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मोदी जी PM तो बन गए, पर PM वाला बड़प्पन कब सीखेंगे?

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इतने दशक बाद भी दक्षिणपंथी राजनीति का ‘नेहरू फोबिया’ खत्म नहीं हुआ. उन्हें नीचा दिखाने और गलत साबित करने का मोह ये अब भी नहीं छोड़ पाते. आपको सबूत चाहिए, तो मोदी जी को सुन लीजिए. वो आज भी नेहरू से ‘शेडो बॉक्सिंग’ कर रहे हैं. शेडो बॉक्सिंग को आसान भाषा में समझाएं आपको. ये ऐसे होता है कि कोई इंसान परछाईं के साथ कुश्ती लड़े. शायद ये एक किस्म की कुंठा है, जो मोदी जी अपने दिल पर लादे घूम रहे हैं. ये पीढ़ियों के जमा फ्रस्ट्रेशन की विरासत है. मोदी खुद भी तो इसी विरासत की देन हैं न. तभी अपना मूल नहीं भूल पाते. उससे ऊपर नहीं उठ पाते. प्रधानमंत्री तो बन गए, मगर उस पद का बड़प्पन नहीं दिखा पाते.


किसी झूठ फैलाने वाले प्रोपगेंडा वेबसाइट की तरह बर्ताव करते हैं मोदी
मोदी जी की कई उपलब्धियां हैं. उनमें से एक ये भी है कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की गरिमा को कम किया है. PM पद पर रहते हुए भी इस पद का बड़प्पन बनाकर नहीं रखा. बीजेपी के प्रचारक की तरह बर्ताव करना नहीं छोड़ा. मोदी जी देश के सबसे नाटकीय नेताओं में से एक हैं. उनका हाव-भाव, अंदाज, चुटकियां लेने का तरीका किसी बुली की तरह होता है. आपके स्कूल में था कोई ऐसा, जो सबके ऊपर धौंस जमाता हो. हंसी उड़ाता हो. ऐसों को ही कहते हैं बुली. मोदी जी उसी बुली की तरह हैं. धौंस जमाते हैं. माखौल उड़ाते हैं. छींटाकशी करते हैं. जब मोदी चुनाव प्रचार पर निकलते हैं, तब शायद अपनी विनम्रता भी PM आवास में छोड़ जाते हैं. अपनी चुनावी रैलियों में मोदी अक्सर नेहरू को याद करते हैं. याद क्या करते हैं, चुटकी लेते हैं. कभी उनका मजाक उड़ाते हैं. कभी ताना देते हैं. ऐसा लगता है कि मोदी नेहरू से ही मुखातिब हों. कि नेहरू मोदी के साथ वाले हों. जब कभी मोदी नेहरू का जिक्र करते हैं, तो एक अजीब सा भाव होता है उनके अंदाज में. उनको सुनकर ऐसा ही लगता है, जैसा सोशल मीडिया पर नेहरू के बारे में अश्लील झूठ परोसने वाले लेखों को पढ़कर महसूस होता है. ऐसे मौकों पर मोदी जी और किसी प्रोपोगेंडा वेबसाइट में कोई फर्क नजर नहीं आता.

राहुल गांधी सोमनाथ गए. ये राहुल गांधी का फैसला था. उनकी राजनीति का हिस्सा था. क्या इसके लिए इतिहास खोदकर नेहरू को बाहर निकालना जरूरी है? बिना संदर्भ-प्रसंग के अपने हिसाब से नेहरू की एक खास छवि बनाना सही है?
राहुल गांधी सोमनाथ गए. ये राहुल गांधी का फैसला था. उनकी राजनीति का हिस्सा था. क्या इसके लिए इतिहास खोदकर नेहरू को बाहर निकालना जरूरी है? बिना संदर्भ-प्रसंग के अपने हिसाब से नेहरू की एक खास छवि बनाना सही है?

बुधवार, तारीख 29 नवंबर. मोदी गुजरात में चुनावी रैली कर रहे थे. जगह थी प्राची. राहुल गांधी सोमनाथ मंदिर होकर आए थे. मोदी को उनकी आलोचना करनी थी. राहुल को निशाना बनाने के लिए मोदी कई पीढ़ी पीछे चले गए. नेहरू पर पहुंच गए. बोले:

अगर सरदार पटेल न होते, तो सोमनाथ मंदिर का सपना मुमकिन न हो पाता. कुछ लोग आज सोमनाथ को याद कर रहे हैं. मैं उनसे पूछना चाहूंगा- क्या आप इतिहास भूल गए हैं? आपके परनाना, हमारे पहले प्रधानमंत्री, इस मंदिर के बनने से खुश नहीं थे.

क्या मोदी जी को नेहरू का इतिहास मालूम है?
ये वाक्य अपने आप में एक मक्कार बयान है. कई ऐसी गलतियां हैं इसमें, जिसे माफ नहीं किया जा सकता. बड़ी चालाकी से एक साथ कई चीजें साधने की कोशिश की गई है. पटेल और नेहरू को आमने-सामने रख दिया गया है. एक को अच्छा और दूसरे को बुरा बता दिया गया है. एक पूर्व प्रधानमंत्री को हिंदू विरोधी साबित करने की कोशिश की गई. मुझे नहीं पता कि मोदी जी का भाषण सुनने वाले कितने लोगों को सोमनाथ मंदिर और नेहरू का ऐतिहासिक किस्सा याद है. बल्कि सवाल तो ये भी उठता है कि क्या मोदी भी असलियत जानते हैं? अगर जानते हुए भी ये कह रहे हैं, तो ये धूर्तता है.

ऐसा नहीं कि नेहरू आलोचनाओं से परे हैं. लोकतंत्र में कोई भी आलोचना से ऊपर नहीं होता. मगर आलोचना एक चीज है और बदतमीजी दूसरी चीज है.
ऐसा नहीं कि नेहरू आलोचनाओं से परे हैं. लोकतंत्र में कोई भी आलोचना से ऊपर नहीं होता. मगर आलोचना एक चीज है और बदतमीजी दूसरी चीज है.

राजनीति और धर्म को अलग-अलग रखना चाहते थे नेहरू
जब भारत आजाद हुआ, तब कई चुनौतियां सामने थीं. एक देश बनने वाला था, जहां बहुसंख्यक आबादी हिंदुओं की थी. इतिहास में हिंदुओं को कई बुरे अनुभव मिले. बाहरी ताकतों ने कई बार उन पर हमला किया. जबरन उनका धर्म बदलवाया गया. धर्म के कारण उनके ऊपर जुल्म हुए. तो देश आजाद होने पर अगर हिंदू अपने लिए विशेष अधिकारों की उम्मीद करते, तो आश्चर्य की बात नहीं होती. मगर ऐसा हुआ नहीं. जिन लोगों पर देश की दिशा तय करने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने इसे एक आधुनिक और आजादख्याल देश बनाने का फैसला किया. जो सेक्युलर हो. लोकतांत्रिक हो. जहां सबके लिए जगह हो. जिन लोगों ने इस देश को ऐसा बनाने का सपना देखा, उनमें नेहरू भी शामिल थे. वो धर्म और राजनीति को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रखना चाहते थे. उनको एहसास था कि वो शुरुआती वक्त आने वाले भारत के लिए मिसाल बनेगा. इसीलिए जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के पास सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शरीक होने का आमंत्रण आया, तो नेहरू ने मुखालफत की. तब देश ताजा-ताजा आजाद हुआ था. बंटवारा और उसके बाद हुई हिंसा अब भी जेहन में जिंदा थी. पाकिस्तान और मुसलमान परस्त समझकर गांधी की हत्या की जा चुकी थी. नेहरू चाहते थे कि अल्पसंख्यकों को भारत की धर्मनिरपेक्षता पर यकीन हो. उन्हें भरोसा हो कि संविधान और सरकार, सबके हैं. मुसलमानों को ये न लगे कि हिंदुस्तान में रहकर उन्होंने कोई गलती की है. सो उन्होंने राजेंद्र प्रसाद को चिट्ठी भेजी. इसमें लिखा था:

मैं मानता हूं कि सोमनाथ मंदिर के भव्य उद्घाटन में शामिल होने की आपकी इच्छा को मैं पसंद नहीं करता. मैं इससे सहमत नहीं हूं. बात बस मंदिर जाने की नहीं है. आप या कोई भी और निजी तौर पर मंदिर जा सकता है. मगर राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर होकर ऐसे समारोह का हिस्सा बनना अलग बात है. इसके कई नतीजे हो सकते हैं.

नेहरू धर्म और राजनीति को दूर रखने की वकालत करते थे. उनका कहना था कि संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को सार्वजनिक जीवन में किसी भी धर्म से नजदीकी नहीं दिखानी चाहिए. वो धर्म को निजी विश्वास की चीज मानते थे. किसी एक धर्म के खिलाफ नहीं थे. अब देखिए? राजनीति ही धर्म का बंदरबांट करके बैठी है. सब धर्म और जाति की राजनीति के आदी हो गए हैं.
नेहरू धर्म और राजनीति को दूर रखने की वकालत करते थे. उनका कहना था कि संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को सार्वजनिक जीवन में किसी भी धर्म से नजदीकी नहीं दिखानी चाहिए. वो धर्म को निजी विश्वास की चीज मानते थे. किसी धर्म के खिलाफ नहीं थे.

नेहरू जिन खतरों के लिए आगाह कर रहे थे, हम वो ही कर रहे हैं
नेहरू जिन खतरों के लिए आगाह कर रहे थे, वो आगे जाकर सच साबित हुआ. धर्म और राजनीति ‘एक जिस्म और दो जान’ हो गए. भारत की राजनीति धर्म और जाति के चक्कर में बाकी सभी जरूरी मसलों को खा गई. हम अभी भी ये ही कर रहे हैं. कोई पार्टी फलां धर्म की बात करती है. कोई पार्टी फलां धर्म की राजनीति करती है. कोई पार्टी किसी खास जाति की बात करती है. कोई पार्टी किसी खास तबके की बात करती है. यहां तक कि कांग्रेस भी ये ही करती है. नेहरू ये नहीं होने देना चाहते थे. मगर मोदी जी और उनके जैसे लोग क्या करते हैं? नेहरू की नीयत और धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े करते हैं. उन्हें खलनायक की तरह पेश करते हैं. ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने की कोशिश करते हैं. इस कोशिश को जितनी लानत दी जाए, कम है.

प्रधानमंत्री मोदी जब अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे होते हैं, तब भी PM होते हैं. उस पद से अलग तो नहीं होते. फिर उनके बर्ताव की आलोचना क्यों नहीं होनी चाहिए.
प्रधानमंत्री मोदी जब अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे होते हैं, तब भी PM होते हैं. उस पद से अलग तो नहीं होते. फिर उनके बर्ताव की आलोचना क्यों नहीं होनी चाहिए.

राहुल और कांग्रेस की आलोचना के लिए बस नेहरू बचे हैं?
राहुल गांधी की आलोचना करने के लिए कोई गुप्त बात खोजकर लाने की जरूरत नहीं है. तमाम बातें हैं, जिन पर राहुल को घेरा जा सकता है. कांग्रेस की आलोचना में तो अनगिनत किताबें लिखी जा सकती हैं. भ्रष्टाचार, परिवारवाद, खास तबके और धर्म के लोगों को सहलाने की नीति, कई अहम मसलों को संभालने में दिखाई गई लापरवाही. तमाम मुद्दे हैं. क्या कांग्रेस और गांधी परिवार की आलोचना के लिए नेहरू का नाम घसीटना जरूरी है? राहुल गांधी सोमनाथ गए. लगातार मंदिरों में जा रहे हैं. राजनीति कर रहे हैं. जिस हिंदू धर्म की राजनीति करने का ठेका पिछले कई सालों से बीजेपी ने ले रखा है, उसमें सेंधमारी की कोशिश कर रहे हैं. जाहिर है, बीजेपी पलटवार करेगी. साबित करने की कोशिश करेगी कि हिंदुत्व और हिंदुओं की चिंता का लाइसेंस बस उसके पास है. ये राजनीति है. नेताओं को राजनीति करने से तो मना नहीं किया जा सकता. धर्म और जाति की राजनीति कितना गलीच काम है, ये बातें बौद्धिक किताबों के लिए छोड़ दीजिए. असलियत में तो जनता और उसके नेताओं ने इसी मुद्दे पर देश को चलाने की ठान रखी है. मगर इसके लिए नेहरू जैसी धरोहरों को घसीटना कितना सही है? क्या ये मक्कारी नहीं?

क्या नेहरू की बस ये पहचान है कि वो राहुल गांधी के परनाना हैं?
क्या नेहरू की पहचान ये है कि वो राहुल गांधी के परनाना होते हैं? ये राहुल की पहचान का हिस्सा है. नेहरू की हस्ती का नहीं. फिर जब राहुल को ताना देने और अपनी राजनीति चमकाने के लिए मोदी नेहरू के जिक्र को ‘परनाना’ पर समेट देते हैं, तो इसे कितना जायज कहा जाए? नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री थे. स्वतंत्रता सेनानी थे. इस आजाद भारत को लोकतंत्र बनाने वालों में शामिल थे नेहरू. वो ही लोकतंत्र, जिसके कारण आज मोदी देश के PM बने हैं. वो नेहरू ही थे, जिन्होंने लाहौर में रावी नदी के तट पर खड़े होकर पूर्ण स्वराज्य की कसम खाई-खिलवाई थी. नेहरू उन लोगों में थे, जिन्होंने इस देश और उसकी आने वाली पीढ़ियों को आजादी दिलाने के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाया. जेल गए. संघर्ष किया. नेहरू का ये परिचय उनके कांग्रेसी होने के परिचय से कहीं बड़ा है.

ऐसा तो नहीं होता न कि जिसने वोट नहीं दिया, उसका कोई और प्रधानमंत्री होगा. PM तो सबका एक ही रहेगा. कई बार जब विपक्षी दल मोदी जी की आलोचना में गलत शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तब बीजेपी के ही नेता सामने आकर कहते हैं कि फलां आदमी ने PM पद का अपमान किया. पद का सम्मान क्या होता है, इसका ध्यान विपक्ष के साथ-साथ सत्ता को भी रखना चाहिए.
कई बार जब विपक्षी दल मोदी जी की आलोचना में गलत शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तब बीजेपी के ही नेता सामने आकर कहते हैं कि फलां आदमी ने PM पद का अपमान किया. पद का सम्मान क्या होता है, इसका ध्यान विपक्ष के साथ-साथ सत्ता को भी रखना चाहिए.

क्या खुद को बेहतर दिखाने के लिए नेहरू के मोहताज हैं मोदी?
प्रधानमंत्री किसका होता है? किसी खास पार्टी का नुमाइंदा होता है क्या? या किसी खास तबके का प्रतिनिधि होता है? या फिर कुछ चुने हुए लोगों का नेता होता है? क्या PM इनमें से कोई होता है? या फिर, जैसा कि हमें अब तक मालूम था, प्रधानमंत्री पूरे देश का सगा होता है. जिसने वोट दिया, उसका भी. जिसने वोट नहीं दिया, उसका भी. जो वोट देगा, उसका भी. जो कतई वोट नहीं देगा, उसका भी. आप कई जगह पढ़ते होंगे. कांग्रेसी मुख्यमंत्री. भाजपाई प्रधानमंत्री. ये तकनीकी रूप से गलत है. ऐसा इसलिए कि नेता पार्टी का होता है. मगर संवैधानिक पद पर बैठने के बाद वो किसी एक पार्टी का नहीं रह जाता. पूरे देश का हो जाता है. तभी तो उस पद की इज्जत है. इसीलिए मोदी जी की भी इज्जत है. और इसीलिए नेहरू की भी इज्जत है. आप नेहरू की नीतियों को लेकर उनकी आलोचना कर सकते हैं. बेहद बेदर्दी से उनकी विदेश नीति की बखिया उधेड़ सकते हैं. उनकी कश्मीर नीति को खरी-खोटी सुना सकते हैं. मगर बदतमीजी नहीं कर सकते. खासकर तब, जब आप प्रधानमंत्री जैसे जिम्मेदार संवैधानिक पद पर बैठे हों. मगर मोदी जी ये ही करते हैं. ये ही करते आए हैं. तभी तो, वो बीजेपी के प्रचारक ज्यादा लगते हैं. अभी दो-तीन दिन पहले भी एक रैली में मोदी ने नेहरू का जिक्र किया था. कहा, नेहरू ने भूकंप पर कुछ काम नहीं किया. जबकि मैंने खूब काम कराया. क्या मोदी जी को अपने दौर के नेताओं में कोई नजर नहीं आता, जिसके साथ वो अपनी तुलना कर सकें? या जिन्हें निशाना बनाकर वो अपनी राजनीति कर सकें? क्या अपनी छवि बनाने के लिए वो नेहरू के मोहताज हैं? या कि उनको राहुल-सोनिया और कांग्रेस की आलोचना के लिए नेहरू के सिवा कोई मुद्दा नहीं मिलता? ये हम नहीं कह रहे. खुद मोदी जी के बयान उनकी चुगली कर दे रहे हैं.


लल्लनटॉप की टीम गुजरात में है. वहां से लगातार चुनाव की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रही है. इससे जुड़ी बाकी खबरें भी पढ़ें: 

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