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एक ओवर में छः छक्के मारने वाला पहला इंडियन!

8 जनवरी 1985. मौसम ठण्ड का था मगर बम्बई ड्रेसिंग रूम गरम था. सुनील गावस्कर ने दिलीप वेंगसरकर को टीम से ड्रॉप कर दिया था. क्यूंकि दिलीप मैच खेलने के लिए लेट पहुंचे थे. मैच था बड़ौदा के ख़िलाफ़. रणजी ट्रॉफी. मैदान था वानखेड़े स्टेडियम.

सुनील गावस्कर अनुशासित कप्तान थे. अनुशासन पसंद भी करते थे. उन्होंने पिछले मैच में रवि शास्त्री को देर से आने की वजह से मैच नहीं खिलाया था. इस बार भी यही कहा था कि जो भी प्लेयर देरी से आयेगा, उसे टीम में नहीं रखा जायेगा. लेकिन दिलीप वेंगसरकर मैच शुरू होने से कुछ मिनट पहले ही पहुंचे. गावस्कर ने उन्हें बिठा दिया. वेंगसरकर नाराज़ हो गए. कहने लगे कि उन्होंने सुनील गावस्कर को पहले ही बता दिया था कि वो रमेश सक्सेना के लिए एक बेनिफिट मैच खेलने जायेंगे. उन्हें देर रात सोने को मिलेगा इसलिए वो मैच खेलेंगे मगर मैदान में ज़रा देर से पहुंचेंगे.

गावस्कर ने इन दलीलों पर कोई ध्यान नहीं दिया. साफ़ कह दिया कि हां दिलीप ने बताया था लेकिन उन्होंने वेंगसरकर को ये कहा था कि किसी भी हालत में टॉस के पहले मैदान पर मौजूद रहें. अगर शास्त्री, मोहिंदर अमरनाथ और खुद गावस्कर की फ्लाइट में ही वेगसरकर भी आ रहे हैं तो क्यूं नहीं वो भी साथ ही मैदान पर आ गए? और फाइनली वेंगसरकर को टीम में जगह नहीं दी गयी.

वेंगसरकर जब मैदान पर पहुंचे, इनिंग्स का पहला ओवर फेंका जा रहा था. गावस्कर का कहना था कि वेंगसरकर वन-डाउन बैट्समैन है. ऐसे में पहले ओवर में उनका आना अनुशासनहीनता है. बम्बई का खेमा टेंशन में था. दो सबसे सीनियर प्लेयर एक-दूसरे से मुंह फुलाए बैठे थे. दोनों ही इंडिया के भी सबसे सीनियर प्लेयर थे.

लेकिन उस मैच को इस बात के लिए नहीं किसी और बात के लिए याद किया जाता है. मैच का तीसरा और आखिरी दिन. अभी तक बम्बई पहले बैटिंग करके लालचंद राजपूत के 66 रन, गुलाम पारकर 170 रन, शिशिर के 83 रनों की बदौलत 4 विकेट पर 371 रन बनाये. जिसके जवाब में बड़ौदा ने आठ विकेट पर 330 बनाये.

बम्बई की दूसरी इनिंग्स में दूसरा विकेट गिरने के बाद पहुंचे रवि शास्त्री. रवि शास्त्री जो बदनाम थे धीमा खेलने के लिए. मैच देखने के लिए आये लोग उन्हें स्टैंड से डांट रहे होते थे. कुछ दस रोज़ पहले ही कलकत्ता में 111 रन बनाये थे. बैटिंग की 455 मिनट और खेलीं 357 बॉल. लेकिन उस रोज़ कुछ अलग होना था. ऐसा जैसे काला सफ़ेद हो जाये. ऐसा जैसे पूरब पश्चिम हो जाये. ऐसा जैसे राम लखन हो जाये.

रवि शास्त्री उस दिन अपने ही खिलाफ़ खेल रहे थे. अपनी बनी हुई इमेज के खिलाफ़. शास्त्री का पहला पचासा 42 गेंद में. टाइम लगा 38 मिनट का. तीन छक्के और चार चौके. अगले पचास 38 गेंद में. 1 छक्का और पांच चौके.

उसके बाद आया तूफ़ान. लेफ़्ट-आर्म स्पिनर तिलक राज बॉलिंग पर आये. और रवि शास्त्री को न मालूम क्या सूझा उन्होंने कारनामा कर दिखाया. 147 के स्कोर से 183 के स्कोर पर पहुंच गए छः गेंदों में. यानी तिलक राज के एक ओवर में 36 रन. हर गेंद पर छक्का. इसके पहले ये काम गैरी सोबर्स ने किया था. 1968 में. यहां शास्त्री ने किया. पहला छक्का स्ट्रेट बाउंड्री के ऊपर. दूसरा वाइड लॉन्ग-ऑन के सर के ऊपर से उड़ता हुआ. तीसरा छक्का भी दूसरे के रास्ते. चौथा मिड-विकेट के ऊपर से. पांचवा लॉन्ग ऑन पर और आखिरी, पहले वाले की नकल करता हुआ.

ओवर खतम होने के बाद शास्त्री ने अपने हाथों को हवा में फेंकते हुए लगभग पागल हो चुके दर्शकों से और शोर करने को कहा. “मैं बहुत कन्फ्यूज़ हो गया था.” ये कहना था तिलक राज का. मैच के बाद वो काफी शर्मिंदा थे और उन्होंने रवि शास्त्री के साथ फ़ोटो खिंचवाने से भी इनकार कर दिया.

उस रोज़ रवि शास्त्री ने 100 से 200 का सफ़र मात्र 43 बॉल में तय किया. 9 छक्के और 4 चौके. फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उस वक़्त का सबसे तेज़ दोहरा शतक. 204 रन की पार्टनरशिप जो गुलाम पारकर के साथ रवि शास्त्री ने की, उसमें गुलाम के मात्र 33 रन थे. शास्त्री ने तिलक राज को और अमर पीटवाले को छः-छः छक्के मारे. एक छक्का संजय हजारे को जड़ा. 13 चौके भी मारे थे. जिसका मतलब था कि कुल मिलाकर रवि ने 26 गेंदों में 130 रन बनाये थे.

Ravi Shastri

रवि शास्त्री आज जब माइक थामते हैं तो अग्रेसिव सुनाई देते हैं. आज विराट कोहली शास्त्री में एक गुरु पाते हैं. वो शास्त्री जो धीमा खेलता था. लेकिन जब बोलता है ‘Just what the doctor ordered’ तो मुट्ठियां बिंध जाती हैं. इंग्लैण्ड में नासिर हुसैन कमेंट्री करते हुए इंडियन प्लेयर्स को ‘डंकी’ बोल देते हैं. रवि शास्त्री खूंटा गाड़ देते हैं. कहते हैं ‘The bottom line is they’ve never been bloody number one in the world.’ ये वही टुक-टुक करने वाला बैट्समैन है जो अभी टीम इंडिया के मैनेजर की पोस्ट से हटा है. जिसे जो काम दिया गया, उसने किया है. और बखूबी किया है. जिसकी कभी लडकियां दीवानी थीं, आज उस शास्त्री का अग्रेशन उसकी पहचान है. और वो छः छक्के इस अग्रेशन की शुरुआत थे.


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