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'राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस' ट्रेंड हो रहा है, लेकिन इसके पीछे की क्रोनोलॉजी क्या है

1 सितंबर, 2020. ट्विटर पर एक ट्रेंड शुरू हुआ. #SpeakupforSSCRailwayStudents. शाम होते-होते ये हैशटैग पूरी दुनिया में टॉप पर ट्रेंड करने लगा. इस हैशटैग के साथ ट्वीट करने वालों की मांग थी कि SSC की लटकी पड़ी भर्तियों के रिजल्ट जारी किए जाएं. इसके अलावा ये बताया जाए कि रेलवे की ओर से निकाली गई NTPC और ग्रुप डी की परीक्षा कब होगी?

5 सितंबर, 2020. सोशल मीडिया ऐसे तमाम वीडियो और पोस्ट से भरा रहा, जिनमें SSC, रेलवे, बैंक के परीक्षार्थियों ने शाम 5 बजे, 5 मिनट के लिए थाली पीटी. कई जगह वो सड़कों पर भी उतरे. पूरा दिन #5Baje5Min, #5Sep5Min, #5बजे5मिनट, #RRBExamDate जैसे हैशटैग ट्रेंड करते रहे.

9 सितंबर, 2020. ट्रेंड कर रहा था #9बजे9मिनट. बात अब SSC और रेलवे से आगे निकल चुकी थी. अब इसमें अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग भर्तियों की तैयारी करने वाले छात्र जुड़ गए थे. ये एक देशव्यापी मुहिम की शक्ल ले चुका था. ये अभ्यर्थी बरसों से लटकी भर्ती परीक्षाओं को पूरा किए जाने की मांग कर रहे हैं. ये मांग कर रहे हैं कि जिन भर्तियों के लिए बरसों पहले नोटिफिकेशन निकाला गया था, उन्हें भरा जाए. ये अभ्यर्थी ‘समय पर’ प्रतियोगी परीक्षाएं कराने और उनके नतीजों की मांग कर रहे थे.

Ssc Railway

ये तीन उदाहरण हैं. सितंबर महीने में छात्रों और युवाओं की ओर से बड़े स्तर पर डिजिटल प्रोटेस्ट के. अभी तक हम देखते थे कि भर्तियों में धांधली, लटकी भर्ती को पूरा कराने आदि के लिए कैंडिडेट्स की ओर से लंबा-चौड़ा जुलूस निकाला जाता था. भर्ती आयोग का घेराव किया जाता था. सड़क पर प्रदर्शन किया जाता था. कोरोना काल शुरू हुआ, तो इन सब पर ब्रेक लग गया. लेकिन बरसों से भर्तियों के पूरे होने का इंतजार कर रहे युवाओं ने इसका भी रास्ता खोज लिया.

छात्रों ने मोदी जी वाला रास्ता पकड़ा. डिजिटल इंडिया का डिजिटल प्रोटेस्ट. प्रोटेस्ट भी ठीक वैसे ही, जैसे मोदी जी बताते हैं. ताली बजाकर, थाली बजाकर, दीया जलाकर. और ये सिलसिला अभी रुका नहीं है. आज 17 सितंबर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन. और ट्रेंड हो रहा है राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस. इसकी तैयारी पिछले एक सप्ताह से चल रही थी. हर दिन एक नया हैशटैग चलाया गया. लेकिन क्या आपको पता है कि ये हैशटैग कहां से आते हैं? इन्हें कौन तय करता है? और कौन हैं वो लोग, जो इन हैशटैग्स को लगातार ट्रेंड कराते हैं?

1 सितंबर को #SpeakUpForSSCRailway पर 3 मिलियन ट्वीट तक हुए.
1 सितंबर को #SpeakUpForSSCRailway पर 3 मिलियन ट्वीट तक हुए.

कहां से आते हैं हैशटैग?

गोविंद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. इसके अलावा वे ‘युवा हल्ला बोल’ नाम के एक संगठन से भी जुड़े हुए हैं. ऊपर जिन ट्रेंड्स का जिक्र किया गया है, उनमें ‘युवा हल्ला बोल’ की महत्वपूर्ण भागादारी रही है. गोविंद बताते हैं-

हम लोगों के साथ हर तरह के लोग जुड़े हुए हैं, चाहे वो एसएससी वाले हों, रेलवे वाले हों या फिर स्टेट की भर्ती परीक्षाओं से जुड़े लोग हों. हम लोग खुद भी कई सारे एग्जाम देते रहते हैं, तो इस तरह से कहीं न कहीं एक कम्यूनिकेशन चेन बन जाता है. वॉट्सऐप ग्रुप या टेलीग्राम ग्रुप के जरिए. वहीं से ये हैशटैग डिसाइड हो जाता है, वहीं से समय और तारीख भी. ज्यादातर आइडिया तो स्टूडेंट्स की ही तरफ से आते हैं. फिर जो हमारी को-ऑर्डिनेशन टीम है, उससे मिलकर हम लोग डिसाइड कर लेते हैं कि कौन-सा हैशटैग सही रहेगा, जिसमें ज्यादा लोग पार्टिसिपेट कर पाएं. जिसमें सटीक मैसेज चला जाए, जो हम देना चाहते हैं.

हम हर रोज देखते हैं कि पॉलिटिकल पार्टियों के आईटी सेल कई तरह के ट्रेंड कराते रहते हैं. आईटी सेल के पास एक पूरा कैडर होता है, जिसका काम ही रोज अलग-अलग चीजों को ट्रेंड कराना होता है. लेकिन छात्रों के जो ट्रेंड्स हैं, वो इन पॉलिटिकल पार्टियों के ट्रेंड्स की तरह नहीं हैं. कैसे, गोविंद बताते हैं-

हर पार्टी का अपना आईटी सेल है. ये लोग चाहें तो हर रोज ट्रेंड कराएं. ये अलग-अलग चीजों को ट्रेंड कराते भी हैं. लेकिन जो 1 सितंबर, 5 सितंबर या 9 सितंबर का कैम्पेन था, वो छात्रों का था. अलग-अलग भर्तियों में, अलग-अलग आयोगों के चक्कर काट रहे छात्र एक साथ जुड़ते चले गए और ये एक बड़ा कैम्पेन बन गया. इसे स्वत: स्फूर्त भी कह सकते हैं. जब हम किसी एक चीज के लिए आवाज उठाते हैं, तो जो हमसे जुड़े हुए दूसरे लोग हैं, वो भी साथ में जुड़ते हैं. वो कहते हैं कि अगर आपने आज Speak up For SSC चलाया है, तो फिर आप कल Speak UP For MPPSC, Speak UP For Railway भी चलाएंगे.

स्पार्क कहां से मिलता है

डॉ. सूर्य प्रताप सिंह. रिटायर्ड आईएएस हैं. पिछले कई साल से भर्ती आयोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई छेड़े हुए हैं. पहले सड़क पर युवाओं के साथ फिजिकल प्रोटेस्ट में शामिल होते थे. इस समय डिजिटल प्रोटेस्ट में युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शामिल हैं. डॉ. सूर्य प्रताप सिंह बताते हैं-

पांच-छह हजार ऐसे लोग हैं, जो ट्विटर पर बहुत अच्छे से एक्टिव हैं. ये लोग अलग-अलग मुद्दों को समय-समय पर उठाते रहते हैं. अब मेरी कोई टीम तो है नहीं. मैं अपने से ही ये करता हूं, तो सब लोग एकसाथ जुड़ जाते हैं. और फिर ये बड़े स्तर पर चलने लगता है.

डॉ. सूर्य प्रताप सिंह बताते हैं कि उनके पास युवाओं के ढेरों मैसेज आते हैं. इनमें ढेर सारे सुझाव शामिल होते हैं. वे बताते हैं-

हैशटैग के लिए हम उन शब्दों को चुनते हैं, जो खूब चलते हैं. जैसे हैप्पी बर्थडे हो गया. बीच में क्या हुआ कि हमने मीडिया पर एक हैशटैग चलाया, लेकिन उसमें एक शब्द को ट्विटर ने अश्लील मान लिया. इसलिए वो ट्रेंडिंग की लिस्ट में नहीं आ पाया. फिर हमने इसे रोक दिया. हालांकि 40 हजार से ज्यादा ट्वीट हुए थे उस पर. हमें जो मैसेज देना था, वो चला गया, ट्रेंड करे या न करे.

स्टूडेंट को कहां से मैसेज आता है

शुभम SSC की तैयारी करते हैं. 1 सितंबर को हुए Speak UP वाले प्रोटेस्ट में बढ़-चढ़कर शामिल हुए थे. हमने इनसे पूछा कि कब, कहां, कैसे, किस हैशटैग के साथ धावा बोलना है, ये कहां पर तय होता है? शुभम ने बताया-

कई बार हम स्टूडेंट्स लोग ही मिलकर करते हैं. हम अपने वॉट्सऐप ग्रुप में डिस्कस करते और फिर वहीं हैशटैग तय कर लेते हैं. ट्वीट्स का ड्राफ्ट बना लेते हैं. मीम्स तैयार कर लेते हैं. कई बार टीचर्स की ओर से आता है. वे लोग भी तो सीधे तौर पर बच्चों से जुड़े होते हैं. जब बच्चे फ्रस्ट्रेट, तो भी टीचर्स भी फ्रस्ट्रेट. फिर ये फ्रस्ट्रेशन दोनों मिलकर निकालते हैं. टीचर्स के जुड़ने से प्रोटेस्ट बड़ा हो जाता है, क्योंकि सारे टीचर्स एकजुट होते हैं.

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अमित ने हमें बताया कि वॉट्सऐप ग्रुप में किस तरह से डिजिटल प्रोटेस्ट की प्लानिंग की जाती है. अमित बताते हैं-

अलग-अलग वॉट्सऐप ग्रुप में ट्वीट्स का ड्राफ्ट बनाकर शेयर कर दिया जाता है. जैसे कल हैशटैग चलाना है, तो आज ही लड़के सारी तैयारी कर लेते हैं. क्या ट्वीट करना है, किसे टैग करना है. एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप तक शेयर होता रहता है. 15-20 मिनट में हजार-दो हजार ट्वीट हो जाता हैं, तो वो धीरे-धीरे ट्रेंड में आ जाता है.

अमित ये भी कहते हैं कि पिछले दिनों सोशल मीडिया पर जो डिजिटल प्रोटेस्ट हुए हैं, उनमें बड़ा हाथ कोचिंग संस्थानों और टीचर्स का रहा है. उन्होंने कहा-

अभी क्या हुआ कि कोचिंग इंडस्ट्री पूरी तरह से बंद थी. एग्जाम्स की डेट आई नहीं. अभी इनको चाहिए थी एग्जाम्स की डेट. क्योंकि एग्जाम्स की डेट आएंगी, तभी एडमिशन शुरू होंगे. कोरोना की वजह से सारी तैयारी डिजिटल में ही हो रही है. यूट्यूब, ट्विटर, टेलीग्राम पर लाखों की संख्या में स्टूडेंट्स कोचिंग वालों से जुड़े हुए हैं. अगर इन लोगों में से 10 फीसदी लोग भी लगातार ट्वीट कर रहे हैं, तो ट्रेंड शुरू हो जाता है. फिर बाकी जनता भी जुड़ने लगती है.

टीचर्स की क्या भूमिका?

पिछले दिनों हुए डिजिटल प्रोटेस्ट में कोचिंग संस्थान और टीचर्स के शामिल होने में कोई दो राय नहीं है. ऑनलाइन क्लासेज चलाने वाले कई टीचर्स ने तो प्रोटेस्ट के समय लाइव होकर स्टूडेंट्स को ब्रीफ भी किया कि इस तरह से ट्वीट करना है. इस तरह से वीडियो बनाना है. शुभम जैन उन टीचर्स में शामिल थे, जिन्होंने Speak up मूवमेंट शुरू किया. शुभम RBE यानी कि रिवॉल्यूशन बाय एजुकेशन नाम से यूट्यूब चैनल चलाते हैं, जहां वे SSC, बैंक, रेलवे आदि की तैयारी कराते हैं. डिजिटल प्रोटेस्ट में टीचर्स की भूमिका पर शुभम बताते हैं-

होता क्या है कि जैसे SSC बहुत धीरे काम कर रहा है. नोटिफिकेशन आए दो साल हो गया, तीन साल हो गया. लेकिन वैकेंसी पूरी नहीं हुई. तो बच्चे हमारे पास आते हैं कि सर ये दिक्कत आ रही है. तो एक तो ये होता है कि हम ग्रीवांसेज डालते हैं. आरटीआई लगाते हैं. लेकिन इससे उन पर कोई फर्क पड़ता है नहीं. तो फिर हम सोचते हैं कि मास प्रोटेस्ट के लिए ट्विटर का सहारा लिया जाए, क्योंकि ट्विटर पर बोलने से बात पहुंचती है सरकार तक. तो हम क्या करते हैं कि बच्चों की प्रॉब्लम्स को दूर करने के लिए कैम्पेन करते हैं.

कई बार बच्चे डिसाइड कर लेते हैं हैशटैग, कई बार हम करते हैं. टीचर्स के भी ग्रुप हैं. वहां भी डिसाइड हो जाते हैं. लेकिन अधिकतर बार बच्चे खुद ही तय करते हैं. फिर इसके बाद अगर लगता है कि मुद्दा सही है, इसे शेयर करना चाहिए, तो वो फिर सब लोगों को बता दिया जाता है.

डिजिटल और फिजिकल प्रोटेस्ट में अंतर

डॉ. सूर्य प्रताप सिंह ने डिजिटल और फिजिकल, दोनों तरह के प्रोटेस्ट का सफल नेतृत्व किया है. जब हमने उनसे पूछा कि कौन-सा प्रोटेस्ट ज्यादा प्रभावी है, तो उनका जवाब सुनिए-

इस समय सड़क पर आकर तो प्रोटेस्ट नहीं कर सकते हैं. मैं खुद लोगों से कहता हूं कि अभी कोरोना है, भीड़ इकट्ठी न करें. बाहर न निकलें. डिजिटल प्रोटेस्ट की रीच बहुत अच्छी है. यहां पर आप बड़ी संख्या में इकट्ठा हो सकते हैं और सीधे उन लोगों तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं, जहां आप पहुंचाना चाहते हैं. फिजिकली कहां कोई प्रधानमंत्री, गृहमंत्री  तक पहुंच सकता है. लेकिन अगर आप सड़क पर नहीं आओगे, तो डिजिटल से काम नहीं चल पाएगा.

पिछले कई दिनों से केंद्र सरकार को छात्रों की तरफ से संदेश दिए जा रहे हैं. सांकेतिक विरोध दर्ज किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई यूट्यूब वीडियो में डिसलाइक की भरमार से लेकर उन्हीं के दिए हुए ताली-थाली वाले आइडिया तक, ये सब हो रहा है, ताकि छिटपुट आवाज़ें इकट्ठा होकर सरकार के कानों पर गिरें. इसके लिए कई लोग मिलकर जोर लगाते हैं. एक सिस्टम की तरह काम करते हैं, ताकि बेरोजगारों की आवाज, नौजवानों की आवाज, छात्रों की आवाज सरकार के कानों तक पहुंच सके. और ये डिजिटल प्रोटेस्ट का सिलसिला लगातार जारी है.


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