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जब नेहरू ने खुद को ही भारत रत्न दे डाला?

आज है 15 जुलाई. और इस तारीख़ का संबंध है भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मिलने के किस्से से.

बैकग्राउंड

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के समीकरण तेज़ी से बदल रहे थे. भारत नया-नया आज़ाद हुआ था. और विश्व में अपनी जड़ें ढूंढ रहा था. अधिकतर क्षेत्रों में भारत अभी भी मदद के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था. अमेरिका भारत को खाद्य सहायता और एग्रीकल्चर के क्षेत्र में मदद दे रहा था. लेकिन भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू चाहते थे कि भारत में जल्द से जल्द इंडस्ट्रियलाइजेशन की शुरुआत हो. तब जियोपॉलिटिकल समीकरण ऐसे थे कि अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज़्यादा था. वो पाकिस्तान से अपने सैन्य रिश्ते मज़बूत कर रहा था. पाकिस्तान के साथ पावर इक्वेशन अनबैलेंस ना हो इसलिए ज़रूरी था कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारत भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराए.

1954 में भारत ने चीन के साथ तिब्बत पर साइनो-इंडियन एग्रीमेंट साइन किया. इसके बाद नेहरू ने USSR और यूरोप का दौरा किया. दुनिया कोल्ड वॉर से गुजर रही थी. एक तरफ चीन और USSR जैसे कम्यूनिस्ट देश थे. दूसरी तरफ़ यूरोप और अमेरिका थे. नॉन-एलायन्मेंट यानि गुटनिरपेक्षता की नीति के तहत नेहरू ने दोनों तरफ़ रिश्तों पर ज़ोर दिया. कम्यूनिस्ट देशों के साथ संबंधों को लेकर उनकी काफ़ी आलोचना भी हुई.

USSR दौरा

7 जून, 1955 को नेहरू USSR पहुंचे. यॉल्टा में जब वो सड़क से यात्रा कर रहे थे, लोगों ने उनकी तरफ़ कुछ गुलाब के फूल फेंके. नेहरू ने एक गुलाब का फूल पकड़ लिया. लेकिन उसका कांटा उनकी उंगली में चुभ गया. उंगली से खून निकलने लगा. नेहरू बोले-

‘देखिए मैंने रशिया के लिए खून बहाया है’.

ये एक तंज था. उन लोगों के लिए जो उन्हें ‘कम्यूनिस्ट सिंपेथाइज़र’, यानि कम्यूनिस्ट देशों का हमदर्द कह रहे थे.

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USSR दौरे पर नेहरू, साथ में इंदिरा (तस्वीर: आर्काइव)

इस दौरे पर नेहरू यूक्रेन से लेकर तुर्कमेनिस्तान तक गए. विदेश नीति के हिसाब से ये दौरा भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ. USSR ने भारत में बड़े उद्योग स्थापित करने में मदद की. इसके अलावा ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत को सहायता प्रदान की. इस दौरे के बाद USSR और भारत के रिश्ते मज़बूत होते चले गए. यहां तक कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में USSR ने अपने पुराने कॉमरेड दोस्त चीन का पक्ष नहीं लिया.

पीस इन अवर टाइम

नेहरू की ये यात्रा दुनिया भर में खबरों का हिस्सा रहीं थी. पश्चिम के पावर स्ट्रगल में भारत ने पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराई थी. यात्रा समाप्त कर नेहरू 13 जुलाई, 1955 को भारत लौटे. एयरपोर्ट पर लोगों की भीड़ इकट्ठा थी. राष्ट्रपति डॉ० राजेंद्र प्रसाद खुद प्रोटोकॉल तोड़कर नेहरू को रिसीव करने पहुंचे थे.

इसके दो दिन बाद यानि 15 जुलाई, 1955 को राष्ट्रपति ने एक विशेष राजकीय भोज रखवाया.

स्थान: राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली. 

डिनर टेबल पर उपराष्ट्रपति और बाक़ी लोग भी मौजूद हैं. हल्की-फुल्की बातचीत चल रही है. अचानक राष्ट्रपति डिनर टेबल पर खड़े हो जाते हैं. और घोषणा करते हैं कि उन्होंने नेहरू को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है. वो नेहरू के लिए कहते हैं-

ए ग्रेट आर्किटेक्ट ऑफ़ पीस इन अवर टाइम’ यानि ‘हमारे समय में शांति का एक महान वास्तुकार’

नेहरू चौंक जाते हैं. वो कहते हैं कि वो अभी इस सम्मान के लायक़ नहीं.

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तमाम मतभेदों के बावजूद नेहरू और डॉ० राजेंद्र प्रसाद एकदूसरे का सम्मान करते थे. (तस्वीर : Getty)

अगले दिन यानि 16 जुलाई, 1955 को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ अख़बार में इसकी रिपोर्ट छपी. नेहरू के USSR से लौटने तक ‘भारत रत्न’ दिए जाने की बात को एकदम गुप्त रखा गया था. रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रपति ने बताया कि ये फ़ैसला उनका था. राष्ट्रपति ने स्वीकार किया कि उन्होंने असंवैधानिक रूप से काम किया था. क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री या कैबिनेट की सिफारिश के बिना नेहरू को ‘भारत रत्न’ देने का फैसला किया था.

कॉन्ट्रोवर्सी

ये फ़ैसला असंवैधानिक है या नहीं, इस मामले में मतभेद हैं. इसके लिए हमें इस पुरस्कार की शुरुआत को जानना होगा. भारत सरकार के 2 जनवरी, 1954 के गैजेट नोटिफ़िकेशन में इसको लेकर निर्देश दिए गए हैं. पुरस्कार किसको दिए जा सकते हैं, उसका आकार किस तरह का होगा, आदि नियम. 15 जनवरी, 1955 को एक और नोटिफ़िकेशन जारी हुआ. जिसके अनुसार मरणोपरांत भी भारत रत्न दिया जा सकता है. इन दोनों में से किसी भी नोटिफ़िकेशन में पुरस्कार चुनने की प्रक्रिया के बारे में नहीं लिखा है.

परम्परा के अनुसार ‘भारत रत्न’ के लिए प्रधानमंत्री नामों का चुनाव करते हैं. इसके बाद ये नाम राष्ट्रपति के पास भेजे जाते हैं, जो इस पर मुहर लगाते हैं. यहां पर इस बात को अंडरलाइन करना ज़रूरी है कि ये केवल एक परम्परा है. कोई क़ानून नहीं. इसलिए राष्ट्रपति द्वारा स्वयं नाम का चुनाव करना परम्परा के विरुद्ध था पर कानून के नहीं.

अब एक प्रश्न और खड़ा होता है. क्या राष्ट्रपति ने पक्षपात या फ़ेव़रेटिस्म‌ के चलते नेहरू को भारत रत्न दिया था? ये जानने लिए हमें नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के रिश्तों को समझना होगा.

नेहरू एंड प्रसाद

सितम्बर 1949 तक संविधान सभा का काम लगभग ख़त्म हो चुका था. नया संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू होना था. इससे पहले ये भी तय होना था कि भारत के पहले राष्ट्रपति कौन होंगे. राष्ट्रपति पद के लिए राजेंद्र प्रसाद, नेहरू की पहली पसंद नहीं थे. नेहरू सी. राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे. इसके दो कारण थे. एक तो राजगोपालाचारी उस समय गवर्नर जनरल के पद पर थे. दूसरा, नेहरू की ही तरह राजगोपालाचारी भी सेक्युलर विचारधारा के थे.

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नेहरू और सी. राजगोपालाचारी (तस्वीर: राष्ट्रपति भवन)

लेकिन वल्लभभाई पटेल ऐसा नहीं चाहते थे. उनकी मंशा थी कि राष्ट्रपति के पद पर ऐसा व्यक्ति बैठे, जो प्रधानमंत्री की शक्तियों में बैलेन्स ला सके. पटेल के अनुसार इस पद के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे राजेंद्र प्रसाद. कांग्रेस संगठन में पटेल की पकड़ मज़बूत थी. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति पद के लिए चुन लिए गए.

नेहरू और प्रसाद के बीच कई वैचारिक मतभेद थे. नेहरू आधुनिकता वादी थे. वो मानते थे कि धर्म अपनी जगह ठीक है पर नए भारत के मूल्य पंथ निरपेक्ष होंगे. नेहरू, विचार और विज्ञान का नया भारत देखना चाहते थे. इसके विपरीत प्रसाद का मानना था कि जिन परम्पराओं और मूल्यों का भारत के जन-जन पर वास है. उन्हें यूं ही तोड़ा नहीं जा सकता. ना ही छलांग लगाकर उनके पार जाया जा सकता है.

हिंदू कोड बिल

नेहरू और डॉ० राजेंद्र प्रसाद के बीच पहली बार खुलकर मतभेद तब ज़ाहिर हुए. जब संविधान सभा में हिंदू कोड बिल का मामला उठा. नेहरू इसके पक्ष में थे. लेकिन डॉ० राजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि पूरे देश में इस पर जनमत कराया जाए. बात इतनी आगे तक गई थी कि डॉ० प्रसाद ने इस्तीफे की धमकी दे दी थी. वो तब संविधान सभा के अध्यक्ष थे.

सोमनाथ मंदिर

1951 में डॉ० राजेंद्र प्रसाद और नेहरू के बीच एक और मतभेद हुआ. गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया जाना था. इस मौक़े पर राष्ट्रपति को भी निमंत्रण भेजा गया. डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने जाने का निर्णय लिया. नेहरू इस बात से नाराज़ थे. नेहरू का मानना था कि स्टेट और धर्म के बीच में एक रेखा होनी चाहिए. सरकार से जुड़े लोगों को धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं दिखना चाहिए. राष्ट्रपति ने नेहरू की बात नहीं मानी और वो इस उद्घाटन में शामिल हुए.

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डॉ० राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल (तस्वीर: आर्काइव)

साफ़ है कि दोनों के बीच जमकर मतभेद थे. लेकिन वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है. ये वो दौर था जब राजनैतिक मतभेद का मतलब दुश्मनी नहीं होता था. दोनों कांग्रेस के बड़े नेता थे. वो एक दूसरे को कठोर से कठोर बात बोल सकते थे. लेकिन दोनों के मन में एक दूसरे के लिए इज़्ज़त और बातों में शालीनता थी. पक्के तौर पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन नेहरू को भारत रत्न दिए जाने के पीछे कोई पक्षपात या तरफ़दारी नहीं नज़र आती.

ऐपिलॉग

क्या है भारत रत्न? क्या ये सिर्फ़ एक पीतल के पत्ते के आकार का पदक है? अगर यह केवल एक पदक है तो हम में से कोई भी पदक ख़रीद कर घर पर रख सकता है. पड़ोस के अंकल भी कोई पुरस्कार शुरू कर सकते हैं. हालांकि भारत रत्न के साथ कोई धनराशि नहीं दी जाती. परंतु क्या किसी पुरस्कार का मूल्य उसके ताम्रपत्र या धनराशि से मापा जा सकता है? ‘भारत रत्न’ का महत्व तब है जब भारत का मानस उस व्यक्ति को रत्न मानता हो. इसलिए ‘भारत रत्न’ का महत्व उससे जुड़ी परम्परा से निर्धारित होता है. इस बात से कि आप उन चुनिंदा महान व्यक्तियों की श्रेणी से जुड़ते हैं. जिन्होंने राष्ट्र के निर्माण में महान योगदान दिया.

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भारतीय सामविधान सभा में वल्लभभाई पटेल (तस्वीर: राष्ट्रपति भवन)

पुरस्कारों के राजनैतिक स्वार्थ हेतु उपयोग की व्यवस्था बना देना इस पुरस्कार की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ है. आज़ादी के बाद ऐसा होता हुआ कई बार दिखा है. जिसकी सरकार थी, उस हिसाब से तय हुआ कि भारत रत्न किसे मिलेगा.

कम से कम नेहरू के मामले में ऐसा होता नहीं दिखता. ये प्रश्न ज़रूर रहेगा की नेहरू ने ‘भारत रत्न’ स्वीकार क्यों किया? क्या वो इसे अस्वीकार कर एक बुरी परम्परा को शुरू होने से रोक सकते थे?
शायद हां. शायद नहीं.
अगर वो ‘भारत रत्न’ को अस्वीकार कर देते तो शायद उन पर आरोप लगता कि उन्होंने राष्ट्रीय सम्मान का अपमान किया है. इस ‘व्हाट इफ़’ को चचा ग़ालिब के हवाले से कहें तो

‘हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना कि यूं होता तो क्या होता’


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