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दिल्ली की 67 सीटों पर जमानत नहीं बची, इतनी बुरी हार के बाद भी कांग्रेस को हासिल क्या हुआ?

Delhi Assembly Election 2025: दिल्ली में Congress लगातार तीसरी बार ‘शून्य पर सवार’ है. 70 में से 67 सीटों पर Congress उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. हाल ये है कि महज एक सीट पर उसका उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहा, और ये इस चुनाव का उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन है. तो फिर इस चुनाव में कांग्रेस का हासिल क्या है?

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8 फ़रवरी 2025 (अपडेटेड: 8 फ़रवरी 2025, 10:42 PM IST)
Delhi Election
दिल्ली की ज्यादातर सीटों पर कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही. (India Today)
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शीला दीक्षित की सरपरस्ती में लगातार 15 साल तक कांग्रेस देश की राजधानी दिल्ली की सत्ता पर काबिज रही. लेकिन, आज चुनाव नतीजों के दिन इस पार्टी की चर्चा तक नहीं है. गाहे बगाहे कांग्रेस की बात भी हो रही है तो नतीजे देखकर तंज कसे जा रहे हैं, हंसी उड़ाई जा रही है. कांग्रेस प्रवक्ताओं से सवाल ही नहीं पूछे जा रहे. कोई पूछे भी तो वो जवाब दे पाने की स्थिति में नहीं हैं. लगातार तीन बार दिल्ली चुनाव जीतने वाली कांग्रेस लगातार तीसरी बार ‘शून्य पर सवार’ है. पहले एक नज़र दिल्ली चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन पर डाल लेते हैं-

- चुनाव में इस बार भी कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली है. इससे पहले 2015 और 2020 में भी कांग्रेस को सभी सीटों पर हार मिली थी.
- इस बार दिल्ली चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 6.36 प्रतिशत वोट मिले.
- 70 में से 67 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई.
- दिल्ली की सिर्फ एक सीट पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही. कस्तूरबा नगर सीट पर कांग्रेस के अभिषेक दत्त दूसरे नंबर रहे.
- लगभग सभी सीटों पर कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही. कुछ सीटें ऐसी हैं, जहां पार्टी चौथे स्थान पर खिसक गई.

यानी इस बार भी कांग्रेस दिल्ली का चुनाव लड़ रही है, लेकिन मतदाताओं को इस बात का जैसे पता ही नहीं चला. चुनाव प्रचार में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से लेकर पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी मैदान में उतरे, लेकिन वोटरों को अपनी तरफ खींच नहीं पाए. देश की सबसे पुरानी पार्टी का दिल्ली में ठीक-ठाक संगठन होने के बाद भी एक सीट तक नहीं जीत पाई. तो सवाल है कि इतनी बुरी हार में कांग्रेस को हासिल क्या हुआ.

सब सीटें हारने वाली कांग्रेस को दिल्ली में क्या मिला?

- खुश होने के लिए कांग्रेस अपने वोट प्रतिशत की बढोत्तरी देख सकती है. पिछले चुनाव में पार्टी को 4 प्रतिशत वोट मिले थे जो इस बार बढ़कर 6.36 प्रतिशत रहा. यानी 2 प्रतिशत से ज्यादा वोट प्रतिशत तो बढ़ा है. दूसरी तरफ बीजेपी को साढ़े 45 प्रतिशत वोट मिले और AAP को साढ़े 43 प्रतिशत वोट मिले. अब कांग्रेस को अपने मत प्रतिशत पर खुश होना है या दुखी यह उसके नेता ही तय करें.

- 2013 में कांग्रेस को हराकर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता हासिल की थी. लेकिन आज AAP दिल्ली हार चुकी है. वैसे तो चुनाव बीजेपी ने जीता है. लेकिन केजरीवाल की पार्टी की हार के पीछे कांग्रेस का भी एक योगदान माना जा रहा है. दिल्ली की 12 सीटें ऐसी हैं, जहां AAP की हार के अंतर के बराबर या उससे ज्यादा वोट कांग्रेस को मिले हैं. नई दिल्ली, छतरपुर, जंगपुरा, बादली, त्रिलोकपुरी, ग्रेटर कैलाश, नांगलोई, तिमारपुर, मालवीय नगर, राजेंद्र नगर, संगम विहार और दिल्ली कैंट, ये 12 सीटें ऐसी हैं जहां बीजेपी ने जीत दर्ज की और जीत का अंतर कांग्रेस के वोटों के बराबर या कम रहा. कांग्रेस के लिए यह उपलब्धि है या पतन यह कांग्रेस कार्यकर्ता जानें.

- दिल्ली में कांग्रेस की इस दुर्गति के पीछे जो सबसे बड़ा हाथ है वो है अरविंद केजरीवाल का. 2013 में केजरीवाल ने नई दिल्ली सीट से सीटिंग सीएम शीला दीक्षित को हराया और खुद मुख्यमंत्री बने. इस चुनाव में शीला दीक्षित के बेटे और कांग्रेस उम्मीदवार संदीप दीक्षित नई दिल्ली सीट से उम्मीदवार थे. केजरीवाल चुनाव हार गए. बीजेपी के प्रवेश वर्मा ने उन्हें हराया. लेकिन केजरीवाल जितने वोटों से हारे लगभग उतने ही वोट संदीप दीक्षित को मिले. केजरीवाल प्रवेश वर्मा से 4,089 वोटों से हारे जबकि संदीप दीक्षित को 4,568 वोट मिले. दीक्षित भले तीसरे नंबर आए, लेकिन अपनी मां की हार का बदला जरूर ले लिया. यह उनके लिए खुशी का मौका है या गम का, यह तो वही बता सकते हैं.

- कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों ही अबतक इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं. लोकसभा चुनाव में दिल्ली, हरियाणा और गुजरात में दोनों पार्टियों ने साथ में चुनाव लड़ा. हालांकि, पंजाब में दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा. हरियाणा में आप ने बड़ी मुश्किल से एक सीट कांग्रेस से ली, लेकिन गुजरात में कांग्रेस को दो सीटें छोड़नी पड़ीं. बदले में आम आदमी पार्टी को दिल्ली में तीन सीटें कांग्रेस के लिए छोड़नी पड़ीं. लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी अपनी सीटें छोड़ने को तैयार नहीं हुई.

महज 12 साल पुरानी पार्टी जो अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर चुकी है, कांग्रेस से सीटों के लिए बार्गेनिंग करती है. क्योंकि दिल्ली को उसने अपना गढ़ बना लिया था और पंजाब दूसरा राज्य है, जहां उसकी सरकार है. लेकिन दिल्ली हारने के बाद केजरीवाल अब उस स्थिति में नहीं हैं, जहां वो कांग्रेस को अपनी शर्तें मानने पर मजबूर कर सकें. लेकिन इसका दूसरा पहलू ये है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के इस ईगो टसल ने दिल्ली में बीजेपी को 27 साल बाद वापस काबिज कर दिया है. 

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