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पीबी मेहता के इस्तीफे के विवाद में अशोका यूनिवर्सिटी को जमीन मिलने की बात कहां से आ गई?

हरियाणा के सोनीपत में देश का एक जाना-माना शिक्षा संस्थान है. अशोका यूनिवर्सिटी. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारत सरकार और हरियाणा सरकार से मान्यता प्राप्त है. अपने रिसर्च और ऐकडेमिक्स के लिए ये प्राइवेट यूनिवर्सिटी देश के बाहर भी जानी जाती है. लेकिन इन दिनों एक प्रोफेसर के इस्तीफे की वजह से चर्चा में है. तीन दिन पहले खबर आई थी कि अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और विख्यात राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता (या पीबी मेहता) ने यूनिवर्सिटी छोड़ने की घोषणा कर दी है. बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक तबके में इसे यूनिवर्सिटी के लिए बड़ा झटका बताया गया है.

इसकी चर्चा चल ही रही थी कि गुरुवार (18 मार्च 2021) को संस्थान के एक और नामी प्रोफेसर अरविंद सुब्रमण्यन ने भी इस्तीफा दे डाला. वही अरविंद सुब्रमण्यन, जो नरेंद्र मोदी सरकार में चार साल मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) रहे थे. उन्होंने अपने इस्तीफे में कहा कि यूनिवर्सिटी में प्रताप भानु मेहता पर इस्तीफे के लिए दबाव बनाया गया, जिस कारण वे भी इस्तीफा दे रहे हैं.

सुब्रमण्यन के इस्तीफे की खबर के कुछ घंटों बाद यूनिवर्सिटी फैकल्टी का वाइस चांसलर (वीसी) मालाबिका सरकार के नाम लिखा पत्र सामने आ गया. इसमें संस्थान के शिक्षकों ने प्रताप भानु मेहता का खुलकर समर्थन किया. उनके इस्तीफे पर दुख जताया और यूनिवर्सिटी से अनुरोध किया कि वो मेहता को इस्तीफा रद्द करने को कहे. उधर, कैंपस में छात्र भी प्रताप भानु मेहता के समर्थन में प्रदर्शन करने लगे. उन्होंने मेहता की वापसी की मांग की है.

कौन हैं प्रताप भानु मेहता?

देश के बड़े बुद्धिजीवियों में से एक हैं. राजनीति, राजनीतिक सिद्धांत, संविधान, शासन और राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे विषयों के एक्सपर्ट हैं. दिल्ली में केंद्र सरकार का एक थिंक टैंक है. सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च. प्रताप भानु मेहता इसके अध्यक्ष रह चुके हैं.

राजस्थान के जोधपुर में जन्मे पीबी मेहता ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिडी में फिलॉसफी, पॉलिटिक्स और इकनॉमिक्स की पढ़ाई कर चुके हैं. वहां से डिग्री लेने के बाद उन्होंने अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की. अपने करियर में प्रताप भानु मेहता ने दुनिया के कई प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में पढ़ाया है. इनमें अमेरिका की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे चर्चित संस्थान शामिल हैं.

पीबी मेहता मनमोहन सरकार में बने नेशनल नॉलेज कमीशन के सदस्य भी रहे. भारत के विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्र संघ चुनावों की गाइडलाइंस तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई लिंगदोह कमेटी में भी वे शामिल रहे. इसके अलावा, वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की काउंसिल ऑफ ग्लोबल गवर्नेंस में वाइस चेयरमैन रह चुके हैं. भारत सरकार और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की अनेकों रिपोर्टों में पीबी मेहता ने योगदान दिया है. बाद में अशोका यूनिवर्सिटी से जुड़े. जुलाई 2017 से जुलाई 2019 के बीच इसके वाइस चांसलर रहे. बाद में ये पद छोड़ दिया. लेकिन यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर बने रहे और पढ़ाने का काम जारी रखा.

मेहता पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं. कई अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के एडिटोरियल बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं. देश-विदेश के अखबारों में उनके लेख छपते रहते हैं. और आगे क्या बताएं. आप समझ ही गए होंगे कि किसी विषय या मुद्दे पर इनकी राय को काफी संजीदगी से लिया जाता है.

Pratap Bhanu Mehta Arvind Subramanian
प्रताप भानु मेहता (दाएं) और अरविंद सुब्रमण्यन (तस्वीरें- ट्विटर)

इस्तीफे की वजह क्या?

पीबी मेहता के कई लेखों और राजनीतिक टिप्पणियों में मौजूदा केंद्र सरकार के कामकाज और नीतियों की तीखी आलोचना की गई है. हाल में उन्होंने कृषि कानूनों पर सरकार की आलोचना की थी. मोदी सरकार को वे पहले ही ‘फासीवादी‘ बता चुके हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, मेहता ने एक बार मोदी सरकार को 1975-77 की इंदिरा गांधी सरकार से भी ज्यादा ‘धूर्त’ बताया था. उन्होंने कहा था,

’70 के दशक में इंदिरा गांधी का इरादा अपनी पोजिशन और व्यक्तिगत ताकत को मजबूत करना था. लेकिन मोदी का इरादा अपने बहुसंख्यक और सत्तावादी अजेंडे के साथ हिंदुत्व को भी आगे बढ़ाने का है.’

अशोका यूनिवर्सिटी हरियाणा में है. यहां की सरकार ने हाल में नई जॉब रिजर्वेशन पॉलिसी की घोषणा की थी. मेहता ने इसे टसंवैधानिक रूप से गलत और राजनीतिक स्वार्थट करार दिया था. अब अचानक उन्हें यूनिवर्सिटी से जाना पड़ा है तो लोगों का उनके इस्तीफे को राजनीतिक दबाव से जोड़ना स्वाभाविक है. फिर मेहता ने खुद भी इसका संकेत दिया है. अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा है कि यूनिवर्सिटी के संस्थापकों ने उन्हें साफ जता दिया था कि संस्थान के साथ उनका जुड़ाव उसके लिए ‘पॉलिटिकल लायबिलिटी’ बन सकता है.

इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि हाल में अशोका यूनिवर्सिटी के फाउंडर्स ने मेहता से मुलाकात की थी. सूत्रों ने कहा कि ये मीटिंग ‘मौजूदा सियासी माहौल’ को लेकर ही थी, जिसके बारे में कई लोगों की राय है कि इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है. अखबार के मुताबिक, मीटिंग में संस्थापकों ने मेहता से यही कहा कि यूनिवर्सिटी उनके ‘बौद्धिक हस्तक्षेप’ की अब और रक्षा नहीं कर सकती. इस मीटिंग के बाद ही मेहता ने अपना रेजिग्नेशन वाइस चांसलर मालाबिका सरकार को भेज दिया था. इसमें उन्होंने लिखा,

‘मेरा सार्वजनिक लेखन सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और सम्मान से जुड़े संवैधानिक मूल्यों के लिए समर्पित राजनीति का समर्थन करता है, जिसे यूनिवर्सिटी के लिए खतरे पैदा करने वाला माना गया है… ये साफ है कि मेरे लिए अशोका यूनिवर्सिटी छोड़ने का समय आ गया है. एक उदार विश्वविद्यालय को आगे बढ़ने के लिए राजनीतिक और सामाजिक रूप से उदार परिस्थितियों की जरूरत होगी. मैं उम्मीद करता हूं कि यूनिवर्सिटी उस माहौल को बचाए रखने में एक भूमिका निभाएगी.’

प्रोफेसर मेहता ने जर्मन फिलॉसफर फ्रेडरिक निच का जिक्र करते हुए कहा,

‘निच ने एक बार कहा था कि संसार में सच के लिए कोई संभावना नहीं है. मैं उम्मीद करता हूं कि उनका भविष्यकथन सच साबित न हो.’

जमीन का क्या मामला है?

अशोका यूनिवर्सिटी का एक स्टूडेंट न्यूजपेपर है. नाम है दि एडिक्ट. मेहता के इस्तीफे के एक दिन बाद यानी 17 मार्च 2021 के एडिशन में उसने एक सूत्र के हवाले से अशोका यूनिवर्सिटी को मिलने वाली किसी जमीन का जिक्र किया था. रिपोर्ट के मुताबिक,

‘प्रोफेसर मेहता से इस्तीफा लेने का मकसद कैंपस का दायरा बढ़ाने के लिए एक नई जमीन हासिल करने की यूनिवर्सिटी की कोशिशों को आसान बनाना था. साथ ही, संस्थान के चार साल वाले पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा कोर्स को भी औपचारिक रेकग्नेशन मिल सकता है.’

फैकल्टी का मेहता को समर्थन

बहरहाल, प्रोफेसर मेहता के इस्तीफे के लिए देश के मौजूदा वातावरण को जिम्मेदार बताने वाले फैकल्टी सदस्यों में अरविंद सुब्रमण्यन के अलावा और भी प्रोफेसर शामिल हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी या कहें कि उसके फाउंडर्स के रवैये पर सवाल उठाए हैं. नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर एक फैकल्टी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा,

‘अगर संस्थापकों को लगता है कि मेहता को निकालकर वे उन (राजनीतिक) शक्तियों को संतुष्ट कर देंगे, तो वे गलती कर रहे हैं. इससे यूनिवर्सिटी की निष्ठा को नुकसान होता है. कई शीर्ष शिक्षक यहां इसलिए आए क्योंकि मेहता और फाउंडर्स ने इसे बनाने में मेहनत की थी. उच्च शिक्षा स्तर पर हर किसी को ये डराने वाला संदेश गया है कि राजनीतिक दबाव के आगे अगर बड़े वित्तीय संसाधनों वाले प्राइवेट फाउंडर्स भी मेहता के लिए खड़े नहीं रह सकते तो फिर कौन हो सकता है?’

क्या है वीसी का रुख?

फैकल्टी की तरफ से लिखे गए पत्र के बाद अशोका यूनिवर्सिटी की वीसी मालाबिका सरकार भी चर्चा में आ गई हैं. उन्होंने कहा है कि मेहता के इस्तीफे के पीछे संस्थान पर सरकार का कोई दबाव नहीं था. गुरुवार को छात्रों के साथ हुई वर्चुअल बैठक में वीसी ने कहा कि संस्थान के ट्रस्टियों ने मेहता को इस्तीफा देने के लिए नहीं कहा. मालाबिका ने ये भी बताया कि उन्हें फाउंडर्स और मेहता के बीच हुई बातचीत की जानकारी नहीं है. हालांकि सूत्रों से आई एक नई जानकारी के मुताबिक, संस्थापकों का एक वर्ग मेहता को वापस लाना चाहता है. इस बीच इंडियन एक्सप्रेस ने कहा है कि दो और फैकल्टी मेंबर अशोका यूनिवर्सिटी छोड़ सकते हैं.


वीडियो: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के नाम पर पत्रकार निधि राजदान के साथ हुआ बड़ा धोखा!

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