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नवाज़ की एक ही जान है, या तो अल्लाह लेगा या मोहल्ला

एक लड़का. ऐक्टर बनना चाहता है. बम्बई आता है. शकल हीरो वाली नहीं है. काला है. इंडस्ट्री के स्टैण्डर्ड के हिसाब से ‘बदसूरत’ है. उसे छोटे छोटे ऐड्स में रोल मिलते हैं. एक्स्ट्रा में. वो खुद को उनमें छुपाता फिरता है. कहीं बस में एक सवारी बन के बैठता है तो अपना सर नीचे करके सोने की ऐक्टिंग करता है. जिससे कि उसे काम भी मिल जाए और चेहरा भी न दिखे. बड़ा हीरो बनना चाहता है. ऐसे में ये छोटे-मोटे ‘चिल्लर’ वाले रोल उसे शर्मिंदा करते हैं. लेकिन करना ज़रूरी था. वरना पैसे कहां से आते?

फिर एक दिन एक फिल्म में काम मिला. कुछ एक मिनट का रोल. कौन सी फ़िल्म, नहीं मालूम. किसकी फिल्म, नहीं मालूम. क्या करना है? मार खानी है. तैयार हो गया. सेट पे खड़ा हुआ. उघारे बदन. पहले से ही काला था, और कालिख का मेक-अप किया गया. लाइट कैमरा ऐक्शन हुआ. हीरो की एंट्री हुई. आमिर खान! वो जो अब तक उसके लिए एक फ़िल्म का हीरो था. वो आमिर जिसे वो फिल्मों में देखा करता था. वो आमिर जिसके जैसा बन पाना उसका सपना था. आज वही आमिर उसका को-वर्कर बनने वाला था. वो जब तक ये सब सोच पाता, आमिर आकर उसके सामने खड़ा हो गया. शॉट चल रहा था. उस ‘बदसूरत’ लड़के की ज़िन्दगी का पहला शॉट. आमिर खान के साथ!

शॉट खतम हुआ. आमिर खान चले गए. अपने अगले शॉट के लिए. उस ‘बदसूरत’ लड़के को कुछ पैसे दे दिए गए. उसका बस इतना ही काम था. मार खाना. फिर इसने बहुत सी फिल्मों में सिर्फ मार ही खाई. मुन्नाभाई एमबीबीएस में एक काम अच्छा हुआ. मार खाने के बाद इसे डॉक्टर के पास ले जाया गया. लेकिन वहां भी इसकी किस्मत वैसी ही निकली जैसे इसे अब तक रोल मिल रहे थे. वो डॉक्टर असल में डॉक्टर नहीं गुंडा था. और ठुकाई हुई.

अमीर किरदार करने की चाहत अब भी दिल में थी. चाहता था कि बस कैसे भी मार खाने की जगह मारने वाला रोल मिले. ऐसा कि जिसमें हनक हो. पॉवर हो. जो इसने असल ज़िन्दगी में कभी नहीं किया वो ये परदे पर करना चाहता था. हर किसी की एक ज़िन्दगी होती है. इसकी दो थीं. इसे परदे पर अपनी असल ज़िन्दगी से अलग वाली ज़िन्दगी जीनी थी. फिल्म आई ‘कहानी’. ये ‘बदसूरत’ लड़का आईबी ऑफिसर बना. आईबी की बिल्डिंग में सिगरेट पीता था. वहां जहां सिगरेट पीना साफ़ मना था. याद दिलाये जाने के बावजूद. कलकत्ता जाकर वहां के एक पुलिस इन्स्पेक्टर को कमरे से ऐसे भगा दिया जैसे कि वो कोई चपरासी हो. और कहता है ‘जाते-जाते दरवाजा बंद करके जाना.’ये सब कुछ इसका गुस्सा था. जो अब निकल रहा था. 1999 में पहली बार स्क्रीन पर मार खाने का सिलसिला शुरू हुआ. कहानी में हनक आई 2012 में. 13 साल! मेरी आधी से ज़्यादा ज़िन्दगी. इस लड़के ने ‘बदसूरत’ लड़के से एक ‘अच्छे ऐक्टर’ होने का सफ़र तय किया. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी.

दुनिया ने अब फिल्म सरफ़रोश में इसके मार खाने वाले सीन को तलाशना शुरू किया. वीडियो यूट्यूब पर देखा जाने लगा. बातें होने लगीं. इसके बारे में. अचानक ही सब कुछ बदलने लगा. ब्लैक फ्राइडे जो बैन हो गयी थी, अब तक डीवीडी और टोरेंट से हर किसी के पास पहुंच चुकी थी. अज़गर के रोल में टार्चर रूम के सीन में लाल लाइट के बीच बैठा नवाज़ हर किसी के दिमाग में एक कोना पकड़ चुका था. और फिर दुनिया को मिला फैजल खान. गांजा पीने वाला, चश्मे, पेजर और सिगरेट का शौक़ीन फैजल खान. वो जो कहता था ‘एक ही जान है. या तो अल्लाह लेगा या मोहल्ला लेगा.’ वो फैजल खान जो अपने बाप के हत्यारे को अपना दोस्त मानता फिरता था. फिर एक दिन उसकी गर्दन काट कर उसके सर को एक झिल्ली में रखकर उसके ही घर के दरवाजे पर लटका आया. फैजल खान एक किरदार नहीं एक घटना बन गया था. जो कहीं घटी थी. और ऐसी घटी कि जिसके बारे में आज भी सोचो तो झुरझुरी होती है.

साल 2013 की सबसे बड़ी फिल्मों के सितारों का एक इंटरव्यू लिया गया. राजीव मसंद सबसे बातें कर रहे थे. रणबीर कपूर, इरफ़ान खान, आमिर खान और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी. वो आमिर खान जो कभी नवाज़ के सामने आया था तो नवाज़ की बोली नहीं फूट रही थी. वो रणबीर कपूर जो लड़कियों के दिलों की रजिस्ट्री करवा के कागज़ अपने तकिये के नीचे रख सोता था, कहता है मुझे मौका मिले तो मैं फैजल खान का रोल करना चाहूंगा. राजीव मसंद पूछते हैं कि जब सफ़लता चली जायेगी. जब ग्राफ में गिराव आएगा. जब सब कुछ ऐसा नहीं रहेगा, तब क्या होगा? तीनों ऐक्टर्स अपने अपने स्टाइल में बड़े ही दार्शनिक होकर जवाब देते हैं. नवाज़ुद्दीन मुस्कुराते हुए और लगभग हकलाते हुए, क्यूंकि उसे शायद अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि वो किस लीग में शामिल हो चुका है, कहता है, “अभी तक तो वहां तक नहीं सोचा. क्यूंकि मैं अभी इतने सालों से वहीँ था. अभी तो आया हूं. थोड़ा देखते हैं.” ईमानदारी. खुदगर्ज़ी. बड़े होने की चाह. सब कुछ था इस बात में. साथ ही प्यार भी. जो आपको होता है. नवाज़ से. इरफ़ान उसकी बात पे दांत दिखाते हुए हंसते हैं. हर कोई हंसता है. देखने वाले भी. और भूल जाते हैं. नवाज़ नहीं भूलता. वो साल दर साल, फिल्म दर फ़िल्म बढ़ता जा रहा है. वो अब महंगे कपड़े पहनता हुआ दिखता है. पिच्चर हॉल में नवाज़ुद्दीन की एंट्री पर सीटियां बजने लगी हैं. दुनिया उसे जानने लगी है. मानने लगी है. लेकिन नवाज़ में वो खुदगर्ज़ी, वो ईमानदारी आज भी वैसी की वैसी ही दिखती है. लंचबॉक्स में ‘हेल्लो सार! कैसे हैं आप?’ कहने वाला आदमी अब बजरंगी भाईजान को उनकी मंजिल तक पहुंचाने लगा है. लोगों से प्यार पाने लगा है.

मार वो अब भी खाता है. यूट्यूब पर अनगिनत बार चले उस सरफ़रोश के वीडियो में. लेकिन उसे मालूम है –

“एक ही जान है. या तो अल्लाह लेगा या मोहल्ला.”

nawazuddin

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