भारत माता की जय!छोटा शहर. छोटे शहर का मिडल क्लास आदमी. पैदा हुआ, पढ़ा-लिखा, नौकरी ढूंढा, नौकरीमिली तो मिली वरना शादी की, बच्चे पैदा किये और मर गया. गजब संतोषी प्रवृत्ति. क्याहै कि सपने देखने का टाइम नहीं मिलता और अलार्म बज जाता है. स्कूल या नौकरी यानौकरी ढूंढने जाने के लिए. इसी बीच संयोग से एक कोई उल्टी खोपड़ी का पैदा होजाता/जाती है. और यहीं छोटे शहर के मिडल क्लास में बवाल मच जाता है. ये एकदम वैसाहोता है जैसे साबू के गुस्सा आने पर बृहस्पति ग्रह पर ज्वालामुखी फट पड़ता है. लेकिनकहानी तब बनती है जब एक ही शहर में दो साबू एक-दूसरे का रास्ता काट जाएं. श्रवण औरसुनयना. एक दूसरे के प्यार में पड़े बरेली के दो साबू. और उनकी लव-स्टोरी -मुक्काबाज़. भारत माता की जय!अनुराग कश्यप कृत, विनीत सिंह, ज़ोया हुसैन और जिमी शेरगिल द्वारा अभिनीत लहालोट करदेने वाला चलचित्र. भारत माता की जय!ये अनुराग कश्यप की अब तक की सबसे ज़िम्मेदार फ़िल्म है. इस फ़िल्म में कदम-कदम पर देशसे जुड़ी समस्याओं और उनके समाधान की बात की गई है. देशप्रेम में डूबी फ़िल्म जिसनेज्वलंत मुद्दों पर सवाल उठाये हैं. इसके साथ ही ये एक विकट लव स्टोरी है जो पूरीतरह से पारिवारिक है. यहां जो भी लिखा है, सच है. भारत माता की जय!फ़िल्म की कहानी बेहद ज़मीनी है. इस कहानी को लिखने वाले विनीत ने बनारस के दिनों मेंइसे अपने आस पास देखा और महसूस किया था. लिहाज़ा कहानी पेवर और सच्ची है. देश में आपगलती से बड़े सपने देख लें तो उन्हें पूरा करने के लिए आपको कई चौखटों पर माथा टेकनापड़ता है. ये एक परंपरा है जिसे होना ही होता है. खेल की दुनिया तो इसी पर टिकी हुईहै. यहां खिलाड़ियों को अपने भले के लिए किसी 'आका' की गुड बुक्स में रहना होता है.इसके लिए उसे प्याज़-लहसुन लाने से लेकर उसकी मालिश करनी पड़ती है, उसके पैर दबानेपड़ते हैं और कभी कभी अमृत समझ उसकी पेशाब भी पीनी पड़ती है. ये किसी लड़ाई से कम नहींहोता है. भारत माता की जय!और इसी लड़ाई के दौरान उसे एक और मोर्चे को संभालना होता है - घर. मां-बाप और पत्नीको 'देखना' होता है. बाप को बेटे की आंखें किताबों में गड़ी मिलनी चाहिए. मिडल क्लासबाप को पूरे रिपोर्ट कार्ड में सिर्फ मैथ्स दिखाई देता है. इसके सिवा सारे अक्षरउसके लिए पारदर्शी होते हैं. एक दिन लड़का पूछ लेता है - "आप कौन सा अपने जीवन मेंबहुत तोप मार लिए?" संस्कार को बाप ही के साथ सांप सूंघ जाता है. ये क्रूर दुनियामें उस बेटे का पहला कदम होता है. भारत माता की जय!एक खिलाड़ी जो उस खेल के 'आका' से जूझ रहा है. वो 'आका' जो अपनी ऊंची जाति के मद मेंचूर है. खिलाड़ी यानी श्रवण सिंह और आका यानी भगवान मिश्रा. श्रवण उन लोगों में सेनहीं है जो अपने फायदे की खातिर किसी के घर का राशन ढोया करे. लिहाज़ा भगवान केसामने सीन तान खड़ा हो जाता है. ज़रुरत पड़ने पर तमाचा भी जड़ देता है. और ये खुद कोसाच में भगवान समझने वाले ऊंची जाति के दबंग भगवान मिश्रा को सहन नहीं होता है. वोवादा करता है कि श्रवण को बढ़ने नहीं देगा. श्रवण आगे बढ़ने को आतुर था क्यूंकि वोअनाप शनाप प्रेम में था. भगवान मिश्रा की भतीजी के प्रेम में. और इसी अनाप शनापप्रेम और उससे भी ज़्यादा अनाप शनाप जातीय समीकरण की कहानी है मुक्काबाज़. भारत माताकी जय!फ़िल्म की ताक़त कहानी का बहुत यकीनी और ज़मीनी होना है. और इसके साथ ही इस फ़िल्म काम्यूज़िक. रचित अरोड़ा के कम्पोज़ किये, हुसैन हैदरी और विनीत सिंह के लिखे गाने इसफ़िल्म के सहयात्री हैं. ये एक म्यूज़िकल फ़िल्म है. ढेरों गाने जो पूरी फ़िल्म मेंफैले हुए हैं. बात चाहे एक आइटम नंबर की हो या बिछोह में लगभग पागल हो रहे भैंस सीबुद्धि वाले मुक्काबाज़ की व्यथा हो, फ़िल्म के गाने पूरी तरह से उस इमोशन को हम तकपहुंचाते हैं. भारत माता की जय!विनीत सिंह ने इस फ़िल्म के लिए जो मेहनत की है, सालों बाद उसपर किताबें लिखीजाएंगी. जिस उम्र में एक मुक्केबाज़ का करियर ख़त्म होने को होता है, विनीत ने उसउम्र में खुद को मुक्केबाज़ी सिखाई है. एक साल तक पटियाला में रहकर विनीत ने अपनीदेह को जैसे तपाया है, उसका असर फ़िल्म में उनके काम पर दिखता है. फ़िल्म बनाने सेपहले अनुराग ने विनीत से कहा था कि अगर बॉक्सर नहीं बने तो फ़िल्म नहीं बनेगी. क्यूंकहा था, फ़िल्म देखते ही समझ में आ जाता है. भारत माता की जय!ज़ोया हुसैन की ये पहली फ़ीचर फ़िल्म है. चूंकि उनका कैरेक्टर एक गूंगी लड़की का हैइसलिए इसमें उनके हिस्से एक भी डायलॉग नहीं हैं. वो भगवान मिश्रा की भतीजी हैं.सुनयना मिश्रा. भगवान मिश्रा जो सिर्फ अपने शहर का ही नहीं अपने घर का भी दबंग है.जिसका बड़ा भाई इस खौफ में जीता है कि एक दिन वो उसे मरवा देगा. इस परिवार मेंसुनयना मिश्रा वो ताक़त है जो भगवान मिश्रा के ख़िलाफ़ बगावत करती है. वो उसे घूरती हैऔर ऊंची जाति के मर्द होने के नाते भगवान मिश्रा के लिए इससे बुरा और कुछ नहीं होसकता है. ज़ोया ने बहुत ही आराम से सब कुछ कर दिया है. हांलाकि वो बताती हैं किउन्हें कई जगहों पर इतना दबाव महसूस हो रहा था कि उनका सर दुखने लगता था लेकिनस्क्रीन पर वो दबाव कहीं भी नहीं दिखा. इसके लिए वो पूरी तरह से शाबाशी की हक़दारहैं. भारत माता की जय!फ़िल्म एक छोटे शहर में बनी एक छोटे शहर की कहानी है. मार-धाड़ एवम ऐक्शन व रोमांस सेभरपूर पारिवारिक मनोरंजन फ़िल्म.देखी जाए.भारत माता की जय!--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:बॉलीवुड की सबसे मशहूर मां के बच्चे किस बात पर झगड़ रहे हैं?सपना चौधरी बदल गई हैंउस रात की पूरी कहानी, जब शास्त्री की मौत हुई