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मूवी रिव्यू: 'मट्टो की साइकिल'

ये फ़िल्म डायरेक्टर, राइटर और सिनेमैटोग्राफर की तो है ही, पर प्रकाश झा की अदाकारी के आगे दूसरी सारी कलाएं बौनी नज़र आती हैं. ये संवादो में कम, दृश्यों में ज़्यादा बात करती है

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16 सितंबर 2022 (अपडेटेड: 16 सितंबर 2022, 01:37 PM IST)
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'मट्टो की साइकिल' ग़रीबी और देश के भीतर एक दूसरे देश का सबटेक्स्ट है.
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प्रधानी का चुनाव हो रहा है. उस दौरान फ़िल्म में एक गाना बजता है, 'पांच साल की लॉटरी'. इस गाने में लोक की महक है. समूचा लोक इसमें समाया है. इसे लिखा है शक्ति प्रकाश ने. गाया और कंपोज किया है होतीलाल पांडे और साथियों ने. इसमें एक लाइन है 'सूखे बम्बा में बहेगी शराब'. चुनाव के समय तो ख़ूब शराब बही. पर अब पानी भी नहीं बह रहा. दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में ख़राब पानी की समस्या से लोग बीमार हो रहे हैं. जिस देश का डंका विश्व पटल पर बजता हो, वहां पाई-पाई जोड़कर खरीदी गई साइकिल के चोरी की रिपोर्ट तक नहीं लिखी जाती. सरपट दौड़ते देश में अब भी कई लोग हैं, जो रेंग रहे हैं. एक वक़्त का खाना भी जिन्हें नसीब नहीं होता. मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है. प्रकाश झा की फ़िल्म 'मट्टो की साइकिल' ऐसे ही देश की कहानी है.

फ़िल्म में अपनी साइकिल के साथ मट्टो
'मट्टो की साइकिल' की कहानी क्या है?

एक हैं मट्टो पाल और दूजी है उनकी साइकिल. वो साइकिल उनके लिए जान से बढ़कर है. परिवार का हिस्सा है. पूरा परिवार वो उसी के सहारे पालते हैं. परिवार में पत्नी और दो बेटियों समेत कुल चार लोग हैं. साइकिल नहीं तो काम पर कैसे जाएंगे. काम पर नहीं जाएंगे तो दो वक़्त की रोटी कैसे नसीब होगी. दिहाड़ी मज़दूर की यही दास्तान है. किसी तरह की कोई सेविंग्स नहीं, ऊपर से कर्ज़ का बोझ सो अलग. अचानक पैसे की ज़रूरत आन पड़े तो जेवर बेचकर काम चलता है. ऐसे ही एक दिहाड़ी मजदूर के भीतर धंसी ग़रीबी, बाहरी तौर से दिख रहे समाज में धंसे एक और समाज की कहानी है, 'मट्टो की साइकिल'.

सबटेक्स्ट में खेलती है फ़िल्म

डायरेक्टर एम. गनी की ये फ़िल्म इंडिया और भारत के बीच एक सबटेक्स्ट की लंबी गाढ़ी लाइन खींचती है. अच्छे सिनेमा का सबटेक्स्ट बहुत ज़ोरदार होता है. इसका भी है. सबटेक्स्ट माने जो दिख रहा है, उसके भीतर भी कुछ बहुत गूढ़ है. ऐसा कुछ जो ज़रूरी है. चाहे वो चुनाव के पहले प्रधान जी का घर हो या फिर चुनाव जीतने के बाद उनका घर और उनकी तरक़्क़ी. गांव वहीं है, प्रधान जी आगे बढ़ चुके हैं. एक तरफ़ गांव में 4G आ गया है. पर एक व्यक्ति है जो साइकिल खरीदने के लिए भीख मांगता फिर रहा है. ऐसा ही एक वकील का किरदार है, जो बीच-बीच में अखबार से खबरें पढ़ता रहता है: 'अब अंबानी एजुकेशन सेक्टर में उतरने की सोच रहे हैं'. '35 रुपए के ऊपर कमाने वाली आदमी अब गरीब नहीं.' फ़िल्म ऐसे और भी कई तगड़े सबटेक्स्ट को स्क्रीन पर उतारती है. 'मट्टो की साइकिल' ग़रीबी और देश के भीतर एक दूसरे देश का सबटेक्स्ट है.

थके हुए मट्टो को बेना झलती उसकी पत्नी 
ये रियलिज़्म का सिनेमा है

फ़िल्म की ख़ास बात है उसका रियलिज़्म. इसे देखकर 'बाइसिकल थीव्स' याद आती है. ईरानियन सिनेमा याद आता है. आम बॉलीवुड फ़िल्मों की तरह कहीं सेट लगाकर किसी गांव को नहीं दिखाया गया है. भारत के असली ग्राम्य जीवन की तस्वीर आपको दिखती है. लोकेशन से लेकर ऐक्टर्स तक सब बहुत ज़्यादा क़रीब लगता है. फ़िल्म कहीं से भी चालाक बनने की कोशिश नहीं करती. जो जैसा है, उसे वैसा पेश करती है. डायरेक्टर एम गनी और लेखक पुलकित फिलिप चाहते, तो किरदारों की भाषा खड़ी हिंदी रख सकते थे. पर मथुरा की कहानी में मथुरा की भाषा है. बहुत दिनों के बाद रोज़मर्रा के मुहावरे किसी फ़िल्म में सुनने को मिलते हैं. जैसे: हथेली पर सरसों उगाना. तुम्हारे पैर किसी कावासाकी से कम हैं क्या? इसमें जीवन के सबसे दुःखी मौकों पर भी खुशी ढूंढ़ लेने वाले डायलॉग्स हैं.

हंसबे बोलबे में ही जिंदगी को सार है
मेरे जैसा सेलिब्रिटी तुमाओ यार है
जे का कम है

ऐसे ही और भी डायलॉग्स, जो सामाजिक सच्चाई की कील हमारे सीने में ठोंकते हैं. जैसे, एक जगह जब मट्टो किसी से पैसा उधार लेने की बात करता है, तो उसकी पत्नी कहती है: पैसा वालेन को ही लोग देवे हैं पइसा.

फ़िल्म संवादो में कम दृश्यों में ज़्यादा बात करती है

डायरेक्टर एम गनी ने इस फ़िल्म में एक बात का ख़ास ख़याल रखा है. ये फ़िल्म संवादों में कम, दृश्यों में ज़्यादा बात करती है. ऐसे दृश्य की आंखें नम हों. आक्रोश पैदा हो. मूवी कहीं पर भी किसी चीज़ की अति नहीं करती. जैसा कि आजकल की ज़्यादातर सामाजिक सरोकार वाली फ़िल्मों में होता है. इसमें ऐसा नहीं लगता कि ये तो थोड़ा ज़्यादा ही दिखा दिया, ऐसा नहीं हो सकता. आप फ़िल्म की हर बात से सहमत होते हैं. कहीं पर भी ये पुरातन काल की फ़िल्म नहीं लगती. आज के भारत की तस्वीर लगती है. फ़िल्म एक ग़रीब परिवार के जीवन निबाहने की कला को ज्यों का त्यों हमारे सामने धर पटकती है. कैसे पैसे की कमी में घर का इकलौता कमाने वाला एक वक़्त की रोटी छोड़ देता है. कैसे बड़ी बहन खाने के अभाव में अपनी थाली छोटी बहन के सामने सरका देती है. ये फ़िल्म सिर्फ़ मट्टो की साइकिल की कहानी नहीं. बल्कि उसके सहारे कई सामाजिक समस्याओं को उजागर करने की दास्तान है. इतने साल गुज़र गए. पर प्रेमचंद के गोदान का होरी अब भी मट्टो के रूप में ज़िंदा है.

मट्टो की बेटियां नीरज और लिमका
प्रकाश झा की अदाकारी ने लूटी महफ़िल

ये फ़िल्म डायरेक्टर, राइटर और सिनेमैटोग्राफर की तो है ही. पर प्रकाश झा की अदाकारी के आगे दूसरी सारी कलाएं बौनी नज़र आती हैं. उन्होंने मट्टो की आत्मा को ख़ुद में उतार लिया है. उनके लिए बस एक ही शब्द, 'अद्भुत'. ये ऐक्टिंग की मास्टरी है. इसमें एक डायरेक्टर ने तमाम बड़े-बड़े अभिनेताओं के लिए ऐक्टिंग की क्लास लगाई है. उनकी पत्नी देवकी बनी अनीता चौधरी ने भी बेहरीन काम किया है. साइकिल मकैनिक का किरदार निभाने वाले डिम्पी मिश्रा ने भी कमाल किया है. मट्टो की बेटियां बनी आरोही और इधिका रॉय दोनों ने भी बढ़िया ऐक्टिंग की है. प्रधान के रोल में चंद्रप्रकाश शर्मा भी जंचे हैं.

इस फ़िल्म को लेकर एक जगह प्रकाश झा ने कहा था: ओटीटी प्लेटफॉर्म्स इस फ़िल्म को आर्ट फ़िल्म का हवाला देकर जगह देने को तैयार नहीं थे. जब ट्रेलर आया, लोगों ने पसंद किया. अब वो लोग कह रहे हैं. हमें फ़िल्म दे दीजिए, हमें फ़िल्म दे दीजिए.

कुल मिलाकर कहने का मतलब ये है कि जिन्हें मेनस्ट्रीम सिनेमा कहा जाना चाहिए उन्हें आर्ट के नाम पर नकार दिया जाता है. हमें शिकायत रहती है कि आजकल बॉलीवुड में अच्छी फिल्में नहीं बनती. ये बनी है देख आइए.

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