिनट का है. यानी कुल मिलाकर सीरीज़ बहुत छोटी है. और इसमें सीज़न टू के आने का कोई वादा नहीं किया है. भारत वाले पार्ट को शायद इसलिए नहीं दिखाया गया है क्यूंकि इससे भारत में ‘लोकल’ स्तर पर कंट्रोवर्सी होने की संभावना होती. Sunny - 9स्त्री विमर्श को लेकर ये एक सशक्त हस्ताक्षर हो सकती थी. जैसे ऑल्ट बालाजी की ‘टेस्ट केस’ है. लेकिन है नहीं. लेकिन ये कहा जा सकता है कि निर्देशक और सीरीज़ से जुड़े हुए लोगों का निर्णय था कि वो इसे कैसे ट्रीट करें. यू ट्यूब में इसके ट्रेलर को लोगों ने बहुत पसंद किया है. यू ट्यूब जैसे ही किसी फ्री प्लेटफॉर्म में अगर पूरी सीरीज़ भी लॉन्च की जाती तो पहुंच ज़्यादा होती. लेकिन फिर वही इस सीरीज़ को बनाने का पूरा पर्पज़ ही डिसिव हो जाता. अगर आपके पास पहले से Z5 का सब्सक्रिप्शन है तो आपके लिए ये फ़िल्म मस्ट वॉच हो जाती है. अगर आपके पास सब्सक्रिप्शन नहीं भी है तो भी Z5 का सब्सक्रिप्शन सस्ता है साथ ही आपको ‘पैड-मैन’ या ‘परमाणु’ जैसी लेटेस्ट फ़िल्में भी देखने को मिल जाती हैं. कुछ टीवी सीरियल्स भी हैं. Sunny -7फाइनल वर्डिक्ट देने से पहले कुछ उजले पक्षों की भी बात करना चाहता हूं. कुछ सोशल कॉज़, साइकोलोजिकल इश्यूज़ हैं जिनको लेकर सीरीज़ गाहे बगाहे मुखरित होती है और इन्हें बड़े अच्छे से रखती है. # सीरीज़ का ताना बाना एक सनी के एक कंट्रोवर्शीयल इंटरव्यू के इर्द गिर्द बुना गया है. पूरी सीरीज़ के दौरान ये इंटरव्यू चलता रहता है, जिसका कई बार सनी जवाब देती है और कई बार कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है. जिस रियल इंसिडेंट (इंटरव्यू) से ये वाला पार्ट इंस्पायर्ड है उसे आप यू ट्यूब में देख सकते हैं –
ये इंटरव्यू वास्तविकता में भूपेंद्र चौबे नाम के पत्रकार ने लिया था और इसमें सनी के उत्तरों की और उसके एटीट्यूड की हर जगह प्रशंसा हुई थी. वेब सीरीज़ में इस पत्रकार को एक बुरे किरदार की तरह पेश किया गया है जिसके अपने प्रीज्युडिस हैं. सीरीज़ में जब वो सनी की तुलना प्रोस्टीट्यूट से करता है तो सनी का सधा हुआ जवाब मन मोह लेता है. # डेनियल, यानी सनी का पति जब उससे पूछता है कि उसकी ‘इस’ फील्ड में आने के क्या कारण, क्या मजबूरियां थीं? तो सनी बड़ी खूबसूरती से कोई भी मजबूरी का न होना जस्टिफाई करती है. हर कोई ये एक्सपेक्ट करता है, हर कोई यही सोचता है कि बचपन में शायद बहुत बुरा हुआ है, फैमिली गलत तरीके ट्रीट करती होगी, फाइनेंसियल इश्यूज होंगे. सनी  मना करते हुए कहती है ये स्टार्ट बेशक फाइनेंसियल इश्यूज़ के कारण था, और मैंने सबसे पहले ऑफर की गई जॉब को चुना लेकिन बाद में मैंने इसे अपनी मर्ज़ी से चुना. यही बात वो पत्रकार/इंटरव्यूअर को भी बताती है कि बेशक मैं वापस लौट सकती थी, लेकिन आगे बढ़ते जाना मेरी चॉइस थी. हर कोई आगे बढ़ना चाहता है. जैसे आप पहले किसी पत्रिका में लिखते थे और आज एक बड़े न्यूज़ चैनल में हैं. Untitled design# साइकोलॉजी की बात करें तो यूं तो सनी की फैमिली बहुत हद तक लिबरल थी लेकिन फिर भी इंडियन वैल्यूज़ की दुहाई देकर उसके माता-पिता, उसे वो काम नहीं करने देते थे, जो अन्यथा बड़े सामान्य थे. जैसे शॉर्ट ड्रेस पहनना, लिव इन में रहना या बॉयफ्रेंड बनाना. तो यूं, हालांकि फ़िल्म में ज़ाहिर तौर पर इसको नहीं दिखाया गया है, सनी एक तरह से बाग़ी हो गई थी और दो छोरों में जीने लगे. एक जो अमेरिका के हिसाब से बहुत ही रूढ़िवादी और पिछड़ा था और दूसरा इसी का ‘ऑल्टर ईगो’ जो पश्चिमी देशों के हिसाब से भी कुछ अधिक था. जिसके चलते उसकी सबसे अच्छी कैनेडियन दोस्त तक उससे मुंह फेर लेती है. दो डायलॉग देखिए –
जब मां के पूछने पर कि सनी बड़े होकर क्या बनेगी, सनी जवाब देती है कि वो नर्स बनेगी. मां ताने मारती है कि, ‘मतलब हर सूरत में पहनना तूने स्कर्ट ही है. जब वो मेहनत करने खुद के पैसों से अपने लिए ड्रेस खरीद के लाती है तो मां उसे वो ड्रेस पहनने से रोक देती है – लेमन बेच के ये ड्रेस खरीदी, ताकि अपने लेमन दिखा सके?
# सीरीज़ में यदि कोई पूरे मार्क्स बटोर के ले जाता है तो वो है सनी के भाई का किरदार. जो भाई कम बीएफएफ (बेस्ट फ्रेंड फॉरएवर) ज़्यादा है. ‘सनी’ नाम भी वो अपने भाई के नाम पर रखती है. और ऐसा किसी एक इंसिडेंट के माध्यम से नहीं पूरी सीरीज़ में दिखता है. इसलिए ही तो आश्चर्य में पड़कर पत्रकार चौबे सनी से पूछता है कि आपका भाई आपको सपोर्ट कर रहा था जबकि भाई तो ऑनर किलिंग तक कर देते हैं. # पिता का अपनी बेटी के प्रति प्रेम, उसके कामों से हुई नफ़रत से जीत जाता है जब वो कहता है, लोगों के लिए होगी सनी लियोनी, मेरे लिए तो...

फाइनल वर्डिक्ट: देख लीजिए. समय हो तो. ज्ञान में थोड़ी बहुत वृद्धि हो जाएगी और क्या. खास तौर पर अगर स्कूल में सनी लियोनी के ऊपर निबंध लिखने को आता है तो. टीवी सीरियल्स से बेहतर है, लेकिन बाकी वेब सीरीज़ और फिल्मों के मुकाबले उन्नीस ही ठहरता है.



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