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अमेरिका-भारत की ऐसी डील हो गई है, जिससे चीन और पाकिस्तान की टेंशन बढ़ सकती है

अमेरिका में चुनाव सिर पर हैं. राष्ट्रपति ट्रंप रहेंगे कि जाएंगे, इस पर शर्तें लग ही रही हैं. कोरोना का दौर बीता नहीं है. बावजूद इसके अमेरिकी सरकार ने अपने दो बड़े मंत्रियों – माइक पोम्पेओ और मार्क एस्पर को भारत के साथ 2+2 डायलॉग के लिए भेजा है. 27 अक्टूबर को भारत और अमेरिका ने BECA समझौते पर भी दस्तखत कर दिए. ये बताता है कि दोनों देश इस समोझौते को कितना महत्व देते हैं. कि इसके लिए दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति के चुनाव का इंतज़ार भी नहीं किया गया. क्या है ये BECA समझौता और भारत को इससे क्या फायदा होगा, आइए समझते हैं.

हमेशा से दोस्त नहीं थे भारत-अमेरिकी

भारत और अमेरिका – एक दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और दूसरा दुनिया का सबसे ताकतवर लोकतंत्र. ऐसे बताने से लगता है कि इन दोनों के बीच स्वाभाविक दोस्ती होनी चाहिए. लेकिन ऐसा था नहीं. भारत ने अमेरिका पर और अमेरिका ने भारत पर भरोसा करने में काफी वक्त लिया है. इतिहास की ज़्यादा लंबी क्लास न लगाएं, तब भी कुछ बड़ी घटनाओं का ज़िक्र करना लाज़मी है. भारत और अमेरिका के बीच आज की दोस्ती की शुरुआत होती है पुरानी दोस्ती खत्म होने से – जब मई 1998 में हमने परमाणु परीक्षण किए. अमेरिका इससे बहुत नाराज़ हुआ. हमपर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए. विदेश से हथियार मिलना तो दूभर हुआ ही, वर्ल्ड बैंक और इंटनैशनल मॉनेटरी फंड जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मिलने वाले कर्ज और दूसरी तरह की आर्थिक मदद पर भी रोक लग गई.

पोखरण दौरे के वक्त तत्तकालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेई.
पोखरण दौरे के वक्त तत्तकालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेई.

ऐसे आए भारत-अमेरिका करीब

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जानते थे कि अमेरिका से एक सामरिक साझेदारी के बिना भारत का आगे बढ़ना बहुत मुश्किल होगा. तो उन्होंने जसवंत सिंह को अपना विशेष दूत बनाकर जून 1998 में अमेरिका भेजा. जसवंत सिंह उन दिनो योजना आयोग के उपाध्यक्ष होते थे. जून 1998 से लेकर सितंबर 2000 के बीच उन्होंने क्लिंटन प्रशासन में डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट स्ट्रोब टालबट्स के साथ 14 बैठकें की जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुईं. तब जाकर भारत और अमेरिका के बीच बातचीत की रूपरेखा दोबारा तैयार हो पाई. आखिरकार मार्च 2000 में बिल क्लिंटन पांच दिनों के भारत दौरे पर आए. यहां से ये दोस्ती लगातार पक्की होती गई. 22 सितंबर 2001 को अमेरिका के नए राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत पर से प्रतिबंध हटाए. और 2 मार्च 2006 को मनमोहन सिंह के ज़माने में भारत और अमेरिका ने सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन अग्रीमेंट (सादी भाषा में न्यूक्लियर डील) पर दस्तखत किए.

Dr. Manmohan Singh
मनमोहन सिंह के जमाने में भारत और अमेरिका ने सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन अग्रीमेंट पर दस्तखत किए.

इसके बाद से भारत नियमित रूप से ऐसे अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय संधियों-समझौतों का हिस्सा बनता गया है, जिनसे उसकी सामरिक स्थिति मज़बूत होती है. लेकिन फिलहाल हमारा फोकस रहेगा अमेरिका के साथ हुए समझौतों पर. परमाणु संधि के तीन साल बाद भारत ने अमेरिका के साथ End User Verification Agreement पर दस्तखत किए. जुलाई 2009 में हुए इस समझौते End User Monitoring Agreement भी कहते हैं. इसके तहत अमेरिका भारत को बेचे उपरकणों का निरीक्षण कर सकता है. इसके बाद भारत को अमेरिका से हथियार खरीदने में कुछ आसानी होने लगी. अमेरिका भारत को और भी अत्याधुनिक सैन्य तकनीक और उपकरण बेचना तो चाहता था, लेकिन उसकी मांग थी कि भारत उसके साथ तीन समझौते करे जिन्हें वो फाउंडेशनल पैक्ट्स कहता था –

– Logistics Support Agreement (LSA)

– Communication and Information on Security Memorandum of Agreement (CISMOA); और

– Basic Exchange & Cooperation Agreement on geo-spatial services (BECA)

चूंकि भारत अचानक अमेरिका के पाले में जाता नज़र नहीं आना चाहता था, इसलिए तय किया गया कि भारत तीनों समझौतों पर एकसाथ दस्तखत नहीं करेगा और जिनपर करेगा, उनमें भी अपनी ज़रूरतों और चिंताओं के मुताबिक, बदलाव करवाएगा. इसी लक्ष्य के साथ 2003 में बातचीत शुरू हुई और 2016 में जाकर पहला समझौता हुआ –

Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA)

29 अगस्त 2016 को रक्षांत्री मनोहर पर्रिकर और अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस एश्टन कार्टर ने इस समझौते पर दस्तखत कर दिए. इसके तहत भारत और अमेरिका की सेनाएं एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कुछ चीज़ों के लिए कर सकती हैं. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, ये सहयोग ‘लॉजिस्टिक्स’ माने रसद की श्रेणी में ही होती है. मिसालन किसी उपकरण में खामी आने पर रिपेयर वर्क्स या फिर कोई सप्लाई पाने के लिए जैसे तेल या इंजन ऑइल. इसके लिए या तो सेवा की रकम अदा की जाती है या फिर अगली बार इसी तरह की मदद दूसरी तरफ से कर दी जाती है. आम तौर पर अमेरिका इस तरह की संधियां Logistics Support Agreement (LSA)नाम से करता है. लेकिन भारत ने इसे कुछ बदलावों के साथ स्वीकार किया और नया नाम पड़ा Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA).

Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA)

जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, ये समझौता दोनों सेनाओं के बीच जानकारी और सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए कानूनी ढांचा तैयार करता है. दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग के लिए ज़रूरी है कि वो एक दूसरे से सुरक्षित ढंग से बात कर पाएं. इसके लिए सेक्योर डेटा लिंक का इस्तेमाल करने वाले खास उपकरण चाहिए होते हैं. COMCASA के तहत ये उपकरण खरीदे जा सकते हैं और जानकारी भी ली या दी जा सकती है. सिद्धांततः भारत अमेरिका के अलावा उन दूसरे देशों से भी जानकारी बांट सकता है जो अमेरिकी सिस्टम इस्तेमाल करते हैं. इस तरह के समझौते अमेरिका Communication and Information on Security Memorandum of Agreement (CISMOA) नाम से करता है. लेकिन भारत ने अपने लिए कुछ बदलाव चाहे थे. तो नाम बदलकर हो गया COMCASA.इसपर 2018 में दस्तखत हुए. इसी साल नई दिल्ली में पहला 2+2 डायलॉग हुआ. 2+2 माने भारत के रक्षा और विदेश मंत्रियों की बैठक अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्री के साथ.

ऐसे खुली बेका (BECA) समझौते की राह

LEMOA और COMCASA पर दस्तखत के हो जाने के बाद जाकर सबसे महत्वपूर्ण BECA समझौते की राह खुली. Basic Exchange and Cooperation Agreement का संबंध जियो स्पेशियल इंटेलिजेंस. जियोस्पेशियल का हिंदी तर्जुमा होता है – भू-स्थानिक. कहने का तात्पर्य ये कि अंग्रेज़ी का हिंदी करने से समझ नहीं आएगा. उदाहरण से समझना होगा. हवाई जहाज़ उड़ाने के लिए या पानी का जहाज़ चलाने के लिए आपके पास नक्शों की सटीक जानकारी होनी चाहिए जिसे रीयल टाइम अपडेट भी किया जा सके. किसी मिसाइल को निशाना बताना है, उसके लिए भी टार्गेट की जानकारी चाहिए – ये भी नक्शे पर ही एक जगह का पता है.

सटीक निशाना लगाने के लिए सही लोकेशन बताने में जियो स्पेशियल इंटेलिजेंस का बहुत योगदान होता है. बेका समझौते से भारत को अमेरिकी की उन्नत तकनीक का सहयोग मिलेगा.
सटीक निशाना लगाने के लिए सही लोकेशन बताने में जियो स्पेशियल इंटेलिजेंस का बहुत योगदान होता है. बेका समझौते से भारत को अमेरिकी की उन्नत तकनीक का सहयोग मिलेगा.

ये सारी जानकारी आती है जियो-स्पेशियल इंटेलिजेंस के तहत. आप फोन पर गूगल मैप्स से रास्ता ढूंढते हैं. तब तकनीक की मदद से जियो-स्पेशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करते हैं. BECA के तहत इसी तरह की जानकारी भारत और अमेरिका के बीच बांटी जाएगी. जियो स्पेशियल इंटेलिजेंस के मामले में अमेरिका दुनिया में सबसे आगे है. उसके सैनिक उपग्रहों के पास बेहद सटीक जानकारी मौजूद है. इसकी मदद से भारतीय मिसाइल और भविष्य के ड्रोन न सिर्फ पहले से ज़्यादा सधा हुआ निशाना लगा सकते हैं, बल्कि इस जानकारी का इस्तेमाल किसी आपदा के वक्त राहत और बचाव के काम को बेहतर तरीके से करने के लिए भी किया जा सकता है. LEMOA ने दोनों देशों की नौसेनाओं के लिए साथ काम करना आसान बनाया था. यही काम BECA वायुसेना के लिए करेगा. वैसे इन तीनों समझौतों का फायदा दोनों देशों की तीनों सेनाओं को मिलेगा.

युद्ध स्मारक गए पोम्पेओ

अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पोम्पेओ और सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस मार्क एस्पर ने आज पहले राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर पहुंचकर श्रद्धांजलि दी. संयोग से आज 74 वां इंफेंट्री डे भी था. 1947 में जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान ने हमला कर दिया था. जब वहां के महाराज हरि सिंह ने भारत के साथ विलय स्वीकार किया, तो भारत ने अपनी सेना भेजी. इसमें से पहली टुकड़ी थी 1 सिख के जवानों की, जो आज ही के दिन श्रीनगर पहुंची थी. इसी की याद में 27 अक्टूबर को इंफेंट्री डे के तौर पर मनाया जाता है.

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अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पोम्पेओ और सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस मार्क एस्पर ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर पहुंचकर श्रद्धांजलि दी.

श्रद्धांजलि देने के बाद दोनों की मुलाकात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर से हुई. इस मुलाकात और मुलाकात के दौरान हुए BECA समझौते को बीज़िंग भी बड़ी बारीक निगाह से देख रहा होगा. क्योंकि चीन के मन में ये बात ज़रूर आई होगी कि अमेरिका के साथ हुए समझौते से मिली खुफिया जानकारी का इस्तेमाल भारत उसके खिलाफ तो नहीं करेगा. लद्दाख में दोनों देशों के बीच जारी गतिरोध अपने सातवें महीने में प्रवेश करने को है. इन समझौतों पर एक और राजधानी की नज़र होगी – मॉस्को. रूस भारत का सबसे पुराना और सबसे पक्का सामरिक साझेदार रहा है. रूस ने भारत की तब भी मदद की है, जब कोई भारत के पास नहीं फटकना चाहता था. और ये काम उसने बहुत कम शर्तें लगाकर किया. भारत अमेरिका की तरफ झुकता है तो रूस का चिंतित होना लाज़मी है. लेकिन फिलहाल भारत ने अपने पुराने दोस्त और अपने नए दोस्त – दोनों को खुश रखा हुआ है.


वीडियो – अमेरिका में राष्ट्रपति डिबेट कैसे शुरू हुई, कौन करवाता है, क्या नियम हैं?

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