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मनीष तिवारी ने अपनी किताब में ऐसा क्या लिखा जिसपर बवाल मच गया?

पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब. और पढ़ोगे कहां से? सयानों ने कहा, किताबों से. किताबें, जिन्हें पढ़ने में लगाया गया वक्त कभी ज़ाया नहीं होता. लेकिन जो किताबें पढ़ने वालों के काम की होती हैं, क्या लिखने वालों का नुकसान कर सकती हैं? सयानों के पास इस बात का जवाब नहीं था. लेकिन कांग्रेस के पास है.

वो कहती है हां, हाथ किताब लिखने से भी जल सकते हैं. सलमान खुर्शीद की किताब में हिंदुत्व को लेकर बवाल थम ही रहा था कि एक दूसरे कांग्रेस नेता मनीष तिवारी की किताब पर बवाल हो गया है. वो भी तब, जब किताब अभी लॉन्च भी नहीं हुई है.

इस किताब का नाम है 10 flashpoints: 20 years – National Security Situations that Impacted India’. रूपा पब्लिकेशन्स ने इसे प्रकाशित किया है. 1 दिसंबर को इस किताब का लॉन्च होगा.

मनीष तिवारी ने ट्विटर पर एक छोटा सा लेख साझा किया है, इसमें किताब का विषय और मकसद समझाने की कोशिश की गई है. इसके मुताबिक किताब में बीते दो दशकों – माने साल 2000 से 2020 के दरम्यान राष्ट्रीय सुरक्षा के जुड़ी घटनाओं पर गौर किया गया है.

हर हमले और हर घटना के बाद भारत की प्रतिक्रिया को भी आलोचनात्मक नज़र से देखा गया है. हमारी कूटनीति और खुफिया रणनीति का मूल्यांकन किया गया है. और फिर अंत में हैं सुझाव. कि 21 वीं सदी की चुनौतियों को देखते हुए भारत का नेशनल सेक्योरिटी डॉक्ट्रिन कैसे मज़बूत किया जा सकता है.

इस भारी भरकम मकसद की पूर्ति के लिए मनीष तिवारी ने 304 पन्ने लिखे हैं. लेकिन अभी के लिए हमारे पास हैं किताब के अंश, जिन्हें मनीष तिवारी ने किताब के मकसद वाले लेख के साथ ही ट्वीट किया है.

किताब आने से पहले ही किताब पर मचे इस बवाल में जितने स्टेकहोल्डर्स हैं, उनके पास फिलहाल किताब के अंश ही हैं. इनमें तीन टिप्पणियां हैं –

पहली टिप्पणी का ताल्लुक है अफगानिस्तान में तालिबान की जीत से. मनीष कहते हैं कि सोवियत संघ के बाद अमेरिका की हार ने सभी तरह के उग्रवादियों और आतंकवादियों का मनोबल बढ़ा दिया है. इनमें इस्लामिक स्टेट, अल कायदा, लश्कर ए तैयबा और जैश ए मुहम्मद जैसे संगठनों का नाम शामिल है. इसका परिणाम हमें जम्मू कश्मीर और पंजाब में देखने को मिल सकता है.

ये एक ऐसी टिप्पणी है, जिससे शायद ही कोई गैरइत्तेफाकी रखे. किसी भी विचार परंपरा से आने वाले विशेषज्ञ इस बात को मानते ही हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान का आना भारत के लिए एक नई तरह की चुनौती पेश करता है. खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर.

दूसरी टिप्पणी में मनीष कहते हैं कि जुलाई 2018 में मोदी सरकार ने चीन को ध्यान में रखते हुए बनाई जा रही माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन को स्थगित कर दिया. कारण दिया गया, आर्थिक तंगी का.

मनीष कहते हैं कि अगर माउंटेन स्ट्राइक कोर का गठन हो जाता और वो तैनात होती, तो 2017 के डोकलाम विवाद समेत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पेश आ रही दूसरी चुनौतियों से बचा जा सकता था. माउंटेन स्ट्राइक कोर न बनाकर मोदी सरकार ने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ा नुकसान पहुंचाया है.

माउंटेन स्ट्राइक कोर को बनाया जाना या न बनाया जाना एक लंबी और घुमावदार बहस है. और हम इसपर लौटेंगे. लेकिन फिलहाल चलते हैं मनीष तिवारी की आखिरी टिप्पणी पर, जहां से ये पूरा विवाद उठकर खड़ा हुआ.

ट्विटर पर साझा इस तीसरी टिप्पणी में मनीष तिवारी कहते हैं कि एक ऐसा देश जो सैकड़ों बेगुनाहों को मौत के घाट उतारने में ज़रा भी संकोच न करता हो, उसे लेकर संयम दिखाना ताकत की नहीं, कमज़ोरी की निशानी समझी जाती है. कभी कभी हमें शब्दों में नहीं, अपने काम से संदेश देने की ज़रूरत होती है.

26/11 के हमलों के बाद ये कर दिया जाना चाहिए था. अतः मुझे लगता है कि भारत को अपने 9/11 के बाद एक ”काइनेटिक रिस्पॉन्स” देना चाहिए था.

मनीष इस टिप्पणी में 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमलों को भारत का 9/11 बताते हैं. और दलील देते हैं कि जिस तरह 9 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमरीका ने अपने गुनहगारों को पनाह देने वालों के खिलाफ एक युद्ध छेड़ दिया था, वैसा ही कदम भारत को भी उठाना चाहिए था. काइनेटिक रिस्पॉन्स से तात्पर्य क्या और कितना है, ये मनीष ही बता सकते हैं. लेकिन ये साफ है कि मनीष महज़ कूटनीति की जगह ठेठ बलप्रयोग की बात कर रहे हैं.

मिसाल के लिए सेना का प्रकट या अप्रकट इस्तेमाल. हम जानबूझकर यहां सर्जिकल स्ट्राइक शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इससे बात फिसलने का डर रहता है. आप आगे समझ भी जाएंगे कि हम क्या कह रहे हैं.

26-11 के हमलों के बाद यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार की प्रतिक्रिया की बहुत आलोचना हुई थी. एनएसजी कमांडोज़ ने दिल्ली से मुंबई पहुंचने में जितना वक्त लिया, वहां से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील के कपड़े बदलते रहने तक, हर बात से असमंजस और अनिर्णय के साथ-साथ लचर प्रबंधन की बू आती रही.

शिवराज पाटील को तो अखबारों ने सीरियल ड्रेसर नाम ही दे दिया. मुंबई पुलिस, नौसेना, सेना और एनएसजी के ऑपरेशन में लश्कर ए तैयबा के 9 आतंकवादी मारे गए और आतंकवादी अजमल कसाब को ज़िंदा भी पकड़ लिया गया. भारत के पास इस बात के अकाट्य सूबत थे कि ये सब पाकिस्तान की ज़मीन से ही नहीं हुआ, इसमें पाकिस्तान के डीप स्टेट की भूमिका भी रही.

लेकिन देश पूछता रहा कि अब सरकार क्या कार्रवाई करेगी और देश पूछता ही रह गया.

सबसे हैरंतअंगेज़ खुलासा हुआ कुछ वक्त बाद. जब ये मालूम चला कि वायुसेना ने मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तान के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई के लिए सरकार को एक प्रस्ताव दिया था. लेकिन सरकार ने फैसला ही नहीं ले पाई.

तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल फाली होमी मेजर ने सेवानिवृत्त होने के बाद कई बार ये बात खुलकर स्वीकार की कि वाकई ऐसा हुआ था. वायुसेना तैयार थी, लेकिन चुनी हुई सरकार से आदेश ही नहीं मिला. और बिना आदेश के वायुसेना के हाथ बंधे ही रहे.

मनीष तिवारी की किताब में चाहे जो लिखा हो, लेकिन इस 6 लाइन की एक टिप्पणी ने पुराने ज़ख्मों को कुरेद ही दिया. भाजपा ने तत्परता से इस मुद्दे को लपक लिया. भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने तो पूरी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ही कर डाली.

गौरव भाटिया के मुताबिक मनीष तिवारी की टिप्पणी एक कबूलनामे की तरह थी. गौरव की बात का समर्थन भाजपा के तमाम दूसरे पदाधिकारियों जैसे अमित मालवीय और केंद्रीय मंत्रियों जैसे प्रह्लाद जोशी ने किया है.

इसके जवाब में मनीष तिवारी ने एक ट्वीट और कर दिया. कहा कि 304 पन्नों की किताब में से एक टिप्पणी पर भाजपा की प्रतिक्रिया ने उन्हें हैरान किया है. ये देखने वाली बात होगी कि क्या वो इसी तरह की प्रतिक्रिया किताब की उन बातों पर भी देंगे जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर उनके कामों की मूल्यांकन किया गया है.

राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा मसला है, जिसपर राजनैतिक बहस का न कोई ओर होता है, न कोई छोर. एक पार्टी के लिए ये एक सेल्फ गोल है. और दूसरी पार्टी के लिए एक ऐसा मौका, जिसमें विरोधी को धर के लपेटा जा सके. लेकिन क्या इस बहस का दायरा बस एक ट्वीट और दो बयान तक ही होना चाहिए? या फिर इस बहाने हमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों को लेकर भारत के बदलते रुख पर चर्चा करनी चाहिए?

इसी सवाल ने हमें प्रेरित किया कि हम पिछले 2 दशकों की बड़ी घटनाओं और भारत की प्रतिक्रिया पर एक नज़र डालें.
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने दर्जनों तरह की चुनौतियां हैं.

लेकिन इनमें से दो को हम प्रमुख मान सकते हैं. पहला है पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और दूसरा है चीन का विस्तारवाद. साल 2000 से लेकर 2020 के दरम्यान ज़्यादातर वक्त हम पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से ही जूझते रहे.

चीन हाल के सालों में चुनौती बना है. आइए कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र डालते हैं. लेकिन पहले आपको समझना होगा कि 21 वीं सदी की शुरुआत में माहौल था कैसा. भारत और पाकिस्तान दोनों अपने अपने यहां परमाणु परीक्षण कर चुके थे. इसीलिए सेक्योरिटी इस्टैबलिशमेंट को लगता था कि अब भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव नहीं होगा.

सबको एस्कलेशन का डर था. कि कहीं बात सैन्य टकराव से बढ़कर परमाणु धमाके तक न पहुंच जाए.

कारगिल की लड़ाई ने इस थ्योरी को गलत साबित किया. भारत के पास परमाणु बम था, बावजूद इसके पाकिस्तान ने हमारे खिलाफ सेना का इस्तेमाल किया. याद कीजिए तब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने साफ निर्देश दिये थे कि पाकिस्तानियों को खदेड़ा जाएगा,

लेकिन हमारी सेना, न ही नियंत्रण रेखा पार करेगी, और न ही किसी दूसरे मोर्चे पर लड़ाई छेड़ेगी. ये संयम भी था, और सतर्कता भी, ताकि परमाणु आपदा टाली जा सके.

पाकिस्तान कारगिल में कामयाब नहीं हुआ. लेकिन कारगिल 20 वीं सदी की लड़ाई थी. और 20 वीं सदी के तौर तरीकों से लड़ी गई थी. 21 वीं सदी में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अपनी खुराफातों का तरीका बदल दिया.

तब तक हमने उग्रवाद के नाम पर पूर्वोत्तर का नाम सुना था और आतंकवाद के नाम पर पंजाब या कश्मीर का. इन दोनों जगह आतंकवाद के पनपने की वजहें फिर भी समझी जा सकती थीं. लेकिन फिर सब कुछ बदल गया. अचानक कहीं भी हमले होने लगे. दिल्ली से लेकर अहमदाबाद और मुंबई तक. पहली बड़ी घटना थी, 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुआ हमला.

जैश ए मुहम्मद और लश्कर ए तैयबा के आतंकवादियों ने संसद पर हमला किया. पांचों आतंकवादियों का मार गिराया गया, लेकिन दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ और संसद के स्टाफ के 9 लोगों की जान चली गई. इसके बाद भी भारत ने सीमा पर एक बहुत बड़ा सैन्य जमावड़ा किया था. लेकिन मनीष तिवारी के शब्दों में कहें, तो कायनेटिक रिस्पॉन्स नहीं दिया जा सका.

इसके बाद हमलों की लंबी फेहरिस्त है. 24 सितंबर 2002 को गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर पर हमला हुआ. आतंकवादियों पर त्वरित कार्रवाई तो हो गई. लेकिन हम एक बार फिर कायनेटिक नहीं हो पाए.

2007 से लेकर 2013 तक उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार तक में बम धमाके भी हुए. इनके पीछे इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठनों का नाम आया. ये कहने को भारत की ज़मीन से काम करते थे, लेकिन इन्हें वैचारिक खाद पानी कहां से मिलता था, हमें अलग से कहने की आवश्यकता नहीं है.

2014 में आई मोदी सरकार. आतंकवाद पर ज़ीरो टॉलरेंस नीति का दावा रखने वाली सरकार. जून 2015 में NSCN खापलांग के उग्रवादियों ने मणिपुर में 6 डोगरा रेजिमेंट के जवानों के काफिले पर हमला किया. 18 जवान वीरगति को प्राप्त हुए. 5 दिन बाद ही सेना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके एक बड़ा ऐलान किया. कि इस हमले के दोषियों को म्यांमार के जंगलों में जाकर सेना ने मार गिराया है. ये था भारत का पहला सर्जिकल स्ट्राइक, जिसकी बड़े स्तर पर चर्चा हुई. घर में घुसकर मारने के मुहावरे का मतलब ही बदल गया.

ये संदेश दिया गया कि भारत अब सॉफ्ट स्टेट नहीं रह गया है. अगर उसे परेशान किया गया, तो नजीता भुगतना होगा.

लेकिन पूर्वोत्तर का उग्रवाद पंजाब या जम्मू कश्मीर के आतंकवाद से बिलकुल अलग है. इस मोर्चे पर भारत को पाकिस्तान जैसे एक न्यूक्लियर स्टेट से निपटने की आवश्यकता नहीं है. वही असमंजस, जो वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह को परेशान करता रहा. इसकी बानगी हमने अगले ही महीने देखी.

जुलाई 2015 में गुरुदासपुर में आतंकवादी हमला हुआ. 3 आतंकवादी मारे गए. लेकिन 3 आम लोग भी मारे गए और 4 पुलिस वाले वीरगति को प्राप्त हुए. कायनेटिक ऑपरेशन नहीं हुआ.

जनवरी 2016 में पठानकोट एयर फोर्स स्टेशन पर जैश ए मुहम्मद के आतंकवादियों ने हमला किया. एक बार फिर सभी 5 आतंकवादी मार दिए गए. लेकिन एक आम नागरिक की जान गई. और 7 जवान वीरगति को प्राप्त हुए. एक बार फिर कायनेटिक ऑपरेशन्स नहीं हुए.

लेकिन इसके बाद भारत ने अपना रुख बदला. 2016 के ही सितंबर में उरी में जैश ए मुहम्मद के आतंकवादियों ने हमला किया. सेना के कैंप में निहत्ते जवानों पर गोलियां बरसाकर 19 जवानों की जान ली. सेना ने त्वरित कार्रवाई की, और चारों आतंकवादियों को परलोक पहुंचा दिया. लेकिन इस बार बात यहीं खत्म नहीं की गई.

28 सितंबर को भारत ने नियंत्रण रेखा के पार सर्जिकल स्ट्राइक की. और सिर्फ की ही नहीं, भारत के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिटरी ऑपरेशन्स, लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने बाकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ये बात देश और पूरी दुनिया को बता दी.

यहां से हम पाकिस्तान के न्यूक्लियर ब्लफ को हवा होते देखते हैं. कि कुछ मत करो, वरना पाकिस्तान बम दाग देगा. भारत ने लकीर खींच दी थी. कि अगर पाकिस्तान अपने छद्म युद्ध में एक सीमा को पार करेगा, तो उसे नतीजा भुगतना होगा.

इसके बाद आता है 2019 की फरवरी में हुआ पुलवामा आत्मघाती हमला. जैश ए मुहम्मद और लश्कर ए तैयबा के आतंकवादियों ने बारूद से भरी एक वैन सीआरपीएफ के काफिले से टकरा दी. 40 जवानों की जान चली गई. आतंकवादियों पर त्वरित कार्रवाई भी हुई और 26 फरवरी को भारत ने सिर्फ नियंत्रण रेखा पार की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार जाकर पाकिस्तान की ज़मीन पर बने आतंकवादी कैंप पर बम गिरा दिए.

बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक, 1971 के बाद पहला मौका था जब भारत ने पाकिस्तान की सीमा में भारतीय वायुसेना को भेजा था.

अब आते हैं अंतिम सवाल पर. कि क्या माउंटेन स्ट्राइक कोर न बनाकर मोदी सरकार ने देश का अहित किया. संक्षेप में बात ये है कि सेना में टुकड़ियां दो तरह की हो सकती हैं. रक्षात्मक, जो आने वाले हमले को रोके. और आक्रामक, जो हमला करने के काम आए. भारत के ज़्यादातर माउंटेन डिविज़न जो चीन सीमा पर तैनात हैं, रक्षात्मक भूमिका में हैं.

ज़रूरत पड़ने पर हमला करने के लिए मनमोहन सिंह सरकार के समय में माउंटेन स्ट्राइक कोर का विचार आया.
ऐसी टुकड़ियां जिनमें तकरीबन 90 हज़ार सैनिक हों, जो पहाड़ों पर दुश्मन पर हमला बोल सकें. फिलहाल इस कोर की रेज़िंग या स्थापना स्थगित है. दो डिविज़न बनाए गए हैं, जो पूर्व और पश्चिम में तैनात हैं.


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