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5 हजार साल से करोड़ों को मारने वाले मलेरिया का टीका वैज्ञानिकों ने 30 साल लगाकर कैसे बनाया?

एक साल ऐसा नहीं जाता जब देश में किसी कोने से मलेरिया के प्रकोप की खबर नहीं आती. मलेरिया फैलाने वाले मच्छर नम और गर्म माहौल में पैदा होते हैं, जिनकी हमारे यहां कोई कमी नहीं है. रही सही कसर पूरी कर देता है जगह-जगह पड़ा कचरा. मई से अगस्त तक चलने वाले मलेरिया सीज़न में हर साल हज़ारों भारतीयों की जानें जाती हैं. जो सरकारी अस्पतालों से मायूस होते हैं, वो निजी अस्पतालों में पैसा फूंकने को मजबूर होते हैं. सच यही है कि भारत आज भी मलेरिया जैसी एक विशुद्ध थर्ड वर्ल्ड बीमारी से पीछा नहीं छुड़ा पाया है. अफ्रीका के हालात तो इस मामले में बेहद खराब हैं. वहां बड़ी संख्या में मलेरिया बच्चों की जान लेता है. लेकिन अब हो सकता है, कि ये बदले. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया के लिए टीके को मंज़ूरी दे दी है.

मलेरिया से मौतें असामान्य क्यों नहीं लगतीं?

मलेरिया. इस शब्द से हम इतने ज्यादा परिचित हैं कि हर साल मलेरिया से होने वाली मौतों के बारे में हमें कुछ भी असामान्य नहीं लगता. पिछले साल जब कोरोना शुरू हुआ तो दुनियाभर में तहलका मच गया. सभी देशों के वैज्ञानिक जुट गए कोरोना का टीका खोजने में और खोज भी लिया. लेकिन मलेरिया संक्रमितों और इससे होने वाली मौतों का कुल आंकड़ा निकालएंगे, तो कोरोना वाली मौतों का आंकड़ा छोटा लगेगा. भारत समेत कई थर्ड वर्ल्ड देशों में मलेरिया घर-घर की बीमारी है. मुमकिन है कि हममें से भी कई लोगों को मलेरिया हुआ हो. आप याद करिए कुछ साल पहले तक बरसात के मौसम में अस्पताल भर जाया करते थे- डेंगू-मलेरिया के मरीजों से. मरने वालों में ज्यादा बच्चे होते थे. और ये 10-20 साल से नहीं 5 हजार साल से होता आ रहा है.

Malaria Africa
भारत समेत कई थर्ड वर्ल्ड देशों में मलेरिया घर-घर की बीमारी है.

30 साल में तैयार हुआ टीका

5 हज़ार साल पहले और आज के इंसान में कितना बदलाव आया है. गुफाओं से निकले इंसानों ने अपने रहने के लिए सैकड़ों मंजिलें इमारत बनाना सीख लिया. अपने जैसी मशीन यानी रोबोट तैयार कर लिए. लेकिन 5 हजार साल से चली आ रही मलेरिया बीमारी से निपटने का तरीका हम नहीं खोज पाए. आपने सोचा है, क्यों ऐसा हुआ. जब कुछ महीनों के भीतर कोरोना जैसी नई बीमारी का टीका खोज लिया जाता है फिर मलेरिया का टीका नहीं खोज पाए.

अब जाकर दुनिया में पहला मलेरिया का टीका बना है, जिसे WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने परमिशन दी है. रोज़मर्रा वाली तमाम बड़ी खबरों में शायद ये खबर अपना स्पेस नहीं बना पाई हो. लेकिन ये ऐतिहासिक उपलब्धि है. बहुत बड़ी बात है कि करोड़ों लोगों की जान लेने वाली मलेरिया बीमारी का टीका अब हमारे पास है. 30 साल लगाकर ये टीका कैसे बनाया गया, और भारत के लिए इस टीके के क्या मायने हैं. इस पर आएंगे. लेकिन पहले मलेरिया का थोड़ा सा बैकग्राउंडर. कैसे इंसान इस बीमारी से जूझता आया है.

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टीका 100 प्रतिशत असरदार नहीं है लेकिन इसे शुरुआती कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है.

मादा मच्छर से फैलती है बीमारी

माना जाता है कि 2700 ईसा पूर्व यानी आज से लगभग 4800 साल पहले मलेरिया बीमारी शुरू हो गई थी. लेकिन 200 साल पहले तक तो इंसानों को पता ही नहीं था कि ये बीमारी होती कैसे है. लोगों को लगता था कि प्रदूषित हवा से बीमारी फैलती है और फिर लोग मरते जाते हैं. और इसी धारणा से बीमारी का नाम मलेरिया पड़ा. मलेरिया का शाब्दिक अर्थ होता है दूषित हवा. इटालियन शब्द है. 19वीं सदी के आखिर में जाकर वैज्ञानिकों को समझ में आया कि असल में मच्छरों के काटने से ये बीमारी फैलती है. 1897 में ब्रिटेन के वैज्ञानिक रॉनाल्ड रॉस ने इस बात का पता लगाया था. और उसके कई साल बाद ये मालूम चला कि सारे मच्छरों से नहीं होता है. सिर्फ मादा मच्छर ही ये बीमारी फैलाते हैं.

Mosquito
सिर्फ मादा मच्छर ही ये बीमारी फैलाते हैं. सांकेतिक तस्वीर- Pixabay से साभार

घरेलू नुस्खे से वैक्सीन तक का सफर

हालांकि जब लोगों बीमारी की वजह का ठीक-ठीक पता नहीं था, तब भी लोगों ने इससे निपटने का घरेलू नुस्खा खोज लिया था. 17वीं शताब्दी में यूरोप में सिनकोना पेड़ की छाल को मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल किया जाने लगा था. फिर 1820 के आसपास सिनकोना की छाल से कुनैन नाम के पदार्थ को अलग कर उसको मलेरिया की दवा के रूप में काम में लिया जाने लगा. बरसों तक ये मलेरिया ठीक करने का तरीका रहा, कुनैन से ही मलेरिया की दवाएं भी बनाई गई. हालांकि अब WHO कुनैन के इस्तेमाल की सलाह नहीं देता है.

जब ये मालूम चल गया कि मलेरिया मच्छरों से फैलती है तो फिर 20 शताब्दी की शुरुआत से बीमारी रोकने के लिए मच्छरों को मारने की रणनीति अपनाई गई. मच्छर ही नहीं रहेंगे तो बीमारी भी नहीं फैलेगी, इस पर ज़ोर दिया गया. घर के आसपास पानी जमा ना होने दें, इस तरह की जागरुकता बढ़ाई जाने लगीं. DDT जैसे कीटनाशियों का छिड़काव शुरू हुआ. आज तक मलेरिया के मच्छरों को मारने के नाम पर कीटनाशों का अच्छा कारोबार चलता है. कीटनाशक बनाने वाली कंपनियां अपने विज्ञापनों में ये डर दिखाती हैं कि कीटनाशक नहीं छिड़का तो मलेरिया हो जाएगा.

Malaria Prevention Work, Mumbai
मलेरिया से बचाव के लिए कीटनाशक के छिड़काव पर ज्यादा जोर रहता है.

हालांकि ये रणनीति भी ज्यादा कामयाब नहीं हो पाई. बारिश के मौसम में जब मच्छर बढ़ते हैं तो मलेरिया भी फैलने लगता है. छत्तीसगढ़, ओडिशा, जैसे प्रदेशों के जंगलों में मच्छरों से निपटना नामुमकिन सा ही है. इसलिए मलेरिया का संक्रमण और मौतें नहीं रुक पाई. और भारत ही क्या अफ्रीका के घाना, इथोपिया जैसे देशों में तो ये बीमारी और भी विकराल रूप में दिखती है. WHO के 2019 के आंकड़े कहते हैं कि 23 करोड़ लोगों को मलेरिया हुआ. जिनमें से 4 लाख की मौत हो गई. ये बीमारी सबसे घातक है बच्चों के लिए. मरने वालों में 67 फीसदी 5 साल से कम उम्र के बच्चे थे.

इसलिए मलेरिया का ऐसा इलाज खोजा जा रहा था कि बीमारी हो ही ना. यानी वैक्सीन. जो मलेरिया पैदा करने वाले परजीवी के खिलाफ शरीर में प्रतिरक्षा पैदा कर सके. लेकिन ये काम बाकी संक्रामक बीमारियों की वैक्सीन बनाने जितना आसान नहीं था.

प्लाजमोडियम परजीवी से होती है बीमारी

मलेरिया बीमारी प्लाजमोडियम नाम के परजीवी से होती है. ये एक कोशिकीय परजीवी है यानी सिंगल सेल पैरासाइट. इसे अपने ग्रोथ के लिए दूसरे जीवों यानी होस्ट की जरूरत पड़ती है. किसी एक अवस्था में ये मादा मच्छर के शरीर में होता है. फिर मच्छर इंसान को काटता है तो ये इंसान में आ जाता है. प्लाजमोडियम की पांच प्रजातियों से इंसानों में मलेरिया फैलता है. प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरम, पी. वाइवेक्स, पी. ओवेल, पी. मलेरी, और पी. नोलेल्सी. और इनमें भी सबसे खतरनाक माना जाता है प्लाजमोडियम फैल्सिपेरम. इसे पी. फैल्सिपेरम कहा जाता है.

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अफ्रीका में लगभग सारी मौतें फैल्सिपेरम से होती हैं.

अफ्रीका में लगभग सारी मौतें फैल्सिपेरम से होती हैं. जबकि एशिया में लगभग 50 फीसदी मौतें फैल्सिपेरम से होती हैं. इसलिए वैज्ञानिकों ने इसका टीका बनाने का अभियान शुरू किया. ब्रिटेन की जीएसके लेबोरेट्रीज़ नाम की कंपनी के वैज्ञैानिकों ने साल 1987 में मलेरिया वैक्सीन बनाने का काम शुरू किया था. हालांकि कोशिशें इससे पहले भी हुई थी.

लेकिन मलेरिया का टीका बनाना उतना आसान नहीं जितना कोरोना या दूसरी संक्रामण बीमारियों का रहा. वजह है इस पैरासाइट की कोई एक तय अवस्था ना होना. जब मच्छर से इंसान में आता है तब अलग अवस्था में रहता है, इंसान के लीवर में पहुंचता है, तो अलग अवस्था में रहता है, और लीवर से रक्त में जाता है तो फिर बदल जाता है.

वैक्सीन क्या करेगी?

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने तय किया कि जब मच्छर से ये इंसान के लीवर तक पहुंचता है उस अवस्था के लिए टीका बनाया जाए. इस अवस्था में परजीवी को स्पोरोजोइट कहा जाता है. इस अवस्था में परजीवी की प्रोटीन को कहा जाता है- सरकुमस्पोरोज़ोइट प्रोटीन या सीएस प्रोटीन. अब दिक्कत ये थी कि ये प्रोटीन इम्यूनोजेनिक नहीं है. यानी शरीर में इससे आसानी से एंटीबॉडीज नहीं बनते हैं. इसलिए सीएस प्रोटीन के अलावा हेपेटाइटिस बी से प्रोटीन का हिस्सा लेकर मलेरिया की वैक्सीन बनाई गई है. वैक्सीन का वैज्ञानिक नाम है आरटीएसएस. कमर्शियल नाम है मॉस्किरिक्स. इस वैक्सीन से शरीर में ऐसी प्रतिरक्षा तैयार होती है कि जब मच्छर काटने के बाद प्लाजमोडियम हमारे शरीर में पहुंच कर लीवर तक पहुंचता है, उसी दौरान हमारे एंटीबॉडीज इस परजीवी को खत्म कर सकें.

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ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने तय किया कि जब मच्छर से ये इंसान के लीवर तक पहुंचता है उस अवस्था के लिए टीका बनाया जाए. सांकेतिक तस्वीर

40 फीसदी असरदार

लगभग 20 साल से इसका ट्रायल चल रहा था. तीसरा ट्रायल 2009 से 2014 के बीच अफ्रीका में चला. और उसके बाद अफ्रीका के घाना, केन्या और मलावी में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में करीब 8 लाख बच्चों को वैक्सीन दी गई. और ये पाया गया कि वैक्सीन लगे हर 10 बच्चों में से 4 को मलेरिया नहीं होता. उनके शरीर इम्यूनिटी है. वैक्सीन सिर्फ 40 फीसदी ही असरदार है, फिर भी ये बड़ी कामयाबी मानी जा रही है.

तो इस रिजल्ट के बाद 6 अक्टूबर को WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने इस वैक्सीन को मान्यता दे दी है. ये दुनिया की पहली और एकमात्र वैक्सीन जिसे WHO ने मान्यता दी है. बच्चों को 5 महीने की उम्र से ये वैक्सीन लगाई जाती है. और चार डोज़ लगाए जाते हैं.

भारत में इस वैक्सीन कब से लगाई जाएगी या अनुमति दी जाएगी या नहीं, इसकी जानकारी अभी तक नहीं हैं. हमने एक्सपर्ट्स से पूछा कि भारत में मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में ये वैक्सीन कितनी मददगार साबित हो सकती है. सीनियर फिजिशियन डॉक्टर केके पांडे का कहना है,

इससे भारत को बहुत ज्यादा फायदा होगा. जो 5 साल से छोटे बच्चे होते हैं वो ज्यादा सफर करते हैं. ज्यादा सीरियस होने का डर उनमें रहता है और फिर जान जाने का भी खतरा रहता है. ऐसी जानें हम बचा सकते हैं. खास तौर से लाखों लोग हिन्दुस्तान में बीमार पड़ते हैं हर साल उन तीन से चार लाख लोगों को बचाया जा सकता है प्रकोप से.

भारत में पिछले 20 सालों में मलेरिया घटा है. WHO की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक 83 फीसदी की गिरावट आई है. साल 2000 में भारत में मलेरिया के करीब 20 लाख मामले आए थे. जबकि 2019 में सिर्फ 3 लाख 38 हजार मामले आए. मौत का आंकड़ा भी घटा है. भारत के अलावा बाकी देशों में मलेरिया के मामलों में गिरावट आई है. साल 2019 में 27 देशों ने ऐलान किया था कि उनके यहां 100 से भी कम मलेरिया के मामले आए हैं. 20 साल पहले ऐसा दावा करने वाले दुनिया में सिर्फ 6 देश ही थे. अब दुनिया के पास टीका भी आ गया है. यानी मलेरिया के खिलाफ लड़ाई और मजबूत हो पाएगी, और हजारों जानें हर साल बचाई जा सकेंगी.


दी लल्लनटॉप शो: मलेरिया का टीका वैज्ञानिकों ने 30 साल लगाकर कैसे बनाया?

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