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अब भारत ने भी चीन की कमज़ोर नस दबाई

ये बात है 1948 की. चीन में गृह युद्ध छिड़ा था. एक लड़ाई में एक तरफ था साम्यवाद. दूसरी तरफ़ था पूंजीवाद. पूंजीवादी धड़े के नेता थे च्यांग काई-शेक. रिपब्लिक ऑफ चाइना के मुखिया. चीन की राष्ट्रवादी क्यूमिनतांग सरकार के प्रमुख. दूसरी तरफ थे माओ त्से-तुंग और उनकी सेना. इस वक़्त तक आते-आते माओ की सेना ने चीन के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया. च्यांग काई-शेक और उनके समर्थक समझ चुके थे कि अब जीतने का कोई चांस नहीं है. सवाल था, अब क्या करें? कई विकल्पों पर विचार हुआ. मसलन ये कि कदम पीछे करके पश्चिमी चीन चले जाएं.

जाएं तो जाएं कहां?
मगर कई अधिकारी इस विकल्प से सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि माओ की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) जल्द ही वहां भी बढ़ आएगी. ऐसे में भाग जाने के लिए चुना गया एक द्वीप. राजधानी पेइचिंग से करीब 1800 किलोमीटर दूर बसी एक जगह. जिसपर कभी चीन के चिंग साम्राज्य का कब्ज़ा था. मगर 1895 में पहला चीन-जापान युद्ध हारने के बाद उन्हें वो द्वीप जापान के सुपुर्द करना पड़ा. 1895 से 1945 तक ये द्वीप जापान के पास ही रहा. दूसरे विश्व युद्ध में हार के बाद अगस्त 1945 में जब जापान ने सरेंडर किया, तब ये द्वीप वापस चीन को मिल गया.

Chiang Kai Shek And Mao Zedong
च्यांग काई-शेक और माओ त्से-तुंग (फोटो: एएफपी)

अकेले-अकेले थोड़े न जाएंगे, सब उठाकर ले जाएंगे
जगह फाइनल हो गई. अब वहां अपना सारा साजो-सामान पहुंचाना था. अगस्त 1948 में च्यांग काई-शेक और उनकी क्योमिनतांग पार्टी, यानी KMT ने अपने जहाज़ों को मूवर्स-ऐंड-पैकर्स बना दिया. नए ठिकाने पर बस दौलत, हथियार और अनाज़ ही नहीं ले जाना था. च्यांग की सरकार अपने सारे संस्थानों को भी रिलोकेट कर रही थी. कारखाने. मिलिटरी अस्पताल. शैक्षणिक संस्थान. प्रशिक्षण संस्थान. रेडियो स्टेशन. मशीनें. नाव. कार. लकड़ी. कपड़े. म्यूज़ियम. लाइब्रेरी. यहां तक कि पूरा एयरफोर्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी भी शिफ़्ट किया गया. करीब 16 महीने तक जहाज़ सामान भरकर पहुंचाते रहे. रोज़ान 50 से 60 विमानों की यही ड्यूटी रहती. पानी के जहाज़ अलग. 9 दिसंबर, 1949 को शिफ़्टिंग की ये प्रक्रिया पूरी हुई. करीब पांच लाख सैनिक और पांच लाख नागरिक भी नए ठिकाने पर भेज दिए गए. 10 दिसंबर, 1949 को अपने बेटे के साथ दोपहर का खाना खाकर सबसे आख़िर में निकले च्यांग काई-शेक. जिनके मुताबिक, उनके साथ-साथ अब चीन की वैध सरकार भी उस नए द्वीप पर शिफ़्ट हो रही थी.

पर ये द्वीप था कौन सा?
10 दिसंबर, 1949 को अमेरिका के लॉस एंजिलिस टाइम्स में न्यूज़ एजेंसी AP के हवाले से ख़बर छपी. इसमें लिखा था- आज च्यांग काई-शेक विमान में बैठकर मेनलैंड चाइना से फोरमोसा पहुंचे. फोरमोसा? ये कौन सी जगह है? ये जगह है ताइवान. जिसका एक पुराना नाम फोरमोसा भी है. फोरमोसा असल में पुर्तगाली भाषा का शब्द है. इसका मतलब होता है, ख़ूबसूरत द्वीप. कहते हैं कि समंदर में जा रहे पुर्तगाली जहाज़ियों को पूर्वी चाइना सी के पास से गुज़रते हुए ये द्वीप दिखा था. इसकी ख़ूबसूरती को नवाज़ने के लिए उन्होंने इसका नाम फोरमोसा रख दिया. शिमोनोसेइकी संधि में जापान के हाथ जाने से पहले कुछ दिनों तक इसका आधिकारिक नाम ‘रिपब्लिक ऑफ फोरमोसा’ रहा था.

Taiwan
ताइवान. जिसका एक पुराना नाम फोरमोसा भी है. (फोटो: गूगल मैप्स)

ये भी चीन. वो भी चीन
अब ताइवान का आधिकारिक नाम है- रिपब्लिक ऑफ चाइना. जो मेनलैंड चीन है, वो ख़ुद को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना कहता है. आगे कई बार इनका ज़िक्र आएगा, इसीलिए ये दोनों नाम अच्छी तरह याद कर लीजिए. रिपब्लिक ऑफ चाइना, माने ताइवान. पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, माने जिसको हम चीन कहते हैं.

च्यांग काई-शेक और उनकी KMT ये मानती थी कि वो चीन के वैध प्रतिनिधि हैं. वो कहते थे कि एक दिन समूचा चीन एक हो जाएगा. मगर माओ का कहना था कि रिपब्लिक ऑफ चाइना असल में पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का ही हिस्सा है. ये भी यूनिफ़िकेशन को अपना मकसद बताते थे.

…फिर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना जीत गया
शुरुआत में ब्रिटेन और अमेरिका, दोनों च्यांग काई-शेक को चीन का लेजिटिमेट लीडर मानते थे. इन्होंने माओ के चीन को मान्यता नहीं दी. 1945 में जब UN बना, तब मेनलैंड चीन रिपब्लिक ऑफ चाइना हुआ करता था. वो UN के शुरुआती सदस्यों में था. आगे भी उसकी सदस्यता बनी रही. मगर 25 अक्टूबर, 1971 को UN ने ताइवान को निकालकर कम्यूनिस्ट चीन को अपना लिया. 70 के दशक में आकर अमेरिका को भी लगा. कि अगर कम्यूनिस्ट चीन के साथ अच्छे संबंध हों, तो सोवियत के साथ चल रहे कोल्ड वॉर में फ़ायदा हो सकता है. ऐसे में दिसंबर 1978 में अमेरिका ने भी कम्यूनिस्ट चीन को मान्यता दे दी.

Who And Taiwan
वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन और ताइवान (फोटो: डब्ल्यूएचओ | गूगल मैप्स)

क्या है वन-चाइना पॉलिसी?
ये मान्यताएं. ये रिकगनिशन. ये चीन की वन-चाइना पॉलिसी पर मुहर थी. क्या है ये पॉलिसी? चीन कहता है कि उसके देश की केवल एक ही सरकार है. वो है, पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना. चीन कहता है कि अगर आपको उससे रिश्ता रखना है, तो आपको ताइवान से आधिकारिक रिश्ते तोड़ने होंगे. मगर क्या इस वन-चाइना पॉलिसी का मतलब ये है कि 2 करोड़ 30 लाख की आबादी की इच्छाएं कुचल दी जाएं? क्या वन-चाइना पॉलिसी का मतलब ये है कि चीन के दबाव में WHO जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ताइवान को ख़ुद से दूर रखें? कोरोना काल में ये सवाल बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है. कैसे, बताते हैं.

ताइवान ने WHO को आगाह करने की कोशिश की, मगर…
ये दिसंबर की बात है. चीन के वुहान शहर से एक रहस्यमय न्यूमोनिया फैलने की ख़बरें आ रही थीं. तब किसी को भनक भी नहीं थी कि कुछ दिनों में ये बीमारी वैश्विक महामारी बनने वाली है. मगर ताइवान को इल्म था. 2003 में चीन से शुरू हुई सार्स बीमारी उसके यहां भी पहुंची थी. 346 लोग बीमार पड़े थे और 73 की जान गई. उसी समय ताइवान ने ऐसी महामारियों से निपटने के लिए अपने यहां एक विस्तृत सिस्टम बनाना शुरू कर दिया.

फिर जब वुहान से बीमारी की ख़बरें आईं, तो ताइवान भांप गया कि ये संक्रामक रोग है. उसने 31 दिसंबर में ही WHO को सावधान करने की कोशिश की. मेल भेजकर बताया कि उसके पास इस बीमारी के संक्रामक होने से जुड़ी ठोस जानकारी है. मगर WHO ने उसकी नहीं सुनी. मेल का जवाब तक नहीं दिया WHO ने. WHO बस चीन के दावों को दोहराता रहा. अगर WHO ने ताइवान की बात सुनी होती, बाकी देशों को सावधान किया होता, तो कोरोना इतनी बड़ी महामारी बनता ही नहीं.

ताइवान की तैयारियां
ताइवान अपनी तैयारी करता रहा. 20 जनवरी को ताइवान ने एक सेंट्रल एपिडेमिक कमांड सेंटर बनाया. इसमें मेडिकल और जन स्वास्थ्य विभाग के जानकार थे. इसकी अध्यक्षता का जिम्मा सौंपा गया ताइवान के उपराष्ट्रपति डॉक्टर चेन चिये-जेन को. जो कि ख़ुद भी एक महामारी विशेषज्ञ हैं. 22 जनवरी को ताइवान ने वुहान के लिए विमान सेवा बंद कर दी. उसने अपने नागरिकों को वुहान न जाने की हिदायत दी. चीन के करीब 24 शहरों के लिए ताइवान से विमान सेवा चलती है. 10 फरवरी से ताइवान ने इनमें से ज़्यादातर विमान सेवाएं रोक दीं.

Taiwan Coronavirus
जब वुहान से बीमारी की ख़बरें आईं, तो ताइवान भांप गया. (फोटो: एएफपी)

बीमारियों-महामारियों से जुड़ी रिसर्च का सिस्टम यहां बहुत अच्छा है. इसका नतीजा ये हुआ कि जनवरी से ही ताइवान अपने यहां लोगों की कोरोना जांच करने लगा. शुरुआत में केवल कोरोना ग्रस्त इलाकों से आने वालों और बीमारी के लक्षण वाले लोगों की जांच की गई. मगर फिर जल्द ही फ्लू के लक्षण वाले सारे लोगों की जांच होने लगी. लगातार जांच का दायरा बढ़ाती गई सरकार. हर दिन नागरिकों को अपडेट दे रही थी ताइवान सरकार. सबकुछ बहुत पारदर्शी तरीके से हो रहा था.

लोगों ने भी सरकार का साथ दिया
सरकार को इल्म था कि आने वाले दिनों में PPE किट की काफी ज़रूरत पड़ेगी. सो जनवरी से ही मास्क वगैरह का उत्पादन बहुत तेज़ कर दिया गया. ताइवान का अडवांस टेक्निकनल सिस्टम कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग में काफी काम आया. एक बड़ी भूमिका नागरिकों की भी रही. महामारियों का अनुभव होने की वजह से लोगों में पब्लिक हेल्थ को लेकर काफी जागरूकता है. कोरोना की ख़बर फैलने के बाद लोग ख़ुद से ही मास्क लगाने लगे. सार्वजनिक जगहों पर लोग सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन कर रहे थे. हाथ धोने, सेनिटाइज़ करने की सुविधा हर जगह उपलब्ध थी.

ताइवान की कामयाबी
इन सबका नतीजा इतना शानदार रहा कि ताइवान में अब तक केवल 7 लोगों की मौत हुई है कोरोना से. 14 मार्च से अब तक का डेटा खंगाल लिया उसका हमने, मगर एक दिन ऐसा नहीं मिला जब नए केस की संख्या 30 भी पहुंची हो. उससे पहले भी संख्या ज़्यादा नहीं रही. 15 फरवरी से 14 मार्च के बीच उसके यहां केवल 32 संक्रमित व्यक्ति मिले थे. 7 अप्रैल को ताइवान में कोरोना के ऐक्टिव केस का ग्राफ सबसे ऊपर गया. पता है, इस दिन तक कितने संक्रमित लोग थे वहां? मात्र 310. 14 मई को उसके यहां केवल 53 संक्रमित मरीज़ बचे हैं.

अपनी ही नहीं, दूसरों की भी मदद कर रहा है ताइवान
ताइवान ने ये सब बिना WHO की मदद के हासिल किया. बल्कि वो तो दूसरों की मदद कर रहा है. चीन के बाद मास्क का सबसे ज़्यादा उत्पादन ताइवान ही कर रहा है. ताइवान सरकार के मुताबिक, वहां हर दिन पौने दो करोड़ मास्क बनाए जा रहे हैं. ताइवान हर हफ़्ते करीब एक लाख सर्जिकल मास्क की मदद भेज रहा है अमेरिका. यानी, महीने के चार लाख सर्जिकल मास्क. इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, नीदलैंड्स, स्पेन इन सारे देशों को उसने मेडिकल सप्लाई भेजी है. इनके अलावा दुनिया के गरीब देशों को भी लाखों मास्क भेजे हैं उसने. भारत में स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मास्क की कमी थी. ताइवान हमारी मदद के लिए आगे आया. उसने दस लाख मास्क डोनेट किए भारत को.

Taiwan Mask Production
ताइवान ने भारत को दस लाख मास्क डोनेट किए. (फोटो: एएफपी)

WHO से बाहर क्यों है ताइवान?
मगर फिर भी ताइवान को जगह नहीं मिल रही WHO में. ये सब चीन के दबाव में हो रहा है. WHO जैसी ग्लोबल संस्थाएं देश के हिसाब से सदस्यता देती हैं. एक देश, यानी एक सदस्य. पेइचिंग की कम्यूनिस्ट सरकार कहती है कि वो ही चीन की वैध जनप्रतिनिधि है. चूंकि चीन के मुताबिक ताइवान उसका ही एक हिस्सा है, ऐसे में चीन कहता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ताइवान को सदस्यता नहीं दे सकती हैं. 18 और 19 मई को WHO की वर्ल्ड हेल्थ असेंबली है. ये WHO का सालाना सम्मेलन है. इस मीटिंग में विश्व स्वास्थ्य नीति से जुड़े कई अहम फैसले लिए जाते हैं. मगर चीन के दबाव में WHO ताइवान को यहां भी शामिल नहीं होने दे रहा है. 2016 तक ताइवान को बतौर पर्यवेक्षक यहां आने की परमिशन थी. मगर 2017 से चीन उसे यहां शिरकत नहीं करने दे रहा है. इसकी वजह है ताइवान की बदली हुई पॉलिटिक्स.

बिफोर, आफ़्टर
पॉलिटिक्स में आए इस बदलाव को समझने के लिए हम फिर वापस चलेंगे च्यांग काई-शेक और उनकी पार्टी KMT पर. च्यांग तानाशाह थे. क्रूर तानाशाह. जब वो चीन से भागकर ताइवान आए, तो यहां रहने वाले मूल बाशिदों पर बहुत ज़ुल्म किया उन्होंने. करीब चालीस सालों तक ताइवान में सिंगल पार्टी का राज रहा. मगर 80 का दशक आते-आते ताइवान में लोकतंत्र की मांग ने ज़ोर पकड़ा. 1996 में यहां पहली बार राष्ट्रपति चुनाव हुआ.

इसके बाद भी KMT ही सत्ता में रही. उसकी नीतियां चीन के लिए उतनी ख़तरनाक नहीं थीं. क्योंकि KMT ताइवान का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं देखता. उसके लिए, ताइवान और चीन एक ही यूनिट हैं. इसी मिजाज़ में साल 1992 में KMT और कम्यूनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता हुआ था. दोनों में वन चाइना पॉलिसी पर सहमति बनी.

मगर ताइवान की नई पीढ़ी ख़ुद को चीन से जोड़कर नहीं देखती. वो अपनी अलग पहचान देखते हैं. वो ख़ुद को एक स्वतंत्र देश मानते हैं. ऐसे में बड़ा मोड़ आया 2016 में. जब KMT चुनाव हार गई. वहां डेमोक्रैटिक प्रोग्रेसिव पार्टी की सरकार बनी. इसकी मुखिया हैं राष्ट्रपति साइ इंग-वेन. साइ के नेतृत्व में ताइवान चीन से और दूर होता जा रहा है. वो बाकी दुनिया के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश कर रहा है.

Taiwan President Tsai Ing Wen
ताइवान राष्ट्रपति साइ इंग-वेन. (फोटो: एएफपी)

ताइवान की मौजूदा सरकार का रुख
दिसंबर 2016 में जब डॉनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए, तब साइ इंग-वेन ने बधाई देने के लिए उन्हें फोन किया. ये रिवाज़ है. दोस्ताना रिश्ते वाले देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक-दूसरे को ऐसी बधाइयां देते रहते हैं. मगर साइ का कॉल मामूली बात नहीं थी. ये एक राष्ट्राध्यक्ष का दूसरे राष्ट्राध्यक्ष को किया गया फोन था. 1979 में ताइवान से डिप्लोमैटिक रिश्ते तोड़ने के बाद ये पहली बार था कि दोनों देशों के लीडर्स की इस तरह बात हुई थी. चीन बहुत नाराज़ हुआ इसपर. मगर साइ रत्तीभर भी पीछे नहीं हटीं. 2017 में रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वो ट्रंप को दोबारा भी कॉल कर सकती हैं.

अभी मार्च की बात है. चीन ने न्यू यॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट और वॉल स्ट्रीट जरनल के पत्रकारों को अपने यहां से निकाल दिया. चीन ने ये भी कहा कि इन तीनों संस्थानों के पत्रकार हॉन्ग कॉन्ग भी नहीं जा सकेंगे. ऐसे में ताइवान के विदेश मंत्री जोसफ़ वु ने एक ट्वीट किया. इस ट्वीट में उन्होंने इन तीनों मीडिया संगठनों को टैग करके लिखा कि आपको चीन में इतने विरोध का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में मैं आपको ताइवान आने का निमंत्रण देता हूं. हमारे देश में भरपूर आज़ादी और लोकतंत्र है. जोसफ़ वु ने लिखा कि आप यहां आएंगे, तो लोग बांहें खोलकर आपको गले लगाएं. ऐसा नहीं कि बस ताइवान की लीडरशिप चीन से दूर जा रही हो. लीडरशिप तो जनता की चुनी हुई है. ऐसे में आप बहुसंख्यक जनता का मूड समझ सकते हैं.

ताइवान को सपोर्ट मिल रहा है?
वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में शिरकत के लिए अब कई देश ताइवान के समर्थन में आगे आ रहे हैं. ख़बरें आईं कि अमेरिका भी फील्डिंग कर रहा है ताइवान के लिए. अमेरिकी डिप्लोमैट्स यूरोपीय देशों के साथ बातचीत करके ताइवान के लिए समर्थन जुटा रहे हैं. अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पिओ ने WHO से अपील की है कि वो ताइवान को इस असेंबली में शामिल होने का न्योता भेजे. न्यू ज़ीलैंड और फ्रांस ने ताइवान को सपोर्ट किया है. बदले में चीन ने उन्हें धमकी भी दी है.

भारत का क्या स्टैंड है?
ख़बरों के मुताबिक, ताइवान का सपोर्ट करने वालों में भारत भी शामिल है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक ख़बर के मुताबिक, विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला की इस मुद्दे पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, न्यू ज़ीलैंड, साउथ कोरिया और वियतनाम समेत कई देशों से बात हुई है. ताइवान ने भी कहा है कि वो भारत से समर्थन की उम्मीद कर रहा है. ताइवान और हॉन्ग कॉन्ग को अपना आंतरिक मसला बताता है चीन. उसे बर्दाश्त नहीं कि कोई और देश इन मामलों में कुछ बोले. मगर यही चीन गिलगित-बाल्टिस्तान में भारत की संप्रभुता की कोई परवाह नहीं करता. भारत के बार-बार विरोध करने पर भी वो इन जगहों को अपनी कॉलोनी की तरह इस्तेमाल करता है.

United States Taiwan Relations Act
ताइवान रिलेशन्स ऐक्ट (फोटो: सीआईए)

ताइवान और अमेरिका: स्पेशल रिलेशनशिप
ताइवान ख़ुद की आज़ाद पहचान बनाने के लिए छोटे-छोटे कदम चल रहा है. चीन को इसमें ख़तरा नज़र आता है. लेकिन वो ताइवान पर हमला नहीं कर सकता. इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका भी है. 1979 में जब अमेरिका ने ताइवान के साथ अपने डिप्लोमैटिक रिश्ते तोड़े, उसी साल वो एक ख़ास अधिनियम लेकर आया. इसका नाम था- ताइवान रिलेशन्स ऐक्ट. इस ऐक्ट में ताइवान के सुरक्षा की गारंटी दी अमेरिका ने. इसके मुताबिक, ताइवान को अपनी सुरक्षा करने में मदद देगा अमेरिका. इसी वजह से अमेरिका हथियार बेच पाता है ताइवान को.

सुनो कहानी, सुनो…
अब जाते-जाते एक विज्ञापन की कहानी सुनते जाइए. इसी साल 14 अप्रैल की बात है. अमेरिका के न्यू यॉर्क टाइम्स अख़बार में पहले पन्ने पर एक फुल पेज विज्ञापन छपा था. विज्ञापन में ऊपर की तरफ काले रंग का एक बड़ा बॉक्स बना था. इसमें लिखा था- हू कैन हेल्प? हू की स्पेलिंग क्या होती है, WHO. और विश्व स्वास्थ्य संगठन का शॉर्टकट क्या चलता है- WHO. तो ये जो लाइन थी, इसमें कैपिटल लैटर में लिखा था WHO. उसके नीचे गैप छोड़कर हू कैन हेल्प के जवाब में लिखा था- ताइवान.

Who Can Help
हू कैन हेल्प? (फोटो: न्यूयॉर्क टाइम्स)

ताइवान के कुछ लोगों ने क्राउडफंडिंग करके इस विज्ञापन के पैसे जमा किए थे. ताकि वो दुनिया को बता सकें कि विश्व का प्रतिनिधित्व करने वाली एक संस्था किस तरह उनके साथ भेदभाव कर रही है. वो दुनिया को ये भी बताना चाहते थे कि इस संकट की घड़ी में ताइवान सबकी मदद करना चाहता है. इस विज्ञापन की बड़ी चर्चा हुई. बहुत मुमकिन है कि ताइवान WHO सम्मेलन में भाग नहीं ले सकेगा. लेकिन उसके सपोर्ट में जिस तरह का माहौल बन रहा है, ये भी ताइवान की एक बड़ी कामयाबी है.


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