Submit your post

Follow Us

तालिबान की सरकार बनने के बाद अफगानिस्तान में क्या होगी भारत की भूमिका?

15 अगस्त को जब भारत अपना 75 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, उसका एक पड़ोसी फिर से गुलाम हो रहा था- पुरातनपंथी कट्टरता का. तालिबान का. अफगानिस्तान अब पूरी तरह से तालिबान के कब्ज़े में है. अफगान लोगों के लिए ये अभूतपूर्व संकट की घड़ी है. उनके दुख का अंदाज़ा हम नहीं लगा सकते.

इस अफगान संकट से हम भी अछूते नहीं हैं. पिछले 20 सालों में भारत ने अरबों रुपए के संसाधन और ऊर्जा अफगानिस्तान को बेहतर बनाने में लगाए हैं. अब इनका क्या होगा? पाकिस्तानी प्रभाव वाले तालिबान के रहते अफगानिस्तान में हमारी भूमिका क्या होगी?

साल था 2010 का. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI कई दिनों से एक आदमी का पीछा कर रही थी. फोन के आधार पर ISI उस आदमी की लोकेशन निकालती, लेकिन वो आदमी में पकड़ में नहीं आ रहा था. वो फोन स्विच ऑफ कर जगह बदल लेता. ISI को पता था कि टेक्निकल सर्विलांस में अमेरिका की एजेंसी CIA उनसे बेहतर है. तो CIA से उस आदमी की पिन पॉइंट लोकेशन पता करने में मदद मांगी गई. इसमें कामयाबी मिल भी गई.

8 फरवरी 2010 को CIA के दो आदमी आईएसआई की टीम को कराची में एक मदरसे के बाहर लेकर गए. आईएसआई ने मदरसे पर रेड मारकर एक आदमी को उठाया. आखिरकार आईएसआई की तलाश पूरी हुई थी. अब्दुल ग़नी बरादर उसके हाथ लग गया था. इसे मुल्ला बरादर के नाम से ज्यादा पहचाना जाता है. तालिबान का ऑपरेशनल कमांडर और उस दौर में मुल्ला उमर के बाद तालिबान में जिसे नंबर दो माना जाता था.

1996 में अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने के बाद मुल्ला बरादर कई अहम पदों पर रहा. वो तालिबान शासन के दौरान सेना का डिप्टी चीफ रहा था. 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद वो पाकिस्तान में आकर छिप गया था. ये सब आईएसआई की मदद से हुआ था.

2010 में पाकिस्तान में गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद न्यू यॉर्क टाइम्स अखबार में एक रिपोर्ट छपी थी. इसमें ISI के अधिकारियों के हवाले से मुल्ला बरादर की गिरफ्तारी की वजह लिखी थी. रपट के मुताबिक ISI को जानकारी मिली थी कि मुल्ला बरादर भारत और अफगान सरकार से बात कर रहा है. यानी अफगान सरकार और तालिबान के बीच सीक्रेट नेगोसिएशन चल रही थी.

इसकी भनक पाकिस्तान को लग गई थी. पाकिस्तान नहीं चाहता था कि तालिबान में कोई भी काम उसके पूछे बिना हो. अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए ही ISI ने मुल्ला बरादर को पकड़ा था. बाद में अक्टूबर 2018 तक पाकिस्तान ने मुल्ला बरादर को अपनी हिरासत में रखा.

ये भी कहा जाता है कि अमेरिकियों से बचाने के लिए मुल्ला बरादर को पाकिस्तान ने अपने पास रखा. ताकि तालिबान पर कभी भी पाकिस्तान की पकड़ कमज़ोर ना हो. अक्टूबर 2018 में अमेरिका ने जब तालिबान के साथ बातचीत शुरू की तो मुल्ला बरादर को पाकिस्तान ने रिहा किया.

जिस मुल्ला बरादर को पाकिस्तान ने 8 साल तक पकड़ कर रखा, वो अब अफगानिस्तान का अगला राष्ट्रपति बन सकता है. मुल्ला बरादर के अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बनने का मतलब होगा कि पाकिस्तान का आदमी अफगानिस्तान की कमान संभाल रहा है. और यही भारत की चिंता बढ़ा रहा है. चिंता, कि तालिबान की सरकार बनने के बाद अफगानिस्तान में भारत का क्या होगा? क्या पाकिस्तान के प्रभाव से मुक्त होकर हम अफगानिस्तान से रिश्ते बना पाएंगे? क्या होगा हमारे अरबों रुपये के निवेश का?

इस डर से हमें दूसरी बार गुज़रना पड़ रहा है. क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान दूसरी बार हुकूमत में आ रहा है. तो पहले ये समझते हैं कि जब पिछली बार तालिबान आय़ा था तो भारत के रिश्ते कैसे थे, कैसे डील किया था हमने तालिबान के साथ?

90 के दशक में तालिबान और भारत के रिश्ते की बात करते हैं, तो कंधार हाईजैक केस याद आता है. 24 दिसंबर, 1999 की बात है. नेपाल के काठमांडू से इंडियन एयरलाइंस के विमान IC-814 ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी. लेकिन कुछ देर बाद ही जानकारी मिली कि आतंकियों ने प्लेन हाईजैक कर लिया.

कश्मीर के आतंकियों ने प्लेन हाईजैक किया था. जिसके बाद प्लेन पहले अमृतसर में लैंड हुआ. वहां रिफ्यूलिंग हुई. फिर लाहौर ले जाया गया, उसके बाद दुबई और आखिर में कंधार लाया गया. हाईजैकर्स के लिए कंधार सुरक्षित जगह थी. क्योंकि उनको स्थानीय सरकार से सहयोग मिल रहा था.

Afghanistan 2
हथियारों के साथ बैठा एक तालिबान लड़ाका. फोटो- PTI

प्लेन हाइजैक पर भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने कहा था कि विमान तालिबान के कंट्रोल में आ गया है. उनके साथ ना तो हमारा कोई आधिकारिक संवाद है और ना ही हमने उन्हें मान्यता दी है. उस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार थी. भारत की सरकार ने तालिबान को मान्यता नहीं दी थी.

सिर्फ पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई ही तालिबान की सरकार को मानते थे. और इसलिए तालिबान ने कंधार हाईजैक के वक्त भारत का सहयोग करने के बजाय हाईजैकर्स का साथ दिया. भारत को अपने नागरिकों के बदले तीन आतंकियों को छोड़ना पड़ा था. ये आतंकी थे – मसूद अजहर, मुश्ताक ज़रगार और उमर शेख.

तब तालिबान को भारत से दिक्कत बस इतनी ही नहीं थी कि हमने उनकी सरकार को वैध नहीं माना. दुश्मनी और गहरी थी. 1994 में भारत ने एक रेलवे प्रोजेक्ट बनाया था. तुर्कमेनिस्तान के साराख से लेकर ईरान के ताजान तक. ये अफगानिस्तान से होकर जाता था. इसके अलावा भारत अफगानिस्तान से होकर एक पाइपलाइन बनाने की भी तैयारी कर रहा था जो सेंट्रल एशिया को पर्शियन गल्फ से जोड़ती थी.

रूस और ईरान के साथ मिलकर भारत अफगानिस्तान में इंवेस्टमेंट बढ़ा रहा था. भारत के अफगानिस्तान में इस बढ़ते दखल से पाकिस्तान और अमेरिका में असहजता थी. कहा जाता है कि भारत के अफगानिस्तान में दखल को काउंटर करने के लिए ही ISI ने तालिबान को खड़ा करना शुरू किया था. हालांकि वजह और भी गिनाई जा सकती हैं. लेकिन पाकिस्तान का तालिबान पर पूरा कंट्रोल था.

एक तरह से अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रॉक्सी के तौर पर तालिबान खड़ा हो रहा था. पाकिस्तान और तालिबान के खिलाफ भारत का विकल्प था नॉदर्न अलायंस. उत्तर अफगानिस्तान में ताजिक समुदाय का लड़ाका गुट. तालिबान को रोकने के लिए भारत ने नॉर्दन एलांयस ग्रुप को मदद करना शुरू किया.

अफगानिस्तान के उत्तरी हिस्से में नॉर्दन एलायंस तालिबान के लिए बड़ी मुसीबत बन गया था. लेकिन इससे भारत और तालिबान में दुश्मनी और बढ़ गई. 1996 में अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज होने के बाद तालिबान 5 साल हुकूमत में रहा. और इस दौरान भारत ने तालिबान के साथ कोई रिश्ते नहीं रखे.

तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत ने सितंबर 1996 में अफगानिस्तान में अपना दूतावास बंद कर दिया था. फिर 11 सितंबर 2001 को अलकायदा ने अमेरिका में आतंकी हमले किए. इसके जवाब में अमेरिका ने अफगानिस्तान में हमला किया और तालिबान की सरकार हटा दी. तालिबान को सत्ता से हटाया तो भारत ने फिर अफगानिस्तान का रुख किया.

अमेरिकी दखल के 6 हफ्ते बाद भारत ने नवंबर 2001 में अपने राजनयिकों को फिर से अफगानिस्तान भेजा. और वहां से भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते का नया चैप्टर शुरू हुआ. 2001 से 2021 तक 20 सालों में भारत ने अफगानिस्तान में अरबों रुपये खर्च किए. 2002 के बाद से अब भारत ने अफगानिस्तान को 3 अरब डॉलर की मदद दी है. रुपयों में ये रकम होती है करीब 22 हज़ार 248 करोड़. इतना पैसा भारत ने दुनिया के किसी और मुल्क पर खर्च नहीं किया.

कौन से बड़े प्रोजेक्ट्स भारत ने अफगानिस्तान में बनवाए?

हमने करीब 400 प्रोजेक्ट्स में अफगानिस्तान की मदद की है. अफगानिस्तान की संसद का भवन बनवाया है. इसमें करीब 675 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने संसद भवन का उद्घाटन किया था. संसद भवन के अलावा एक और बड़ा प्रोजेक्ट है सलमा डैम. हेरात प्रांत में 42 मेगावाट का हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट भारत की सरकार बनवा रही है. इस प्रोजेक्ट पर अब तालिबान का कब्जा हो चुका है.

एक और अहम प्रोजेक्ट है जारांज-डेलारम हाइवे. ये 218 किलोमीटर लंबा हाईवे है. भारत के बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइज़ेशन ने बनाया है. 11 सौ10 करोड़ रुपये की लागत से ये बना है. इनके अलावा स्कूल, हॉस्पिटल जैसे और भी कई प्रोजेक्ट्स में भारत ने अफगानिस्तान को मदद दी है. रणनीतिक लिहाज से भी अफगानिस्तान भारत के लिए बहुत अहम रहा है. पाकिस्तान से बॉर्डर लगता है, इसके अलावा अफगानिस्तान से भारत को सेंट्रल एशिया का एक्सेस मिलता है. तो अफगानिस्तान में मजबूत कदम होना हमारे लिए ज़रूरी है.

अब तालिबान सत्ता में लौट रहा है तो भारत का क्या होगा? क्या हमारा सालों का इंवेस्टमेंट डूब जाएगा? पिछली बार जब तालिबान की सरकार बनी थी तो पाकिस्तान यूएई और सऊदी अरब, इन तीन देशों ने ही तालिबान सरकार को मान्यता दी थी. इस बार चीन, रूस, अमेरिका जैसे देशों का तालिबान को समर्थन है. ये देश तालिबान के साथ बातचीत में बड़ी भूमिका में रहे हैं.

यानी तालिबान सरकार को इस बार वैधता मिलने में दिक्कत नहीं होगी. लेजिटिमेसी वाला संकट नहीं है. इसलिए भारत के पास तालिबान से रिश्ते बनाने के अलावा विकल्प नहीं है. अफगानिस्तान को लेकर भारत की पूरी निर्भरता अमेरिका पर रही है. पिछले 6-7 साल में भारत ने अमेरिका से रिश्तों को ज्यादा तवज्जो दी है.

रूस और अमेरिका के साथ बैलेंस बनाकर चलने के बजाय, भारत की विदेश नीति का टिल्ट अमेरिका की तरफ हुआ है. इसका खामियाजा अफगानिस्तान में उठाना पड़ रहा है. भारत के पास विकल्प कम हो गए हैं. तालिबान में रिश्ते सुधारने में रूस से भी वैसी मदद नहीं मिल रही. और ऐसा माना जाता है कि समय रहते हमने भी अफगानिस्तान पॉलिसी पर काम शुरू नहीं किया.

Taliban In Afghanistan
काबुल शहर में तालिबान लड़ाके दाखिल हो चुके हैं. फोटो- आजतक

अमेरिका ने ओबामा सरकार के दौरान 2014 में ही ऐलान कर दिया था कि वो अफगानिस्तान से सेना निकालेंगे. इसके बावजूद भारत वेट एंड वॉच की स्थिति में ही रहा. अमेरिका के जाने के बाद भारत की भूमिका क्या होगी, इसके विकल्प तलाशे नहीं गए. जब अमेरिका ने भी तालिबान के साथ पॉलिटिकल डायलॉग शुरू कर दिया था, तब भी हम बात करने में हिचकिचा रहे थे. और फिर बातचीत शुरू हुई तो रूस, चीन, पाकिस्तान जैसे देशों ने भारत को लगभग अप्रासांगिक सा माना.

बातचीत की टेबल पर भारत की उपस्थिति तो रही, लेकिन सांकेतिक ही. कतर सरकार के न्यौते पर भारत ने तालिबान के साथ दोहा में क्षेत्रीय बातचीत का हिस्सा बनना कबूला. लेकिन वहां भी भारत को बड़े कार्यक्रमों का हिस्सा नहीं बनाया गया. रूस, चीन, पाकिस्तान वाले ग्रुप में शामिल नहीं किया गया. इसके बजाय उस ग्रुप की बैठक में शामिल किया गया जिसमें जर्मनी, नॉर्वे, तुर्केमेनिस्तान जैसे देश थे.

भारत के बजाय पाकिस्तान को साथ लेकर अमेरिका भी अपने हित साधने में लगा है. अफगानिस्तान में अमेरिका ने रीजनल कनेक्टिविटी के लिए चार देशों का ग्रुप बनाया है, जिसमें यूएस के अलावा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उज्बेकिस्तान हैं. यहां भी भारत की ज़मीन कमज़ोर दिखती है. बीच में ऐसी खबरें आई थी कि भारत ने तालिबान के नेताओं के साथ बैकचैनल बातचीत शुरू की है. हालांकि वो कितनी सफल रही, ये अभी कहा नहीं जा सकता.

अभी अफगानिस्तान में भारत के लिए चुनौतियां कई तरह की हैं. काबुल में दूतावास के अलावा भारत के अफगानिस्तान में चार वाणिज्यिक दूतावास हुआ करते थे. भारत को ये बंद करने पड़े हैं. इंडियन स्टाफ को वहां से पहले ही निकाल लिया है. इसके अलावा अफगानिस्तान में नौकरी करने वाले भारतीयों को भी निकाला जा रहा है. रणनीतिक लिहाज से भी भारत के लिए अफगानिस्तान में अब मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों की अफगानिस्तान में मौजूदगी रहती है. अब इन तंजीमों को अफगानिस्तान में और संसाधन मिल सकते हैं, जिनका इस्तेमाल कर वो कश्मीर में दिक्कतें बढ़ा सकते हैं. अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर भारत के विदेश मंत्रालय का भी बयान आया है. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अफगानिस्तान में सुरक्षा के हालात में गिरावट आ रही है. भारत अभी हालात पर करीब नजर बनाए हुए है. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वो भारतीयों के भी संपर्क में हैं, और वक्त वक्त पर एडवाइज़री भी जारी कर रहे हैं.

तो कुल मिलाकर अभी अफगानिस्तान के हालात ऐसे हो गए हैं वहां से निकलने के बजाय कोई विकल्प नहीं है. सब वहां से भागने में लगे हैं. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी देश छोड़ चुके हैं, बड़े अधिकारी मंत्री देश छोड़कर जा रहे हैं. तालिबान के खौफ से देश छोड़कर भागने वालों की एयरपोर्ट पर भीड़ जमा हैं. खौफ इतना कि लोग प्लेन से लटककर भागना भी मुनासिब समझ रहे हैं. भारत समेत बाकी देश भी अपने लोगों को निकाल रहे हैं. अभी किसी को नहीं पता अफगानिस्तान में आगे क्या होगा. तालिबान क्या क्या करेगा. सरकार में आएगा तो तालिबान क्या नियम लागू करेगा. वेट एंड वॉच वाली स्थिति में है दुनिया.

भारत की बड़ी खबरें-

सुष्मिता देव ने छोड़ी कांग्रेस

असम से कांग्रेस के बड़े चेहरे और कांग्रेस के महिला मोर्चे की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव ने पार्टी छोड़ दी है. इससे पहले ये बात चलती कि क्या वो भी ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद की तरह भाजपा में जा रही हैं, खबर आ गई कि सुष्मिता, अभिषेक बैनर्जी और डेरेक ओ ब्रायन से जाकर मिली हैं. इससे साफ हुआ कि सुष्मिता तृणमूल कांग्रेस में जाएंगी.

चूंकि राजनीति आजकल ट्विटर पर होती है, सुष्मिता के कदम का पहला संकेत भी ट्विटर ने ही दिया. उन्होंने अपने ट्विटर बायो में एक ”पूर्व” कांग्रेस सदस्य के आगे लगाया और दूसरा ”पूर्व” अध्यक्ष, ऑल इंडिया महिला कांग्रेस के आगे लगाया. इसके बाद सुष्मिता का इस्तीफा सोशल मीडिया पर तैरने लगा. अपने इस्तीफे में सुष्मिता ने पार्टी छोड़ने का कोई कारण नहीं गिनाया. बस ये कहा कि उनके जीवन में पब्लिक सर्विस से जुड़ा एक नया अध्याय शुरू हो रहा है.

जैसा कि हमने आपको बता ही दिया है, इस नए अध्याय का नाम है तृणमूल कांग्रेस. अब आते हैं इस्तीफे की वजहों पर. सुष्मिता, चौथी पीढ़ी की कांग्रेस नेता थीं. उनके पिता संतोष मोहन देव असम कांग्रेस में एक कद्दावर बंगाली चेहरा थे. शिलचर, असम में बराक घाटी की सांस्कृतिक राजधानी भी है और इलाके का सबसे बड़ा शहर भी. ये एक वक्त संतोष मोहन देव का गढ़ हुआ करता था. यहीं से सुष्मिता भी सांसद रह चुकी हैं. आज की तारीख में वो बराक घाटी में कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा थीं.

जब तक असम में सरकार और पार्टी दिवंगत कांग्रेस नेता तरुण गोगोई के पास रही, तब तक सबकुछ ठीक रहा. लेकिन उनके जाने के बाद पार्टी जब 2021 के विधानसभा चुनाव में उतरी, तो भयंकर खेमेबाज़ी से त्रस्त थी. तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई एक तरफ थे. एक दूसरे पूर्व सीएम हितेश्वर सैकिया के बेटे देबब्रत सैकिया दूसरी तरफ थे. तब के कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा एक तीसरी दिशा में थे. इस खेमेबाज़ी के बीच टिकट वितरण में सुष्मिता को मान नहीं मिला.

फिर कांग्रेस ने जिस तरह बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF से साझेदारी की, उसे लेकर भी सुष्मिता नाराज़ थीं. क्योंकि कांग्रेस-AIUDF के साथ लड़ने का मतलब था कि बराक घाटी के मुस्लिम बहुल इलाकों में सुष्मिता को कुर्बानी देनी पड़ती. सूत्रों का दावा है कि इसी के चलते फरवरी 2021 में सुष्मिता उस बैठक से बाहर निकल आई थीं जिसमें कैंडिडेट्स का चुनाव हो रहा था. तब खबर चली कि सुष्मिता पार्टी छोड़ देंगी, लेकिन किसी तरह वो विवाद शांत करा लिया गया.

कांग्रेस सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट CAA के खिलाफ भी रही है. इसे लेकर सुष्मिता देव सहज नहीं थीं क्योंकि बराक घाटी के बांग्ला हिंदू इस कानून के समर्थन में है. तो सुष्मिता के जाने की भूमिका कई दिन से बन रही थी. वो तृणमूल में जाकर क्या करेंगी, ये भी कोई राज़ नहीं है.

सुष्मिता के पिता संतोष मोहन देव 7 बार सांसद रहे. पांच बार सिलचर से और दो बार त्रिपुरा से. तृणमूल कांग्रेस त्रिपुरा की बांग्ला आबादी को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है. फिर सुष्मिता का अपना इलाका भी बांग्ला बहुल है. तो तृणमूल को सुष्मिता से बहुत उम्मीदें हैं. रही बात कांग्रेस की, तो उसे अब एक नए चेहरे की तलाश करनी होगी जो सिलचर और गुआहाटी दोनों जगहों पर स्वीकार्यता पा सके.

भाजपा के लिए ये स्थिति वैसी ही है कि एचआर की गलती से एक अच्छा एम्प्लॉई हाथ से निकल जाए. लेकिन भाजपा फिलहाल चिंतित नहीं है. क्योंकि फिलहाल असम में हिमंता बिस्वा सरमा नाम का सूरज पूरी तेज़ी से चमक ही रहा है. और हाल में मिज़ोरम-असम सीमा विवाद के चलते सरमा ने बराक घाटी में भी बहुत नंबर बनाए हैं.

इस पूरे प्रकरण पर खुद कांग्रेस के लोग ही चुटकी ले रहे हैं. कांग्रेस नेता और जी 23 के सदस्य कपिल सिब्बल ने ट्विटर पर लिखा कि युवा नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं और हम जैसे बुज़ुर्ग नेता, जो पार्टी को मज़बूत करने की कोशिश में हैं, कोसे जा रहे हैं. और इस सब के बीच आंख बंद किए हुए पार्टी का काम जैसे चल रहा था, चल रहा है.

सबरीना लाल का निधन

सबरीना लाल. 15 अगस्त को गुरुग्राम के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली. ज़्यादातर लोग उनकी बहन जेसिका लाल के नाम को अच्छे से जानते हैं. 29 अप्रैल 1999 को सिद्धार्थ वशिष्ठ उर्फ मनु शर्मा ने जेसिका की हत्या कर दी थी. मनु शर्मा के पिता विनोद शर्मा कांग्रेस नेता थे, पंजाब से विधायक रह चुके थे और पार्टी उन्हें एक बार राज्यसभा भी भेज चुकी थी.

इसीलिए इस मामले को रफा-दफा करने के लिए दिल्ली पुलिस पर बहुत दबाव था. एक के बाद एक गवाह पलट रहे थे. ट्रायल कोर्ट ने मनु शर्मा को रिहा भी कर दिया था. लेकिन सबरीना लाल ने अपनी बहन के लिए लड़ना छोड़ा नहीं और फिर दिल्ली उच्च न्यायालय में ये मामला दोबारा चला. दिसंबर 2006 में मनु शर्मा को दोषी पाकर उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सज़ा को बरकरार रखा.

मनु शर्मा की सज़ा 2023 तक चलने वाली थी. लेकिन 2020 में Delhi Sentence Review Board की सिफारिश पर उसे छोड़ दिया गया. सबरीना 2018 में ही कह चुकी थीं कि उन्हें मनु शर्मा के रिहा होने में कोई आपत्ति नहीं है. अपनी बहन जेसिका को न्याय दिलाने की सबरीना की कहानी ”नो वन किल्ड जेसिका” फिल्म में देखी जा सकती है.

प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना

15 अगस्त के रोज़ प्रधानमंत्री मोदी ने डेढ़ घंटे लंबे अपने भाषण में आने वाले वक्त के लिए अपना ब्लूप्रिंट पेश करने की कोशिश की. और इसी ब्लूप्रिंट का हिस्सा है प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना. इसका मकसद है देश में आर्थिक विकास के लिए नए मौके विकसित करना और इसी बहाने युवाओं के लिए रोज़गार के मौके पैदा करना. इसके लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी सुविधाओं में निवेश किया जाएगा. कुल बजट है 100 लाख करोड़.

फिलहाल ये तय नहीं है कि गति शक्ति योजना, नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन का हिस्सा होगी या अलग योजना. नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन की घोषणा पीएम मोदी ने 15 अगस्त 2019 को की थी. इसका बजट है 111 लाख करोड़. और फिलहाल इसपर काम चल रहा है. जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, इस योजना के तहत भी इंफ्रास्ट्रक्चर पर ही काम होता है, जिससे रोज़गार मिलता है.

रोज़गार की बात चली है, तो आपको ये भी बताते चलें कि रोज़गार की मौजूदा स्थिति क्या है. सरकार द्वारा रोज़गार और बेरोज़गारी का स्तर देखने के लिए समय-समय पर पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) जारी किया जाता है. हाल ही में जारी PLFS में कोरोना वायरस की पहली लहर और दूसरी लहर में रोज़गार पर पड़े प्रभाव का लेखा-जोखा दिया है.

पहली लहर में सर्विस सेक्टर और निर्माण क्षेत्र की नौकरियों में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी बढ़ी. वहीं दूसरी लहर के बाद, बेरोज़गारी शहरी क्षेत्रों में ज़्यादा बढ़ी. सैलरीड क्लास पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा है. दूसरी लहर के बाद ग्रामीण इलाक़ों में खेती-किसानी में पहले से ज़्यादा लोग काम करने लगे हैं. इसका मतलब शहरों ने लोगों का भरोसा तोड़ा है, तभी वो अपने गांव जाकर खेती करने लगे.

पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

पेगासस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. सरकार ने आज अदालत को बताया कि पेगासस मामले में लगी याचिकाएं कयासों और आधारहीन मीडिया रिपोर्ट्स की देन हैं. सरकार ने अपने ऊपर लगाए सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है, लेकिन ये जोड़ा कि इन आरोपों की जांच के लिए एक्सपर्ट्स के एक समूह को लगाया जाएगा. याचिकाकर्ताओं – एन राम और शशि कुमार की तरफ से पेश हुए वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार ने अपने हलफनामे में ये नहीं बताया कि उसने पेगासस का इस्तेमाल किया या नहीं.


 

वीडियो- खर्चा पानी: तो क्या भारत का अफ़ग़ानिस्तान के इंफ्रा पर किया निवेश ग़लत था?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?