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ब्रिटेन में ड्रग्स को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

एक लड़का था. यूनिवर्सिटी के दिनों में उसे कोकीन की लत लगी. कुछ समय बाद उसे लाभ-हानि समझ आई. उसने ड्रग्स छोड़ दिया. लेकिन जो टैग जुड़ चुका था, वो उसका पीछा नहीं छोड़ने वाला था. कई बरस बाद वो लड़का अपने मुल्क़ का प्रधानमंत्री बना. फिर उसने ड्रग्स के ख़िलाफ़ जंग शुरू की. कसम खाई कि अपने देश से ड्रग्स का नामोनिशान मिटा दूंगा.

यहां पर आता है एक मुहावरा. चिराग तले अंधेरा. प्रधानमंत्री देशभर में ड्रग्स को बंद करने की मुहिम चलाता रहा. इधर उसके दफ़्तर में नशे का निशान मिल गया.

तारीख़ – 06 दिसंबर 2021. ब्रिटिश सरकार ने नशाखोरी से निपटने के लिए अगले दस साल का प्लान पेश किया. इसके तहत कई नए नियम लाए गए हैं.

क्या-क्या?

अब मिडिल-क्लास ड्रग यूजर्स से पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस छीना जा सकता है.

पुलिस ड्रग डीलर्स के फ़ोन को खंगाल सकेगी. इसके जरिए खरीदारों का पता लगाया जाएगा. और, उन्हें लत छोड़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा.

ड्रग गैंग्स को ध्वस्त करने के लिए नए सिरे से अभियान चलाया जाएगा.

ड्रग्स की सप्लाई लाइन्स पर चोट पहुंचाई जाएगी.

नशे के लती लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए निवेश बढ़ाया जाएगा आदि-आदि.

कुल जमा बात ये कि सरकार क्रैकडाउन के मूड में है. ब्रिटेन लंबे समय से नशे की गिरफ़्त में है. यहां नौ में से एक व्यक्ति कोकीन का इस्तेमाल करता है. सरकार के कई मंत्री और बड़े अधिकारी कोकीन का इस्तेमाल करने की बात स्वीकार चुके हैं. हर हफ़्ते ब्रिटेन में करोड़ों डॉलर्स की कीमत के अवैध ड्रग्स पकड़े जाने की ख़बर आती है. लेकिन इस पर पूर्ण रोक अभी तक नहीं लग सकी है.

2020 में ड्रग्स के चलते ब्रिटेन में 45 सौ से अधिक लोगों की मौत हुई. ये अपने आप में एक रेकॉर्ड है. इसके अलावा, तीन लाख से अधिक लूटपाट और डकैती के आरोपी ड्रग एडिक्ट थे. आधे से अधिक हत्या के मामलों में ड्रग एडिक्ट का नाम आया. ब्रिटेन के गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल ड्रग्स से जुड़े अपराधों के चलते 01 लाख 80 हज़ार करोड़ का नुकसान हो रहा है.

सरकार दस-वर्षीय प्लान के ज़रिए इन नुकसानों को कम करने की कोशिश कर रही है. उसे उम्मीद है कि वो ड्रग्स से होने वाली मौतों को रोकने में कामयाब होगी. साथ ही, नशे के शिकार लोगों को मुख्यधारा की ज़िंदगी में लाया जाएगा.

एक तरफ़ ब्रिटेन सरकार बड़े-बड़े प्लान बना रही है. प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन पुलिस वाली ड्रेस पहनकर मिशन को समर्थन दे रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ़, सरकार के अपने घर में पलीता लगा है.

लंदन के वेस्टमिंस्टर पैलेस में ब्रिटेन की संसद के दोनों सदन हैं. हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ़ कॉमंस. वहां रूटीन बेसिस पर ड्रग्स की पड़ताल चलती रहती है.

संडे टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटिश संसद में एक दर्ज़न से अधिक जगहों पर ड्रग्स के निशान मिले हैं. इनमें से 11 जगहों पर कोकीन का निशान मिला है.

ब्रिटेन ने कोकीन को ‘लिस्ट ए ड्रग’ की केटेगरी में रखा है. इसको मेडिकल इस्तेमाल की वैधता मिली हुई है. लेकिन अवैध इस्तेमाल पर सात साल तक की जेल या असीमित ज़ुर्माने या दोनों का प्रावधान है. अगर कोई कोकीन की सप्लाई या प्रोडक्शन के मामले में पकड़ा जाता है तो उसे उम्रभर के लिए क़ैद की सज़ा हो सकती है.

इसलिए, ब्रिटिश पार्लियामेंट में कोकीन पाए जाने का मामला संगीन है. चौंकाने वाली बात ये है कि ये निशान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन, गृह मंत्री प्रीति पटेल और विपक्षी नेताओं के दफ़्तर से सटे बाथरूम्स में भी मिले हैं. कोई पीछे नहीं रहना चाहता.

रिपोर्ट छपने के बाद क्या हो रहा है? हाउस ऑफ़ कॉमंस के स्पीकर लिंडसे हॉयल ने कहा कि आगे की जांच लंदन पुलिस को सौंपी जाएगी. अभी ये पता नहीं चल सका है कि संसद के अंदर कौन कोकीन ले रहा है. ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा. टाइम्स की रिपोर्ट् में दावा किया गया है कि ब्रिटिश संसद में कोकीन का चलन आम है. संसद कवर करने वाले कई और पत्रकारों ने इस दावे की पुष्टि की है.

ये खुलासा बोरिस जॉनसन के लिए दोहरी चुनौती लेकर आया है. एक तरफ़ उन्हें अपने ड्रग-विरोधी अभियान का बचाव करना है. दस सालों का समय लंबा होता है. पता नहीं वो पीएम की कुर्सी पर बने रह पाएंगे या नहीं. इसलिए, वो अच्छी विरासत छोड़कर जाना चाहेंगे.

लेकिन इस राह में कांटे बहुत हैं. इसकी शुरुआत उनके दफ़्तर से हो चुकी है. जनता को भरोसा दिलाने के लिए उन्हें सबसे पहले उसकी सफाई करनी होगी. अगर वो इसमें कामयाब नहीं हो पाए तो दोनों मोर्चों पर भारी नुकसान की आशंका है.

ब्रिटेन के चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं फ़्रांस.

अप्रैल 2022 में फ़्रांस में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होंगे. उससे पहले उम्मीदवारी को लेकर हंगामा शुरू हो चुका है. एक कैंडिडेट हैं, एरिक ज़िमौर. ज़िमौर कट्टर दक्षिणपंथी हैं. पांच दिसंबर को उन्होंने पहली चुनावी रैली की. इस दौरान ज़िमौर ने आप्रवास पर रोक लगाने और टैक्स में कटौती का ऐलान किया.

ज़िमौर ने अपनी पार्टी को ‘री-कॉन्क़्वेस्ट’ या पुनर्विजय का नाम दिया है. यूरोप में इस नाम को एक ऐतिहासिक घटना से जोड़कर देखा जाता है. जब ईसाईयों ने इबेरियन पेनिनसुला से मुस्लिमों को भगाया था.

जानकारों का कहना है कि ज़िमौर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नक़्शेकदम पर चल रहे हैं. उनकी बातें और उनके क्रियाकलाप ट्रंप से मेल खाते हैं. दोनों का विजन एक ही है.

पांच दिसंबर की रैली के दौरान एंटी-रेसिज़्म प्रोटेस्टर्स भी इकट्ठा हुए थे. वे ज़िमौर के विरोध में नारे लगा रहे थे. कुछ ने नस्लभेदी-विरोधी टी-शर्ट्स भी पहने हुए थे. रैली से ठीक पहले ज़िमौर के समर्थकों के साथ उनकी लड़ाई भी हुई. इस झड़प में पांच लोग घायल हो गए.

जब ज़िमौर मंच पर जा रहे थे, तब उनके ऊपर हमला भी हुआ. एक आदमी ने उनका गला दबोच लिया था. पुलिस ने हमलावर को पकड़ लिया. हिरासत में लेकर उससे पूछताछ की जा रही है.

हमले के बावजूद ज़िमौर ने अपना भाषण पूरा किया. हालांकि, डॉक्टरों ने उन्हें नौ दिनों तक बेड रेस्ट करने के लिए कहा है.

एरिक ज़िमौर की कहानी क्या है उन्हें राष्ट्रपति पद का प्रबल दावेदार क्यों माना जा रहा है?

एरिक ज़िमौर का जन्म अगस्त 1958 में हुआ था. उन्होंने साइंस स्ट्रीम से पढ़ाई की. उसके बाद वो पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए. ज़िमौर ने कई किताबें भी लिखीं है. इनमें वो फ़्रांस के पतन के लिए मुस्लिमों को ज़िम्मेदार बताते रहे हैं. 2011 और 2018 में दो बार नस्लभेद भड़काने के आरोप में उनके ऊपर ज़ुर्माना भी लग चुका है.

जहां तक विदेश नीति की बात है, ज़िमौर अमेरिका की बजाय रूस के साथ रिश्ते मज़बूत करने की वकालत करते हैं. उन्होंने अपने भाषणों में बार-बार विदेशियों को दी जाने वाली सब्सिडी बंद करने की बात कही है.

फ़्रांस में एक धड़ा ज़िमौर को बेहद पसंद करता है. चार्ली हेब्दो के दफ़्तर पर हमला हो या 2015 में स्टेडियम में सुसाइड बॉम्बिंग, इस्लामिक आतंकवाद को लेकर उनकी राय बदली है. अक्टूबर 2020 में सैमुअल पैटी की गला रेतकर हत्या कर दी गई थी. पैटी ने कथित तौर पर अपनी क्लास में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था. उन्हें मारने वाला एक चेचेन मूल का मुस्लिम था.

इसको लेकर पूरे फ़्रांस में रैलियां हुई. पैटी के समर्थन में आम जनता और सरकार, दोनों आई. फ़्रेंच राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यहां तक कहा कि इस्लाम में सुधार की ज़रूरत है. इस्लामिक देशों ने एक सुर में मैक्रों की आलोचना की. इसके बावजूद वो अपने बयान पर अडिग रहे. इसे आने वाले चुनाव से जोड़कर देखा गया.

ज़िमौर अपने चाल और चरित्र, दोनों में मुस्लिम-विरोधी रहे हैं. उनका सपोर्ट बेस बढ़ता जा रहा है. फिलहाल तो वो मैक्रों को चुनौती देते नहीं दिख रहे. लेकिन जानकार मानते हैं कि आने वाले समय में वो इस स्थिति को पलट भी सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए.


पूर्वी अफ्रीका के इन देशों में करोड़ों लोगों पर मौत का ख़तरा मंडरा रहा है

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