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सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे दिया लेकिन नोएडा में 40 मंजिला इमारत गिराई किस तरह जाएगी?

सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त को एक आदेश पास किया. आदेश कि नोएडा में सुपरटेक ग्रुप के 40-40 मंजिल के दो टॉवर गिराए जाएंगे. कोर्ट ने कहा कि ये ट्विन टॉवर्स बनाने से पहले ज़रूरी नियम-कायदों का पालन नहीं किया गया इसलिए अब तीन महीने के अंदर इन्हें गिरा दिया जाए.

इस ख़बर के आने के बाद एक क्यूरोसिटी है कि इतनी बड़ी-बड़ी इमारतों को गिराया कैसे जाएगा? इसके आस-पास और भी रेसिडेंशियल टॉवर्स हैं, तो क्या इन ट्विन टॉवर्स को गिराने से अगल-बगल की इमारतों को नुकसान नहीं पहुंचेगा? इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को भी समझते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट में अवैध रूप से टावर बनाने का मामला लंबे समय से अदालतों में घूम रहा है. सुपरटेक दिल्ली-NCR के बड़े बिल्डर ग्रुप का नाम है. एमराल्ड कोर्ट इनका एक प्रोजेक्ट है, जिसके तहत नोएडा में रेसिडेंशियल टॉवर्स बनाए गए थे. एमराल्ड कोर्ट के जो ट्विन टॉवर्स विवादों में हैं, वो हैं – T16 और T17. सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि इन दोनों टॉवर्स को बनाए जाने में नियमों की घनघोर अनदेखी की गई. 2014 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन टॉवर्स को गिराने का आदेश दिया था. इसके ख़िलाफ सुपरटेक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन अब वहां से भी हाई कोर्ट के आदेश पर मुहर लगा दी गई है. इसके बाद सुपरटेक के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित अरोड़ा कह रहे हैं कि वो सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे.

रहने वालों का क्या होगा?

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि 3 महीने के अंदर दोनों टॉवर्स गिरा दिए जाएं. गिराने से लेकर मलबा हटाने और तमाम अन्य खर्च सुपरटेक को ही वहन करने होंगे. कोर्ट ने कहा है कि इस पूरे प्रोसेस में अन्य इमारतों को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए. जो 2 टॉवर गिराए जाने हैं, उनमें एक-एक हज़ार फ्लैट हैं. कोर्ट ने कहा है कि बिल्डर को प्रभावित लोगों को उनकी रकम लौटानी होगी, वो भी 12 फीसदी ब्याज के साथ. रकम जमा करने के समय से ये ब्याज काउंट होगा.

Supertech Towers
सुपरटेक ट्विन टॉवर्स, नोएडा. (फोटो- PTI)

कैसे गिराई जाएंगी बिल्डिंग?

ये तो हुआ सुप्रीम कोर्ट का फैसला. लेकिन सवाल ये है कि इतने ऊंचे-ऊंचे दो टॉवर्स को गिराया कैसे जाएगा. ये अपने आप में एक बड़ा टास्क है. वो भी ये ध्यान रखते हुए कि इनके काफी करीब और भी टॉवर्स बने हैं, जिन्हें नुकसान न पहुंचे.

किसी भी स्ट्रक्चर को गिराने के कुछ स्टेप्स होते हैं.

1. सर्वे करना

2. खाली कराना.

3. प्लानिंग.

4. गिराना.

पहला स्टेप है सर्वे का. सर्वे में कुछ ख़ास बातों का अध्ययन किया जाता है, इनके बारे में सर्वे किया जाता है जैसे कि –

# बिल्डिंग कब बनी है. जब बनी थी तो कैसे बनी थी. और क्या बनने के बाद भी इसमें कुछ बदलाव किए गए.

# बिल्डिंग के बारे में कुछ और बातें. जैसे कि – भूकंपरोधी है कि नहीं, वॉटर ड्रेनेज सिस्टम, अंडरग्राउंड कंस्ट्रक्शन वगैरह की जानकारी.

# बिल्डिंग के आस-पास क्या है. कितनी दूरी पर दूसरे कंस्ट्रक्शन हैं. वगैरह वगैरह.

दूसरा स्टेप है खाली कराने का. बिल्डिंग में रहने वाले लोगों को हटाना. बिल्डिंग के एक-एक कोने की जांच करना, ख़ासकर इस लिहाज से वहां कोई ऐसी चीज न रह जाए जो बिल्डिंग गिराते वक्त बड़ा धमाका या बड़ा नुकसान कर सके.

प्लानिंग और डिमोलिशन

तीसरा और चौथा स्टेप होता है प्लानिंग और डिमोलिशन का. प्लानिंग यानी अब बिल्डिंग को कैसे गिराना है? किसी भी स्ट्रक्चर को गिराने के दो तरीके हो सकते हैं.

एक्सप्लोसिव  – इसका इस्तेमाल ऊंची इमारतों को गिराने के लिए किया जाता है.

नॉन एक्सप्लोसिव –इसका इस्तेमाल बहुत ऊंची इमारतों में नहीं किया जाता क्योंकि समय, लागत और ऊर्जा बढ़ जाती है.

नॉन एक्सप्लोसिव तरीके

नाम से ही साफ है कि बिल्डिंग को गिराने के वो तरीके, जिसमें विस्फोटक का इस्तेमाल नहीं किया जाता. जैसे कि –

# छैनी, हथौड़ी से चोट कर-करके गिराना. ऑब्वियस है कि ये तरीका एकाधी दीवारों को गिराने या बहुत छोटे स्ट्रक्चर को गिराने के लिए ही इस्तेमाल होता है.

# बुलडोज़र. किसी घर, कुछ मंजिलों की इमारत, छोटे-मोटे कॉम्प्लेक्स को गिराने में बुलडोज़र की मदद ली जा सकती है.

# ब्रेकिंग बॉल. ये एक भारी, बहुत भारी गेंद होती है, जिसे क्रेन पर टांगकर इससे बिल्डिंग पर चोट मारी जाती है. ये तरीका 10-12 मंजिल तक की इमारत को भी गिराने में भी काम आ सकता है.

Buldozer
नॉन एक्सप्लोसिव मेथड से गिराई जाती एक इमारत. (फोटो- PTI)

बुलडोज़र और ब्रेकिंग बॉल मेथड में ये ध्यान रखना होता है कि जिस स्ट्रक्चर को गिराना है, उसके बहुत पास में कोई और स्ट्रक्चर न हो वरना उसे भी नुकसान हो सकता है.

एक्सप्लोसिव तरीके

एक बार फिर नाम से ही साफ है कि बिल्डिंग गिराने का वो तरीका, जिसमें विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जाता है. इसके भी दो तरीके होते हैं.

# ट्री टाइप फॉलिंग – जब कोई पेड़ गिरता है तो हमेशा वो एक बड़ा एरिया कवर करता है. अमूमन जितनी उसकी लंबाई चौड़ाई होती है, करीब-करीब उतना ही. इसी मेथड पर बेस्ड है गगनचुंबी इमारतें गिराने का पहला तरीका भी. जब बिल्डिंग के अगल-बगल में काफी फ्री स्पेस हो तो इस मेथड का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें बिल्डिंग के सबसे नीचे फ्लोर में विस्फोटक लगाए जाते हैं. फिर ताकतवर ब्लास्ट कराया जाता है जिससे बिल्डिंग अपने दाएं या बाएं और झुकते-झुकते धराशायी हो जाती है.

# फुटप्रिंट फॉलिंग – ये मेथड तब इस्तेमाल किया जाता है, जब बिल्डिंग को गिराने के लिए अगल-बगल में फ्री स्पेस न हो. इसमें बिल्डिंग के बिल्कुल बीचोंबीच के फ्लोर के आस-पास विस्फोटक लगाए जाते हैं. ब्लास्ट कराने पर बिल्डिंग अपनी ही जगह पर बैठ जाती है.

Footprint Demolish
ऐसी संकरी जगहों पर इमारत गिराने के लिए फुटप्रिंट फॉलिंग मेथड का इस्तेमाल करना पड़ता है. (सांकेतिक फोटो- PTI)

छैनी, हथोड़ी की मदद से छोटी दीवारों को गिराने की बात छोड़ दें तो बाकी सभी मेथड के लिए स्पेशलिस्ट काम करते हैं. ख़ासकर विस्फोटक से बड़े ढांचे गिराने के लिए तो डिग्रीधारी इंजीनियर्स तक लगते हैं. जहां तक सुपरटेक की बिल्डिंग गिराने का सवाल है तो अभी नोएडा अथॉरिटी की तरफ से ऐसा कुछ नहीं बताया गया है कि बिल्डिंग गिराने में कौन सा तरीका अपनाया जाएगा. सुपरटेक के बताने का तो सवाल ही नहीं उठता क्योंकि वो तो कोर्ट में रिव्यू पिटीशन डाल रहे हैं. लेकिन इमारतों को गिराने के तमाम तरीकों के बारे में जानने पर ये समझ आता है कि ट्विन टावर्स को गिराने में फुटफॉल एक्सप्लोसिव फॉलिंग मेथड का इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि बिल्डिंग के आस-पास बमुश्किल 9 से 10 मीटर की जगह ही खाली है.


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