Submit your post

Follow Us

माओ की राह पर चल कर क्या हासिल करना चाह रहे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग?

ये कहानी 1950 के दशक के आख़िरी सालों में शुरू हुई थी. चीन पर माओ त्से-तुंग की पकड़ मज़बूत होती जा रही थी. ताक़त का अहंकार उस पर हावी हो चुका था. इसी क्रम में माओ ने 1958 में ग्रेट लीप फ़ॉवर्ड की शुरुआत की. इस योजना का मकसद था, चीन की अर्थव्यवस्था को कृषि से उद्योग-केंद्रित बनाना. इसके लिए दो काम किए गए. पहला, सामूहिक खेती की शुरुआत हुई. खेतों पर सरकार का नियंत्रण हो गया. जिन खेतों पर किसानों का मालिकाना हक था, वहां वे दिहाड़ी मजदूर बनकर रह गए. उन्हें तय क़ोटा के हिसाब से फसल उपजाना होता था. गांवों में साझा किचन की शुरुआत की गई. ताकि महिलाएं भी खेतों में काम कर सके.

दूसरे मोर्चे पर स्टील का प्रोडक्शन बढ़ाने की योजना थी. माओ का गणित था कि अगर सब उसके हिसाब से चला तो चीन 15 सालों में सबसे आगे निकल जाएगा. लोगों को घरों के पीछे स्टील की भट्टियां लगाने का आदेश दिया गया. प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए अजीबोगरीब रास्ते अपनाए गए. किसानों के पास मौजूद खेती के औजारों को ज़ब्त कर लिया गया. उन्हें गलाकर नई चीज़े बनाने की कोशिश की गई.

कुछ ही समय में ये दोनों प्लान चौपट हो चुके थे. खेतों में लोगों से ज़बरदस्ती काम करवाया जाता था. उनके पास खेती के लिए ज़रूरी मशीनें नहीं थी. जब वे फसल का कोटा पूरा नहीं कर पाते थे, तो अधिकारी बीज तक उठाकर ले जाते थे. उन लोगों के खाने के लिए भी कुछ नहीं बचता था. जो लोग काम नहीं करने में अक्षम थे, उन्हें बोझ मान लिया गया था. रही-सही कसर मौसम ने पूरी कर दी. इसका नतीजा ये हुआ कि गांवों में अकाल पड़ने लगा. लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने लगे.

यही हाल इंडस्ट्री के मोर्चे पर भी था. जिन्हें स्टील के प्रोडक्शन में लगाया गया था, उनमें से अधिकतर इस काम के बारे में कुछ नहीं जानते थे. उनके पास न तो कोई अनुभव था और न ही उन्हें किसी तरह की ट्रेनिंग मिली थी. प्रशिक्षित इंजीनियर्स की भारी कमी थी. माओ सिर्फ़ जनसंख्या के दम पर देश बदलने का ख़्वाब देख रहा था. उसक कहना था, प्रोसेस मत समझाइए. प्रोसेस पर ध्यान नहीं देने से क्या हुआ? स्टील प्रोडक्शन का अधिकांश हिस्सा किसी काम का नहीं होता था. सरकार ने सारे तिकड़म भिड़ा लिए, फिर भी वे प्रोडक्शन की क़्वालिटी ठीक करने में नाकाम रहे.

Mao Zedong
1958 में माओ ने ‘ग्रेट लीप फ़ॉर्वर्ड’ नाम से एक कार्यक्रम चलाया जिसके कारण चीन में क़रीब साढ़े चार करोड़ लोगों की मृत्यु हुई

इन सबके अलावा जबरन मजदूरी, भुखमरी, टॉर्चर जैसी चीज़ें तो आम थीं. ग्रेट लीप फ़ॉवर्ड एक छलावा साबित हुई थी. इस दौरान दो करोड़ से अधिक लोग मारे गए थे. कुछ रिपोर्ट्स में मौत का आंकड़ा पांच करोड़ तक का है. ये सब अगर किसी लोकतांत्रिक देश में हो रहा होता तो लोगों ने कुर्सी खिसका दी होती. लेकिन ये चीन में हो रहा था. उस देश में जिसे ‘प्रोपेगैंडा स्टेट’ के नाम से जाना जाता है. मीडिया सरकारी भोंपू बजा रही थी. वहां वही दिखाया जाता था, जो कम्युनिस्ट पार्टी और चेयरमैन माओ लोगों को दिखाना चाहता था. क्या? सब चंगा सी. अच्छे दिन आने वाले हैं.

माओ को सब पता था कि असलियत में क्या हो रहा है. कम्युनिस्ट पार्टी के भीतरखाने में सारी रिपोर्ट्स पहुंचती थी. लेकिन उसे दबा लिया जाता था. माओ के आस-पास के लोग इससे वाक़िफ थे. लेकिन वो कुछ कर या कह नहीं पा रहे थे. उन्हें अपने अंज़ाम के बारे में पहले से पता था. जिन्होंने इसकी परवाह नहीं की, उनका हश्र पेंग देन्हुई के जैसा होने वाला था. पेंग देन्हुई एक समय माओ के वफ़ादार हुआ करते थे. उन्होंने कोरियन वॉर के दौरान चीनी आर्मी का नेतृत्व किया था. युद्ध खत्म होने के बाद उन्हें चीन का रक्षामंत्री बना दिया गया. पेंग इस पद पर साल 1959 तक रहे. फिर एक दिन उन्होंने माओ की इकोनॉमिक पॉलिसी की आलोचना कर दी. पेंग ने कहा कि द ग्रेट लीप फ़ॉवर्ड की नीतियां असली दुनिया में संभव नहीं है.

माओ को ये आलोचना पसंद नहीं आई. पेंग को पद से हटा दिया गया. उन्हें सुदूर गांव में भेज दिया गया. मई 1966 में जब सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत हुई. तब रेड गार्ड्स ने पेंग को गिरफ़्तार कर लिया. उन्हें तब तक पीटा गया, जब तक कि उनकी कमर नहीं टूट गई. 1970 में उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई. चार बरस बाद उनकी मौत हो गई. पेंग देन्हुई अर्श से फर्श तक पहुंचे थे. इसकी वजह थी, उनके दो अपराध. पहला, वो ग़लत को ग़लत कहने का माद्दा रखते थे. और दूसरा, वो बुद्धिजीवी थे. और, असली दुनिया की समझ रखते थे.

आप कहेंगे कि ये तो इंसान की खूबियां हैं, इन्हें ‘अपराध’ कैसे कहा जा सकता है? दरअसल, पेंग जिस देश और काल में अपनी अंतरात्मा की आवाज़ बाहर ला रहे थे, वहां ये खूबियां अपराध ही थीं. ठीक-ठीक कहें तो आज भी हैं. आज भी चीन सरकार आलोचकों को किनारे लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. भले ही ऐसे लोग कितने ही लोकप्रिय और ताक़तवर क्यों ना हों, उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. अलीबाबा के फ़ाउंडर जैक मा इसका ताज़ा उदाहरण हैं. सरकार टैलेंट शोज़ पर प्रतिबंध लगा चुकी है. स्कूलों के करिकुलम में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विचारों को शामिल किया गया है. ये सब करने के बाद सरकार का ध्यान अब म्युज़िक और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की तरफ़ गया है. जानकारों का कहना है कि चीन पांच दशक पुरानी ‘सांस्कृतिक क्रांति’ को दोहरा रहा है.

चीन की सांस्कृतिक क्रांति की पूरी कहानी क्या है? कथित नई सांस्कृतिक क्रांति के तहत किन्हें निशाना बनाया जा रहा है? इन सबके पीछे चीन और शी जिनपिंग का इरादा क्या है?

द ग्रेट लीप फ़ॉवर्ड की असफ़लता के चलते माओ का सिंहासन डोलने लगा था. पार्टी के भीतर विरोध की आवाज़ें उठने लगी थी. उसे हटाने की मांग तेज़ होने लगी थी. माओ ने सोवियत तानाशाह स्टालिन का हश्र देख लिया था. 1956 में स्टालिन की मौत के तुरंत बाद उसे खारिज किया जाने लगा. पार्टी के जनरल सेक्रेटरी निकिता ख्रुश्चेव ने एक सीक्रेट मीटिंग में यहां तक कह दिया कि सोवियत संघ की खराब हालत का इकलौता ज़िम्मेदार स्टालिन है.

Mao Zedong
माओ त्से-तुंग (फोटो: एएफपी)

1958 में देश की कमान ख्रुश्चेव के हाथों में आ गई. सत्ता में आने के तीन साल बाद एक ड्रामा रचा गया. स्टालिन की लाश को रेड स्‍क़्वायर के मक़बरे में रखा गया था. व्लादिमीर लेनिन की लाश के ठीक बगल में. अक्टूबर 1961 की घटना है. कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक चल रही थी. तभी एक बूढ़ी महिला ने खड़े होकर कहा, कॉमरेड! कल रात लेनिन मेरे सपने में आए थे. मैंने उनसे बात की. उन्होंने कहा, मुझे स्टालिन के बगल में लेटे रहने में बहुत दुख होता है. स्टालिन ने पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचाया है.

लेनिन तो सोवियत संघ के संस्थापक थे. कम्युनिस्ट पार्टी के माई-बाप थे. उनके हुक्म की तामील हुई. कुछ दिनों के बाद क्रेमलिन की दीवार के पास एक क़ब्र खोदी गई. फिर एक सुनसान रात में स्टालिन की लाश को निकालकर उसी क़ब्र में दफ़ना दिया गया. माओ के मन में ये डर घर कर चुका था. उसे लगा कि कुर्सी से उतरने के बाद उसके साथ भी वैसा ही होगा. इससे बचने के लिए माओ एक शातिर प्लान लेकर आया. इस कहानी के पीछे भी एक कहानी है.

बीजिंग में एक इतिहासकार हुए, वु हान. 1961 में उन्होंने एक नाटक लिखा. इसका नाम रखा गया, ‘हे रई डिस्मिस्ड फ़्रॉम ऑफ़िस’. इस नाटक का हीरो मिंग वंश के दरबार में अधिकारी था. उसने अंज़ाम की परवाह किए बिना राजा की आलोचना की. गुस्से में राजा ने उसे जेल में डलवा दिया. ये नाटक ख़ूब फ़ेमस हुआ. लोग हे रई के किरदार की तुलना पेंग देन्हुई से करने लगे, जिन्हें माओ ने ग्रेट लीप फ़ॉवर्ड की आलोचना के लिए रक्षामंत्री के पद से हटा दिया था. माओ इस नाटक से नाराज़ हो चुका था. तानाशाहों में अक्सर डर की बीमारी पाई जाती है. उन्हें हर चीज़ में साज़िश दिखती है. माओ भी इस बीमारी से अछूता नहीं था.

पहले तो नाटक के ख़िलाफ़ अख़बारों में रिपोर्ट्स छपवाईं गई. वु हान ने कहा कि ये नाटक उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. कम्युनिस्ट समाज में पुराने विचारों की बात करना मेरी ग़लती थी. लेकिन ग़लती तो हो चुकी थी. 1966 में वु हान को गिरफ़्तार कर लिया गया. तीन साल बाद जेल में ही उनकी मौत हो गई. वु हान जैसे लोगों की चीन में कोई कमी नहीं थी. ये सभी माओ की आंखों में खटक रहे थे. उन्हें हटाने के लिए एक फ़ुलप्रूफ़ प्लान की दरकार थी. कुछ ऐसा करना था, जिससे काम भी हो जाए और इल्ज़ाम भी न आए.

Mao Zedong
पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के संस्थापक माओ त्से-तुंग. (तस्वीर: एएफपी)

मई 1966 में माओ ने सांस्कृतिक क्रांति की अपील कर दी. उसने फ़ोर ओल्ड्स को जड़ से मिटाने का ऐलान कर दिया. फ़ोर ओल्ड्स को मिटाने का ऐलान. ये चार चीज़ें थीं- पुरानी संस्कृति. पुरानी विचारधारा. पुराने रीति-रिवाज और पुरानी परंपराएं. माओ ने ऐलान तो कर दिया. लेकिन जनता उसकी बात को गंभीरता से नहीं ले रही थी. चर्चा थी कि माओ की तबीयत खराब चल रही है. वो कुछ दिनों का मेहमान रह गया है. इस धारणा को बदलना ज़रूरी था.

जैसे ही माओ की तैरने वाली तस्वीर बाहर आई, जज़्बात ही बदल गए. नौजवान माओ के दीवाने हो गए. उन्हें लगा, अगर उनका लीडर 73 की उम्र में इतना जोशीला हो सकता है, तो हम उसकी बात क्यों न माने? वो जो कर रहा है, सही ही कर रहा होगा. फ़रवरी, 2020 की वॉक्स की एक रिपोर्ट है. इसमें एक तस्वीर की कहानी थी. गर्दन तक पानी में डूबे माओ की तस्वीर. तारीख थी 16 जुलाई 1966 की. यांग्सी नदी में माओ अपने हज़ारों चाहने वालों के साथ तैर रहा था. 73 की उम्र में माओ की उस तस्वीर ने बंदूक का ट्रिगर दबा दिया. नौजवानों को लगा, अगर 73 की उम्र में उनका नेता इतना एक्टिव हो सकता है, तो वे क्यों नहीं.

इसके बाद तो नौजवानों ने क़त्लेआम मचा दिया. इस बार निशाने पर थे, बुद्धिजीवी, टीचर-प्रफ़ेसर, वैज्ञानिक, धार्मिक नेता और वो सारी चीज़ें जो फ़ोर ओल्ड्स में शामिल हो सकती थीं. इन नौजवानों को रेड गार्ड्स का नाम दिया गया. वे अपने साथ एक छोटी किताब लेकर चलते थे. द लिटिल रेड बुक. इसमें माओ की चार सौ से ज़्यादा उक्तियां थीं. बताया गया था कि क्रांति के लिए क्या सही है और क्या नहीं?

माओ की इस किताब को पढ़ना सबके लिए अनिवार्य था. माओ के युग का धार्मिक ग्रंथ. जिनके घरों में रेड बुक नहीं मिलता, उन्हें माओ का दुश्मन मान लिया जाता था. उनके लिए मौत की सज़ा तय थी. इस किताब की एक अरब से अधिक कॉपीज़ बिकीं. रेड बुक को छापने के लिए सैकड़ों की संख्या में नए प्रिटिंग प्रेस खोले गए थे.

सांस्कृतिक क्रांति में आख़िर हो क्या रहा था? स्टूडेंट्स अपने टीचर के, मिल मज़दूर अपने मालिकों के, किसान ज़मींदारों की जान के दुश्मन हो गए. उन्हें परंपरावादी मान लिया गया था. नया सिस्टम उनके जाने के बाद ही आता. ऐसे लोगों के गले में ‘माओवाद विरोधी’ का पट्टा टांग कर जुलूस निकलता. अधिकतर मामलों में उन्हें चौराहे पर फ़ांसी दे दी जाती. ये सब माओ की मौत तक चला. दस सालों में 20 लाख से अधिक कवियों, पत्रकारों, प्रफ़ेसर्स और बुद्धिजीवियों की हत्याओं को अखबारों ने आत्महत्या में बदल दिया था. पुरानी किताबें, मूर्तियां, लाइब्रेरी सबको मिटा दिया गया.

Mao Zedong
माओ की फाइल फोटो.

पढ़े-लिखे लोगों को मिटाने के बाद माओ पार्टी के भीतर मुड़ा. ताक़तवर लोगों में एक बीमारी पाई जाती है. शक की. उन्हें हमेशा अपनी सत्ता छीन जाने का खतरा रहता है. माओ इससे अलग कतई नहीं था. उसने पार्टी के अंदर अपने दुश्मनों को मिटाने के लिए एक अनोखी स्कीम निकाली. वो सीधे हमला नहीं करता था. सरकारी भोंपू छापते, फलां आदमी माओ-विरोधी कुओमितांग पार्टी का समर्थक है. फलां आदमी चीनी संस्कृति का दुश्मन है. प्रोपेगैंडा वाली खबरें पढ़कर जनता उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ हो जाती थी.

इसी स्कीम की चपेट में 15 साल का एक लड़का भी आया. उसके पिता बड़े अधिकारी थे. उनपर भी माओ विरोधी होने का आरोप लगा. लड़के की मां को पति से नाता तोड़ने के लिए कहा गया. पिता का सरेआम परेड कराया गया. बाद में उन्हें जेल भेज दिया गया. उस लड़के को लेबर कैम्प में काम करने भेजा गया. उसकी एक बहन ने आहत होकर आत्महत्या कर ली. उसने कम्युनिस्ट पार्टी की मेंबरशिप लेने की कोशिश की. लेकिन पुराने रिकॉर्ड्स की वजह से उसे नौ बार मना कर दिया गया.

वो लड़का आगे चलकर चीन का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बना. वो लड़का था. शी जिनपिंग. वर्तमान में चीन का राष्ट्रपति. जिसे माओ के बाद चीन का सबसे करिश्माई नेता माना जाता है. ठीक-ठीक कहें तो माओ से भी ताकतवर नेता. शी जिनपिंग ने 2018 में चीनी संविधान की एक धारा बदल दी. इसके बाद वो जब तक चाहे, राष्ट्रपति पद पर बने रह सकते हैं.

ये सारी कहानियां आज सुनाने की वजह क्या है? दरअसल, जिस सांस्कृतिक क्रांति के चलते शी जिनपिंग के परिवार में इतने हादसे हुए. ख़ुद उन्हें लेबर कैम्प में रहना पड़ा. वही शी जिनपिंग चीन पर फिर से सांस्कृतिक क्रांति थोपने की कोशिश कर रहे हैं. अपने तरीके से. आधुनिक सेटअप में.

शी जिनपिंग की कथित सांस्कृतिक क्रांति के सबसे पहले शिकारों में से एक थे, अलीबाबा के फ़ाउंडर जैक मा. वो लगातार सरकार की तानाशाही पर सवाल खड़े कर रहे थे. कई मौकों पर उन्होंने सामने से सरकार का सामना किया था. अक्टूबर 2020 में एक कार्यक्रम में उन्होंने चीन के बैंकिंग सिस्टम में सुधार की मांग की. इसके बाद तो सरकार हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गई.

Xi Jinping
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. (तस्वीर: एपी)

अलीबाबा से जुड़े ऐन्ट ग्रुप का आईपीओ रद्द कर दिया गया. अलीबाबा के ख़िलाफ़ जांच बिठा दी गई. इतना ही नहीं, जैक मा अचानक से पब्लिक स्पेस से गायब हो गए. कुछ मौकों पर ही उनके वीडियोज़ रिलीज़ हुए. हालांकि, उनके बारे में कोई पुख़्ता जानकारी अभी तक नहीं आई है. जैक मा के बाद चीन सरकार ने कई और भी बड़ी कंपनियों पर डंडा चलाया है.

ये तो हुई बिजनेस की बात. अब चलते हैं एजुकेशन की तरफ़. मई 2021 में सरकार ने प्राइवेट स्कूलों का ज़बरदस्ती अधिग्रहण शुरू किया. इसके बदले में स्कूल के मालिकों को किसी भी तरह का मुआवजा नहीं दिया गया. चीन में 19 हज़ार से अधिक निजी स्कूल हैं. सरकार इन्हें अपने नियंत्रण में लेकर अपने अनुसार चलाना चाहती है. जानकारों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में विचारधारा और सिलेबस पर कंट्रोल करना आसान है.

इसके पीछे का मकसद तब देखने को मिला, जब 1 सितंबर से चीन में न्यू स्कूल ईयर की शुरुआत हुई. इस बार के सिलेबस में एक नई चीज़ जोड़ी गई है. इसका नाम है, शी जिनपिंग थॉट. इसकी पढ़ाई अनिवार्य है. शिक्षा मंत्रालय ने कहा है कि जिनपिंग के राजनैतिक विचारों को प्राइमरी स्कूल से लेकर ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई में शामिल किया जाएगा. सरकारी नोटिस के अनुसार, प्राइमरी स्कूल के टीचर्स को नई ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. अब उन्हें बच्चों में पार्टी, देश और समाजवाद से प्यार करने की भावना बढ़ानी होगी.

स्कूल की किताबों में जिनपिंग की तस्वीरों और उनकी उक्तियों को भी शामिल किया गया है. चैप्टर्स के बीच में जिनपिंग की आम लोगों से मुलाक़ात के क़िस्से दर्ज़ हैं. चीन में पहले से ही शी जिनपिंग के 14 सिद्धांतों का इस्तेमाल विस्तृत तौर पर हो रहा है. साहित्य और कला से लेकर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी अधिकारी उन सिद्धांतों का उदाहरण देते हैं. इतना ही नहीं, कई यूनिवर्सिटीज़ ने इन सिद्धांतों को पढ़ाने के लिए अलग से इंस्टिट्यूट भी खोले हैं. इन्हें अलग से फ़ंडिंग भी दी जा रही है.

इस कड़ी में सरकार ने नया निशाना म्युज़िक और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को बनाया है. दो सितंबर को ब्रॉडकास्टिंग रेगुलेटर्स ने कई तरह के रियलटी टीवी शोज़ पर प्रतिबंध लगा दिया. रेगुलेटर्स ने टीवी चैनल्स से कहा है कि वे महिलाओं की तरह बर्ताव करने वाले पुरुष कलाकारों को अपने शोज़ में शामिल न करें. बहुत अधिक मेकअप करने वाले पुरुष सेलिब्रिटीज़ की आलोचना भी की गई है. इसके बदले में पारंपरिक, समाजवादी और देशभक्ति की भावना बढ़ाने वाले कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाएगा.

इससे पहले सरकार वीडियो गेम्स पर भी नियम लगा चुकी है. नौजवान हफ़्ते में तीन घंटे से अधिक वीडियो गेम नहीं खेल सकते हैं. वो भी शुक्रवार, वीकेंड या छुट्टी वाले दिन. 18 साल से कम उम्र के लोगों के लिए हफ़्ते में एक घंटे का क़ोटा तय किया गया है. कई तरह के कॉन्टेंट को अनैतिक बताकर हटा दिया गया है. इन सबके अलावा, ऑनलाइन और ऑफ़लाइन, दोनों ही माध्यम में फ़ैन कल्चर पर नियंत्रण की भी तैयारी हो रही है. कुछ फ़ैन क्लब्स की वेबसाइट पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है. रेगुलेटर्स का कहना है कि इन प्लेटफ़ॉर्म्स पर फ़ैन्स का बर्ताव चीनी संस्कृति के ख़िलाफ़ था.

चीन सरकार हर नए नियंत्रण और प्रतिबंध में सांस्कृतिक मूल्यों का हवाला दे रही है. लेकिन अंत में इन सबका मकसद एक ही है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग की छवि को मज़बूत बनाना. जैसा कि माओ की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान हुआ था. कई चीज़ें पहली नज़र में काफ़ी ज़रूरी और अच्छी लग सकतीं है. लेकिन सरकारी नियंत्रण कभी भी आम जनता के हित में नहीं होता. याद रहे, सत्ता को बस कुर्सी की परवाह होती है.


वीडियो- दुनियादारी: तालिबान से दोस्ती कर चीन आखिर अफगानिस्तान में क्या फायदा देख रहा है?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.