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मूवी रिव्यू: कुत्ते

फ़िल्म में कुछ किरदारों से ज़्यादा स्क्रीनटाइम तो बंदूकों को मिला है.

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13 जनवरी 2023 (अपडेटेड: 13 जनवरी 2023, 10:56 AM IST)
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तबू और कोंकणा ने बेहतरीन काम किया है
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विशाल भारद्वाज की 2009 में फ़िल्म आई थी 'कमीने'. अब उनके बेटे आसमान भारद्वाज की फ़िल्म आई है 'कुत्ते'. फ़िल्म में अर्जुन कपूर, तबू, कुमुद मिश्रा, कोंकणा सेन शर्मा, राधिका मदान, नसीरुद्दीन शाह  और शार्दूल भारद्वाज लीड रोल में हैं. 

फ़िल्म में कई किरदार हैं. कई कहानियां भी हैं. पर लीड किरदार हैं, ख़ून और ख़ून की सोंधी सुगंध. हर 5 मिनट बाद ख़ून खराबा और गोलीबारी. कुछ किरदारों से ज़्यादा स्क्रीनटाइम तो बंदूकों को मिला है. कुत्ते को आसमान ने एक थिएट्रिकल टच देने की कोशिश की है. कहीं-कहीं पर वो कामयाब भी हुए हैं. जब आज़ादी गाना चलता है और बैकग्राउंड पूरा लाल रहता है, यहां तक कि आसमान भी.

तबू का काम दृश्यम में उनके किरदार का विस्तार है

मैंने तो जब से ट्रेलर देखा था, मुझे 'कुत्ते' से भयंकर उम्मीदें थीं. फ़िल्म का प्रोलॉग शुरू भी ऐसे ही होता है. नक्सल लीडर लक्ष्मी के रोल में जब कोंकणा कहानी सुनाती हैं, उम्मीदें एक लेवल और अप जाती हैं. पर जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है. मामला गड़बड़ा जाता है. पहला हाफ देखकर तो लगता है फ़िल्म बनाई ही क्यों गई है? जैसे कोई वीडियो गेम चल रहा हो. हां, सेकंड हाफ बढ़िया है. ग्रिपिंग है. कहानी की परतें जब खुलती हैं, सारे किरदार एक जगह मिलते हैं, वो सब देखना बढ़िया सिनेमैटिक एक्सपीरियंस होता है. स्क्रीनप्ले पेस्ड है. सटासट चीजें घटती हैं. इसमें एडिटिंग भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जंप कट्स की भरमार है. कैमरा एंगल्स काफ़ी अच्छे हैं. माने सोच समझकर इस्तेमाल किए गए हैं. इसकी वजह से इंटेस सिचुएशन में भी आपको हंसी आती है. फ़िल्म का नैरेटिव जिस हिसाब से बिल्ड किया गया है, ऐप्ट  है. थ्रिलर को यदि नॉन लीनियर स्ट्रक्चर दे दिया जाए, तो क्या ही कहने! ऐसा ही कुछ इस फ़िल्म के साथ किया गया है. स्क्रीन प्ले का सेटअप ऐसा है कि नॉर्मल स्पीड से चल रही फ़िल्म अचानक से हाई पिच पर पहुंच जाती है. इसी के सहारे इंटेसिटी बनाए रखने की कोशिश की गई है.

असली काम तो कोंकणा सेन शर्मा ने किया है

चूंकि स्क्रीनप्ले में आसमान के अलावा विशाल भारद्वाज का हाथ लगा है और ये फ़िल्म भी 'कमीने' की लीगेसी को आगे बढ़ाती है. इसलिए थ्रू आउट आपको डार्क ह्यूमर दिखेगा. डायलॉग राइटिंग में बहुत से इशारे हैं. बहुत से नए जुमले हैं. जैसे: शेर भूखा हो तो क्या ज़हर खा ले. या फिर फ़िल्म के किरदार जो भी कहानियां नरेट करते हैं. इनमें से तबू के कैरेक्टर पम्मी की सुनाई बिच्छू-मेंढक वाली कहानी बहुत कमाल है. वो इसलिए भी कमाल है क्योंकि ये फ़िल्म के एंड से जुड़ी है. बहुत दिनों के बाद मैंने ऐसा चुटीला और सटायरिकल एंड देखा है. माने फ़िल्ममेकर ने अपनी बात भी कह दी और कोई आहत भी नहीं हुआ. पर मैं लक्ष्मी के किरदार को और देखना चाहता था. जब आपने नक्सल वाला ऐंगल फ़िल्म में डाला है, तो इसे वैचारिक स्तर पर ज़्यादा विस्तार देना चाहिए था. ठीक ऐसे ही नसीर का किरदार भी है. मतलब क्यों हैं भाई वो फ़िल्म में? अनुराग कश्यप का किरदार क्यों ही है? जो मैसेज उस किरदार के ज़रिए दिया गया है, वो किसी और के ज़रिए भी दिया जा सकता था.

इनके लिए बस एक ही शब्द, 'कमाल'

आजकल फिल्मों में गालियों का चलन हो गया है. ये फ़िल्म भी वैसी है. जहां ज़रूरत है, वहां गालियां डालनी चाहिए. हर किरदार को सशक्त दिखाने के लिए उसके मुंह से गाली दिलवाना ज़रूरी नहीं होता. ऐसे ही फ़िल्म के बीच-बीच में आता सेक्स. ज़रूरी है क्या, हमेशा सेक्स आए ही. शुरू में लक्ष्मी के साथ जो होता है, उसका फिल्मांकन तो हद बनावटी लगता है. सेक्स को भी बहुत नॉमिनल रखा जा सकता था. इस फ़िल्म की बेस्ट बात है, इसका म्यूजिक. भाईसाहब, विशाल भारद्वाज का क्या तगड़ा बीजीएम है. यदि हालफिलहाल में आई किसी फ़िल्म से तुलना करें, तो इसके बैकग्राउन्ड म्यूजिक में 'मोनिका ओ माई डार्लिंग' वाली बात है. गाने भी बेहतरीन हैं. मुझे निजी तौर पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म का कुत्ते के टाइटल ट्रैक के तौर पर अडाप्टेशन बहुत अच्छा लगा.

इनकी पिक्चर है और यही सबसे फ़ीके हैं

बाकी ऐक्टिंग सबकी एक नंबर है. सिर्फ अर्जुन कपूर फीके पड़े हैं. पर उन्होंने अपने अनुसार ठीक काम किया है. मुझे फ़िल्म में इशकज़ादे वाले अर्जुन ही दिखे. कुमुद मिश्रा ने सरदार के किरदार को असरदार बना दिया है. तबू को तो आप कुछ भी काम दे दीजिए, उन्हें तो अपना बेस्ट ही देना है. पुलिस ऑफिसर पम्मी के रोल में उन्होंने आग लगा दी है. हालांकि इस किरदार को आप दृश्यम का एक्स्टेंडेड वर्जन कह सकते हैं. उनके मुंह से गालियां सुनना अच्छा नहीं लगता है. माने सहजता नहीं है, उनकी गालियों में. इस फ़िल्म में जिसने सबसे अच्छा काम किया है, वो हैं कोंकणा सेन शर्मा. नक्सल लीडर की दृढ़ता और सच्चाई उनके चेहरे पर दिखती है. शायद पूरी फ़िल्म में उनका ही एक किरदार है, जो दगाबाज़ नहीं है. उनके किरदार का एक ही शेड है. बाकी सभी किरदार ग्रे हैं. राधिका मदान जैसे काम कर रही हैं, ऐसे ही करती रही तो उनका फ्यूचर बहुत ब्राइट है.

बाकी फ़िल्म पैसा और पावर की कहानी है. सब एक दूसरे को गिराने में लगे हुए हैं. अंत में कौन किसको गिरा पाता है, इसके लिए आपको फ़िल्म देखनी पड़ेगी. पर कोई इतनी इम्पॉर्टेन्ट फ़िल्म नहीं है कि सब-छोड़छाड़कर देखने के लिए मैं आपसे कहूं. 

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