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इस Nazi डॉक्टर की क्रूरता की कहानी आपकी रूह कंपा देगी

दो डॉक्टर हैं. ठीक-ठीक कहें तो एक हैं और दूसरा था. एक को बीमारों का मसीहा कहा जाता है, दूसरे को मौत का देवता. इनके बीच में एक न्यूज़ शो है. जहां सूत्रधार का बयान आता है. बकौल बयान, दोनों डॉक्टर्स में कोई अंतर नहीं है. वे तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. इस तुलना के बाद बहस शुरू होती है, जिसका सिरा कोरोना से शुरू होकर नाज़ी जर्मनी तक जाता है.

आज जानेंगे, ये दोनों डॉक्टर्स कौन हैं और उनकी कहानी क्या है? उनके बीच की तुलना कितनी जायज है? और, इस ऐपिसोड में नाज़ी जर्मनी का ज़िक्र कहां से आया?

23 अगस्त 1939. जगह, मॉस्को. क्रेमलिन में दो विपरीत धाराएं गलबहियां कर रहीं थी. एडोल्फ़ हिटलर का विदेश मंत्री जोचिम वोन रिबेनटॉप सोवियत संघ के बादशाह सलामत जोसेफ़ स्टालिन से हाथ मिला रहा था. कुछ देर पहले ही रिबेनटॉप और सोवियत संघ के विदेश मंत्री वेस्लाव मोलोटोव ने एक संधि पर दस्तखत किए थे. मोलोटोव-रिबेनटॉप पैक्ट.

ये पैक्ट क्या था और दो दुश्मन देश इसके लिए राज़ी क्यों हुए?

हिटलर फ़ासीवादी था. वो कम्युनिस्टों का डर दिखाकर सत्ता में आया था. वहीं, स्टालिन एक कम्युनिस्ट सरकार चला रहा था. दोनों राजनैतिक दुनिया के अलग-अलग ध्रुव पर खड़े थे.

जर्मनी का चांसलर बनते ही हिटलर ने अपने मंसूबे साफ़ कर दिए थे. उसके ऊपर ‘अखंड जर्मनी’ बनाने का भूत सवार था. शुद्ध आर्यन नस्ल वाले लोगों की दुनिया. वो यूरोप पर अपना एकाधिकार चाहता था. मार्च 1938 में उसने ऑस्ट्रिया को एक दिन में जीत लिया. जर्मन सेना को कोई चुनौती नहीं मिली थी.

ऑस्ट्रिया को जर्मनी में मिलाने के बाद हिटलर आगे बढ़ा. अब उसकी नज़र चेकोस्लोवाकिया पर पड़ी. वहां जर्मन मूल के तीस लाख लोग रहते थे. हिटलर ने उन लोगों को भड़काना शुरू किया. उसने हूल दिया कि अपनी सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दो. फिर तो मौजा ही मौजा है.

यूरोप के बाकी देश हालात पर नज़र बनाए हुए थे. उन्हें लक्षण ठीक नहीं लगे. चेकोस्लोवाकिया की फ़्रांस के साथ संधि थी. वादा कुछ यूं कि बाहरी हमले की स्थिति में फ़्रांस उसकी मदद करता. सोवियत संघ के साथ भी उसका कुछ-कुछ ऐसा ही करार था. अगर फ़्रांस और सोवियत संघ जर्मनी के ख़िलाफ़ लड़ने जाते तो ब्रिटेन को भी आना होता. रिश्तेदारी निभाने के चक्कर में मल्टी-नेशनल युद्ध शुरू होने का ख़तरा दिख रहा था.

इसको रोकने के लिए फ़्रांस और ब्रिटेन ने एक खेल किया. उन्होंने आपस में तय किया कि हिटलर से समझौता कर लेते हैं. 30 सितंबर 1938 को म्युनिख में एक समझौता हुआ. इसमें फ़्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी के अलावा इटली भी शामिल हुआ था.

इन देशों ने मिलकर चेकोस्लोवाकिया से पूछे बिना उसका भविष्य तय कर दिया. फ़्रांस और ब्रिटेन ने कहा, अगर तुम्हारा लड़ने का मन हो तो लड़ो. लेकिन हम बचाने नहीं आएंगे. अपन अब अलग-अलग हैं. चेकोस्लोवाकिया के पास ठीक-ठाक सेना थी. लेकिन बाहरी मदद के बिना वो जर्मनी का मुक़ाबला नहीं कर सकती थी. समझौते के बाद उसने जर्मनी के आगे समर्पण कर दिया.

म्युनिख में ये भी तय हुआ कि चेकोस्लोवाकिया के बाद हिटलर आगे नहीं बढ़ेगा. उस समय नेविल चेम्बरलिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे. जब वो समझौता करके आए तो उनका भरपूर स्वागत किया गया. चेम्बरलिन ने इस मौके पर भाषण भी दिया. इसमें उन्होंने कहा,

ये सम्मान के साथ हासिल की हुई शांति है. मुझे उम्मीद है कि ये शांति लंबे समय तक कायम रहेगी.

उन दिनों विंस्टन चर्चिल विपक्ष में थे. उन्होंने म्युनिख समझौते के लिए चेम्बरलिन की आलचोन की. चर्चिल बोले,

आपको युद्ध और अपमान में से किसी एक को चुनने का मौका दिया गया था. आपने अपमान चुना और जहां तक युद्ध की बात है,वो तो होकर रहेगा.

कालांतर में चर्चिल की कही बात सच साबित हुई.

चेकोस्लोवाकिया के मामले में सोवियत संघ को पूरी तरह दरकिनार किया गया था. उन्हें ना तो किसी बैठक में शामिल किया गया और ना ही उनकी राय पूछी गई थी. स्टालिन को लगा, अगर हम हिटलर से लड़े तो किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. ब्रिटेन और फ़्रांस बस तमाशा देखेंगे. भलाई इसी में है कि हम आपस में सुलट लें.

इसी वजह से उसने हिटलर के साथ हाथ मिला लिया. हिटलर की नज़र अब पोलैंड पर थी. अगस्त 1939 में हुए समझौते में पोलैंड को दो हिस्सों में बांट लिया गया. स्टालिन ने कहा, पश्चिम वाला हिस्सा तुम्हारा, पूरब वाला हमारा. जर्मनी और सोवियत संघ इस बंटवारे से बहुत खुश हुए. हिटलर को लगा कि सब बैठे-बिठाए मिल रहा है. जबकि, स्टालिन पोलैंड को हथियाने के साथ-साथ जर्मन आक्रमण से भी सुरक्षित हो चुका था.

हालांकि, ये खुशियां क्षणभंगुर थीं. एक सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया. ये म्युनिख एग्रीमेंट का उल्लंघन था. ब्रिटेन और फ़्रांस को जर्मनी के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान करना पड़ा. इस तरह से दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हुई.

जर्मनी में 1933 के साल से ही नस्ली युद्ध शुरू हो चुका था. जो भी लोग हिटलर के शुद्ध नस्ल वाले मानकों पर खरे नहीं उतरते थे, उन्हें मौलिक अधिकारों से दूर किया जाने लगा. ऐसे लोगों की संपत्तियां छीनी जाने लगी. उन्हें अलग-थलग रखा जाने लगा. इनमें यहूदी, रोमा, स्लाव आदि लोग थे.

पोलैंड पर क़ब्ज़े के बाद दमन का चक्र आगे बढ़ा. जहां-जहां हिटलर जीता, वहां से कथित अशुद्ध लोगों को उठाकर पोलैंड भेजा जाने लगा. उन्हें जानवरों से भी बदतर स्थिति में ट्रेन में भरा जाता था. ट्रेनों में कोई सुविधा नहीं होती थी. कई दिनों के सफ़र के बाद वे पोलैंड पहुंचते थे. उन्हें उम्मीद होती थी कि दुख भरे दिन बीत गए. लेकिन वहां उन्हें कुछ और ही मिलता था.

पोलैंड में ऑश्विज़ था. नाज़ी जर्मनी के सबसे बड़े कंसन्ट्रेशन कैंप्स में से एक. यहां पर एक समय तक पोलिश आर्मी की बैरकें थी. जर्मनी के नियंत्रण के बाद इन इमारतों को जेल में तब्दील कर दिया गया. इनमें यूरोप से लाए गए क़ैदियों को बंद रखा जाता था. संख्या बढ़ी तो उन्हें ठिकाने लगाने के उपाय शुरू किए गए. ऑश्विज़ में गैस चैंबर्स का निर्माण हुआ.

जब ट्रेन ऑश्विज़ पहुंचती, तब क़ैदियों की छंटनी की जाती थी. जो लोग काम करने के लायक होते, उन्हें अलग कर दिया जाता. बाकियों को नहाने के लिए भेजा जाता. उसके बाद कतार में उन्हें गैस चैंबर्स की तरफ रवाना किया जाता था. क़ोटा पूरा होने के बाद दरवाज़े बंद कर दिए जाते.

इसके बाद उसमें ज़हरीली गैस डाली जाती थी. दम घुटने से 20 मिनट के अंदर लोग मर जाते. गैस चैंबर्स की दीवारें जान-बूझकर मोटी बनाईं गई थी. ताकि चीखने की आवाज़ें बाहर ना आए. हत्या के बाद लाशों को या तो जला दिया जाता था या सामूहिक क़ब्रों में दफ़्न कर दिया जाता था. जब 1945 में सोवियत सेना ऑश्विज़ पहुंची, वहां का दृश्य देखकर उनका भी दिल दहल गया. उनके चेहरों से जीत की खुशी गायब हो चुकी थी. उन्हें इस बात का अपराधबोध था कि धरती पर इस तरह की हैवानियत भी संभव है.

एक सैनिक ने बाद में लिखा,

उनकी हालत देखना बहुत मुश्किल था. मुझे उनके चेहरे आज भी याद आते हैं. खासकर आंखें,जो उनकी भावनाओं को व्यक्त करने में अक्षम साबित हो रहे थे.

सोवियत सेना के पहुंचने से पहले ही नाज़ी सैनिक ऑश्विज़ छोड़कर भाग चुके थे. उन्होंने लगभगग सभी रेकॉर्ड्स भी जला दिए. फिर भी जो कुछ बचा, उससे कुछ आंकड़े सामने आए. ऑश्विज़ में दस लाख से अधिक लोगों की हत्या की गई. इनमें से अधिकतर यहूदी थे.

इसी ऑश्विज़ कैंप में एक डॉक्टर था. जब क़ैदियों से भरी ट्रेन आती तो वो भी प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा हो जाता. वो ऊंगली से इशारा करता और लोग अलग छांट लिए जाते. उसके द्वारा छांटे हुए लोग गैस चैंबर में नहीं भेजे जाते थे. ऐसे लोगों को अच्छा खाना मिलता था. उन्हें बाकियों की तरह मज़दूरी भी नहीं करनी होती थी. वो बच्चों के लिए टॉफ़िया भरकर लाया करता. बच्चे उसे देखते ही ‘अंकल-अंकल’ चिल्लाने लगते थे.

उस डॉक्टर का नाम था, जोसेफ़ मेंगेले. वो 1911 में पैदा हुआ था. उसके पिता खेती-किसानी की मशीनें बेचते थे. मेंगेले ने डॉक्टरी की पढ़ाई की. दो बार डॉक्टरेट की डिग्री भी ली.

1937 में उसने नाज़ी पार्टी जॉइन कर ली. सेकंड वर्ल्ड वॉर में वो लड़ाई के मैदान में गया. असाधारण बहादुरी दिखाने के लिए उसे आयरन क्रॉस भी मिला. फिर एक मोर्चे पर वो बुरी तरह घायल हो गया. उसे लड़ाई के लिए अनफ़िट घोषित कर दिया गया. मेंगेले वापस रिसर्च करने लगा. फिर अपने मेंटर के कहने पर उसने कंसन्ट्रेशन कैंप के लिए अप्लाई किया. उसे हाथोंहाथ लिया गया. 1943 में जोसेफ़ मेंगेले ऑश्विज़ पहुंचा. यहां से उसके जीवन का एक अलग अध्याय शुरू हुआ.

मेंगेले वंश के आधार पर होने वाली बीमारियों पर रिसर्च कर रहा था. ऑश्विज़ में उसे रिसर्च का पूरा सामान मुहैया था. ख़ासकर ज़िंदा लोग, जिनके साथ वो कुछ भी कर सकता था.

मेंगेले के चुने हुए लोग अलग कैंप में रखे जाते थे. वहां उनका रोज़ाना ब्लड टेस्ट होता था. मेंगेले को बच्चों और ख़ासकर जुड़वां बच्चों में खास दिलचस्पी थी. उसका मानना था कि अगर जर्मन महिलाएं जुड़वां बच्चे पैदा करने लगें तो जर्मनी सबसे शक्तिशाली बन सकता है. इसी के लिए वो अपने अधिकतर प्रयोग जुड़वां बच्चों पर करता था.

वो एक बच्चे से ख़ून निकालकर दूसरे को चढ़ा देता. नीली आंख बनाने के लिए उसने एक दवा बनाई थी. वो इस दवा को बच्चों की आंखों में डाल देता. इसकी वजह से कई बच्चे हमेशा के लिए अंधे हो जाते थे.

अगर कोई बीमार पड़ जाता तो मेंगेले बिना बेहोश किए चीर-फाड़ शुरू कर देता था. अगर जुड़वां बच्चों में से कोई एक मर जाता तो दूसरे की हत्या कर दी जाती थी. फिर उनके शरीर के अंगों को निकालकर बर्लिन भेजा जाता था. रिसर्च के लिए.

जोसेफ़ मेंगेले ने ऑश्विज़ में कम-से-कम 732 जुड़वां बच्चों पर अत्याचार किए. ऑश्विज़ के लोग उसे मौत का देवता कहते थे. वो एक चलती-फिरती डेथ मशीन था.

ये सब करते हुए उसके चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं होती थी. उसे ये लगता था कि ये लोग तो पहले से ही मरे हुए हैं. वो तो बस मरे हुए लोगों पर प्रयोग कर रहा है.

मेंगेले के साथ काम कर चुके एक डॉक्टर ने बाद में लिखा,

मेंगेले बच्चों के साथ दयालु रहता था. वो उनके लिए चॉकलेट्स और खिलौने लेकर आता. कैंप में बच्चे उससे प्यार करने लगे थे. लेकिन उसका एक दूसरा पक्ष भी था. वो उन्हीं बच्चों पर ख़तरनाक एक्सपेरिमेंट्स भी करता था और उन्हें अपने ही हाथों से मार भी देता था.

ऑश्विज़ में सोवियत आर्मी के पहुंचने से ठीक पहले मेंगेले भाग निकला. कई महीनों तक वो नाम बदलकर छिपता रहा. लेकिन जून 1945 में अमेरिकी सेना ने उसे पकड़ लिया. यहां ग़लती ये हुई कि उन्हें मेंगेले के गुनाहों के बारे में कुछ पता नहीं था. एक महीने बाद ही उसे रिहा कर दिया गया.

मेंगेले को लगा कि भेद तो एक दिन खुलना ही है. अगर भेद खुला तो मौत की सज़ा तय है. 1948 में वो अर्जेंटीना भाग गया. रेड क्रॉस के कागज़ात पर. न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, रेड क्रॉस को इस बात का पता था कि वे एक वॉर क्रिमिनल को भागने में मदद कर रहे हैं.

ऐसे कई नाज़ी अपराधी थे, जो गुनाह करने के बाद गायब हो चुके थे. न्यूरेम्बर्ग ट्रायल्स में उन्हें सज़ा नहीं दी जा सकी. इज़रायल की स्थापना के बाद वहां की सरकार ने ऐसे लोगों को तलाशने और उन्हें सज़ा देने का मिशन शुरू किया. इसकी ज़िम्मेदारी खुफिया एजेंसी मोसाद को सौंपी गई.

1960 में मोसाद को बड़ी टिप हाथ लगी. फ़ाइनल सॉल्यूशन का मास्टरमाइंड एडोल्फ़ आइख़मैन अर्जेंटीना में छिपा हुआ था. मोसाद ने हैरतअंगेज़ कारनामा किया. वे अर्जेंटीना में घुसकर आइख़मैन को किडनैप कर इज़रायल ले आए. वहां उसके ऊपर मुकदमा चला. फिर उसे फांसी पर लटका दिया गया.

मेंगेले भी अर्जेंटीना में ही छिपा हुआ था. जिस एजेंट ने आइख़मैन का पता लगाया था, उसे दो साल बाद मेंगेले जैसा ही एक शख़्स दिखा. उसने अपने मुख्यालय में रिपोर्ट भेजी. लेकिन बॉस राज़ी नहीं हुए. बॉस का कहना था कि और सटीक जानकारी लेकर आओ. कई दशक बाद पता चला कि वो आदमी जोसेफ़ मेंगेले ही था. तब तक वो मर चुका था.

खैर, मोसाद की बढ़ती निगहबानी के बीच मेंगेले सतर्क हो चुका था. वो पहले पराग्वे और फिर बाद में ब्राज़ील भाग गया. उधर, इज़रायल के सामने नई चुनौतियां आ गई. मिडिल-ईस्ट वॉर और फ़िलिस्तीन के झगड़े की वजह से ध्यान बंट गया. मेंगेले को उठाने वाली फ़ाइल दब गई.

फिर आया साल 1977 का. मेनाखिम बेगिन इज़रायल के प्रधानमंत्री बने. पीएम बनने के चार महीने बाद उन्होंने एक कैबिनेट मीटिंग बुलाई. इसमें मोसाद के लिए एक ऑर्डर पास किया गया. मोसाद को कहा गया कि नाज़ी क्रिमिनल्स का शिकार फिर से शुरू कर दो. तुम्हारे पास दो विकल्प हैं, या तो उन्हें उठाकर इज़रायल लाओ. ट्रायल के लिए. अगर ये संभव ना हो तो वे जहां दिखें, वहीं मार दो.

मोसाद को नौ लोगों की लिस्ट सौंपी गई. इसमें जोसेफ़ मेंगेले का नाम सबसे ऊपर था.

मोसाद ने मिशन शुरू किया. वो तलाश करते रहे, इस बीच में मेंगेले मर गया. ब्राज़ील के साओ पाउलो में. स्विमिंग पूल में तैरने के दौरान उसे दिल का दौरा पड़ा और उसकी जान चली गई थी. साल 1979 में.

मोसाद को इसकी जानकारी 1985 में मिली. फिर उसकी क़ब्र खुदवाई गई. डीएनए टेस्ट के बाद कंफ़र्म हुआ कि वो मेंगेले ही था.

नाज़ी इतिहास के सबसे ख़तरनाकर अपराधियों में से एक ने अपनी ज़िंदगी अपने शर्तों पर गुजार दी. उसे कभी उसके किए की सज़ा नहीं मिल सकी. हालांकि, साओ पाउलो में उसका जीवन बेइंतहा मुफलिसी में गुजरा. वो हमेशा डर के साये में जीता रहा. डर कि मोसाद आकर उसकी हत्या ना कर दे.

आज हम ये सब कहानी क्यों सुना रहे हैं?

इसकी वजह है एक तुलना. फ़ॉक्स न्यूज़ की होस्ट और पॉलिटिकल कॉमेंटेटर लारा लोगन ने एक टीवी शो के दौरान डॉ एंथनी फ़ाउची की तुलना जोसेफ़े मेंगेले से की. एंथनी फ़ाउची इस समय अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के चीफ़ मेडिकल एडवाइज़र हैं. वो कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका का चेहरा हैं. उनकी बात पर कोरोना को लेकर नियम बनाए और हटाए जाते हैं. फ़ाउची सात अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ काम कर चुके हैं.

30 नवंबर को फ़ॉक्स न्यूज़ पर ओमिक्रॉन वेरिएंट को लेकर चर्चा चल रही थी. इसी दौरान शो के होस्ट ने वैक्सीन मेनडेट और कोरोना प्रोटोकॉल्स की आलोचना की. लारा लोगन को मौका मिल गया. वो एक कदम आगे निकल गईं.

उन्होंने कहा,

जब आप डॉ फ़ाउची को देखते हैं – तो लोग मुझसे यही कहते हैं कि वो आदमी विज्ञान का प्रतिनिधि नहीं है. उसमें जोसेफ़ मेंगेले की झलक आती है.

लोगन के इस बयान की खासी आलोचना हो रही है. यहूदी संगठनों ने भी इस बयान को शर्मनाक बताया है. हालांकि, लोगन अपने कहे से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं. चैनल के बाद अब उन्होंने ट्विटर पर एंथनी फ़ाउची के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला हुआ है. वो उनके ऊपर अफ़्रीका में अमानवीय मेडिकल ट्रायल्स का आरोप लगा रहीं है.

ये पहली बार नहीं है, जब डॉ फ़ाउची को इस तरह के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंच से उन्हें बर्ख़ास्त करने की धमकी दी थी. इसके अलावा, कई बार उन्हें हत्या की धमकियां भी दी गईं है.

एंथनी फ़ाउची कोरोना प्रोटोकॉल्स और वैक्सीन की अनिवार्यता को लेकर सख़्त रहे हैं. अमेरिका की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसका विरोध करता है. ये धड़ा वैक्सीन मेनडेट को स्वीकार नहीं करता. इसे व्यक्तिगत आज़ादी से जोड़कर देखता है. ऐसे लोगों को फ़ाउची नहीं सुहाते.

ऐसे लोगों के अपने तर्क हो सकते हैं. इस पर बहस भी की जा सकती है. लोकतंत्र में इसकी गुंज़ाइश हमेशा रहनी चाहिए. लेकिन उन्हें जोसेफ़ मेंगेले बताने को मानसिक दिवालियेपन की श्रेणी में रखा जा सकता है.


अगर ये आदमी इंटरपोल का प्रेसिडेंट बना तो अनर्थ हो जाएगा!

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