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जैसे सड़क पर गाड़ियां भिड़ती हैं, वैसे ही हवा में प्लेन क्यूं नहीं भिड़ते?


आज से लगभग इक्कीस साल पहले 12 नवंबर, 1996 को दुनिया का सबसे बड़ा ‘मिड एयर कोलीज़न’ हुआ था.


मिड एयर कोलीज़न मलतब आसमान में दो हवाई जहाजों का टकराना. इस टक्कर को ‘चरखी दादरी विमान हादसा’ के नाम से जाना जाता है क्यूंकि दोनों विमान टकराकर हरियाणा के चरखी-दादरी में गिरे थे. ये टक्कर दिल्ली से उड़ान भर रहे और दिल्ली लैंड करने जा रहे दो विमानों के बीच हुई थी. 349 लोग मारे गए थे.

चरखी दादरी विमान हादसे का मलवा
चरखी दादरी विमान हादसे का मलवा

 

मगर आज हम इसकी बात क्यूं कर रहे हैं, जबकि आज इसकी बरसी भी नहीं है?

कारण है कि अभी 10 जुलाई, 2018 को ठीक ऐसा ही एक हादसा होते-होते बचा, जब इंडिगो के दो विमान हवा में टकराने ही वाले थे. कुछ महीने पहले भी क़तर एयरवेज़ के दो विमान भारत के एयरस्पेस में टकराते-टकराते बचे थे.

यूं हमें साफ़ समझ में आता है कि जहां मिड एयर कोलीज़न इतने कॉमन नहीं हैं वहीं ‘बाल-बाल बचना’, मने ‘टकराते-टकराते बचना’ बहुत कॉमन है. और ये अच्छी बात है. लेकिन इस अच्छी बात के लिए हमें एटीएस और टीसीएएस का शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

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# एटीसी –

कार चलाते वक्त फ़ोन पर बात करना न केवल ग़ैरकानूनी है, बल्कि इसमें जान का ख़तरा भी है. क्यूंकि इससे कंसंट्रेशन भंग होता है. लेकिन इससे ठीक उल्ट एयरोप्लेन उड़ाते वक्त पायलट को पूरे समय वायरलेस में बातें करते रहना ज़रूरी है. इस वायरलेस के दूसरी तरफ होता है ग्राउंड स्टाफ. ये ग्राउंड स्टाफ, ग्राउंड में बसे किसी ऑफिस में बैठा रहता है, और इस ग्राउंड स्टाफ का नाम होता है एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स यानी एटीसी. इसका काम वही होता है जो सड़कों में ट्रैफिक पुलिस का होता है. रडार, वायरलेस, कंप्यूटर और कई अन्य आधुनिक उपकरणों से लेस एटीसी ही पायलट के साथ मिलकर इस बात को सुनिश्चित करता है कि कौन-सा विमान कब लैंड करेगा, कितनी हाईट में रहेगा, स्पीड क्या होगी आदि.

एयर ट्रैफिक कंट्रोल
एयर ट्रैफिक कंट्रोल

चूंकि किसी एयरपोर्ट पर लैंड करने वाले और वहां से टेक ऑफ करने वाले हर प्लेन से इसका संपर्क होता है इसलिए इसे ही ‘मिड एयर कोलीज़न’ की पहली शील्ड या ढाल कहा जा सकता है.


# टीसीएएस –

टीसीएएस का फुल फॉर्म है – ट्रैफिक कोलीज़न अवॉयडेंस सिस्टम यानी ऐसा सिस्टम जो दो विमानों को टकराने से बचाने के लिए ही बनाया गया है.

तो इस हिसाब से, जहां एटीसी एकाधिक काम देखता है वहीं टीसीएएस का ‘एकमात्र उद्देश्य’ है विमान को टकराने से बचाना. इसलिए ही टक्कर होने की स्थितियों में पायलट टीसीएएस और एटीसी में से टीसीएएस को वरीयता देता है. चूंकि टीसीएएस, एटीसी का हिस्सा नहीं है, इसलिए हो सकता है कि एक वक्त में पायलट को दो आदेश आ रहे हों.

दुनिया भर में एयर ट्रैफिक बहुत तेज़ गति से बढ़ रहा है (फोटो: metabunk.org)
दुनिया भर में एयर ट्रैफिक बहुत तेज़ गति से बढ़ रहा है (फोटो: metabunk.org)

टीसीएएस दरअसल एक इक्यूपमेंट है, और ये पूरी तरह ऑटोमेटिक है. मने इसे चलाने के लिए अलग से किसी बंदे की ज़रूरत नहीं पड़ती. न थल में न नभ में. यह हर उस विमान के लिए आवश्यक है जिसमें 19 से ज़्यादा लोग हों या जिसका ‘अधिकतम टेक-ऑफ़ वजन’ 5,700 किलो या उससे अधिक हो.

ये आवश्यक किया है आईसीएओ मने इंटरनेशनल सिविल एविएशन आर्गेनाइजेशन ने. आईसीएओ दुनिया की सभी एयरलाइन्स के लिए वही है जो भारत के लिए अभी मोदी. मतलब जिस तरह मोदी ने कह दिया नोटबंदी, तो नोटबंदी वैसे ही अगर आईसीएओ ने कह दिया टीसीएएस तो टीसीएएस.


# कैसे काम करता है टीसीएएस –

किसी विमान में लगा टीसीएएस हर उस दूसरे विमान के टीसीएएस से कम्यूनिकेट करता है जो उसके पन्द्रह किलोमीटर के दायरे में आता हो. और इस कम्युनिकेशन से आस पास के विमानों की मैपिंग करके पायलट को स्क्रीन में दिखा देता है. जीपीएस, या गूगल मैप होता है न जैसे वैसे ही. जैसे गूगल मैप में एटीएम, पेट्रोल पंप वगैरह दिखते हैं वैसे ही इस मैप में पायलट को अपने आस पास के सारे विमानों की लोकेशन दिखती है. लेकिन ये गूगल मैप मैप की तरह द्विआयामी नहीं थ्री डाइमेंशनल होता है. वो इसीलिए क्यूंकि कार को तो आप ऊपर नीचे नहीं चला सकते, लेकिन विमान को चला सकते हैं.

RA - रेसोल्यूशन एडवाईज़री, TA - ट्रैफिक एडवाईज़री
RA – रेसोल्यूशन एडवाईज़री, TA – ट्रैफिक एडवाईज़री (फोटो: विकिपीडिया)

टीसीएएस बाकी विमानों की लोकेशन की नहीं उनकी गति और एक्सलरेशन पर भी नज़र रखकर, सही-सही अनुमान लगा सकता है कि बाकी विमान कहां जा रहे हैं और कितनी गति से जा रहे हैं. और यूं अगर कोई दूसरा विमान बहुत क़रीब आ जाता है तो पायलट को इस बात का ‘ऑडियो अलर्ट’ मिल जाता है जिसे ट्रैफिक एडवाईज़री कहा जाता है.

अब ये पायलट का काम है कि वो आगे क्या करे. तो फिर भी अगर दोनों विमान 4 किलोमीटर के दायरे में आ जाते हैं तो टीसीएएस ‘रेसोल्यूशन एडवाईज़री’ ज़ारी करता है. इसके बाद दोनों नज़दीक आ रहे विमानों के पायलट डिसाइड करते हैं कि हादसे से बचने के लिए कौन सा विमान ऊपर जाना शुरू करेगा और कौन सा नीचे. इसके बाद दोनों ही पायलट एक ‘ऑडियो अलर्ट’ सुनते हैं. दोनों में से एक क्लाइंब और दूसरा डिसेंड सुनता है. यानी एक उंचा उठने का आदेश सुनता है और दूसरा नीचे जाने का. ये टीसीएएस ऑटोमेटिकली चुनता है. लेकिन फिर भी एक विमान के पायलट को अपना विकल्प चुनकर दूसरे को इन्फॉर्म करना होता है, क्यूंकि कई बार दोनों ही विमानों के टीसीएएस एक सा विकल्प चुन लेते हैं.

TCAS Collision
(फोटो: AeroSavy.com)

अब मज़े की बात ये है कि इसके ‘एलर्ट’ तो ऑटोमेटिक होते हैं लेकिन विमान की सुरक्षा पूर्णतया ‘मैन्युअल’ है. इसलिए ही बेशक ‘मिड एयर कोलीज़न’ दुर्लभ तो हैं लेकिन असंभव नहीं.

वैसे यदि आप विमान यात्रा से डरते हैं तो आपको ये बता दें कि विमान यात्रा दुनिया की सबसे सुरक्षित यात्रा है. और उसमें भी ‘मिड एयर कोलीज़न’ तो और भी रेयर-इंसिडेंट.


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