पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अभी लगेगी और आग, 11 रुपये तक और बढ़ सकती हैं कीमतें!
हाल ही में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कहा था कि कच्चे तेल की लागत में भारी वृद्धि के बावजूद ईंधन की कीमतों में वृद्धि नहीं की गई है. इस कारण सरकारी तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है

शुक्रवार 15 मई को सुबह -सुबह खबर आई कि पेट्रोल-डीजल 3 रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया है. दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 97.77 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई है. इसी तरह से दिल्ली में एक लीटर डीजल 90.67 रुपये का मिलेगा. इस बढ़ोतरी के बाद आम आदमी की जेब पर बोझ पड़ना तय है. फिर चाहें आप बाइक से दफ्तर जाते हैं या कार से. ऑटो-टैक्सी या बस वगैरा से सफर करते हों, दाम बढ़ने का असर जरूर पड़ेगा. आने वाले दिनों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का किराया भी बढ़ना तय है. इसके अलावा ट्रांसपोर्ट लागत और रोजमर्रा की जरूरत वाली चीजें भी महंगी होंगी. विशेषज्ञों का मानना है कि 3 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि मौजूदा हालात में बहुत कम है और इसमें कम से कम 11 रुपये की बढ़ोतरी की जा सकती है.
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हुए इस बढ़ोतरी का असर पूरे मंथली बजट पर पड़ेगा. कितना पड़ेगा इसका हिसाब-किताब तो आपको ही लगाना होगा. जानकारों का कहना है कि अभी पहला झटका भर है. आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के दाम और बढ़ जाएं तो कोई हैरानी वाली बात नहीं होगी. सरकार को पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने की नौबत फिर क्यों आ सकती है . इसे आगे समझेंगे. पहले ये समझते हैं कि अभी देश में पेट्रोल और डीजल के दाम तय करने का फॉर्मूला क्या है ? आपको अपनी गाड़ी की टंकी में पेट्रोल और डीजल डलवाने के लिए कितने तरह के टैक्स भरने होते हैं.
ये भी पढ़ें: आपने सोना खरीदना छोड़ा तो क्या होगा? PM मोदी की अपील का नफा-नुकसान समझिए
भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम तय कैसे होते हैं?पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी अक्सर सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं होता. इसकी कई वजहें हैं जैसे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत का बढ़ना, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और तेल कंपनियों की लागत वगैरा. भारत अपनी जरूरत का 85-89 परसेंट कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इस निर्भरता की वजह से जैसे ही इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल महंगा होता है भारत की तेल कंपनियों को विदेश से महंगा तेल खरीदना पड़ता है.
भारत ने साल 2017 में दुनिया के कई देशों की तरह 'डायनामिक डेली प्राइस मॉडल' को अपनाया गया है. इसके बाद से देश में पेट्रोल-डीजल के दाम रोजाना तय होते हैं. हालांकि , जरूरी नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के अनुसार रोजाना भारत में भी पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ें.
भारत में एक लीटर पेट्रोल या डीजल की कीमत सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से तय नहीं होती. सबसे पहले क्रूड ऑयल खरीदा जाता है. फिर उसकी रिफाइनिंग होती है, उसके बाद ट्रांसपोर्टेशन लागत जुड़ती है और डीलर कमीशन शामिल होता है.
बिजनेस स्टैंडर्ड की एक खबर के मुताबिक रिफाइनिंग खर्च, ट्रांसपोर्ट और बीमा जैसे खर्च आमतौर पर 3 से 5 रुपये प्रति लीटर तक पड़ते हैं. इन सभी लागतों को जोड़ने के बाद जो कीमत बनती है, उसे 'रिफाइनरी ट्रांसफर प्राइस ' कहते हैं. ये वह कीमत होती है जिस पर रिफाइनरी से तेल कंपनियां तैयार ईंधन को आगे डिस्ट्रीब्यूशन के लिए भेजती हैं. इसके बाद तेल मार्केटिंग कंपनियां अपना मार्जिन जोड़ती हैं. यह 2-3 रुपये प्रति लीटर के आसपास बनता है. लेकिन अंतिम कीमत में सबसे बड़ा फर्क टैक्स डालता है.
केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती है. राज्य भी वैट (वैल्यू एडेड टैक्स) लगाते हैं जो अलग-अलग राज्य में अलग-अलग हैं. इसके अलावा इसमें डीलरों को कमीशन दिया जाता है. अब जो कीमत बनती है वह कीमत ही ग्राहकों को चुकानी होती है. इस तरह कीमत में एक बड़ी हिस्सेदारी इन टैक्स की हो जाती है.
हालांकि, इसी साल मार्च के आखिर में कच्चे तेल की सप्लाई में दिक्कत आने पर केन्द्र सरकार ने तेल कंपनियों को बड़ी राहत दी थी. सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये घटाकर 3 रुपये कर दी थी जबकि डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को खत्म कर दिया गया था. रिपोर्ट बताती है कि आमतौर पर, कच्चे तेल की लागत, रिफाइनिंग और माल ढुलाई लागत पेट्रोल के रिटेल प्राइस का करीब 35-45 परसेंट होती है.
ये भी पढ़ें: न युद्ध रुक रहा और न रुपये की गिरावट, दोनों कितना रुलाएंगे?
मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट बताती है कि जुलाई 2025 में भारत में आयात होने वाले कच्चे तेल की कीमत करीब 71 डालर प्रति बैरल थी. मई में यह कीमत 114 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है. जुलाई 2025 में, भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत 70.95 डॉलर प्रति बैरल थी, जबकि पेट्रोल का डीलर मूल्य मात्र 52.09 रुपये प्रति लीटर था. उस समय, केंद्र सरकार कस्टम और एक्साइज के रूप में 22.88 रुपये प्रति लीटर, डीलर कमीशन के रूप में 4.40 रुपये और मूल्य वर्धित कर के रूप में 15.40 रुपये प्रति लीटर वसूल करती थी.
फिलहाल केंद्र सरकार पेट्रोल पर कोई कस्टम और एक्साइज नहीं वसूल रही है .टैक्स वगैरा के अलावा रुपये और डॉलर की विनिमय दर भी ईंधन की कीमतों पर असर डालती है. इसकी वजह ये है कि दुनिया में कच्चे तेल का लेनदेन डॉलर में होता है. रुपया कमजोर हुआ तो विदेश से तेल मंगाने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं.
टैक्स का हिस्सा इतना बड़ा क्यों होता है?हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर संजीत सिंह लल्लनटॉप से बातचीत में कहते हैं कि पेट्रोल-डीजल भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए सबसे भरोसेमंद राजस्व स्रोतों में से एक है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि तेल की खपत काफी ज्यादा है. इस वजह से टैक्स कलेक्शन लगातार होता रहता है. शराब की तरह पेट्रोल-डीजल अभी भी गुड्स एवं सर्विसेज टैक्स ( GST) के दायरे से बाहर हैं. इसलिए केंद्र और राज्य दोनों अपने हिसाब से टैक्स लगाकर बड़ी कमाई करते हैं.
उनका कहना है कि सरकारों के लिए यह इंफ्रास्ट्रक्चर, वेलफेयर स्कीम्स और बजट संतुलन का महत्वपूर्ण जरिया बन जाता है. यही कारण है कि टैक्स में बड़ी कटौती करना राजनीतिक रूप से लोकप्रिय जरूर हो सकता है, लेकिन आर्थिक रूप से सरकारों के लिए कठिन फैसला होता है.
ये भी पढ़ें: प्रॉपर्टी से मोटा पैसा बनाना चाहते हैं तो दिल्ली-मुंबई का मोह छोड़िए, मालामाल करने वाले शहर ये हैं
आगे राहत मिलेगी या बोझ बढ़ेगा?ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों से पता चलता है कि युद्ध बढ़ने से पहले फरवरी की शुरुआत में भारत को कच्चे तेल खरीदने की औसत कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी. मई में यह लागत बढ़कर 104.68 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई. भारत में हर दिन करीब 55-60 लाख बैरल कच्चा तेल इस्तेमाल होता है.
हाल ही में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कहा था कि कच्चे तेल की लागत में भारी वृद्धि के बावजूद ईंधन की कीमतों में वृद्धि नहीं की गई है. इस कारण सरकारी तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. अलग अलग अनुमानों के मुताबिक तेल कंपनियों जैसे कि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन , भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को पेट्रोल पर 14 रुपये प्रति लीटर और घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर 674 रुपये प्रति सिलेंडर का नुकसान हो रहा है. उन्होंने कहा था कि तेल कंपनियों ने पिछले 4 साल से पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ाए हैं.
पेट्रोलियम एवं गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने पिछले महीने कहा था कि युद्ध शुरू होने के बाद तेल की ऊंची कीमतों के कारण तेल कंपनियों को डीजल पर लगभग 100 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल पर लगभग 20 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हुआ.
इस तरह से देखें तो 15 मई को पेट्रोल और डीजल के दाम 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ने के बाद भी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां पूरी तरह अपनी लागत रिकवर नहीं कर पा रहीं . मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा स्तर पर तेल कंपनियों को पिछले साल जैसी फायदे वाली स्थिति में लौटने के लिए करीब 16% तक और कीमत बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है, हालांकि यह पूरा बोझ एक साथ डालना राजनीतिक रूप से मुश्किल है.
इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों का मानना है कि 3 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि "मामूली" है और इसमें कम से कम 11 रुपये की और इजाफा करने की जरूरत है. इन जानकारों का कहना है कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई वृद्धि को देखते हुए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 14-15 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि तर्कसंगत है. रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट प्रशांत वशिष्ठ ने कहा, "पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की मामूली वृद्धि से तेल मार्केटिंग कंपनियों को सीमित राहत मिली है."
वहीं, इंडिया टुडे की रिपोर्ट में हार्वर्ड से स्नातक और अमेरिका स्थित कंसल्टिंग फर्म ZS के पार्टनर विनीत के ने X पर शेयर एक पोस्ट के हवाले से लिखा कि विनीत मानते हैं कि 3 रुपये की बढ़ोतरी तो बस शुरुआत है. ईंधन की कीमतें समय के साथ कुल मिलाकर 20-25 रुपये तक बढ़ सकती हैं. तेल और गैस कंपनियां प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं, और इस नुकसान को लंबे समय तक सहन करना संभव नहीं होगा."
ये भी पढ़ें: आपको अपना गैस सिलेंडर छोड़ना पड़ सकता है, 'एक घर एक कनेक्शन' नियम समझ लें
महंगाई पर कितना असर पड़ सकता है?तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ वाहन मालिक तक सीमित नहीं रहता. डीजल महंगा होने से ट्रकों की आवाजाही की लागत बढ़ती है. इससे फल-सब्जी, राशन और अन्य जरूरी सामानों की ढुलाई महंगी हो सकती है. बस-टेपों जैसे आवागमन के साधनों का किराया भी बढ़ सकता है.
फाइनेंस एक्सपर्ट शरद कोहली लल्लनटॉप से कहते हैं कि ईंधन कीमतों में लगातार बढ़ोतरी महंगाई दर पर दबाव डालती है. इसकी वजह ये है कि सप्लाई चेन का लगभग हर हिस्सा ईंधन की कीमतों से प्रभावित होता है. उनका कहना है कि पेट्रोल और डीजल के दाम 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ने से कुछ हफ्तों बाद बाजार में कई चीजों की कीमतों पर दिख सकता है. 14 मई को अमूल और मदर डेयरी ने दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है.
वीडियो: 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' पर पलटे शी जिनपिंग, ट्रंप के सुर में मिलाए सुर?

