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पुतिन के करीबी लोग एक-एक कर सुसाइड क्यों कर रहे हैं?

How do Russians commit suicide?

रूस में लोग आत्महत्या कैसे करते हैं?

कुछ बरस पहले किसी ने सोशल मीडिया साइट रेडिट पर ये सवाल पूछा था. इसके जवाब में जो कमेंट आए, वे पहली नज़र में आपको मज़ाक लगेंगे. वीभत्स मज़ाक.

मसलन,

रूस में आप सुसाइड नहीं करते. सुसाइड आपके गले पड़ जाता है.

एक कमेंट था,

उसका पांव फिसला होगा और वो गोली के ऊपर गिर गया होगा.

एक ने लिखा था,

उसने अपने सिर के पीछे दो बार गोली मारी होगी.

अगर सहज स्थिति की कल्पना की जाए तो कोई व्यक्ति सुसाइड करने के लिए सिर के पीछे गोली क्यों मारेगा. दूसरी बात, सिर के पीछे एक गोली मारने वाले शख़्स के पास उठकर दूसरी गोली खाने का टाइम कहां से आएगा? आम स्थिति में ये जिज्ञासाएं वाजिब और तार्किक लगतीं है. लेकिन जब बात रूस की हो तो इन तर्कों को पॉकेट में रखकर छिपा लिया जाता है.

आज इतनी भूमिका बांधने के पीछे की एक वजह है. क्या? दरअसल, ये सब मज़ाक सच साबित हो रहे हैं. 2022 में रूस के 07 ओलिगार्क्स ने कथित तौर पर आत्महत्या की है. उनमें से 06 ने रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अपनी जान ली है. अगर इन मामलों को विस्तार में देखा जाए तो दाल का कालापन साफ़ पता चलता है. किसी ने अपने घरवालों को मारने के बाद फांसी लगा ली.

कोई छुट्टी मनाने देश से बाहर गया और होटल के कमरे में उसकी लाश मिली. एक की मौत स्कीइंग के दौरान हो गई. मरने वाले सारे ओलिगार्क्स रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी रहे हैं. ये लोग पुतिन की सत्ता में ईंधन भरते हैं. यूक्रेन पर हमले के बाद से पश्चिमी देशों ने इन लोगों पर प्रतिबंध लगाए हैं. दिलचस्प बात ये है कि इस साल सुसाइड करने वाले सातों ओलिगार्क्स इन प्रतिबंधों के दायरे में नहीं थे. यानी, पश्चिमी देशों को उनसे चिंता नहीं थी.

इसको लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं. क्या हत्या को सुसाइड का जामा पहनाया जा रहा है? क्या इन संदिग्ध मौतों के पीछे पुतिन का हाथ है? क्या आने वाले दिनों में ऐसे और मामले देखे जा सकते हैं?

इन्हीं सवालों के बीच आज हम जानेंगे,

ओलिगार्क्स कौन होते हैं और पुतिन को सत्ता में बनाए रखने में उनकी क्या भूमिका है?

इस साल 07 ओलिगार्क्स की संदिग्ध मौतों की मिस्ट्री क्या है?

और, इन मौतों से किसे फायदा होगा?


पहले एक रूसी लतीफ़ा सुन लीजिए.

व्लादिमीर पुतिन का इकॉनमी को लेकर प्लान क्या है? उनका मकसद क्या है?

लोगों को अमीर और ख़ुश बनाना.

लिस्ट ऑफ़ पीपुल अटैच्ड.

कहने का मतलब ये कि रूस में किसके पास कितनी संपत्ति होगी और कौन कितना प्रभावशाली होगा, ये तय करने का एकाधिकार पुतिन के पास है. रूस में लंबे समय से एक पैटर्न चलता आ रहा है. वहां पुतिन और ओलिगार्क्स का भविष्य एक-दूसरे से नत्थी रहा है. ओलिगार्क्स ने सपोर्ट दिया, बदले में उन्हें पैसा कमाने की छूट मिली. जिस किसी ने इस लीक से हटकर चलने की कोशिश की, उसे या तो देश छोड़कर भागना पड़ा या दुनिया छोड़ देनी पड़ी. इतना ज़रूर हुआ कि पुतिन की सत्ता पर कोई आंच नहीं आई.

आपने कई बार ओलिगार्क्स शब्द सुना. आपके मन में जिज्ञासा हो रही होगी कि ये होते कौन हैं?

इसका जवाब जानने के लिए हमें समय का पन्ना पलटना होगा. इतिहास में चलते हैं.

ये 1980 के दशक की बात है. मिखाइल गोर्बाचोव के सोवियत लीडर बनने से पहले की. गोर्बाचोव सोवियत संघ में पेरेस्त्रोइका की नीति लेकर आए थे. इसके तहत, सोवियत संघ की क्लोज़ड इकॉनमी को उदार बनाने पर ज़ोर दिया गया था. ये सोवियत संघ के मार्केट को खोलने को पहली कोशिश थी.

हालांकि, इससे कुछ समय पहले एक पैरलल मार्केट तैयार हो रहा था. गुप्त तरीके से. इसके पीछे सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी केजीबी थी. दरअसल, केजीबी को फ़ंड की कमी से जूझना पड़ रहा था. उन्हें ऑपरेशन चलाने में मुश्किल आ रही थी. पैसे की कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने एक नया सिस्टम बनाया. एक ब्लैक मार्केट था. केजीबी प्रतिबंधित सामानों और तकनीकों को स्मगल करके सोवियत संघ में लाती. फिर उनके ज़रिए पैसा कमाने का जुगाड़ भिड़ाया जाता. केजीबी को इसमें कामयाबी मिलने लगी. उन्होंने पैसा कमाने और उसे देश से बाहर छिपाने की तरक़ीब सीख ली थी.

धीरे-धीरे तलब बढ़ने लगी थी. केजीबी को कमाई के नए रास्तों की दरकार थी. उन्होंने एक एक्सपेरिमेंट करने का फ़ैसला किया. केजीबी को लगा, कंप्यूटर प्रोग्रैमिंग और साइंटिफ़िक रिसर्च के ज़रिए कम समय में ज़्यादा पैसा बनाया जा सकता है. उन्होंने मिख़ाइल ख़ोदोकोव्स्की नाम के एक नौजवान को इस काम के लिए चुना. मिख़ाइल को इसके लिए कंप्यूटर लाने और पैसा कमाने की परमिशन चाहिए थी. उस दौर में सोवियत संघ में ये दोनों काम गैर-कानूनी थे. केजीबी ने मिख़ाइल को परमिशन दे दी. मिख़ाइल ने सोवियत संघ में पहली प्राइवेट कंपनी शुरू की. उन्होंने पैसा बनाना शुरू कर दिया था. 1985 में गोर्बाचोव ने मार्केट को उदार बनाने की शुरुआत की. इसके बाद तो केजीबी के प्रयोगों को पंख लग गए. इस फ़ील्ड में मिख़ाइल जैसे और भी लोगों की एंट्री होने लगी.

फिर आया साल 1991 का. सोवियत संघ का विघटन हो गया. केजीबी को भंग कर उसे चार एजेंसियों में बांट दिया गया. एजेंसी का इकॉनमी पर से नियंत्रण खत्म हो चुका था. मिख़ाइल ख़ोदोकोव्स्की जैसे लोगों को और भी आज़ादी मिली. सोवियत संघ का उत्तराधिकार रशियन फ़ेडरेशन के पास आया था. नई सत्ता को पैसे की दरकार थी. पैसा मिख़ाइल और उनके जैसे लोगों के पास था. चुंबकीय शक्ति से दोनों धड़े एक-दूसरे की तरफ़ खिंचे चले गए. तब रूस में एक नए वर्ग का जन्म हुआ. ओलिगार्क्स. इसका शाब्दिक अर्थ होता है, कुलीन. कुलीनतंत्र में सत्ता की चाबी कुछ अमीर और प्रभावशाली लोगों के पास रहती है.

रूस के संदर्भ में, पोलिटिकल कनेक्शन रखने वाले उद्योगपतियों को ओलिगार्क्स कहा जाता है. बोरिस येल्तसिन रूस के पहले राष्ट्रपति थे. उनके समय में 07 ओलिगार्क्स के पास रूस की आधी अर्थव्यवस्था का कंट्रोल था. इनमें से एक मिख़ाइल ख़ोदोकोव्स्की भी थे.

जिस समय मिख़ाइल केजीबी के एक्सपेरिमेंट के तहत पैसा बना रहे थे, उसी दौर में व्लादिमीर पुतिन ईस्ट जर्मनी में केजीबी एजेंट के तौर पर काम कर रहे थे. उन्होंने ओलिगार्क्स की पैदाइश करीब से देखी थी. सोवियत संघ के विघटन के बाद वो सेंट पीटर्सबर्ग आ गए. कुछ समय बाद वो डिप्टी मेयर बने. पुतिन के पास करिश्मा था. वो सत्ता से नजदीकी रखना जानते थे. ये टैलेंट उनके काम आया. उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग से मॉस्को और फिर क्रेमलिन तक का सफ़र बहुत आसानी से पार कर लिया. वो बोरिस येल्तसिन के करीबी बने. येल्तसिन ने पुतिन को अपना उत्तराधिकारी चुना. 07 मई 2000 को पुतिन ने रूस के दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ले ली.

राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने अपने वफ़ादारों और क़रीबियों के बीच मेवा बांटना शुरू किया. इनमें से अधिकतर केजीबी के एजेंट रह चुके थे. उन्हें सरकारी कंपनियों में अहम पदों पर नियुक्त किया जाने लगा. उन्हें पैसा कमाने का मौका दिया गया. इससे उन्हें दो बड़े फायदे हुए. पहला, नई पीढ़ी के ओलिगार्क्स उनके हाथों की कठपुतली बन गए. दूसरा फ़ायदा ये हुआ कि उनके ज़रिए पुतिन को अपनी संपत्ति छिपाने का मौका मिला. आरोप हैं कि पुतिन रूस के सबसे धनी शख़्स हैं. कहा जाता है कि उनकी संपत्ति ओलिगार्क्स के नाम पर दर्ज़ हैं.

ये तो हुई वफ़ादारों की बात. जो लीक से हटे, उनका क्या हुआ?

एक उदाहरण मिख़ाइल ख़ोदोकोव्स्की का है. 2003 आते-आते मिखाइल रूस के सबसे अमीर आदमी बन चुके थे. उसी साल फ़रवरी में पुतिन ने प्रभावशाली लोगों की एक मीटिंग बुलाई. इसमें मिख़ाइल भी आए. उन्होंने ओलिगार्क्स की तरफ़ से प्रजेंटेशन दिया. इसमें उन्होंने पुतिन और उनके अधिकारियों पर करप्शन का आरोप लगा दिया. मिख़ाइल ने प्रेस के सामने भी कई तरह के संगीन इल्ज़ाम लगाए. ये पुतिन को नाराज़ करने के लिए काफ़ी था. कुछ समय बाद ही मिखाइल को टैक्स चोरी के मामले में जेल भेज दिया गया. उनकी कंपनी की नीलामी कर दी गई. 09 सालों तक जेल में रखने के बाद उन्हें जेल से छोड़ा गया. फिलहाल, वो ब्रिटेन में रहकर पुतिन की आलोचना करते रहते हैं. उनके ऊपर कई जानलेवा हमले भी हो चुके हैं.

दूसरा उदाहरण बोरिस बेरोज़ोस्की का है. फ़ोर्ब्स की रिपोर्ट के अनुसार, 1997 में उनके पास लगभग 25 हज़ार करोड़ रुपये की संपत्ति थी. उन्होंने पुतिन का पोलिटिकल करियर बनाने में मदद की थी. मार्च 2000 में हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद वो पुतिन के विरोधी हो गए. उन्हें रूस छोड़कर भागना पड़ा. 2003 में ब्रिटेन ने उन्हें अपने यहां शरण दे दी. बोरिस अंतिम समय तक पुतिन की आलोचना करते रहे. मार्च 2013 में बर्कशायर के उनके घर में उनकी लाश मिली. अभी तक उनकी हत्या की असली वजह पता नहीं चल सकी है.

बोरिस पहले और इकलौते नहीं थे. यूएस टुडे की 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, तीन सालों में 38 ओलिगार्क्स की रहस्यमयी परिस्थितियों में जान गई या वे अचानक गायब हो गए. तब से अब तक मॉस्को नदी में काफ़ी पानी बह चुका है.

सिर्फ़ 2022 में 07 ओलिगार्क्स ने कथित तौर पर सुसाइड किया है.

  • जनवरी में रूसी कंपनी गैज़प्रॉम के एक वरिष्ठ मैनेजर लियोनिड शुलमान अपने कॉटेज के बाथरूम में मृत पाए गए. उनकी लाश के पास से एक सुसाइड नोट मिला. मरने के टाइम वो सिक लीव पर चल रहे थे. गैज़प्रॉम ने उनकी मौत की जांच की बात कही.
  • 25 फ़रवरी को गैज़प्रॉम के एक डिप्टी जनरल डायरेक्टर अलेक्जेंडर तूलियाकोव की लाश सेंट पीटर्सबर्ग में मिली. उनकी लाश कॉटेज के गैराज से लटकी हुई थी. पुलिस को उनकी लाश के पास भी एक नोट मिला. दावा किया गया कि उन्होंने भी सुसाइड किया है.
  • 28 फ़रवरी को इंग्लैंड के सरे में रूसी उद्योगपति मिख़ाइल वाटफ़ोर्ड की लाश मिली. उनकी लाश भी गैराज में लटकी हुई थी. पुलिस ने कहा कि उनकी मौत एक सुसाइड है. उन्हें कुछ भी संदिग्ध नहीं लगा. मिख़ाइल का जन्म यूक्रेन में हुआ था. उन्होंने रूस में तेल और गैस के व्यापार में अच्छा-खासा नाम कमाया था.
  • 24 मार्च को निझनी नोवग्रोद में अरबपति व्यापारी वासिली मेलिनकोव, उनकी पत्नी और उनके दो बच्चों की लाशें मिली. चारों के शरीर पर चाकू के निशान थे. जांच के बाद कहा गया कि मेलिनकोव ने पहले अपनी पत्नी और बच्चों को मारा. फिर ख़ुद अपनी जान ले ली. ये भी कहा गया कि उनकी कंपनी घाटे से जूझ रही थी. मेलिनकोव इससे परेशान चल रहे थे.
  • 18 अप्रैल को मॉस्को के एक लग्जरी अपार्टमेंट में तीन लाशें मिलीं. इनमें से एक गैज़प्रॉम बैंक के वाइस-प्रेसिडेंट रह चुके व्लादिस्लाव अवायेव की थी. अपार्टमेंट अंदर से लॉक था. उनके हाथ में एक बंदूक भी मिली. जांच के बाद दावा किया गया कि अवायेव ने अपनी पत्नी और बेटी को मारने के बाद सुसाइड कर लिया.
  • 19 अप्रैल को स्पेन के एक विला में रूसी कंपनी नोवाटेक के टॉप मैनेजर रहे सर्गेई प्रोतोसेन्या, उनकी पत्नी और बेटी की लाश बरामद हुई. सर्गेई की लाश गार्डेन में लटकी हुई थी. उनकी पत्नी और बेटी को चाकू से गोदकर मारा गया था. ये लोग छुट्टियां मनाने स्पेन आए थे. उनकी हत्या में भी सुसाइड वाली थ्योरी पेश की गई.
  • सबसे हालिया मामला 01 मई का है. सोच्चि में क्रेसनाया पोलयाना रिजॉर्ट के जनरल डायरेक्टर आंद्रे क्रुवोस्की की मौत हो गई. वो एक क्लिफ़ से गिरकर घायल हो गए थे. उन्हें बचाया नहीं जा सका. उनके रिजॉर्ट में पुतिन अपने दोस्तों को छुट्टियां बिताने के लिए बुलाया करते थे.

ये सारे लोग रूस में प्रभावशाली पदों पर थे या रह चुके थे. यानी, उनकी पुतिन से करीबी थी. इनमें से किसी ने पुतिन के यूक्रेन पर हमले के आदेश की आलोचना नहीं की थी. दूसरा विरोधभास ये भी है कि किसी भी देश ने इन लोगों पर प्रतिबंध भी नहीं लगाए थे.

पुतिन की सत्ता को चलायमान बनाए रखने में ओलिगार्क्स का बड़ा योगदान रहा है. यूक्रेन पर हमले के बाद पुतिन ने ओलिगार्क्स की मीटिंग भी बुलाई थी. इस मीटिंग में उन्होंने सबको अनकंडीशनल सपोर्ट करने का आदेश दिया था. यूक्रेन का हमला पुतिन की उम्मीदों से बहुत लंबा खिंच चुका है. जानकारों की मानें तो उन्हें ओलिगार्क्स का सपोर्ट छीनने का डर सता रहा है. एक आशंका तख़्तापलट को लेकर भी जताई जा रही है. अफ़वाहें ये भी हैं कि ओलिगार्क्स की संदिग्ध मौतों के ज़रिए संदेश दिया जा रहा है. ताकि कोई उनके ख़िलाफ़ जाने की कोशिश ना करे.

इन थ्योरीज़ के पक्ष में अभी कोई सबूत नहीं आए हैं. लेकिन आशंकाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं हैं. सच क्या है, ये तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चल सकेगा. पुतिन के सत्ता में रहते हुए इसकी संभावना नगण्य है.अंत में एक और चुटकुला.

एक बार की बात है. एक अमेरिकी और एक रूसी व्यक्ति के बीच बहस हो गई. मुद्दा ये कि किस देश में ज़्यादा आज़ादी है?

अमेरिकी ने कहा,

मैं वाइट हाउस के सामने जाकर चिल्ला सकता हूं. जो बाइडन मुर्दाबाद! और, मेरे साथ कुछ ग़लत नहीं होगा. मुझे जेल में नहीं डाला जाएगा.

इस पर रूसी व्यक्ति ने कहा,

इसमें कौन सी बड़ी बात है? मैं भी क्रेमलिन के सामने जाकर चिल्ला सकता हूं. जो बाइडन मुर्दाबाद! मेरे साथ भी कुछ ग़लत नहीं होगा. हो सकता है कि मुझे कुछ इनाम भी मिल जाए.

अब सुर्खियों की बारी.

पहली सुर्खी श्रीलंका से है. 12 मई को राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने रानिल विक्रमसिंघे को नया प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया. शाम में शपथ भी दिला दी गई. 09 मई को महिंदा राजपक्षे के इस्तीफ़े के बाद कुर्सी खाली थी. विक्रमसिंघे छठी बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं. दिलचस्प बात ये है कि विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी (UNP) के पास संसद में महज एक सीट है. 2020 के चुनाव में विक्रमसिंघे अपनी ही सीट से चुनाव हार गए थे. श्रीलंका में चुनाव में मिले कुल वोटों के आधार पर पार्टियों को कुछ सीटें अलग से अलॉकेट की जातीं है. इसी आधार पर UNP को एक सीट मिली थी. पार्टी ने विक्रमसिंघे को अपने कैंडिडेट के तौर पर संसद भेजा था.

पीएम पद की शपथ लेने के बाद विक्रमसिंघे ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को थैंक्यू भेजा है. उन्होंने आर्थिक मदद के लिए भारत को शुक्रिया कहा. बोले, मैं पीएम मोदी के साथ करीबी रिश्ते रखने के पक्ष में हूं.

भारत ने इस साल श्रीलंका को अलग-अलग माध्यमों से लगभग 25 हज़ार करोड़ रुपये की मदद की है. इसके अलावा, भारत ने ईंधन और खाद्य पदार्थों की सप्लाई भी भेजी है.

जहां तक रानिल विक्रमसिंघे की बात है, उन्हें देश चलाने का पुराना तजुर्बा है. उन्हें दूरदर्शी और उदार किस्म का नेता माना जाता है. उनके पास आर्थिक संकट से उबरने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करने को लेकर नीतियां हैं. उनका अनुभव काम आता है या नहीं, यह राष्ट्रपति, विपक्षी पार्टियों और जनता से मिलने वाले सपोर्ट की मात्रा पर निर्भर करेगा.

इससे पहले चर्चा चल रही थी कि समागी जन बालबेगाया पार्टी के नेता साजिथ प्रेमदासा को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा. हालांकि, उनकी मांग थी कि पहले राष्ट्रपति गोटाबाया अपने पद से इस्तीफ़ा दें. उसके बाद ही वो प्रधानमंत्री पद पर आसीन होंगे. गोटाबाया ने नया गेम खेलते हुए एक सीट वाले विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बना दिया. जानकारों की मानें तो इससे गोटाबाया को सरकार पर नियंत्रण रखने में आसानी होगी. और, इससे उनकी कुर्सी भी सलामत रहेगी.

दूसरी सुर्खी नॉर्थ कोरिया से है. 12 मई को नॉर्थ कोरिया ने कोरोना का पहला मामला दर्ज़ किया था. राजधानी प्योंगयोंग में टेस्टिंग के बाद एक व्यक्ति में ओमिक्रॉन वेरिएंट मिला था. नॉर्थ कोरिया ने महामारी के 29 महीने बाद अपने यहां कोरोना होने की बात स्वीकारी है. इस स्वीकारोक्ति के एक दिन बाद ही नया खुलासा हुआ है. कोरियन सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी (KCNA) के अनुसार, साढ़े तीन लाख से अधिक लोगों में बुखार के लक्षण देखे गए हैं. बुखार के कारणों का अभी पता नहीं चला है. लगभग दो लाख लोगों को आइसोलेशन में रखा गया है. ये सब अप्रैल से चल रहा है.

इसके अलावा, रहस्यमयी बुखार से पीड़ित 06 लोगों की मौत भी हो चुकी है. इनमें से एक में ओमिक्रॉन वेरिएंट पाया गया. यानी, नॉर्थ कोरिया में आधिकारिक तौर पर कोरोना से पहली मौत दर्ज़ हो चुकी है.

नॉर्थ कोरिया में अभी तक एक भी व्यक्ति को कोरोना की वैक्सीन नहीं लगी है. WHO ने कोवैक्स प्रोग्राम के तहत वैक्सीन ऑफ़र की थी. लेकिन सरकार ने इस ऑफ़र को ठुकरा दिया था.

नॉर्थ कोरिया पहले से ही कुपोषण और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है. अगर कोरोना संकट बढ़ा तो उनके लिए अकेले निपटना कतई मुश्किल होगा. 2021 में आई ग्लोबल हेल्थ सिक्योरिटी इंडेक्स की रिपोर्ट भी यही कहती है. इस रिपोर्ट में हेल्थ क्राइसिस से निपटने में सक्षम देशों की रैंकिंग है. इसमें नॉर्थ कोरिया को 195 में से 193वां स्थान मिला.

आज की तीसरी और अंतिम सुर्खी रवांडा से है. रवांडा जनसंहार के मुख्य आरोपियों में से एक प्रोटेस पिरान्या की मौत की पुष्टि 16 बरस बाद हुई है. जांचकर्ताओं को ज़िम्बॉब्वे में एक क़ब्र मिली. इसकी जांच के बाद पता चला कि प्रोटेस 2006 में ही मर चुका है. प्रोटेस प्रेसिडेंशियल गार्ड का मुखिया था. आरोप थे कि उसी के आदेश पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अगाथे उलिंगिमाना की हत्या कर दी गई थी. अगाथे रवांडा के इतिहास की पहली और इकलौती प्रधानमंत्री थीं. अप्रैल 1994 में उनकी हत्या के बाद देशभर में नरसंहार शुरू हुआ था. इसमें 100 दिनों के भीतर 10 लाख से अधिक लोगों की हत्या हुई.

नरसंहार के बाद प्रोटेस भागकर कैमरून चला गया. जनसंहार में शामिल रहे अधिकतर लोग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो चले गए थे. उन लोगों ने डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ फ़ॉर द लिबरेशन ऑफ़ रवांडा (FLDR) की स्थापना की. 1998 में प्रोटेस FLDR में शामिल हो गया. डी आर कॉन्गो के विवाद में उसने ज़िम्बॉब्वे सेना की एक ब्रिगेड को लीड किया. वहां उसने अपना नाम बदलकर कमांडर एलेन कर लिया था. ज़िम्बॉब्वे की सेना में उसकी ख़ासी इज्ज़त थी. इसी की बदौलत उसे ज़िम्बॉब्वे में शरण मिल गई.

फिर आया साल 2002 का. रवांडा जनसंहार के दोषियों को सज़ा देने के लिए इंटरनैशनल ट्रायब्यूनल बनाई गई. इसमें प्रोटेस पर हत्या, जनसंहार और बलात्कार जैसे संगीन आरोप लगाए गए. हालांकि, उसे कभी कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सका.

प्रोटेस राजधानी हरारे में आराम से बिजनेस चलाता रहा. 2006 में वो अचानक गायब हो गया. उसके घरवालों ने उसकी मौत की ख़बर छिपाए रखी. वे जांच एजेंसियों से झूठ बोलते रहे. अब जाकर पता चला है कि उसने अंतिम समय में अपना नाम बदलकर न्दुमे सम्बाओ रख लिया था. यही नाम उसकी क़ब्र पर भी लिखा था. प्रोटेस की मौत की पुष्टि के बाद एक अफ़सोस बचा रह गया है. न्याय ना हो पाने का.

अब विश्व-कविता की बारी. आज हम ज़िम्बॉब्वे के कवि चेन्जेराई होव की कविता लेकर आए हैं. इसका शीर्षक है – इनकार. अंग्रेज़ी से हिंदी में इसका अनुवाद किया है, राजेश चंद्र ने. पढ़िए-

पुलिस जब आ ही जाए ऐन सिर पर

और उसकी लाठी नृत्य करने लगे

तुम्हारी पीठ पर

इनकार कर देना झुकने से.

बिच्छू जब आ ही जाएं

और डंक मार दें चाहे

तुम्हारी आंखों और कानों पर

इनकार कर देना उनके वश में आने से.

दुनिया जब घूमती नज़र आए गोल-गोल

यातना-कक्ष के भीतर

साफ़ इनकार कर देना चाहिए

तुम्हारे दिल को मुरझाने से.

तुम सुनना बच्चों की आवाज़ों को

देखना रंगत हमारे संगीत की

और नाच उठना मन ही मन

समर्पण की मौत पर.

जिस क्षण शक्तिसम्पन्न लोग

लूटने में लगे हों तमगे

और अशक्त चुन रहे हों

तिनके शासन के

तुम इनकार कर देना घुटने टेकने से

फुटपाथ पर छल और कपट के.


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