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क्या होता है प्रिविलेज मोशन, जो शशि थरूर और निशिकांत दूबे एक-दूसरे के खिलाफ लाने पर आमादा हैं

एक देसी कहावत है सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठा. मतलब मामले में अभी कुछ हुआ नहीं और लोग बेवजह ही एकदूसरे से लड़ने लग जाएं. ऐसा ही कुछ फेसबुक और हेटस्पीच के कथित बीजेपी कनेक्शन वाले मामले में हो रहा है. मामला फेसबुक और बीजेपी से आगे बढ़ गया है. अब संसद में नया बखेड़ा होने की नौबत आ गई है. इसका नाम है प्रिविलेज मोशन. क्या होता है ये प्रिविलेज मोशन या विशेषाधिकार हनन का मामला. आइए जानते हैं-

हर बार की तरह पहले जानिए मामला क्या है?

हुआ ये कि अमेरिका के एक बड़े अखबार ने फेसबुक और बीजेपी के बीच हेट स्पीच को बढ़ावा देने के लिए कथित कनेक्शन निकाल दिया. इस पर भारत की संसद में आईटी मामलों की स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष शशि थरूर ने फेसबुक को आड़े हाथों ले लिया. उन्होंने कहा कि फेसबुक को संसदीय समिति के सामने बुलाया जाए. इस कमेटी के ही दूसरे मेंबर बीजेपी के निशिकांत दूबे ने थरूर की इस बयानबाजी को संसदीय समितियों के काम करने के नियम-कायदे के खिलाफ बता दिया. यहां तक धमकी दे डाली कि वह लोकसभा स्पीकर से शिकायत करेंगे कि इस मामले में शशि थरूर पर गंभीर कार्रवाई की जाए और उन्हें कमेटी से हटा दिया जाए. इस पर कांग्रेस नेता शशि थरूर कहां चुप रहने वाले थे. उन्होंने कहा कि यह उनके विशेषाधिकारों का हनन है. इसके लिए थरूर ने दुबे के खिलाफ यह कहते हुए विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे दिया कि उन्होंने ‘अपमानजनक बातें’ कही हैं. निशिकांत दुबे ने भी फौरन हिसाब चुकता कर दिया. उन्होंने भी विशेषाधिकार हनन का एक नोटिस दाखिल कर दिया. कारण बताया कि शशि थरूर और राहुल गांधी ने शालीनता की सभी सीमाएं पार कर दी हैं और मूलभूत संसदीय प्रक्रियाओं का पालन भी नहीं कर रहे हैं. इसके अलावा, उन्होंने मोशन में आरोप लगाया कि थरूर और राहुल गांधी फेक न्यूज और नफरत फैला रहे हैं. बीजेपी एमपी दुबे यहीं नहीं रुके, उन्होंने स्पीकर को लिखे अपने लेटर में लिखा है कि भले ही थरूर एक खास लहजे में हाईफाई अंग्रेजी बोलते हों लेकिन इससे उन्हें संसदीय कमेटी की गरिमा को गिरा कर अपने राजनीतिक मंसूबे पूरे करने का अधिकार नहीं मिल जाता. दूसरे एमपी राज्यवर्धन राठौर ने भी स्पीकर को पत्र लिखकर शशि थरूर को संसदीय कमेटी से हटाने को कहा है.

शशिथरूर ने फेसबुक हेटस्पीच मामले में फेसबुक को संसदीय समिति के सामने बुलाने की बात कही थी.
शशि थरूर ने हेटस्पीच मामले में फेसबुक को संसदीय समिति के सामने बुलाने की बात कही थी.

ये प्रिविलेज-प्रिविलेज क्या है?

प्रिविलेज का मतलब विशेषाधिकार, मतलब ऐसे खास अधिकार, जो सिर्फ चंद लोगों को ही मिले हुए हैं. इन चंद लोगों में शुमार हैं हमारे गणमान्य सांसद. चूंकि यही देश के लोकतंत्र के पहरुआ हैं इसलिए इनका बेरोकटोक और बिना डर के कामकाज करना बहुत जरूरी है. इस आजादी को सुनिश्चित करने के लिए ही इन्हें कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं. अब आपके दिमाग में आ रहा होगा कि ऐसा क्या खास अधिकार है इन लोगों को. तो आइए आपको सिलसिलेवार तरीके से बताते हैं.

भारत के संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 में इन्हें कुछ विशेषाधिकार मतलब स्पेशल पावर दी गई हैं. आर्टिकल 105 लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के लिए है. और आर्टिकल 194 विधानसभा और विधानपरिषद सदस्यों के लिए है.

बोलने की आजादी

किसी भी सदन में किसी भी सदस्य द्वारा कुछ भी बोलने पर किसी भी कोर्ट में मुकदमा नहीं चल सकता. सदस्यों के साथ-साथ सदनों के भी कुछ सामूहिक विशेषाधिकार होते हैं. जैसे-

# सदन की चर्चा और सदन की कार्यवाही को प्रकाशित करने का अधिकार सदन के पास रिजर्व होता है. स्पीकर के पास यह अधिकार होता है कि कौन-सी बात सदन की कार्यवाही में जाएगी और कौन-सी नहीं. कार्यवाही में जाना मतलब सदन के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज होना. सदन के आधिकारिक रिकॉर्ड में सारे बयान-भाषण जाते हैं. लेकिन ये रिकॉर्ड गैर ज़रूरी चीज़ों (जैसे शायरियां-गालियां) से न भर जाएं, इसलिए ऐसा किया जाता है. इसलिए सदन की कार्यवाही से निकाली गई किसी बात को मीडिया नहीं छाप सकता. ऐसा करना संसदीय विशेषाधिकार का हनन होता है.

गिरफ्तारी से छूट
किसी भी सदन के सदस्य को सिविल मामले (नॉन-क्रिमिनल मामले, जिन्हें हम दीवानी मामले भी कहते हैं) में सदन की कार्यवाही चलने से 40 दिन पहले और 40 दिन बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. ऐसे ही कोई भी सदस्य अगर सदन की किसी समिति का सदस्य है तो समिति की बैठक के 40 दिन पहले और इतने दिन बाद तक सदस्य की गिरफ्तारी नहीं हो सकती. हालांकि क्रिमिनल केस के मामले में ऐसी छूट नहीं है. अगर कभी किसी सदस्य को किसी मामले में गिरफ्तार किया जाएगा तो उसकी सूचना तुरंत ही सदन के सभापति को देनी होगी. गिरफ्तारी को लेकर एक नियम और है. वो ये कि कभी किसी सदस्य को सदन के अंदर से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. यह नियम जन प्रतिनिधियों को भयमुक्त होकर काम करने के लिए बनाए गए हैं.

गवाह बनने से छूट
सदन की कार्यवाही चलने के दौरान किसी भी सदस्य को कोर्ट में बिना सदन के सभापति की परमिशन के समन नहीं किया जा सकता. किसी भी अदालती मामले में किसी सदस्य को गवाह बनाने के लिए सभापति की परमिशन जरूरी होती है. इसके पीछे का लॉजिक भी यही है कि संसद की कार्यवाही में कोई खलल न पड़े और निडर होकर जनप्रतिनिधि काम कर सकें.

क्या-क्या आता है विशेषाधिकार हनन में?

यदि सदन के किसी सदस्य पर सदन के भीतर या बाहर झूठे या गलत आरोप लगाए जाते हैं तो यह विशेषाधिकार हनन के अंतर्गत आता है. कुछ ऐसा ही विवाद थरूर और दुबे के बीच चल रहा है. दोनों एकदूसरे पर उनके विशेषाधिकार हनन का आरोप लगा रहे हैं.
इतना ही नहीं, अगर कोई सदस्य सदन के अंदर झूठ बोलता है या कोई गलत दस्तावेज पेश करता है तो वह भी विशेषाधिकार हनन के अंतर्गत आता है. ऐसे में आरोप लगाने वाले के ऊपर विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई हो सकती है. राहुल गांधी पर सदन में झूठ बोलने का आरोप लगाकर भाजपा विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे चुकी है. ऐसे ही कांग्रेस पीएम और रक्षा मंत्री पर झूठ बोलने का आरोप लगाकर विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे चुकी है. संसद के भीतर सभी सांसद बराबर होते हैं. कोई भी मंत्री या प्रधानमंत्री नहीं होता. इसलिए प्रधानमंत्री भी स्पीकर के प्रति जवाबदेह होते हैं. प्रधानमंत्री के खिलाफ भी विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया जा सकता है.

कौन करता है प्रिविलेज मोशन पर कार्रवाई

इस तरह के मामलों में लोकसभा स्पीकर, राज्य सभा के चेयरमैन और विधान मंडलों के स्पीकर का रोल बहुत बड़ा होता है. इनके फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती (कभी-कभी विवाद छिटककर अदालतों तक जाते हैं. लेकिन वो गंभीर संवैधानिक प्रश्न होते हैं और ऐसा बहुत कम होता है). विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने पर किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार स्पीकर के पास ही होता है. प्रिविलेज मोशन की कार्यवाही का जिक्र लोकसभा की रूल बुक के बीसवें चैप्टर के रूल नंबर 222 पर है. राज्यसभा की रूल बुक के 16वें चैप्टर के रूल नंबर 187 में वहां कार्यवाही की प्रक्रिया बताई गई है.

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विशेषाधिकार हनन के मामलों में कार्यवाही का दारोमदार हाउस के मुखिया पर ही रहता है.

विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई का प्रॉसेस क्या है?

संसद और सांसदों के विशेषाधिकार की देखरेख के लिए सदन में एक खास समिति होती है, जिसे विशेषाधिकार समिति या प्रिविलेज कमेटी कहते हैं. लोकसभा में फिलहाल 15 सदस्यों की एक विशेषाधिकार समिति है. किसी सदस्य का विशेषाधिकार हनन होने पर वह स्पीकर को नोटिस देता है. स्पीकर यह तय करता है कि दिया गया नोटिस विशेषाधिकार कमिटी को भेजा जाना चाहिए या नहीं. अगर यह नोटिस विशेषाधिकार समिति को भेजा जाता है तो समिति अदालत की तरह ही मामले पर सुनवाई करती है. आरोपी व्यक्ति भी समिति के सामने पेश होता है. उसका पक्ष सुना जाता है. इसके बाद समिति कार्रवाई के बारे में अपनी सिफारिशें स्पीकर को भेज देती है. तब सदन तय करता है कि आरोपी पर क्या कार्रवाई की जाएगी.

सदन के किसी सदस्य पर विशेषाधिकार की कार्रवाई होने पर उसे चेतावनी देकर छोड़ा जा सकता है. गंभीर मामले में सदस्य को थोड़े टाइम या फिर स्थाई रूप से सस्पेंड किया जा सकता है. हालांकि अधिकांशत: सदन के सदस्यों को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है. सदन के बाहर के किसी भी आदमी को सदन कारावास और जुर्माने तक की सजा दे सकता है. जैसे जून 2017 में कर्नाटक विधानसभा ने विधायकों के खिलाफ गलत खबर छापने पर दो पत्रकारों को एक साल की जेल और 15,000 का जुर्माना लगाया गया था.

तो अभी शशि थरूर और निशिकांत दुबे के बीच प्रिविलेज-प्रिविलेज का जो खेल चल रहा है, वो सेमीफाइनल स्टेज में है. आगे सब स्पीकर के ऊपर है कि वो इसे विशेषाधिकार हनन का मामला मानकर आगे की कार्रवाई के लिए भेजते हैं कि नहीं.

वीडियोः कैसे काम करती हैं संसदीय समितियां, जिनमें विपक्ष के लोग भी होते हैं

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