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युवराज की 358 रनों की इनिंग्स जिसके बारे में धोनी ने अपनी फ़िल्म में कहा था, "धागा खोल दिया!"

19 दिसंबर 1999. कूच बिहार ट्रॉफी. कीनन स्टेडियम, जमशेदपुर. जमशेदपुर यानी स्टील का शहर. जमशेदपुर यानी टाटा का शहर. जमशेदपुर, यानी धोनी का शहर. (ये मत कहियेगा कि रांची ही धोनी का शहर है. झारखंड में जाकर देखिये. हर गली, हर मोहल्ला, लोगों ने धोनी के नाम किया हुआ है.)

मगर ये किस्सा उस दिन का है जब झारखंड, बिहार हुआ करता था. धोनी, धोनी नहीं माही हुआ करता था. और माही, बिहारी डायलेक्ट में महिया हुआ करता था. बाल छोटे हुआ करते थे. और छोटे बालों वाला महिया बिहार अंडर-19 टीम में सेलेक्ट हुआ था. कूच बिहार ट्रॉफी का फाइनल मैच. ये वही किस्सा है जिसका ज़िक्र इंडियन क्रिकेट के सफलतम कप्तान और देश के क्रिकेट पर अपनी सबसे गहरी छाप छोड़ने वाले महिंदर सिंह धोनी की बायोपिक में सुशांत सिंह राजपूत करते हैं. वो कहते हैं, “युवराज मार मार के धागा खोल दिया.” महिंदर सिंह धोनी इसलिए, क्यूंकि महेंद्र में वो अपनापन नहीं है. क्यूंकि महेंद्र में शहरीपन है. जिससे खुद महिया कोसों दूर रहता है.

“डे 2 में हम आउट हो गए 84 रन पे. पूरा टीम आउट हो गया 357 रन पे. अब पंजाब बैटिंग करने आता है. उनका पहला विकेट गिरता है 60 पर. फिर बैटिंग करने आता है युवराज सिंह. डे 2 के एंड का स्कोर 108 पे 1. पूरे डे 3 में उनका सिर्फ एक्के विकेट गिरता है. डे 3 के एंड का स्कोर 431 पे 2. युवराज सिंह डबल सेंचुरी. बहुत मारा. धागा खोल दिया एकदम. लास्ट डे. डे 4. पंजाब का टोटल 839. युवराज का अकेले का स्कोर 358. बिहार के टोटल से एक रन ज़्यादा.”

कूच बिहार ट्रॉफी का फाइनल. बिहार की टीम पहले बैटिंग करने उतरी. 357 रन पर ऑल आउट. युवराज सिंह पंजाब की ओर से वन डाउन खेलने आया. तीसरे दिन 108 पर 1 विकेट से आगे खेलना शुरू किया तो रुका ही नहीं. अगले दिन खेल ख़तम होने पर स्कोर था 431 पर 2 विकेट. युवराज नॉट आउट 232 रन पर. पंजाब 73 रन आगे चल रहा था. 8 विकेट बचे हुए थे. चौथे दिन, यानी आखिरी दिन, युवराज सिंह ने सचमुच धागा खोल दिया.


क्रिकेट की गेंद में सीम को नोटिस कीजिये. चमड़े के दो या चार पीसेज़ को एक साथ बांधने की खातिर उसे धागे से सिला जाता है. यही सिलाई गेंद की सीम कहलाती है. और बिहार में गेंद को इतना मारना कि उसके धागे खुल कर गेंद फट पड़े, को धागा खोलना कहते हैं.


युवराज सिंह ने कुल 579 मिनट बैटिंग की. 404 गेंदें खेलीं. 40 चौके. 6 छक्के. तीसरे विकेट के लिए महाजन के साथ 524 गेंदों में 341 की पार्टनरशिप की. पहली पार्टनरशिप 207 रन की. मनीष शर्मा के साथ. और दूसरी ये, महाजन के साथ.

ऐसा नहीं है कि उस दिन सिर्फ युवराज सिंह ने ही मारा था. बिहार को एक-एक पंजाबी बल्लेबाज ने मारा था. महाजन ने उस दिन अपनी डबल सेंचुरी पूरी की. 204 नॉट आउट. 414 गेंदों में. 21 चौकों के साथ. 520 मिनट की कुल बैटिंग. महाजन ने धुप्पर के साथ 119 रन की पार्टनरशिप की. धुप्पर ने खुद 73 गेंद में 66 रन बनाये.

बिहार के बॉलर्स की उस दिन दुर्गति हुई थी. ऐसे फिगर्स थे जिन्हें रात का बुरा ख्वाब कहा जाना चाहिए. सतेंदर मिश्रा ने 218 रन दिए. 49 ओवर में. अजय यादव ने 81 ओवर में 289 रन दिए. दो विकेट लिए.

लेकिन कुछ भी हो, उस दिन ने युवराज सिंह को बहुत कुछ बना दिया. धोनी को अब भी कोई नहीं जान रहा था. ये बात शायद महिया के लिए ही अच्छी साबित हुई. उसके अन्दर का लोहा और भी गरम हो रहा था. और लोहा जितना ज़्यादा गरम हो, उसे मनमाने आकार में ढालना आसान हो जाता है. वो मनमाना आकार ही धोनी कहलाया. वो धोनी जिसने धागा खोला तो 2 अप्रैल 2011 की रात. गेंद कुलासेकरा के सर से ऊपर होती हुई वानखेडे के स्टैंड्स में गम हो गयी. युवराज सिंह आकर धोनी से चिपट गया. रांची में फिर किसी ने चिल्ला कर खबर की,

“धोनी ने मार दिया…धोनी ने मार दिया…”

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