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संसद में होता रहा हंगामा, बिना चर्चा के केंद्र सरकार ने बना दिए ये 5 कानून

इस देश की सबसे बड़ी पंचायत है संसद. इस मकसद से बनाई गई कि लोगों की ज़िंदगी से जुड़े मसलों पर गंभीर चर्चा हो और फिर जहां ज़रूरी लगे, कानून बनाया जाए. लेकिन बीते दो हफ्तों से संसद अपना काम आधा ही कर रही है. बिल पर बिल पास हो रहे हैं, लेकिन बिना चर्चा. क्योंकि हंगामा हो रहा है. सुनने में स्कूल या कॉलेज की क्लास में होने वाले हंगामे जैसा लगता है. लेकिन उससे कहीं गंभीर मुद्दा है. ऐसे कानून हो हल्ले में बन गए, जो आपकी ज़िंदगी पर सीधा असर डाल सकते हैं. इसीलिए हम आपको इन कानूनों के बारे में तफसील से बताएंगे.

हम सांसद क्यों चुनते हैं? क्या सांसदों का काम सिर्फ इतना है कि बहुमत जोड़कर 5 साल में सरकार बना सकें. क्या होता है हमारे सांसदों का असल काम? क्यों होती है संसद और उसके साल में तीन सत्र? क्या इसीलिए कि सत्ता पक्ष और विपक्ष एक साथ बैठकर हो हल्ला कर सकें? संविधान लिखने वालों ने संसद को सबसे बड़ी ताकत दी. संविधान में बदलाव का हक सिर्फ संसद को दिया, सरकार को भी संसद के प्रति उत्तरदायी बनाया. सांसद के पास इतनी ताकत है कि वो सरकार के सबसे बड़े मंत्री से सवाल पूछ सकता है, और मंत्री को जवाब देना पड़ता है.

लेकिन पिछले तीन हफ्तों से हम क्या देख रहे हैं. विपक्ष के सांसद हंगामा करते हैं. सदन कई बार स्थगित भी होता है. और शाम तक संसद से ये भी खबर आती है सरकार ने अमुक बिल पास कर लिया. बिना चर्चा के, बिना बहस के संसद से बिल पास हो रहे हैं. उन क्षेत्रों के कानून जो संसद में जब भी आए खूब बवाल हुआ, पक्ष-विपक्ष में खूब बहस हुई, कई बार बिल गिर गए. वो बिल भी अब बिना चर्चा के पास हो रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि सरकार भी विपक्ष के हंगामे वाले मौके को भुनाने में लगी है, संसद से बिल पास कराना संसद से महज एक औपचारिकता सी बन गई है. तो मानसून सत्र के हंगामे में सरकार ने कौनसे बिल पास करवाए, जिन्हें पर चर्चा होनी चाहिए थी. हम 5 बिल आपके लिए लेकर आए हैं.

1. जनरल इंश्योरेंस बिजनेस (राष्ट्रीयकरण) संशोधन बिल

इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद साल 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था. राष्ट्रीयकरण का मतलब है कि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों को सरकार ने अपने कंट्रोल में ले लिया था. इसके तीन बरस बाद 1972 में इंदिरा गांधी सरकार एक और कानून लेकर आई थी. निजी इंश्योरेंस कंपनियों के राष्ट्रीयकरण का कानून. कानून का नाम था- जनरल इंश्योरेंस बिजनेस(राष्ट्रीयकरण) कानून 1972. इसके बाद सरकार का इंश्योरेंस वाला काम संभालने के लिए जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी GIC बनाया गया. फिर जो भी प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियां थीं, उनका कंट्रोल आ गया GIC के पास. कंपनियों के राष्ट्रीयकरण के तहत प्राइवेट कंपनियों को मिलाकर चार सरकारी इंश्योरेंस कंपनियां बनाई गईं-

1. नेशनल इंश्योरेंस
2. न्यू इंडिया अश्योरेंस
3. ऑरिएंटल इंश्योरेंस
4. यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस

ये चारों जनरल इंश्योरेंस कंपनियां आज तक चली आ रही हैं.

अब मोदी सरकार इंदिरा गांधी के दौर में बने कानून में बदलाव के लिए बिल लेकर आई है. जिसका नाम है- जनरल इंश्योरेंस बिजनेस (नेशनलाइज़ेशन) अमेंडमेंट बिल, 2021. तो क्या बदलाव करना चाहती है सरकार? 1972 में इंदिरा सरकार ने जो काम किया था मोदी सरकार लगभग उसका उल्टा कर रही है. तब इंश्योरेंस वाली प्राइवेट कंपनियों को सरकारी बनाया गया था. और अब उन सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी प्राइवेट कंपनियों को बेची जाएगी. इसी के लिए पुराने कानून में बदलाव किया जा रहा है.

संसदीय कामकाज पर नज़र रखने वाली वेबसाइट PRS के मुताबिक – पुराने कानून में प्रावधान है कि सरकारी जनरल इंश्योरेंस कंपनियों में 51 फीसदी हिस्सेदारी सरकार की होनी चाहिए. इस प्रावधान को नए बिल से खत्म किया जा रहा है. मतलब ये है कि इन इंश्योरेंस कंपनियों पर सरकार का पहले जितना कंट्रोल रहता था, अब उतना नहीं रहेगा. कंपनी के डायरेक्टर्स कौन होंगे, पॉलिसी क्या होगी, ये पहले सरकार तय करती थी. लेकिन अगर नया संशोधन वाला बिल कानून बन जाएगा, तो सरकार की भूमिका कम हो जाएगी. कुल मिलाकर बात ये है कि सरकारी इंश्योरेंस कंपनियों को प्राइवेटाइज़ करने की तरफ सरकार आगे बढ़ रही है. लोकसभा से सरकार ने ये बिल बिना चर्चा के पास करवा लिया है.

इंश्योरेंस देश में बहुत संवेदनशील मसला रहा है. जब भी इंश्योरेंस को लेकर कोई नया कानून लाने की बात हुई तो खूब बहस हुई हैं. 1996 में कांग्रेस सरकार इंश्योरेंस में FDI का बिल लेकर आई तो लेफ्ट और बीजेपी ने एकजुट होकर विरोध किया. जब वाजपेयी सरकार इंश्योरेंस में FDI का बिल लेकर आई तो कांग्रेस विरोध में थी. मनमोहन सिंह सरकार ने इंश्योरेंस में FDI बढ़ाकर 49 फीसदी करने के लिए खूब कोशिश की. लेकिन बीजेपी समेत विपक्षी पार्टियां विरोध करती रही. बिल पास नहीं हो पाया. मोदी सरकार ने FDI बढ़ाकर 74 फीसदी किया तब भी खूब बहस हुई, विपक्ष ने जी जान लगाकर विरोध किया. यानी कभी ऐसा नहीं हुआ कि इंश्योरेंस को लेकर कोई बड़ा बिल संसद में आए और वो सन्नाटे में पास हो जाए. लेकिन अब जनरल इंश्योरेंस बिजनेस (राष्ट्रीयकरण) संशोधन बिल बिना किसी चर्चा के पास हो गया.

2. Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021

हंगामे के बीच ये बिल सरकार ने पास करा लिया है. किस बारे में है ये बिल. इसके तहत अब ज़िला कलेक्टर को बच्चे गोद देने के मामले में ज़्यादा अधिकार दिए जाएंगे. 2015 में लाए गए जुवेनाइल एक्ट में संशोधन के लिए ये बिल लाया गया है. 2015 के जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में ये व्यवस्था थी कि सिविल कोर्ट से आदेश आने के बाद अडॉप्शन यानी गोद लेने की प्रक्रिया को पूरा माना जाएगा. नए बिल में यही अधिकार ज़िला मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट को भी दे दिए गए हैं.

दूसरा बड़ा बदलाव है नाबालिगों के किए अपराधों के संदर्भ में. नए कानून में सीरियस क्राइम्स माने गंभीर अपराधों के लिए सज़ा के लिए नए प्रावधान किए गए हैं. 2015 के जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में ये व्यवस्था थी कि जघन्य अपराधों के मामले में 16 से 18 साल के नाबालिगों पर व्यस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है. लेकिन जघन्य अपराधों की व्याख्या इस तरह हो गई थी कि ड्रग्स या शराब से जुड़े अपराधों में भी ये सख्त प्रावधान लगाया जा सकता था. नए कानून के मुताबिक 16-18 की उम्र के नाबालिगों पर तभी व्यस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सकेगा, जब संबंधित अपराध के लिए कम से कम 7 साल की सज़ा का प्रावधान हो. आम तौर पर ऐसे यौन हिंसा और हत्या जैसे मामलों पर ऐसी सज़ा होती है.

बाकी अपराधों को सीरियस क्राइम माने गंभीर अपराध मानकर जुवेनाइल कोर्ट में मुकदमा चलाया जाएगा. छोटे अपराधों माने पेटी क्राइम के मामले भी पहले की तरह जुवेनाइल कोर्ट में ही सुने जाएँगे. इससे ये होगा कि किशोर ज़्यादा से ज़्यादा अडल्ट जस्टिस सिस्टम से दूर रहेंगे. ताकि उनके मुख्यधारा में लौटने की उम्मीद बरकरार रहे. इस बाबत सुप्रीम कोर्ट ने विधि मंत्रालय को कदम उठाने को कहा था.

3. इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (संशोधन) बिल, 2021

विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, ललित मोदी. इन सारे नामों में क्या समानता है. यही कि बैंकों से हज़ारों करोड़ उधार लिए और चुकाने की बारी आई तो विदेश भाग लिए. ये तो वो बड़े नाम हैं जिनका नाम अलग अलग वजहों से हम सुनते रहते हैं. ऐसी सैकड़ों कंपनियां हैं, जो बैंकों से या किसी कर्ज देने वाली संस्था से पैसा उधार लेती हैं लेकिन वापस नहीं चुका पातीं. दिवालिया हो जाती हैं. देश के बैंकों की बहुत बड़ी रकम डूब वाले खाते में है. 8 लाख 34 हज़ार करोड़. यानी सरकार सालभर के लिए जितना बजट बनाती है उसके एक चौथाई हिस्से के बराबर.

तो बैंकों का पैसा कम डूबे, या जो डूब रहा हो उसे वापस वसूल किया जा सके, इस दिशा में मोदी सरकार ने 2016 में एक कानून बनाया था. जब अरुण जेटली वित्त मंत्री थे. उस कानून का नाम है -Insolvency and Bankruptcy Code, 2016. हिंदी में इसे कहते हैं दिवाला और शोधन अक्षमता कोड, 2016. इसमें डूबे हुए कर्ज का 330 दिन में समाधान करने का प्रावधान है.

इस प्रक्रिया को कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रेसोल्यूशन प्रोसेस यानी CIRP कहते हैं. कर्ज़ देने वाले की तरफ से CIRP शुरू की जाती है. इसमें होता ये है कि कर्ज़ देने वाले की तरफ से एक कमेटी बनती है. और ये कमेटी तय करती है कि दिवालिया हो चुकी कंपनी से पैसा कैसे वसूलना है, क्या उसका अधिग्रहण करना है, या कंपनी के मैनेजमेंट में बदलाव करना है. और जब ये CIRP की प्रक्रिया चलती है तब दिवालिया कंपनी का पूरा कंट्रोल लोन देने वालों के हाथों में होता है.

ये तो हुई 2016 वाले कानून की बात. अब अरुण जेटली के लाए कानून में निर्मला सीतारमण बदलाव कर रही हैं. इस बदलाव के लिए संशोधन बिल लाया गया है जिसका नाम है -Insolvency and Bankruptcy Code (Amendment) Bill 2021. इसमें कर्ज़ के निपटारे का एक नया तरीका निकाला गया है. इसका नाम है प्री-पैकेज्ड इंसॉल्वेंसी रेसॉल्यूशन. कोई भी ऐसी कंपनी या उद्योग जिसने 1 लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज लिया है वो नई प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं.

इसमें जो डिफॉल्टर है, यानी कर्ज़ नहीं चुका पाने वाली कंपनी के मालिक हैं, सेटलमेंट की प्रोसेस शुरू कर सकते हैं. कितना और कैसे कर्ज़ चुकाएंगे इसका प्लान वो लोन देने वालों को बता सकते हैं. 120 दिन में सेटलमेंट का काम करना होगा. और इस दौरान कर्ज़ में डूबे उद्योग का मैनेजमेंट मालिकों के पास ही रहेगा, कर्ज देने वालों के पास नहीं जाएगा. कर्ज़ में डूबी लघु, सूक्ष्म या मध्यम साइज़ की कंपनियां के फायदे के लिए पुराने कानून में ये बदलाव किया गया है. ताकि ऐसा ना हो कि कर्ज़ नहीं चुका पाए तो इंसाफ करने का पूरा हक कर्ज़ देने वाले के हाथ में ना हो, दिवालिया होने वाले के पास भी कुछ अधिकार हों, कंपनी का काम ना रुके. तो इस बिल पर भी संसद में कोई बहस नहीं हुई. बिल भी पिछले बुधवार को लोकसभा से पास हुआ, आज राज्यसभा से पास हो गया. और अब राष्ट्रपति का ठप्पा लगते ही कानून बन जाएगा.

4. एसेंशियल डिफेंस सर्विसेज, बिल- 2021. (आवश्यक रक्षा सेवा विधेयक 2021)

आज लोकसभा में ये बिल भी पास हो गया है. ये बिल आवश्यक रक्षा सेवाओं में शामिल कर्मचारियों के हड़ताल करने पर रोक लगाने के लिए है. आवश्यक रक्षा सेवाएं यानी वो फैक्ट्रियां जहां पर सेना के इस्तेमाल वाला सामान बनता है. यानी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज़ समझिए. हालांकि बिल में आवश्यक रक्षा सेवाओं की परिभाषा काफी विस्तृत है. सरकार ऐसी किसी भी सेवा को आवश्यक रक्षा सेवा घोषित कर सकती है जिससे सेना के लिए बनने वाला सामान प्रभावित होता है. और ऐसी किसी भी फैक्ट्री के कर्मचारी नया कानून लागू होने के बाद हड़ताल नहीं कर पाएंगे. बिल की वजह में सरकार ने बताया कि युद्ध और सेना के लिए इस्तेमाल सामान में देश की आत्मनिर्भरता के लिए बिल ज़रूरी है.

अब यहां वाजिब सा सवाल ये आता है कि देश में ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज़ तो बरसों से चल ही रही हैं. पहले की सरकारों ने कर्मचारियों की हड़ताल पर रोक क्यों नहीं लगाई. हड़ताल से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे वाली बात अभी क्यों आई. इसकी वजह है ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज़ को लेकर सरकार का इसी साल जून में लिया फैसला. देश में अभी 41 ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज़ हैं और ये आती हैं, ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज़ बोर्ड के तहत. आर्डिनेंस फैक्ट्रीज़ बोर्ड आता था रक्षा मंत्रालय के डिफेंस प्रोडक्शन विभाग के तहत. जून में सरकार ने आयुध फैक्ट्रियों को पीएसयूज़ के साथ जोड़ दिया. इन ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों में करीब 70 हज़ार लोग काम करते हैं. और उनको लग रहा था कि सरकार ने उनकी नौकरी के साथ खिलवाड़ किया है, उनकी नौकरी के नियम बदल जाएंगे. रिटायरमेंट की पॉलिसी बदल जाएगी. और इसके खिलाफ ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज़ की कर्मचारी यूनियन हड़ताल की धमकी दे रही थी. कर्मचारियों की हड़ताल पर रोक के लिए सरकार जून में अध्यादेश लेकर आई थी. और उस अध्यादेश को अब बिल की शक्ल में संसद में पेश किया गया है. आज लोकसभा से पास भी करवा लिया.

5. पांचवां बिल- एयरपोर्ट्स इकनॉमिक रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (अमेंडमेंट) बिल- 2021.

2008 में कानून लाकर Airport Economic Regulatory Authority यानी AERA बनाया गया था. ये अथॉरिटी उड़ानों और एयरपोर्ट से जुड़ी फीस को रेग्यूलेट करती है. अब पुराने कानून में थोड़ा बदलाव किया जा रहा है. ‘मेजर एयरपोर्ट्स’ या बड़े एयरपोर्ट्स क्या हैं, इसकी पुराने कानून में जो परिभाषा थी वो बदली जाएगी. कानून में बदलाव से सरकार की कोशिश ये है कि मुनाफा वाले और घाटे में चलने वाले एयरपोर्टस की पेयरिंग कर दी जाए. ताकि घाटे वाले एयरपोर्ट्स को भी पीपीपी मॉडल पर इंवेस्टर्स मिल सकें. इसके अलावा छोटे इलाकों में हवाई उड़ानों को बढ़ाने के लिहाज से भी पुराने नियम में कुछ बदलाव किए गए हैं. सरकार कह रही है कि छोटी जगहों में हवाई उड़ानें बढ़ाने के लिए ये बिल ज़रूरी है. इसी साल मार्च में भी ये बिल लोकसभा में पेश किया गया था. लेकिन फिर संसद की स्थाई सीमित को भेज दिया गया. आज लोकसभा में बिना चर्चा के ये बिल पास हो गया. राज्यसभा में पास होना अभी बाकी है.

अब इनमें से कई कानून ऐसे हो सकते हैं, जो बहुत अच्छे हों. सरकार अच्छी मंशा से ला रही हो. कई कानून ऐसे भी हों जिनमें शायद कुछ बदलाव ज़रूरी हो. ये सब संसद की बहस से तय होता है. लोकतंत्र की मजबूती के लिए बहस ज़रूरी है. संसद वाली बहस भी ज़रूरी है. इसलिए सरकार को विपक्ष के शोर में धड़ाधड़ बिल पास नहीं करवाने चाहिए. हाउस को कैसे ऑर्डर में लाना चाहिए, ये सरकार की जिम्मेदारी है. और ये जिम्मेदारी मोदी सरकार को भी समझनी चाहिए.


मोदी सरकार ने बिना चर्चा मॉनसून सत्र में कौनसे 5 नए कानून बनाए?

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