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जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस के साथ तो आए लेकिन पार्टी की सदस्यता क्यों नहीं ले पाए?

गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी मंगलवार, 28 सितंबर को कांग्रेस के मंच पर द‍िखे. कांग्रेस पार्टी से 2022 का गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया. लेकिन जिग्नेश आधि‍कार‍िक रूप से कांग्रेस में शाम‍िल नहीं हुए. वहीं उनके साथ मौजूद कन्‍हैया कुमार ने कांग्रेस की सदस्‍यता ग्रहण की. जिग्नेश मेवाणी के कांग्रेस में शामिल न होने के पीछे एक तकनीकी कारण है. आइए इसी तकनीकी कारण और उसके संवैधानिक पहलुओं पर गौर करते हैं.

कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगे, पर अभी मेंबर नहीं बनेंगे

कांग्रेस के मंच पर आने और अगला चुनाव लड़ने का ऐलान करने के बावजूद जिग्नेश मेवाणी ने पार्टी के सदस्य क्यों नहीं बने, इसके बारे में उन्होंने खुद बताया था. कहा था,

एक टेक्निकल वजह के चलते मैं फॉर्मली (कांग्रेस) पार्टी ज्वाइन नहीं कर सकता, क्योंकि मैं एक निर्दलीय विधायक हूं. if I join a party, I may not continue as an MLA.मेरी पार्टी के सीनियर लीडर्स से बात हुई. मेरे क्षेत्र के साथियों के साथ बात हुई. अपने आप से बात हुई. राहुल जी से बात हुई, तो मुझे लगा कि मैं इस विचार के साथ हूं ना, ये सबसे प्रमुख बात है. बाकी की फॉर्मेलिटी तो आने वाले महीनों में भी हो जाएगी. और राहुल जी ने भी कहा कि वो जो पर्चा भरकर सदस्यता लेने वाली बात है, वो तो कल भी कर लेना. अभी अपने क्षेत्र के लोगों के साथ खड़े रहो. मैं फॉर्मली नहीं, लेकिन इस विचार के साथ आज जुड़ चुका हूं. मैं 2022 का चुनाव कांग्रेस के सिंबल से ही लड़ूंगा. चुनाव कैंपेन का हिस्सा रहूंगा.

बता दें कि 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जिग्नेश मेवाणी ने बडगाम विधानसभा सीट से निर्द​लीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरा था. कांग्रेस ने तब जिग्नेश के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था. मेवाणी ने बीजेपी के हरखाभाई चक्रवर्ती को हराकर जीत हासिल की थी.

Kanhaiya Kumar Joins Congress
राहुल गांधी के साथ जिग्नेश (ब्लू शर्ट में)

जिग्नेश के कांग्रेस जॉइन न करने की वजह

अब बात करते हैं इस टेक्निकल कारण की, जिसके चलते जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस जॉइन नहीं कर पाए. इसका जवाब मिलता है दल विरोधी कानून यानी संविधान की दसवीं अनुसूची में. 1985 की जनवरी में शीतकालीन सत्र के दौरान राजीव गांधी की अगुआई में संविधान में 52वां बदलाव किया गया. इससे बना दल-बदल विरोधी कानून-1985. इस कानून में दल बदलते समय निर्धारित नियमों का पालन न करने पर निर्वाचित सदस्यों की अयोग्यता का प्रावधान है.

दल-बदल विरोधी कानून के तहत इन आधार पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है-

#यदि एक निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है.

#यदि वह पहले से अनुमति लिए बिना अपने राजनीतिक दल या ऐसा करने के लिए अधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा जारी किसी निर्देश (जैसे विप) के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से दूर रहता है.

#यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य निर्वाचन के छह महीने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है.

जिग्नेश मेवाणी के संदर्भ में यहां तीसरी लाइन फिट बैठ रही है. अगर वो अभी कांग्रेस पार्टी जॉइन करते हैं तो उनकी विधानसभा सदस्यता जा सकती है.

थोड़ा इतिहास की बात कर लेते हैं

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1969 में गृहमंत्री वाई बी चव्हाण की अध्यक्षता में एक समिति ने दलबदल के मुद्दे पर गौर किया था. यह देखा गया कि 1967 के आम चुनावों के बाद दलबदल ने भारत में राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया. 376 में से 176 निर्दलीय विधायक बाद में किसी ना किसी राजनीतिक दल में शामिल हो गए. हालांकि, समिति ने निर्दलीय विधायकों के खिलाफ किसी कार्रवाई की सिफारिश नहीं की. लेकिन समिति के एक सदस्य निर्दलीयों के मुद्दे पर समिति से असहमत थे. वह चाहते थे कि यदि निर्दलीय किसी राजनीतिक दल में शामिल होते हैं तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए.

चव्हाण समिति ने निर्दलीयों को लेकर सिफारिश नहीं की. इसकी वजह से दलबदल विरोधी कानून (1969, 1973) बनाने के प्रारंभिक प्रयासों में राजनीतिक दलों में शामिल होने वाले निर्दलीय विधायकों को शामिल नहीं किया गया. अगले विधायी प्रयास 1978 में हुए, जिसमें स्वतंत्र और मनोनीत विधायकों को राजनीतिक दल में शामिल होने की अनुमति दी गई. लेकिन जब 1985 में संविधान में संशोधन किया गया तो निर्दलीय विधायकों के तयशुदा वक्त के बाद राजनीतिक दल में शामिल होने पर रोक लगा दी गई. किसी पार्टी में शामिल होने के लिए मनोनीत विधायकों को निर्वाचन के बाद छह महीने का समय दिया गया.

कानून की खामी क्या है?

इस कानून की सबसे बड़ी कमी यह है कि किसी भी जनप्रतिनिधि की सदस्यता को रद्द करना सदन के अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर करता है. कानून में किसी टाइमफ्रेम का जिक्र नहीं है कि इतने समय में उन्हें फैसला लेना है. यहीं पर शुरू होती है राजनीति. देखने में आया है कि सदन के अध्यक्ष ने कभी तेजी से फैसला लिया तो कभी फैसला करने में बहुत देरी की. ऐसे में राजनीतिक पूर्वाग्रह के आरोप सदन के अध्यक्ष पर लगे. हालांकि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्पीकर को तीन महीने के अंदर दल बदल विरोधी मामले में फैसला कर देना चाहिए.

पश्चिम बंगाल में, भाजपा विधायक मुकुल रॉय के खिलाफ अयोग्यता याचिका 17 जून से विधानसभा अध्यक्ष के पास लंबित है. डेडलाइन बीत चुकी है. लेकिन फैसला नहीं हुआ है. कभी ममता बनर्जी के सिपहसालार रहे मुकुल रॉय ने 2017 में टीएमसी छोड़ दी थी और बीजेपी में शामिल हो गए थे. लेकिन इसी साल यानी 2021 में बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के करीब एक महीने बाद वे फिर से टीएमसी में शामिल हो गए. आधिकारिक रूप से वह कृष्णानगर उत्तर सीट से बीजेपी के विधायक हैं. उन्हें विधानसभा की लोक लेखा समिति का अध्यक्ष बनाया गया है. हालांकि बीजेपी ने मुकुल रॉय को दलबदल कानून के तहत विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य करार देने और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष पद से हटाए जाने की मांग की है.


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