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'मेरा डेटा लेकर कोई कर भी क्या लेगा...?' सोचने वाले ज़रा ये पढ़ लें

प्राइवेसी. हिन्दी में कहें तो एकांत, उर्दू में बोलें तो राज़दारी. बड़े लंबे टाइम से इसपर बहस चल रही है. वॉट्सऐप की नई प्राइवेसी पॉलिसी के आने के बाद ये बहस फ़िर से ताज़ा हो गई है. ये मैसेजिंग ऐप्स यूजर का कितना डेटा लेते हैं, इसको किसके साथ साझा करते हैं और इसका क्या करते हैं? आप इनकी सर्विसेज़ को इस्तेमाल कर रहे हैं तो क्या इनको आपकी निजी जानकारी का अधिकार मिल गया?

अपने देश में जहां आपसे ज़्यादा आपके रिश्तेदारों को आपकी शादी की चिंता होती है, वहां प्राइवेसी या पर्सनल स्पेस का कान्सेप्ट थोड़ा ढीला ढाला ही है. बात अलग लेवल की तब हो जाती है जब लोग दूसरे की छोड़ अपनी खुद की प्राइवेसी को भी अहमियत नहीं देते. वैसे लोग अपनी प्राइवेसी को अहमियत देते हैं, बस अपनी ऑनलाइन प्राइवेसी की कद्र नहीं करते. वॉट्सऐप वाले पूरे मसले पर बहुत से लोगों का ऐटिट्यूड यही है, “जकरबर्ग हमरेन मैसेज पढ़य तो बैठा है ना.”

सही है. फेसबुक वाले आपका ही मैसेज पढ़ने थोड़ी बैठे हैं. लेकिन शायद उन्हें आपके बारे में नीचे लिखे सारे सवालों के जवाब मालूम हैं:

  • आप कहां रहते हैं? कहां टहलते हैं? किससे बात करते हैं? कितनी देर बात करते हैं? किस वक़्त बात करते हैं?
  • आपके दोस्त कौन हैं? आपके रिश्तेदार कौन हैं? आप किस-किस को जानते हैं?
  • आपका ईमेल क्या है? आपका मोबाइल नंबर क्या है?
  • आप फोन कौन सा चलाते हैं? SIM कौन सा इस्तेमाल करते हैं?
  • आपके बैंक अकाउंट कहां है और कितने हैं? आप पैसा कहां और कितना खर्च करते हैं?
  • आपकी हॉबी क्या हैं? आपकी सेहत कैसी है? बीमारी है तो क्या है और कब से है?
  • आपकी पॉलिटिक्स में रुचि है कि नहीं? है तो किसे पसंद करते हैं और किसे नापसंद करते हैं?
  • आपका धर्म क्या है? आपकी आइडियोलॉजी क्या है? आपने पढ़ाई कहां की है और कब की है?
  • आपकी फैमिली में कौन-कौन हैं? बच्चे हैं कि नहीं? हैं तो कितने साल के हैं? स्कूल कहां जाते हैं?

और ये सब तो सिर्फ़ एक नमूना भर है. आपकी असल जानकारी कितनी है और उसका इस्तेमाल करके आपके बारे में और कितना कुछ जाना जा सकता है, इसका तो अंदाजा भी ठीक से नहीं लगाया जा सकता है. मगर फ़िर भी ऐटिट्यूड वही है, ये सब जानकर फ़ेसबुक या कोई और ऑनलाइन प्लैट्फॉर्म कर क्या लेगा? क्या कर लेगा उसपर भी आएंगे, मगर उससे पहले कुछ और बात.

प्राइवेसी के विरोधी अपनी खुद की प्राइवेसी के चैम्पियन हैं

साल 2009 में गूगल के CEO एरिक श्मिट से जब गूगल के उन कामों के बारे में पूछा गया जिनकी वजह से लोगों की प्राइवेसी भंग की जा रही है तो इन्होंने कहा, अगर आप कुछ ऐसा कर रहे हैं जो आप चाहते हैं कि कोई और न देखे, तो शायद आपको वो काम करना ही नहीं चाहिए.”

श्मिट साहब हमारे सामने ये बात कहते तो हम उनको बताते कि हमारे घर के टॉइलेट में दरवाज़ा क्यों है और कपल अलग कमरे में दरवाज़ा बंद करके क्यों सोते हैं. बहरहाल श्मिट महोदय ने हिपोक्रिसी की सीमा जल्द ही लांघी. CNET ने एक आर्टिकल छापा जिसमें इन्होंने एरिक श्मिट के बारे में बहुत सारी पर्सनल जानकारी झोंक दी. और ये सारी जानकारी किसी जासूस की मदद से नहीं जुटाई गई थी. बस एक कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने बैठकर गूगल पर सर्च करके उठाई गई थी. श्मिट साहब इतना दुखी हो गए कि गूगल के सारे कर्मचारियों से बोला कि CNET से अब से कट्टी. कोई बात नहीं करेगा इनसे.

Mark Zuckerberg
ज़करबर्ग की पॉलिसी को लेकर सवाल उठते रहे हैं. (तस्वीर: एपी)

प्राइवेसी की बात चले और फ़ेसबुक वाले मार्क जकरबर्ग डिस्कशन में न आए ऐसा कैसे हो सकता है. ये एक इंटरव्यू में बोले थे कि प्राइवेसी अब “सोशल नॉर्म” नहीं रह गया है. मतलब कि कहां चक्कर में पड़े हो प्राइवेसी के, ये सब बेकार की बातें हैं. मगर इन्हीं जकरबर्ग साहब ने अपनी पत्नी के साथ पालो आलटो में एक घर खरीदा तो सिर्फ़ अपना घर नहीं खरीदा बल्कि आस-पास के चार घर और खरीद डाले. क्यों? प्राइवेसी दादा, प्राइवेसी.

अगर आम ज़िंदगी में प्राइवेसी की तरह डिजिटल प्राइवेसी जरूरी नहीं है तो फ़िर हर किसी के सोशल मीडिया अकाउंट, बैंकिंग ऐप्स, ईमेल पर पासवर्ड लॉक क्यों लगा होता है? ज़्यादातर स्मार्टफोन यूजर्स के डिवाइस पर फोन लॉक क्यों लगा होता है?

प्राइवेसी का अधिकार

आपको अपनी ऑनलाइन प्राइवेसी की कदर हो या न हो मगर भारत का संविधान आपको प्राइवेसी का अधिकार या “राइट टु प्राइवेसी” देता है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 में इस बात को माना कि “राइट टु प्राइवेसी” एक fundamental right यानी मौलिक अधिकार है. 9 जजों की एक बेंच ने अपने फ़ैसले में कहा कि प्राइवेसी का अधिकार आर्टिकल 21 में दिए हुए “राइट टु लाइफ एण्ड पर्सनल लिबर्टी” का हिस्सा है. और ये प्राइवेसी ऑनलाइन भी लागू होती है.

इंडिया और बहुत से देशों में यूजर का डेटा बचाने के लिए डेटा प्रोटेक्शन कानून हैं. हालांकि NSA ह्विसल-ब्लोवर और प्राइवेसी ऐडवोकेट एडवर्ड स्नोडेन इसमें एक दिक्कत बताते हैं. ट्रेवर नोआह को दिए गए एक इंटरव्यू में स्नोडेन कहते हैं कि दिक्कत इस बात की है कि हमारे पास डेटा प्रोटेक्शन कानून हैं, लेकिन हमने मान लिया है कि डेटा कलेक्शन कोई बुरी बात नहीं है.

एडवर्ड स्नोडन
अगर अपने एडवर्ड स्नोडन के बारे में नहीं सुना तो आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं.

वॉट्सऐप के केस में भी किसी को तब तक कोई दिक्कत नहीं थी जब तक वॉट्सऐप यूजर का ढेर सारा डेटा ले रहा था. दिक्कत तब हुई जब इसने ये फ़ैसला किया कि अब ये डेटा फ़ेसबुक के साथ साझा करेगा. क्यों? क्योंकि फ़ेसबुक के पास पहले से लोगों का बहुत सारा डेटा है. इसमें वॉट्सऐप वाला डेटा जुड़ जाएगा तो इंसान की पूरी कुंडली फ़ेसबुक और इसकी कंपनियों के पास पहुंच जाएगी.

आपका डेटा लेकर ये कंपनियां क्या करती हैं?

इंसान एक सामाजिक प्राणी है. दूसरे लोगों से जुड़े रहे बिना जीवन कठिन होता है. सोशल मीडिया ने एक रास्ता दिया अपनी खुशी और अपने विचार दूसरों तक पहुंचाने का, उनसे बात करने का, उनसे दूर होते हुए भी उनसे जुड़े रहने का. मगर ये टेक कंपनियां सिर्फ़ आपके विचार, आपके फोटो, वीडियो ही नहीं लेते बल्कि आपकी एक पूरी प्रोफाइल तैयार कर देते हैं. आपकी पर्सनल, ऐकडेमिक और फाइनैन्शल हर तरह की जानकारी को मिलाकर तैयार की गई प्रोफाइल. इसमें वो सारी जानकारी भी होती है जो आप सिर्फ़ अपने बेस्ट फ्रेंड या पार्टनर के साथ शेयर करने में सहज हैं या वो जानकारी जो अपने बारे में सिर्फ़ और सिर्फ़ आप ही जानते हैं.

तो आपकी प्रोफाइल बन गई फ़िर क्या? फ़िर आप एक आसान टारगेट बन गए, सिर्फ़ जकरबर्ग के लिए नहीं बल्कि हर उस शख्स, कंपनी या सरकार के लिए जिसके पास ये डेटा मौजूद है.

ऐड दिखाने वाली कंपनियां जैसे फ़ेसबुक और गूगल इस डेटा का इस्तेमाल आपको ऐसे ऐड दिखाने के लिए करते हैं जिनका ज़्यादा से ज़्यादा इम्पैक्ट हो. ऐसा ऐड बेकार ही है जिसे आप देख कर इग्नोर कर दें. जब वो ऐड आपके मतलब का होगा तभी आप उसपर क्लिक करेंगे. बस आपके डेटा के जरिए ये बात पता चलेगी कि आप कितना पैसा खर्च कर सकते हैं और किस ऐड पर क्लिक करेंगे. फ़िर आपकी तरफ़ ऐसे ही ऐड भेजे जाते हैं जिनपर आप क्लिक करें ही करें.

facebook
कंपनियां आपके डेटा के जरिए आपको टारगेट करती हैं. (फ़ोटो: Gerd Altmann/ Pixabay

अगर आप ऐड देखकर फौरन ही खरीदारी नहीं करते हैं तब भी ऐसे ऐड धीरे-धीरे आपके ऊपर एक असर डालते हैं. खासकर आपके निर्णय लेने की क्षमता पर. आपको लगता है कि ये फ़ैसला आपका है मगर आपकी सोच लगातार ऐसे ऐड देखने की वजह से बदल चुकी होती है. इसे एक उदाहरण से समझिए:

मान लीजिए कि आपको चश्मे की जरूरत पड़ी और आपके ऊपर मौजूद डेटा में ये बात जुड़ गई. अब आपको हर तरफ़ चश्मे वाली वेबसाइट के ऐड दिखेंगे. आप भले ही चश्मा अभी न खरीदें, मगर जब भी चश्मे के बारे में बात आएगी तो आपके दिमाग में सबसे पहले उसी कंपनी का नाम आएगा जिसका आपने बार-बार ऐड देखा था. और कुछ इस तरह ये ऐड आपके निर्णय को इम्पैक्ट करते हैं.

ठीक इसी तरह ये डेटा जिसके पास भी होता है वो आपकी सोच को इसी तरह से इम्पैक्ट कर सकता है. कैंब्रिज एनालिटिका वाले केस में इस कंपनी ने फ़ेसबुक यूजर के डेटा का इस्तेमाल उनके वोट देने के फैसले को इम्पैक्ट किया था. और यहां भी लोगों को पता नहीं चला था कि इनके फैसले को किसी और ने शेप दिया है. अब सोचिए कि अगर आपका इतना सारा डेटा सरकार के पास हो तब क्या-क्या हो सकता है? और अगर ये डेटा लीक होकर गलत हाथों में पहुंच गया तब?

डेटा चाहे अमीर इंसान का हो या गरीब इंसान का, दोनों ही केस में बराबर इम्पॉर्टेन्स रखता है. ये पावर डिसाइड करता है. आपका डेटा आपके पास है तो पावर आपके पास है, दूसरे के पास है तो पावर उसके पास है. इस डेटा के इस्तेमाल होने के अनगिनत रास्ते हैं और ये जकरबर्ग के मैसेज पढ़ने से भी ज़्यादा खतरनाक है.


 

वीडियो: क्या सिर्फ वॉट्सऐप और फ़ेसबुक मैसेंजर, जो यूजर डेटा ले रहे हैं वो बहुत ज्यादा है?

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