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कोरोना में प्राइवेट हॉस्पिटल मनमानी करें तो क्या करें?

आज हम कुछ उदास क़िस्सों से बातचीत शुरू करेंगे. उन लोगों के बयानों के ज़रिए बात करेंगे, जिन्होंने कोविड में अपनों को खोया और साथ ही इसके चंद प्राइवेट अस्पतालों की कथित मनमानी का भी शिकार हुए. अपनी क्षमता से बहुत ज़्यादा अस्पताल का बिल भरा. अस्पताल से अपने अप्रतिमों का कोई हाल-पुर्सी भी नहीं मिला, उन्हें खो दिया और अब न्याय के विकल्प तलाश रहे हैं.

#1

सबसे पहले बात हम परमजीत की करेंगे. नोएडा के रहने वाले परमजीत की तबीयत ख़राब हुई. दिल्ली NCR में कहीं बेड नहीं मिलता देख वो पंजाब के मोहाली चले गए. 26 अप्रैल को यहां के न्यू लाइफ़लाइन अस्पताल में भर्ती हुए और 14 मई को मौत हो गयी. बिल बना 9 लाख रुपयों का.

#2

दिल्ली की रहने वाली गुलशन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. तबियत ख़राब हुई. 2 अप्रैल 2021 को उन्हें उनके घरवालों ने पटपड़गंज के मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया. कोरोना रिपोर्ट पॉज़िटिव. गुलशन के भाई आमिर बताते हैं कि इलाज के कुछ दिनों बाद गुलशन की रिपोर्ट निगेटिव आ गयी. फिर भी गुलशन वेंटिलेटर पर ही रही. इलाज के दरम्यान अस्पताल ने 16 लाख रुपए का बिल बनाया, ऐसे आरोप हैं. बिल में छूट के लिए गुलशन के घर वालों ने आर्थिक रूप से कमज़ोर श्रेणी का जब सर्टिफ़िकेट लगाया गया, तो अस्पताल ने एक और कोरोना टेस्ट किया और गुलशन की रिपोर्ट पॉज़िटिव आ गयी. और दो दिनों बाद गुलशन की मौत.

#3

यूपी के ग़ज़ियाबाद में रहने वाले रमेश चंद्र गुप्ता की भी यही कहानी है. उन्होंने अपनी सास विमला गुप्ता को 13 मई को ग़ाज़ियाबाद के हीलिंग ट्री अस्पताल में भर्ती कराया. आरोप लगाते हैं कि उन्हें एक बार भी इस बात की जानकारी नहीं दी गयी कि उन्हें रोग क्या है और इलाज क्या चल रहा है. और 18 मई को उन्हें बताया गया कि विमला गुप्ता का निधन हो गया है. और उन्हें दे दिया गया 2 लाख का बिल.

#4

इसके अलावा महाराष्ट्र से भी ऐसी ही घटना सुनाई देती है. 16 अप्रैल को महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के गोदावरी अस्पताल में कोरोना संक्रमित शिक्षक अंकलेश पवार को भर्ती कराया गया. भर्ती करते समय रिश्तेदारों ने अस्पताल में 50 हजार रुपए जमा किए. 20 अप्रैल को अंकलेश की तबीयत ज्यादा खराब हुई तो आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया. 21 अप्रैल को अस्पताल ने अंकलेश की पत्नी से फीस की मांग की. 24 अप्रैल को परिजनों ने अस्पताल को पचास हजार रुपए ऑनलाइन और 40 हजार रुपए नकद में दिए. इसी दिन दोपहर में अस्पताल ने अंकलेश के मौत की खबर दी. परिवार शव लेकर चला गया और अंतिम संस्कार में जुट गया. अदालत ने पुलिस को सभी तर्कों की जांच करने और गोदावरी अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ धारा 420 और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज करने का निर्देश दिया. ये तो अस्पतालों में हुई कथित मनमानियों का ज़िक्र है.

पटना में कोविड संक्रमित मरीज़ों से गैंगरेप?

निजी अस्पतालों से आ रही ख़बरें बस इतनी ही स्याह नहीं हैं. इन ख़बरों में कोविड संक्रमित मरीज़ों से गैंगरेप और यौन उत्पीड़न जैसी घटनाएं भी शामिल हैं.

जैसे पटना के पारस अस्पताल की ये ख़बर. 15 मई 2021. नालंदा की रहने वाली एक आंगनबाड़ी सेविका को पटना के पारस अस्पताल में भर्ती कराया गया. 17 मई को महिला की बेटी ने एक वीडियो जारी किया. ख़बरों के मुताबिक़ बेटी ने कहा कि अपनी मां से जब उसने बात की, तो माँ ने बेटी को बताया कि उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है. बेटी ने आरोप लगाया कि उसी दिन के बाद से मां की तबीयत खराब होने लगी और फिर 19 मई को मौत हो गई.

बेटी ने आरोप लगाया कि छेड़खानी और बदसलूकी की घटना को दबाने के लिए उसकी मां को गलत दवा देकर मार दिया गया.

महिला की मौत के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. लोगों ने पारस अस्पताल को बंद करने के लिए हैशटैग चलाया. बेटी की शिकायत पर पुलिस ने अस्पताल के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है. और इसके उलट अस्पताल प्रबंधन ने दावा किया है कि बेटी की शिकायत पर उन्होंने इंटरनल जांच कराई. जांच में इस तरह की कोई घटना नहीं सामने आई है.

निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम क्यों नहीं?

अब इन घटनाओं में देखें तो एक चीज़ लगभग कॉमन है. वो है निजी अस्पताल. और इन्हीं कथित मनमानियों के मद्देनज़र हालफ़िलहाल में अदालतों के आदेश भी आए हैं. आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 20 मई को इस मामले में एक बड़ा आदेश दिया. हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नोडल अधिकारी के माध्यम से बिल का भुगतान करने के तरीकों पर काम करने का आदेश दिया. ताकि निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों से मनमानी पैसा न वसूला जा सके. जस्टिस सी. प्रवीण कुमार और जस्टिस ललिता कन्नेगंती की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश में कोरोना की स्थिति से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिया था. इसके पहले दिसम्बर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्यों को निर्देश दिए थे कि या तो वो प्राइवेट अस्पतालों की फ़ीस पर लगाम लगाएँ, या तो राज्यों में और सरकारी अस्पताल खोले जाएं.

कोर्ट से इतर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर निजी अस्पतालों में कोरोना के इलाज की फीस तय करने की मांग की है. प्रियंका ने लिखा है कि ऐसा देखा गया है कि प्राइवेट अस्पताल मरीजों से इतना पैसा वसूल रहे हैं कि उन्हें लोन तक लेना पड़ रहा है. इसलिए सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए. अस्पताल के प्रतिनिधियों से बात करके फीस फिक्स करना चाहिए. ताकि इलाज कराने वाले लोगों को राहत मिल सके.

इसी तरह जेवर से बीजेपी विधायक धीरेंद्र सिंह ने पीएम मोदी और सीएम योगी को चिट्ठी लिखी है. विधायक ने चिट्ठी में लिखा है कि इस आपदा काल में क्या प्राइवेट अस्पतालों ने अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन किया? और अगर नहीं किया तो सरकार को इन निजी अस्पतालों को सामाजिक दायित्वों का निर्वहन किए जाने हेतु इनकी गैरत को जागृत और नैतिकता पूर्ण आचरण के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए? विधायक धीरेन्द्र सिंह ने एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाकर सभी निजी अस्पतालों के ऑडिट की मांग भी की. ख़बरें ये भी बताती हैं कि यूपी सरकार ने प्रदेश के कुछ प्राइवेट अस्पतालों के खिलाफ़ ओवरचार्ज़िंग की शिकायत करने पर मुक़दमा भी दर्ज किया है.

तो अस्पताल या डॉक्टर के खिलाफ़ कैसे शिकायत की जा सकती है?

बात बस फ़ीस की ही नहीं है. मेडिकल नेगलिजेंस की यानी अनदेखी की है. अब बात जवाबदेही की आती है. क्या मेडिकली कम रूप से शिक्षित जनता को कोई भी बहाना देकर बरगलाया जा सकता है? या जिस पारदर्शी सिस्टम का हम आग्रह करते हैं, उसमें हमारा स्वास्थ्य तंत्र कितना शामिल है?

इस देश के संविधान ने हमें बहुत कुछ दिया है. प्रश्न पूछने के अधिकार से लेकर क़ानूनी रास्ते अख़्तियार करने के अधिकार तक. अब अस्पताल अगर तीमारदार को मरीज़ की जानकारी नहीं दे रहा है, या किसी भी क़िस्म से अंधेरे में रख रहा है, तो अस्पताल या डॉक्टर के खिलाफ़ कैसे शिकायत की जा सकती है? अपने अधिकारों का कैसे निर्वहन का लाभ कैसे उठाया जा सकता है? इस पर क़ानून के जानकारों ने लम्बे समय तक मेडिकल नेगलीजेंस का केस लड़ा है.

आप ऐसी परिस्थितियों में फँसे, तो सबसे पहले परिस्थितियों का आंकलन करें. सोच लें कि क्या सच में अस्पताल या डॉक्टर की ग़लती है? अक्सर अपनों को खोने का दुःख एक मनोवैज्ञानिक कठिनाई दे जाता है, सही ग़लत का फ़र्क़ समझ नहीं आता, हम गुस्साते हैं. क्रोध दिखाते हैं. ऐसे में अक्सर डॉक्टरों के प्रति हिंसा की ख़बरें आती हैं, जो पूरी तरह से ग़लत है और अपराध है. तो अपने आकलन पर पुष्ट होईए और फिर अपने न्यायसंगत विकल्पों का चुनाव करिए.


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