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दुनिया की सबसे कुख्यात ग्वांतनामो जेल बंद होने वाली है?

राष्ट्रपति नंबर एक. बयान –

हम इसे खत्म करना चाहते हैं. ग्वांतनामो को लेकर बहुत विवाद हो रहा है. हम इसे खाली देखना चाहते हैं.

राष्ट्रपति नंबर दो. बयान –

मैं ग्वांतनामो को बंद कर दूंगा. मैं इसपर ताला लगाने के फ़ैसले से पीछे नहीं हटूंगा. ये हमारे मूल्यों के ख़िलाफ़ है.

राष्ट्रपति नंबर तीन. बयान –

मैं ग्वांतनामो बे के डिटेंशन सेंटर को बंद कर दूंगा. ये हमारे सरकार की प्राथमिकता है.

तीन राष्ट्रपति. तीन बयान. मकसद एक. क्या वे सफ़ल हो पाए?

पहले दो यानी जॉर्ज़ डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा आठ-आठ बरस तक सत्ता में रहे. लेकिन अपने कहे का मान नहीं रख पाए. तीसरे नंबर वाले हैं जोसेफ बाइडन. जनवरी 2021 में राष्ट्रपति बने. उन्होंने भी हू-ब-हू वही वादा दुहराया है. जब ओबामा पूरे जोश से ग्वांतनामो पर ताला लगाने की बात करते थे, बाइडन उनके डिप्टी हुआ करते थे. उन्होंने ओबामा के वादे का हश्र देखा है. क्या जो बाइडन उनसे आगे निकल पाएंगे?

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा, इस ग्वांतनामो बे की कहानी क्या है? इसका पूरा विवाद क्या है? अमेरिकी राष्ट्रपति इसे बंद करने का वादा करते हैं, लेकिन फ़ेल क्यों हो जाते हैं? और, आज हम आपको इसकी कहानी क्यों सुना रहे हैं? सब विस्तार से बताते हैं.

1890 के अंतिम दशक की बात है. उस वक़्त क्यूबा पर स्पेन का कब्ज़ा था. जैसे ही स्पेन कमज़ोर पड़ा, लोगों ने विदेशी शासन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. क्यूबा से अमेरिकी जनता के भी हित जुड़े थे. उन्होंने उनकी सुरक्षा के लिए सरकार से गुज़ारिश की. तब अमेरिका ने अपने समुद्री युद्धपोत ‘यूएसएस मेन’ को हवाना की तरफ रवाना किया. इस जहाज में युद्ध का सारा साजो-सामान रखा था. लेकिन सैनिकों को सीधे युद्ध में कूदने की मनाही की गई थी. जहाज क्यूबा की आज़ादी की लड़ाई का मूकदर्शक था.

Uss Maine
यूएसएस मेन में धमाके में 260 लोगों की मौत हो गई थी. (तस्वीर: loc.gov)

फिर आई 15 फ़रवरी, 1898 की तारीख

इस दिन यूएसएस मेन में एक जोरदार धमाका हुआ. हवाना हार्बर के पास जहाज समंदर में डूब गया. इसमें 260 क्रू मेंबर्स की मौत हो गई. धमाके की असली वजह पता नहीं चल थी. लेकिन अमेरिकी अख़बारों ने दावा किया कि हमले के पीछे स्पेन का हाथ है. इस दावे के एवज में कोई सबूत नहीं दिया गया. वो ‘येलो जर्नलिज़्म’ का शुरुआती दौर था. इसका मतलब होता है, बिक्री बढ़ाने के लिए लोगों को उकसाने या लुभाने वाली ख़बरें छापना. भले ही ख़बरें असत्य हों.

यही हुआ भी. अमेरिका में स्पेन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन होने लगे. मांग की गई कि अमेरिका सीधी लड़ाई में शामिल हो. दबाव काम कर गया. अप्रैल 1898 में अमेरिका, क्यूबाई विद्रोहियों के साथ खड़ा हो गया. स्पेन के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू हो गई. दिसंबर आते-आते स्पेन पस्त हो गया. उसने क्यूबा को अमेरिका के हवाले कर दिया.

तीन साल बाद क्यूबा को आज़ादी मिल गई. अमेरिका ने क्यूबा की संप्रभुता मान ली. 1903 में दोनों देशों के बीच एक संधि हुई. क्यूबा अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था. उसे सुरक्षा के क्षेत्र में मदद की दरकार थी. इसी वजह से उसने अमेरिका को अपनी ज़मीन पर एक नौसेनिक अड्डा बनाने की इजाज़त दे दी. ये ज़मीन क्यूबा के दक्षिण-पूर्व में स्थित थी. ग्वांतनामो बे. ग्वांतनामो का मतलब होता है, ‘नदियों के बीच की धरती’.

Cuba Map
लाल घेरे में क्यूबा. (गूगल मैप्स)

ग्वांतनामो बे: क्यूबा के सीने में धंसा खंज़र!

क्यूबा ने 19 हज़ार 621 एकड़ की ये ज़मीन लीज़ पर दी थी. उस वक़्त अमेरिका किराए के तौर पर लगभग डेढ़ लाख रुपये की रकम देता था. अब लगभग तीन लाख रुपये सालाना देता है. लेकिन क्यूबा इसे स्वीकार नहीं करता है. क्यों? 1960 में क्यूबा में क्रांति हुई. बटिस्टा सरकार को हटाकर फिदेल कास्त्रो सत्ता में आए. कास्त्रो कम्युनिस्ट थे. अमेरिका से उनकी नहीं पटती थी. उन्होंने अमेरिका को ग्वांतनामो से निकलने की धमकी दी. अमेरिका ने साफ़ मना कर दिया. गुस्से में कास्त्रो ने नेवल बेस पर पानी की सप्लाई बंद करवा दी. तब अमेरिका ने वहां अपना पानी और बिजली का प्लांट शुरू कर दिया. लीज़ बरकरार रही. फ़िदेल कास्त्रो ग्वांतनामो बे को ‘क्यूबा के सीने में धंसा खंज़र’ कहते थे.

कास्त्रो निकालने की कोशिश करते रहे गए. लेकिन ग्वांतनामो बे का नौसेनिक अड्डा बरकरार रहा. समय के साथ-साथ ये ख़बरों से ओझल हो गया. अमेरिका इस बेस का इस्तेमाल नौसेनिक अभ्यासों और नए रंगरूटों को ट्रेनिंग देने के लिए करने लगा.

Fidel Castro
फ़िदेल कास्त्रो ग्वांतनामो बे को ‘क्यूबा के सीने में धंसा खंज़र’ कहते थे. (तस्वीर: एएफपी)

इस रूटीन में खलल तब पड़ा, जब 11 सितंबर, 2001 की तारीख़ आई. उस दिन अमेरिका पर हमला हुआ था. आतंकी संगठन अल-क़ायदा ने यात्री विमानों को हाईजैक कर तबाही मचाई थी. इस हमले में लगभग तीन हज़ार लोग मारे गए थे. ये दुनियाभर के इतिहास में हुआ सबसे खतरनाक आतंकी हमला था.

इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था. अमेरिका जैसी महाशक्ति के लिए ये एक बड़ा झटका था. उस वक़्त राष्ट्रपति थे जॉर्ज डब्लयू बुश. उन्होंने ऐलान किया कि हमले के दोषियों को उनके घर में घुसकर मारा जाएगा. इस ऐलान के साथ शुरू हुआ, ‘द वॉर ऑन टेरर’. अमेरिका के नेतृत्व में विदेशी सेनाओं ने अफ़ग़ानिस्तान में मोर्चा खोल दिया.

Sep 11 Attacks
11 सितंबर, 2001 को हुए हमले में लगभग तीन हज़ार लोग मारे गए थे. (तस्वीर: एएफपी)

ऐसी जगह जहां अमेरिका के कानून लागू नहीं हो?

वॉर ऑन टेरर के दौरान संदिग्धों की गिरफ़्तारी भी हो रही थी. सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में. 9/11 हमले से जुड़े हर व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने की तैयारी थी. ताकि आगे किसी हमले की आशंका को खत्म किया जा सके. आतंकी घटनाओं पर लगाम लगाई जा सके.

गिरफ़्तारी हो रहे लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा थी. शुरुआत में उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में बेस पर ही रखा गया. लेकिन ये ठिकाना अस्थायी था. वहां पूछताछ के लायक पर्याप्त सुविधाएं भी नहीं थी. ऐसे में नई जगह की तलाश शुरू हुई.

जांचकर्ता ऐसी जगह तलाश रहे थे, जो न सिर्फ़ सुरक्षित और आम लोगों की पहुंच, बल्कि कानूनी बाधाओं से भी परे हो. कई विकल्पों पर विचार के बाद ग्वांतनामो बे के नाम पर मुहर लगा दी गई. ये जगह अमेरिकी धरती पर नहीं थी. इसलिए यहां अमेरिका के कानून लागू नहीं होते. मतलब, क़ैदियों को भी किसी तरह के लीगल रिप्रजेंटेशन का अधिकार नहीं. वे अमेरिकी सरकार की मर्ज़ी के ग़ुलाम थे. ग्वांतनामो बे में डिटेन्शन सेंटर बनाने के लिए पर्याप्त इंफ़्रास्ट्रक्चर भी था. और, सिक्योरिटी के मामले में इसका कोई सानी नहीं था. ये कुछ-कुछ आउटर स्पेस जैसी जगह थी. दुनियावी नियमों से अलग-थलग.

George Bush
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश. (तस्वीर: एएफपी)

जनवरी 2002 से ग्वांतनामो बे डिटेंशन कैंप शुरू हो गया

यहां सबसे खतरनाक संदिग्ध आतंकियों को क़ैद रखा गया. इन्वेस्टिगेटर्स पूछताछ के लिए अंतहीन टॉर्चर का सहारा लेते थे. कई बार ये अमानवीय भी हो जाता था. जब अंदर की ख़बर प्रेस में छपी, हंगामा मच गया. मानवाधिकार संगठनों ने अमेरिकी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. अमेरिका ने टॉर्चर को जायज ठहराया. उसने कहा कि कई मामलों में फायदा भी हुआ है. मसलन, टॉर्चर की ही वजह से ख़ालिद शेख़ मोहम्मद ने अल-क़ायदा के आगे का प्लान बताया. ख़ालिद शेख़ मोहम्मद 9/11 के हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता है.

हालांकि, ग्वांतनामो बे में कई ऐसे भी क़ैदी बंद थे, जिनपर कोई चार्ज़ नहीं था. उन्हें बस शक के आधार पर उठाया गया था. ऐसे लोगों को कानूनी सहायता भी नहीं मिल रही थी. उन्हें अमानवीय यातना अलग से झेलनी पड़ रही थी. ‘अमानवीय’ कहने की वजह क्या है? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जांचकर्ताओं ने क़ैदियों को टॉर्चर करने के अजीबोग़रीब तरीके ईजाद किए थे. मसलन, यौन अंगों को सिगरेट से जलाना. नंगा करके पानी भरे फर्श पर छोड़ देना. एक पैर में रस्सी बांधकर छत से लटका देना आदि-आदि. किसी भी सभ्य समाज में इस किस्म की बर्बरता स्वीकार नहीं की जा सकती.

इन्हीं सब कारणों से ग्वांतनामो बे का शुमार दुनिया की सबसे बदनाम जेलों में होने लगा. आलोचनाएं बढ़ीं तो बुश ने इस जेल को बंद करने पर विचार शुरू किया. लेकिन उस वक़्त के वाइस-प्रेसिडेंट डिक चेनी और चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ डेविड एस़ एडिंगटन ने इसका विरोध किया. उनका कहना था कि इस फ़ैसले से ऐसा लगेगा कि अमेरिका आतंकवादियों के साथ समझौता कर रहा है. ये आपकी छवि को कमज़ोर बना देगा. उस समय बुश का कार्यकाल अंतिम दौर में पहुंच चुका था. उन्होंने अपने विचार को डिलीट कर दिया.

Guantanamo Bay Detention Camp
ग्वांतनामो बे दुनिया की सबसे बदनाम जेलों में शुमार है. (तस्वीर: एपी)

हालांकि, तब तक ग्वांतनामो बे में क़ैदियों की संख्या 500 के क़रीब आ चुकी थी. पीक पर एक समय में इस जेल में 779 क़ैदी थे.

बुश के बाद बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने. उन्होंने अपनी इलेक्शन रैलियों में ही ऐलान किया था कि वो ग्वांतनामो बे की जेल बंद कर देंगे. राष्ट्रपति बनने के दो दिन बाद ही उन्होंने इसपर दस्तख़त भी कर दिए. एक साल की डेडलाइन तय की गई. ओबामा ने कहा था कि अगर संसद उनके प्रस्ताव पर राज़ी नहीं हुई तो वो अपने वीटो पॉवर का इस्तेमाल करेंगे.

न तो डेडलाइन का पालन हुआ और न ही वीटो पॉवर का यूज हुआ. संसद में उनके प्रस्ताव का ज़बरदस्त विरोध हुआ. बराक ओबामा कुर्सी से जाते-जाते एक चिट्ठी छोड़कर गए. उन्होंने अपना वादा पूरा न कर पाने के लिए ‘गंदी राजनीति’ को ज़िम्मेदार बताया. उन्होंने ये भी लिखा कि इतिहास उनका कठोर मूल्यांकन करेगा. हालांकि, ओबामा ने ग्वांतनामो बे में बंद क़ैदियों की संख्या को 41 तक लाने में कामयाब रहे थे. बाकियों को दूसरी जेलों में शिफ़्ट कर दिया गया था या जेल से रिहा कर दिया गया.

Barack Obama
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा. (तस्वीर: एपी)

फिर डोनाल्ड ट्रंप की सरकार आई

ट्रंप ने ओबामा के फ़ैसले को पलट दिया. उन्होंने कहा कि ग्वांतनामो बे कभी बंद नहीं होगा. ट्रंप ने ये भी दावा किया कि इस जेल में और संदिग्ध अपराधियों को रखा जाएगा. मतलब, ग्वांतनामो बे डिटेन्शन कैंप को रिवाइव किया जाएगा. ट्रंप के कार्यकाल में ऐसा कुछ नहीं हुआ. बस एक और क़ैदी को सऊदी अरब प्रत्यर्पित किया गया. बच गए 40.

Donald Trump
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप. (तस्वीर: एपी)

हम ग्वांतनामो बे की कहानी क्यों सुना रहे हैं?

दरअसल, इस जेल में बंद तीन और क़ैदियों को रिहा करने का नोटिस आया है. इसमें एक नाम पाकिस्तान के सैफ़ुल्लाह प्राचा का है. सैफ़ुल्लाह ग्वांतनामो में बंद सबसे उम्रदराज़ क़ैदी हैं. उनकी उम्र 73 साल है. गिरफ़्तारी से पहले तक पाकिस्तान में उनका अच्छा-खासा बिजनेस था. वो ख़ुद न्यू यॉर्क में रहा करते थे.

उन्हें 2003 में थाईलैंड में अरेस्ट किया गया था. अल-क़ायदा को मदद पहुंचाने के संदेह में. सैफ़ुल्लाह आरोपों से इनकार करते रहे हैं. उनके ऊपर कभी कोई क्रिमिनल चार्ज़ नहीं लगा. उनके वकील ने बताया कि रिव्यू बोर्ड ने माना कि सैफ़ुल्लाह अब अमेरिका के लिए खतरा नहीं हैं. इसलिए उन्हें जेल से छोड़ा जा सकता है. बिना किसी केस के 16 सालों तक सबसे बदनाम जेल में बंद रहे सैफ़ुल्लाह प्राचा के लिए अपने वतन लौटने का रास्ता खुल गया है.

हालांकि, ये उतना भी आसान नहीं है. अभी अमेरिका और पाकिस्तान के बीच समझौता होगा. पाकिस्तान अगर तैयार होता है तो प्राचा अपने घर लौट पाएंगे. इसमें कितना वक़्त लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.

Saifullah Paracha
सैफ़ुल्लाह प्राचा को 2003 में थाईलैंड में अरेस्ट किया गया था. (तस्वीर: गेटी इमेजेज)

इस ख़बर से एक बात तो साफ़ है कि जो बाइडन अपने वादे को लेकर सजग हैं. वो ग्वांतनामो बे की जेल को पूरी तरह खाली करना चाहते हैं. उन्होंने इसकी शुरुआत भी कर दी है. लेकिन अभी बाधाएं और भी हैं. क्या? ग्वांतनामो बे में कई क़ैदी यमन के हैं. एक की रिहाई दस साल पहले हो गई थी. लेकिन सिविल वॉर की वजह से वहां की सरकार से समझौता नहीं हो सका. इसलिए, वो अभी भी ग्वांतनामो बे में ही है. इसके अलावा बाइडन को संसद में रिपब्लिकन पार्टी का सामना भी करना पड़ेगा. जनता का एक बड़ा धड़ा संदिग्ध आतंकियों को अमानवीय टॉर्चर देने के पक्ष में है. बाइडन को उनसे भी निपटना होगा.

ये देखने वाली बात होगी कि, क्या जो बाइडन ग्वांतनामो बे डिटेन्शन कैंप को लेकर किए गए अपने वादे पर खरा उतर पाते हैं या नहीं?


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