Submit your post

Follow Us

भारत-पाकिस्तान बंटवारे से जुड़ी वो तारीख जिसे हम याद नहीं करना चाहते

ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर,
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इन लाइनों से जिस दर्द को बयां करने की कोशिश की है वो इससे कहीं बड़ा है. वाकई 15 अगस्त की सुबह वो सुबह नहीं रही होगी जिसके लिए देश के युवाओं ने अपना सबकुछ न्यौछावर किया था. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, आज़ाद ने इस भारत के सपने तो नहीं देखे होंगे. सोचिए उस दर्द की तासीर जिसने गुझियों की थाली और सेवइयों के डोंगों की अदला-बदली रोक दी. जिसने हर शाम नुक्कड़ पर मिलने वाले दोस्तों की यारियां छीन लीं. जिसने मुसलमान भाइयों से उनकी हवेलियां हथिया लीं. जिसने हिन्दुओं के लिए लाहौर की गलियों की रोशनी ख़त्म कर दी.

हम ये शब्द लिख-पढ़ रहे हैं, मगर हज़ारों परिवारों ने ये सब सहा है. क्या आप नहीं सोचते कि ये सब क्यों हुआ. कैसे हुआ. कब हुआ. हम सब जानते हैं कि 15 अगस्त को देश आज़ाद हुआ. लेकिन देश के बंटवारे का ज़हरीला फैसला आज के दिन यानी 18 जुलाई 1947 को ले लिया गया था.

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 

18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को स्वीकृति मिली. इसकी नींव माउंटबेटन योजना ने रखी थी. इसमें देश की आज़ादी के बदले अंग्रेज़ों ने इसके दो टुकड़े करने की ठानी थी. इस काम के लिए चुना गया था लंदन के वकील सर सिरिल रेडक्लिफ को. वो रेडक्लिफ जो कभी भारत नहीं आए थे. जिन्हें न यहां की संस्कृति की जानकारी थी न तहज़ीब का इल्म था. जो सिर्फ एक नक्शे पर लकीर खींचने आ रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि वो दुनिया का बेहद स्याह फैसला लेने जा रहे हैं. इस बंटवारे के तहत हिन्दू बहुल इलाके भारत में और मुस्लिम बहुल इलाके पाकिस्तान में शामिल किए जाने थे. देश के कई राज्यों को आज़ादी दी गई कि वो अपना पाला चुन लें. अधिकतर राज्यों ने धर्म के आधार पर देश चुना. विभाजन के बाद पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र में नए सदस्य के रूप में शामिल किया गया और भारत ने ब्रिटिश भारत की कुर्सी संभाली.

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पर 18 जुलाई 1947 को मुहर लगी.
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पर 18 जुलाई 1947 को मुहर लगी.

कौन लोग शामिल थे?

अंग्रेज़ों ने फूट डालो-राज करो की नीति के तहत 1906 में मुस्लिम लीग को मान्यता दे दी. उस समय लीग के लगभग सभी सदस्य मुसलमानों के ऊंचे तबके से आते थे. इसी तरह 1915 में बनी हिन्दू महासभा भी हिन्दुओं के ऊंचे तबके की बपौती थी. मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा-आरएसएस अपने-अपने ‘राष्ट्रों’ पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती थीं. कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का लक्ष्य आज़ादी पाना था. एक देश के लिए लक्ष्य अलग-अलग होंगे तो राहें मुश्किल ही होंगी. इसके बाद पंडित नेहरू ने 1937 में मुस्लिम लीग के सदस्यों को उत्तरप्रदेश की सरकार में शामिल करने से इनकार कर दिया. इस इनकार ने चोट का काम किया. लीग में गुस्सा बढ़ रहा था. 1945 में शिमला सम्मेलन हुआ. इसमें वायसराय लॉर्ड वेवैल के साथ देश के बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया. हालांकि यह सम्मेलन विफल रहा था. जिन्ना भी इस सम्मेलन में शामिल थे. ये वही जिन्ना हैं जिन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता करवाया था. लेकिन कांग्रेस से नाख़ुशी के बाद जिन्ना ने अलग देश की मांग कर ली. क्योंकि उन्हें लगने लगा कि भारत में मुसलमानों के साथ परायों जैसा बर्ताव हो रहा है.

जसवंत सिंह ने अपनी किताब ‘जिन्ना: इंडिया पार्टीशन इंडिपेंडेंस’ में जिन्ना को एक धर्मनिरपेक्ष नेता बताया है. उनका कहना है कि जिन्ना को अकारण ही खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.

nehru jinnah
एक मीटिंग में नेहरू, माउंटबेटेन और जिन्ना.

किसने विरोध किया?

विभाजन के लिए कई नेता तैयार नहीं थे. लेकिन निज़ामों ने विरोध करने वालों की एक न सुनी. आजादी के पूर्व तक बाबा साहेब अंबेडकर राजनीति में नहीं थे. दलितों के उत्‍थान के लिए लगातार काम रहे थे. लेकिन उनकी नज़र सियासत पर थी. वे लगातार भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस और उनके बड़े नेताओं महात्‍मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू की गलत और सही नीतियों की आलोचना कर रहे थे. मुस्‍लिम लीग के मोहम्‍मद अली जिन्‍ना को भी उन्‍होंने नहीं बख्‍शा था. उन्होंने विभाजन का कड़ा विरोध किया था. वो देश को अखंड देखना चाहते थे. उन्होंने इस मुद्दे पर एक किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी लिखी.

क्या बंटा?

ब्रिटिश भारत की संपत्ति को दोनों देशों के बीच बांटा गया. माउंटबेटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपये देने की सलाह दी थी. भारत सरकार इसे टालती रही लेकिन गांधीजी ने अनशन कर यह राशि पाकिस्तान को दिलाई. इस वजह से कई लोग गांधी की आलोचना करते रहे हैं.

बंटवारे के बाद क्या हुआ

विभाजन के बाद कई महीनों तक दोनों नए देशों के बीच लोगों की आवाजाही हुई. भारत से कई मुसलमानों ने डर और अपने मुल्क की चाहत में पलायन किया तो पाकिस्तान से हिन्दुओं और सिखों ने अपना घर छोड़ दिया. जो नहीं छोड़ना चाह रहे थे उन्हें हालातों ने मजबूर कर दिया. लूटपाट, हत्याएं, बलात्कार जैसी तमाम घटनाओं ने इस तारीख को लोगों के ज़ेहन में काली स्याही पोत दी. कुछ अपनी दोस्ती रिश्तेदारी भूल गए, कुछ इसे बचाने के लिए जान से गए. बहन-बेटियों की लूट हुई. जिसका दंश लोग अबतक भूल नहीं पाए हैं. सीमा रेखाएं तय होने के बाद लगभग 1.45 करोड़ लोगों ने सीमा पार करके अपने ‘नए देश’ में शरण ली.

1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के बाद72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गए और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए. पंजाब और लाहौर ने सबसे ज़्यादा दर्द सहा. आज भी न जाने कितनी कहानियां अनसुनी हैं. आज भी न जाने कितनी दास्तानों को लफ़्ज़ नहीं मिल सके. आंकड़ों की मानें तो इस बंटवारे में20 लाख लोगों की जान गई. लेकिन ये सिर्फ आंकड़ा है. ट्रेनों में लाशों का जत्था, मोहल्लों में आगजनी और गांवों के पलायन में गई जानों की ठीक गिनती कर पाना नामुमकिन है.

pinjar

फिल्मों में विभाजन

इस त्रासदी पर देश-दुनिया पर कई उपन्यास लिखे गए. कहानियां गढ़ी गईं. फिल्में-डॉक्युमेंट्री बनाई गईं. यशपाल की ‘झूठा सच’, भीष्म साहनी की ‘तमस’, अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’, खुशवंत सिंह की ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’  और सलमान रुश्दी की ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ (आधी रात की सन्तानें) में जो दर्द दिखाने की कोशिश हुई है वो एक नमूना भर है. पिंजर को फिल्म और तमस को दूरदर्शन का धारावाहिक भी बनाया गया. इसके अलावा ‘गरम हवा’, दीपा मेहता की ‘अर्थ’ (ज़मीन), कमल हसन की ‘हे राम’ भी भारत के विभाजन को दिखाती है. एक पंजाबी लड़की की जबरन मुसलमान के साथ शादी, लाहौर के ज़मीदार का भारत आकर पैसे-पैसे को तरसना, अपने एक साल के बच्चे को खो देना, पूरा का पूरा परिवार क़त्ल हो जाना, और ऐसे न जाने कितने हालात उस वक़्त एक साथ गुज़र रहे थे. इन सब को किसी फ़िल्म में समेट पाना मुमकिन ही नहीं है.

आखिर में भारत भूषण अग्रवाल की ये लाइनें पढ़िए-

तुमने सारे ठाठ इस आधार पर बनाए थे
कि एक की विजय
और दूसरे की पराजय होगी
तुमने दुनिया के लोगों को
या तो शत्रु समझा
या फिर मित्र
यानी तुम दो की सत्ता में विश्वास करते रहे
यह भूलकर
कि यह विभाजन दुनिया का नहीं
तुम्हारे मन का अपना है.


ये भी पढ़ें-

फ्रांस के खुफिया दस्तावेजों में दफ़न था नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत का सच!

अरुणा आसफ अली: अपने दौर से कहीं ज़्यादा आगे रहने वाली महिला

इस वजह से महात्मा गांधी से नाराज थे भगत सिंह और सुखदेव

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'मनी हाइस्ट' की खतरनाक इंस्पेक्टर अलिशिया, जिन्होंने असल में भी मीडिया के सामने उत्पात किया था

'मनी हाइस्ट' की खतरनाक इंस्पेक्टर अलिशिया, जिन्होंने असल में भी मीडिया के सामने उत्पात किया था

सब सही होता तो, टोक्यो या मोनिका में से एक रोल करती नजवा उर्फ़ अलिशिया.

कहानी 'मनी हाइस्ट' वाली नैरोबी की, जिन्होंने कभी इंडियन लड़की का किरदार करके धूम मचा दी थी

कहानी 'मनी हाइस्ट' वाली नैरोबी की, जिन्होंने कभी इंडियन लड़की का किरदार करके धूम मचा दी थी

जानिए क्या है नैरोबी उर्फ़ अल्बा फ्लोरेस का इंडियन कनेक्शन और कौन है उनका फेवरेट को-स्टार?

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

जगह थी मुंबई एयरपोर्ट. अब दस साल बाद फिर से दोनों का नाम एक साथ सुर्ख़ियों में है.

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.